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essay on women’s safety in india

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महिला सुरक्षा पर निबंध – Women’s safety essay in hindi

महिला सुरक्षा पर निबंध – Essay on women’s safety in hindi

Introduction : 

महिलाओं की सुरक्षा यह एक महत्वपूर्ण विषय हैं | भारत अपनी महान परंपरा और संस्कृति के लिए दुनिया भर में सबसे प्रसिद्ध देश है जहां महिलाओं को सबसे सम्मानित स्थान दिया जाता है। भारतीय महिलाएं सभी क्षेत्रों में काम कर रही हैं, जैसे कि वैमानिकी, अंतरिक्ष, राजनीति, बैंक, स्कूल, खेल, व्यवसाय, सेना, पुलिस, लेकिन हम भारत में महिलाओं की स्थिति के नकारात्मक पहलू को भी नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। हर दिन, हर मिनट कुछ महिलाओं को देश भर में विभिन्न स्थानों पर उत्पीड़न, छेड़छाड़, मारपीट जैसे अपराधों का सामना करना पड़ता है। 

आंकड़ों के अनुसार, यह पाया गया है कि भारत में हर 20 मिनट में एक महिला का बलात्कार होता है। भारत की राष्ट्रीय राजधानी में निर्भया सामूहिक बलात्कार एक भयानक घटना थी जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। भारत में महिला सुरक्षा के संबंध में स्थिति को सुधारने के लिए आत्मरक्षा तकनीक सबसे महत्वपूर्ण है जिसके लिए प्रत्येक महिला को अपनी सुरक्षा के लिए जागरूक होना चाहिए। उनके पास सभी आपातकालीन नंबर होने चाहिए ताकि वे तुरंत अपने परिवार के सदस्यों और पुलिस से संपर्क कर सकें।

  • भारत के बदलते युग के साथ-साथ नारी को लेकर सोच को भी काफी हद तक बदल गई है आज की नारी हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ चलकर काम कर रही है।
  • शिक्षित होकर अपने जीवन में नई ऊँचाइयों को पा रही है, फिर भी वह अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित है, आज के युग में नारी सुरक्षा एक बड़ी समस्या बन चुका है, नारी सुरक्षा के कानून और कायदे होते हुए भी उस पे अत्याचार होते रहते हैं, वह अत्याचार घरेलू हिंसा, सामाजिक संस्थानों पर नारी शोषण, दहेज़ को लेकर कई प्रकार से परेशान किया जाता है।
  • आज वह पढ़ लिख कर शिक्षित तो बन गई है मगर फिर भी अपने हक और अपनी स्वतंत्रता के लिए उसे कई बार लड़ना पड़ता है सरकार के नियम और कानून होते हुए भी पुरुष प्रधान देश में वह कई बार लाचार बन जाती है।
  • आजकल तो नारी ना तो घर में सुरक्षित है ना ही बाहर सुरक्षित है ऐसे हालातों से नारी गुज़र रही है। उसपे बलात्कार जैसी घटनाएँ आए दिन बढ़ रही है देश के विकसित समाज के लिए यह घटनाएँ एक कलंक रूप में साबित हो रही है।
  • बलात्कार जैसी घटनाएँ देश और नारी दोनों के लिए एक सवाल रुक बन चुकी है। क्यों होती है ऐसी घटनाएँ ! क्यों नारी आज के जमाने में पूर्ण रूप में सुरक्षित रूप से नहीं रह पा रही है। आज की बदलती इस दौर में नारी का सुरक्षित रह पाना मुश्किल बन गया है।
  • नारी आज घर से बाहर निकलने से डर रही है, आज के समय में बलात्कार जैसी घटनाएँ काफी हद तक बढ़ गई है, नारी आज किसी भी क्षेत्र में अपने को सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रही है।
  • नारी को जो देश देवी के रूप में पूजा जाता था वहीं आज उसका चीर हरण कर रहा है। इसके पीछे का एक कारण इंटरनेट का दुरुपयोग भी माना जा रहा है। मोबाइल में सब कुछ देखने को मिल जाता है जिससे आज का युवा वर्ग सोचे समझे इसका अनुकरण भी कर लेता है।
  • जो आज के समाज और नारी दोनों के लिए ख़तरा रूप साबित हो रहा है उसके साथ साथ आज की फिल्में में दिखाई जाने वाली उत्तेजित दृश्य, सीरियल में भी आज देश आने वाले दृश्य भी बलात्कार जैसी वारदातों के लिए का रूप माना गया है। 
  • इन सब से बचने के लिए किसी भी नारी को अपनी सुरक्षा के लिए खुद तैयार होना पड़ेगा। हर जगह साकार या परिवार साथ नहीं रह सकता इसलिए आज के जमाने में नारी को अपनी रक्षा के लिए खुद ही मजबूत होना पड़ेगा अपनी अपनी सुरक्षा के लिए मिर्ची स्प्रे, कराटे जैसी चीजों को सीख कर आत्मनिर्भर बनना पड़ेगा।
  • आज के विकसित और बदलते भारत के साथ नारी अपनी सुरक्षा खुद ही कर सकें ऐसे कार्यक्रमों को बढ़ावा देना चाहिए नारी को अपनी सुरक्षा को लेकर खुद ही तैयार होना पड़ेगा भारत सरकार नारी सुरक्षा को लेकर जागृत हे, और उसके लिए कड़े कानून और नियम के साथ-साथ सजा भी करता है।
  • महिलाएं घर की इज़्ज़त होती है। उनका सम्मान और रक्षा करना एक सच्चे नागरिक का कर्त्तव्य है। लोगो को समझना चाहिए अगर महिलाएं ना होती तो बच्चे भी ना होते और परिवार नहीं बनता।
  • हम जो भी है ,जिस मुकाम पर है उसके पीछे हमारी माँ का हाथ है। माँ , बहन इत्यादि सारे रिश्तो का सम्मान सिर्फ पुरुषो को करना चाहिए। सिर्फ कहने के लिए नहीं होने चाहिए।
  • गाँव के कुछ जगहों में महिलाओं पर दैनिक अत्याचार होते है। पति और सास -ससुर का बहु को मारना। उसको दहेज़ के लिए प्रताड़ित करना , यह सब शामिल है। वहां महिलाएं अपने ऊपर हो रहे जुल्मो के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाती है और सहती रहती है। यह बिलकुल गलत है।
  • निर्भया बलात्कार केस ने सम्पूर्ण देश को हिलाकर रख दिया था और नारियों की सुरक्षा के विषय में सोचने पर मज़बूर कर दिया था। इकीसवीं शताब्दी में आकर भी देश में लड़कियां सुरक्षित नहीं है। आये दिन दर्दनाक घटनाओ को सुनकर , मानवता शर्मसार हो रही है
  • आज कल सरकार पहले की तुलना में काफी जागरूक हुयी है। पुलिस वाले भी रात होने पर निगरानी करते है , कि सब कुछ ठीक है या नहीं। लड़कियों के सुरक्षा के लिए हेल्पलाइन नंबर्स भी जारी किये गए है।

Conclusion : 

महिलाओं के खिलाफ होने वाले सभी प्रकार के अपराधों के लिए सुरक्षा कानूनों की एक सूची है लेकिन महिलाओं के खिलाफ अपराधों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। हमें इसके लिए केवल सरकार को दोष नहीं देना चाहिए क्योंकि महिला सुरक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, यह प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। महिला सुरक्षा की इस समस्या को समझने और हल करने की तत्काल आवश्यकता है ताकि वे भी अपने देश में पुरुषों की तरह समान रूप से विकसित और हमारे देश की तरक्की में अपना योगदान दे सकें।

महिला सशक्तिकरण पर निबंध

Introduction :

नारी सशक्तिकरण के नारे के साथ एक प्रश्न उठता है कि “क्या महिलाएँ सचमुच में मजबूत बनी है” और “क्या उसका लंबे समय का संघर्ष खत्म हो चुका है”। राष्ट्र के विकास में महिलाओं की सच्ची महत्ता और अधिकार के बारे में समाज में जागरुकता लाने के लिये मातृ दिवस, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस आदि जैसे कई सारे कार्यक्रम सरकार द्वारा चलाये जा रहे और लागू किये गये है। महिलाओं को कई क्षेत्र में विकास की जरुरत है। ‘सशक्तिकरण’ से तात्पर्य किसी व्यक्ति की उस क्षमता से है जिससे उसमें ये योग्यता आ जाती है जिसमें वो अपने जीवन से जुड़े सभी निर्णय स्वयं ले सके। महिला सशक्तिकरण में भी हम उसी क्षमता की बात कर रहे है जहाँ महिलाएँ परिवार और समाज के सभी बंधनों से मुक्त होकर अपने निर्णयों की निर्माता खुद हो।

अपनी निजी स्वतंत्रता और स्वयं के फैसले लेने के लिये महिलाओं को अधिकार देना ही महिला सशक्तिकरण है। वें देश और परिवार की आर्थिक स्थिति का प्रबंधन करने में पूरी तरह से सक्षम है। अत: महिलाओं के सशक्त होने से पूरा समाज अपने आप सशक्त हो जायेगा। भारत में, महिलाओं को सशक्त बनाने के लिये सबसे पहले समाज में उनके अधिकारों और मूल्यों को मारने वाले उन सभी राक्षसी सोच को मारना जरुरी है जैसे दहेज प्रथा, अशिक्षा, यौन हिंसा, असमानता, भ्रूण हत्या, महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा, वैश्यावृति और मानव तस्करी ।

  • पुरुष और महिला को बराबरी पर लाने के लिये महिला सशक्तिकरण में तेजी लाने की जरुरत है। सभी क्षेत्रों में महिलाओं का उत्थान राष्ट्र की प्राथमिकता में शामिल होना चाहिये। महिला और पुरुष के बीच की असमानता कई समस्याओं को जन्म देती है जो राष्ट्र के विकास में बड़ी बाधा के रुप में सामने आ सकती है।
  • ये महिलाओं का जन्मसिद्ध अधिकार है कि उन्हें समाज में पुरुषों के बराबर महत्व मिले। वास्तव में सशक्तिकरण को लाने के लिये महिलाओं को अपने अधिकारों से अवगत होना चाहिये। न केवल घरेलू और पारिवारिक जिम्मेदारियों बल्कि महिलाओं को हर क्षेत्रों में सक्रिय और सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिये। उन्हें अपने आस-पास और देश में होने वाली घटनाओं को भी जानना चाहिये।
  • महिला सशक्तिकरण में ये ताकत है कि वो समाज और देश में बहुत कुछ बदल सकें। वो समाज में किसी समस्या को पुरुषों से बेहतर ढ़ंग से निपट सकती है। वो देश और परिवार के लिये अधिक जनसंख्या के नुकसान को अच्छी तरह से समझ सकती है।
  • अच्छे पारिवारिक योजना से वो देश और परिवार की आर्थिक स्थिति का प्रबंधन करने में पूरी तरह से सक्षम है। पुरुषों की अपेक्षा महिलाएँ किसी भी प्रभावकारी हिंसा को संभालने में सक्षम है चाहे वो पारिवारिक हो या सामाजिक।
  • महिला सशक्तिकरण के द्वारा ये संभव है कि एक मजबूत अर्थव्यवस्था के महिला-पुरुष समानता वाले वाले देश को पुरुषवादी प्रभाव वाले देश से बदला जा सकता है। महिला सशक्तिकरण की मदद से बिना अधिक प्रयास किये परिवार के हर सदस्य का विकास आसानी से हो सकता है।
  • एक महिला परिवार में सभी चीजों के लिये बेहद जिम्मेदार मानी जाती है अत: वो सभी समस्याओं का समाधान अच्छी तरह से कर सकती है। महिलाओं के सशक्त होने से पूरा समाज अपने आप सशक्त हो जायेगा।
  • महिलाओं के लिये प्राचीन काल से समाज में चले आ रहे गलत और पुराने चलन को नये रिती-रिवाजों और परंपरा में ढ़ाल दिया गया था। भारतीय समाज में महिलाओं को सम्मान देने के लिये माँ, बहन, पुत्री, पत्नी के रुप में महिला देवियो को पूजने की परंपरा है लेकिन इसका ये कतई मतलब नहीं कि केवल महिलाओं को पूजने भर से देश के विकास की जरुरत पूरी हो जायेगी।
  • आज जरुरत है कि देश की आधी आबादी यानि महिलाओं का हर क्षेत्र में सशक्तिकरण किया जाए जो देश के विकास का आधार बनेंगी।
  • भारत एक प्रसिद्ध देश है जिसने ‘विविधता में एकता’ के मुहावरे को साबित किया है, जहाँ भारतीय समाज में विभिन्न धर्मों को मानने वाले लोग रहते है। महिलाओं को हर धर्म में एक अलग स्थान दिया गया है जो लोगों की आँखों को ढ़के हुए बड़े पर्दे के रुप में और कई वर्षों से आदर्श के रुप में महिलाओं के खिलाफ कई सारे गलत कार्यों (शारीरिक और मानसिक) को जारी रखने में मदद कर रहा है।
  • प्राचीन भारतीय समाज दूसरी भेदभावपूर्ण दस्तूरों के साथ सती प्रथा, नगर वधु व्यवस्था, दहेज प्रथा, यौन हिंसा, घरेलू हिंसा, गर्भ में बच्चियों की हत्या, पर्दा प्रथा, कार्य स्थल पर यौन शोषण, बाल मजदूरी, बाल विवाह तथा देवदासी प्रथा आदि परंपरा थी। इस तरह की कुप्रथा का कारण पितृसत्तामक समाज और पुरुष श्रेष्ठता मनोग्रन्थि है।
  • पुरुष पारिवारिक सदस्यों द्वारा सामाजिक राजनीतिक अधिकार (काम करने की आजादी, शिक्षा का अधिकार आदि) को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया। महिलाओं के खिलाफ कुछ बुरे चलन को खुले विचारों के लोगों और महान भारतीय लोगों द्वारा हटाया गया जिन्होंने महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण कार्यों के लिये अपनी आवाज उठायी।
  • राजा राम मोहन रॉय की लगातार कोशिशों की वजह से ही सती प्रथा को खत्म करने के लिये अंग्रेज मजबूर हुए। बाद में दूसरे भारतीय समाज सुधारकों (ईश्वर चंद्र विद्यासागर, आचार्य विनोभा भावे, स्वामी विवेकानंद आदि) ने भी महिला उत्थान के लिये अपनी आवाज उठायी और कड़ा संघर्ष किया। भारत में विधवाओं की स्थिति को सुधारने के लिये ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने अपने लगातार प्रयास से विधवा पुर्न विवाह अधिनियम 1856 की शुरुआत करवाई।
  • पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं के खिलाफ होने वाले लैंगिक असमानता और बुरी प्रथाओं को हटाने के लिये सरकार द्वारा कई सारे संवैधानिक और कानूनी अधिकार बनाए और लागू किये गये है।

Conclusion : 

हालाँकि ऐसे बड़े विषय को सुलझाने के लिये महिलाओं सहित सभी का लगातार सहयोग की जरुरत है। आधुनिक समाज महिलाओं के अधिकार को लेकर ज्यादा जागरुक है जिसका परिणाम हुआ कि कई सारे स्वयं-सेवी समूह और एनजीओ आदि इस दिशा में कार्य कर रहे है। महिलाएँ ज्यादा खुले दिमाग की होती है और सभी आयामों में अपने अधिकारों को पाने के लिये सामाजिक बंधनों को तोड़ रही है। हालाँकि अपराध इसके साथ-साथ चल रहा है। भारतीय समाज में सच में महिला सशक्तिकरण लाने के लिये महिलाओं के खिलाफ बुरी प्रथाओं के मुख्य कारणों को समझना और उन्हें हटाना होगा। जरुरत है कि हम महिलाओं के खिलाफ पुरानी सोच को बदले और संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों में भी बदलाव लाये।

बेटी बचाओबेटी पढ़ाओ पर निबंध

Introduction :

बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ योजना की शुरुआत भारतीय सरकार द्वारा 2015 के जनवरी महीने में हुई। इस योजना का मकसद भारतीय समाज में लड़कियों और महिलाओं के लिये कल्याणकारी कार्यों की कुशलता को बढ़ाने के साथ-साथ लोगों के बीच जागरुकता उत्पन्न करने के लिये भी है। 22 जनवरी 2015 को भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा सफलतापूर्वक इस योजना का आरंभ हुआ। इस योजना को सभी राज्य और केन्द्र शासित प्रदेशों में लागू करने के लिये एक राष्ट्रीय अभियान के द्वारा देश के 100 चुनिंदा शहरों में इस योजना को लागू किया गया । इस कार्यक्रम की शुरुआत करते समय प्रधनमंत्री ने कहा कि, भारतीय लोगों की ये सामान्य धारणा है कि लड़कियाँ अपने माता-पिता के बजाय पराया धन होती है।

अभिवावक सोचते है कि लड़के तो उनके अपने होते है जो बुढ़ापे में उनकी देखभाल करेंगे जबकि लड़कियाँ तो दूसरे घर जाकर अपने ससुराल वालों की सेवा करती हैं। लड़कियों या महिलाओं को कम महत्ता देने से धरती पर मानव समाज खतरे में पड़ सकता है क्योंकि अगर महिलाएँ नहीं तो जन्म नहीं। इसमें कुछ सकारात्मक पहलू ये है कि ये योजना लड़कियों के खिलाफ होने वाले अपराध और गलत प्रथाओं को हटाने के लिये एक बड़े कदम के रुप में साबित होगी।

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान के उद्देश्य –

  • इस अभियान के मुख्य उद्देश्य बालिकाओं की सुरक्षा करना और कन्या भ्रूण हत्या को रोकना है। इसके अलावा बालिकाओं की शिक्षा को बढ़ावा देना और उनके भविष्य को संवारना भी इसका उद्देश्य है। सरकार ने लिंग अनुपात में समानता लाने के लिए ये योजना शुरू की।
  • ताकि बालिकाएं दुनिया में सर उठकर जी पाएं और उनका जीवन स्तर भी ऊंचा उठे। इसका उद्देश्य बेटियों के अस्तित्व को बचाना एवं उनकी सुरक्षा को सुनिश्चित करना भी है। शिक्षा के साथ-साथ बालिकाओं को अन्य क्षेत्रों में भी आगे बढ़ाना एवं उनकी इसमें भागीदारी को सुनिश्चित करना भी इसका मुख्य लक्ष्य है|
  • इस अभियान के द्वारा समाज में महिलाओं के साथ हो रहे अन्याय और अत्याचार के विरूद्ध एक पहल हुई है। इससे बालक और बालिकाओं के बीच समानता का व्यवहार होगा। बेटियों को उनकी शिक्षा के लिए और साथ ही उनके विवाह के लिए भी सहायता उपलब्ध करवाई जाएगी, जिससे उनके विवाह में किसी प्रकार की दिक्कत नहीं होगी।
  • इस योजना से बालिकाओं को उनके अधिकार प्राप्त होंगे जिनकी वे हकदार हैं साथ ही महिला सशक्तिकरण के लिए भी यह अभियान एक मजबूत कड़ी है।

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान के कार्य –

  • हर थोड़े दिनों बाद हमें कन्या भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा, महिलाओं पर शारीरिक और मानसिक अत्याचार जैसे अपराधों की खबर देखने और सुनने को मिलती है। जिसके लिए भारत देश की सरकार इन बालिकाओं को बचाने और उनके अच्छे भविष्य के लिए हर संभव कोशिश कर रही है और अलग अलग योजनाएं चला रही है|
  • बालिकाओं की देखभाल और परवरिश अच्छी हो इसके लिए कई तरह के नए नियम कानून भी लागू किये जा रहे हैं। इसके साथ ही पुराने नियम कानूनों को बदला भी जा रहा है|
  • इस योजना के तहत मुख्य रूप से लड़के एवं लड़कियों के लिंग अनुपात में ध्यान केन्द्रित किया गया है, ताकि महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव और सेक्स डेटरमिनेशन टेस्ट को रोका जा सके।
  • इस अभियान का संचालन तीन स्तर पर हो रहा है, राष्ट्रीय स्तर पर, राजकीय स्तर पर और जिला स्तर पर। इस योजना में माता पिता एक निश्चित धनराशि अपनी बेटी के बैंक खाते में जमा करवाते हैं और सरकार उस राशि पर लाभ प्रदान करती है ताकि वह धनराशि बालिका की उच्च शिक्षा में और विवाह में काम आए।
  • जिससे बेटियों को बोझ ना समझा जाए। सरकार इस अभियान के द्वारा बालिकाओं की सुरक्षा और उनके उज्जवल भविष्य की कामना करती है।
  • इस अभियान के शुरुआती दौर में सभी ने इसका स्वागत और समर्थन किया लेकिन फिर भी ये इतना सफल नहीं हो पाया जितना सोचा गया था। बालिकाओं की स्थिति में सुधार लाने के लिए लोगों को जागरूक होना होगा और सभी को एकजुट होकर इस समस्या का समाधान करना होगा।
  • एक बच्ची दुनिया में आकर सबसे पहले बेटी बनती है। वे अपने माता पिता के लिए विपत्ति के समय में ढाल बनकर खड़ी रहती है। बालिका बन कर भाई की मदद करती है। बाद में धर्मपत्नी बनकर अपने पति और ससुराल वालों का हर अच्छी बुरी परिस्थिति में साथ निभाती है।
  • वह त्यागमूर्ति मां के रूप में अपने बच्चों पर सब कुछ कुर्बान कर जाती है और अपने बच्चों में अच्छे संस्कारों के बीज बोती है, जिससे वे आगे चलकर अच्छे इंसान बनें। सभी को बेटी और बेटों के साथ एक समान व्यवहार करना चाहिए।

Conclusion : 

उन्हें समान रूप से शिक्षा और जीवन स्तर देना चाहिए, समान अधिकार और प्यार – दुलार देना चाहिए, क्योंकि किसी भी देश के विकास के लिए बेटियां समान रूप से जिम्मेदार है। हम ये आशा करते हैं कि आने वाले दिनों में सामाजिक-आर्थिक कारणों की वजह से किसी भी लड़की को गर्भ में नहीं मारा जायेगा, अशिक्षित नहीं रहेंगी, असुरक्षित नहीं रहेंगी, अत: पूरे देश में लैंगिक भेदभाव को मिटाने के द्वारा बेटी-बचाओ बेटी-पढ़ाओ योजना का लक्ष्य लड़कियों को आर्थिक और सामाजिक दोनों तरह से स्वतंत्र बनाने का है। लडकियों को लडकों के समान समझा जाना चाहिए और उन्हें सभी कार्यक्षेत्रों में समान अवसर प्रदान करने चाहिए।

शिक्षा का अधिकार पर निबंध

Introduction :

प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में शिक्षा का बड़ा महत्व हैं,शिक्षा को जीवन का आधार माना गया हैं। किसी भी देश के आधुनिक या विकसित होने का प्रमाण उस देश के नागरिकों के शिक्षा स्तर पर निर्भर करता हैं। आधुनिक समय में शिक्षा को ही किसी राष्ट्र या समाज की प्रगति का सूचक समझा जाता हैं। शिक्षा का अधिकार अधिनियम संसद का एक अधिनियम है जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 ए के तहत भारत में 6 से 14 वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए नि: शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के महत्व का वर्णन करता है। यह अधिनियम 1 अप्रैल 2010 से लागू हुआ। इस अधिनियम की खास बात यह है कि गरीब परिवार के वे बच्चे, जो प्राथमिक शिक्षा से वंचित हैं, के लिए निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान रखा गया है ।

शिक्षा के अधिकार के साथ बच्चों एवं युवाओं का विकास होता है तथा राष्ट्र शक्तिशाली एवं समृद्ध बनता है । यह उत्तरदायी एवं सक्रिय नागरिक बनाने में भी सहायक है । इसमें देश के सभी लोगों, अभिभावकों एवं शिक्षकों का भी सहयोग आवश्यक है । इस कानून के लागू करने पर आने वाले खर्च केंद्र (55 प्रतिशत) और राज्य सरकार (45 प्रतिशत) मिलकर उठाएंगे।

  • आज विश्व के सभी राष्ट्रों द्वारा भारतीय युवाओं की प्रतिमा का मुक्त कण्ठ से गुणगान किया जाना इसका प्रमाण है । बावजूद इसके सम्पूर्ण राष्ट्र की शिक्षा को आधार मानकर विश्लेषण किया जाए तो अभी भी भारत शिक्षा के क्षेत्र में विकसित राष्ट्रों की तुलना में काफी पीछे है ।
  • वर्तमान में भारतीय शिक्षा दर अनुमानतः 74% है, जो वैश्विक स्तर पर बहुत कम है । तब इस अनुपात में और वृद्धि करने के लिए बुद्धिजीवियों ने अपने-अपने सुझाव दिए ।
  • उन सभी के सुझावों पर गौर अते हुए भारत सरकर ने शिक्षा को अनिवार्य रूप से लागू करने हेतु शिक्षा का अधिकार कानून (RTE Act) बनाकर पूरे देश में समान रूप से प्रस्तुत कर दिया ।
  • ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009’, 1 अप्रैल, 2010 से सम्पूर्ण भारत में लागू कर दिया गया । इसका प्रमुख उद्देश्य है- वर्ष आयु तक के सभी बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य, गुणवतायुक्त शिक्षा को सुनिश्चित करना । इस अधिनियम को सर्व शिक्षा अभियान तथा वर्ष 2005 के विधेयक का ही संशोधित रूप कहा जाए, तो समीचीन ही होगा ।
  • क्षेत्रीय सरकारों, अधिकारियों तथा अभिभावकों का यह दायित्व है कि वे बच्चे को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा दिलाने का प्रबन्ध करें । इस कार्य हेतु वित्तीय प्रबन्धन का पूर्ण दायित्व केन्द्र व राज्य सरकार द्वारा मिश्रित रूप से उठाया जाएगा । कोई भी बच्चा किसी समय विद्यालय में प्रवेश पाने को स्वतन्त्र है ।
  • आयु प्रमाण-पत्र न होने के बावजूद, बच्चा विद्यालय में प्रवेश ले सकता है । बच्चों की आवश्यकता का ध्यान रखते हुए पुस्तकालय, खेल के मैदान, स्वच्छ व मजबूत विद्यालय कक्ष, इमारत आदि का प्रबन्ध राज्य सरकार द्वारा किया जाएगा ।
  • शिक्षण की गुणवत्ता में सुधार हेतु 35 छात्रों पर एक शिक्षक का प्रावधान किया गया है तथा साथ ही यह सुनिश्चित किया गया है कि ग्रामीण ब शहरी किसी भी क्षेत्र में यह अनुपात प्रभावित न हो। 
  • इसके साथ ही अध्यापन की गुणवत्ता हेतु केवल प्रशिक्षित अध्यापकों को ही नियुक्त करने का प्रावधान किया गया है जो अप्रशिक्षित अध्यापक, प्राचीन समय से अध्यापनरत हैं, उन्हें सीमित अवधि में अध्यापक-प्रशिक्षण पूर्ण करने का आदेश पारित किया गया है, अन्यथा उन्हें पद-मुक्त किया जा सकता हे।

इसके अतिरिक्त निम्न कार्यों का पूर्ण रूप से निषेध है –

  • छात्रों को शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना देना ।
  • प्रवेश के दौरान छात्रों से कोई लिखित परीक्षा लेना ।
  • छात्रों या उनके अभिभावकों से किसी प्रकार का शुल्क लेना।
  • छात्रों को ट्‌यूशन पढ़ने के लिए बाध्य करना ।
  • बिना मान्यता प्राप्ति के विद्यालय का संचालन करना ।
  • इसी प्रकार निजी विद्यालयों में भी कक्षा 1 से प्रवेश के समय आर्थिक रूप से कमजोर समुदायों के छात्रों हेतु 25% आरक्षण का प्रावधान सुनिश्चित किया गया है ।
  • इस अधिनियम को प्रभावी बनाने का उत्तरदायित्व केन्द्र ब राज्य सरकार दोनों का है, जिसका वित्तीय बहन भी दोनों संयुक्त रूप से करेंगे ।
  • इस अधिनियम के अनुसार, वित्तीय बहन का दायित्व सर्वप्रथम राज्य सरकार को सौंपा गया था, परन्तु राज्य सरकार ने अपनी विवशता का हवाला देते हुए इसे अस्वीकार कर दिया तथा केन्द्र सरकार से मदद का अनुरोध किया, तदुपरान्त केन्द्र तथा राज्य सरकार द्वारा 65:36 अनुपात के तहत वित्तीय प्रबन्धन का विभाजन किया गया । उत्तर-पूर्वी राज्यों में यह अनुपात 90:10 है।

केन्द्र सरकार के दायित्व –

(i) बच्चों का चहुँमुखी विकास ।

(ii) संवैधानिक मूल्यों का विकास ।

(iii) जहाँ तक हो सके, मातृभाषा में शिक्षण दिया जाए ।

(iv) बच्चों के मानसिक बिकास के अनुरूप, उनका नियमित विश्लेषण । (धारा-29 के अन्तर्गत)

(v) बच्चों को भयमुक्त माहौल प्रदान कराना तथा अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का विकास करना ।

राज्य सरकार के दायित्व –

(i) वह प्रत्येक बच्चे को नि:शुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराएगी ।

(ii) अपने क्षेत्र के 14 वर्ष आयु तक के बच्चों का पूर्ण रिकॉर्ड रखेगी ।

(iii) शैक्षणिक कलेण्डर का निर्धारण करेगी (धारा-9 के अन्तर्गत)।

सर्व शिक्षा अभियान द्वारा पारित लक्ष्य वर्ष 2010 तक पूर्ण न हो पाया था, इसके अतिरिक्त यह अधिनियम भी लागू कर दिया गया । अतः यह कहना समीचीन ही होगा कि इस अधिनियम में सर्व शिक्षा अभियान के सभी नियम समाहित है ।

Conclusion : 

अधिनियम शिक्षा को 6 से 14 वर्ष की आयु के बीच हर बच्चे का मौलिक अधिकार बनाता है। अब भारत में 74% आबादी साक्षर है जिसमें पुरुषों में 80% और महिला 65% शामिल हैं। यह शिक्षा का मौलिक अधिकार 6 से 14 वर्षो के बालक-बालिकाओं के लिए निशुल्क और गुणवतापूर्ण शिक्षा की सहायता से उन्हें समान रूप से शिक्षा और रोजगार के समान अवसरों की उपलब्धता सुनिश्चित करवाएगा, इससे हमारा भारत शिक्षित और विकसित बनेगा।

निजता का अधिकार पर निबंध

Introduction :

मनुष्य की ज़रूरतें सबसे प्राथमिक ज़रूरतों जैसे कि भोजन, कपड़े और आश्रय से लेकर माध्यमिक ज़रूरतों जैसे शिक्षा, काम और मनोरंजन और आगे की ज़रूरतों जैसे मनोरंजन, भोजन, अवकाश, यात्रा, आदि से शुरू होती हैं। यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि इन सभी जरूरतों और इच्छाओ (wants) में गोपनीयता कहाँ है ? किसी भी सभ्य समाज में गोपनीयता की एक बुनियादी डिग्री एक प्राथमिक आवश्यकता है। जैसे-जैसे गोपनीयता की डिग्री बढ़ती है, यह एक माध्यमिक जरूरत और आगे एक इच्छा में विकसित हो जाती है।

निजता का अधिकार नागरिकों की निजता के अधिकार को लेकरकर यह सुनिश्चित करता है की सभी समान रूप से संरक्षित हो और अमीर और गरीब के लिए समान न्याय और अधिकार हो। आधार के लिए भारत के निवासियों के व्यक्तिगत डेटा के संग्रह की आवश्यकता होती है, और इसके परिणामस्वरूप चूक होने की संभावना को लेकर विवाद पैदा हो सकता है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि इसमें बायोमेट्रिक विवरण जैसे कि आईरिस स्कैनिंग और फिंगर प्रिंट के संग्रह की आवश्यकता होती है जो अनिवार्य रूप से महत्वपूर्ण विवरण हैं और इसका दुरुपयोग किया जा सकता है। साइबर स्पेस एक संवेदनशील स्थान है और यहाँ खतरे की संभावना अधिक है हालांकि, आधार अपने आप में एक सुविचारित कार्यक्रम है ताकि वित्तीय समावेशन सुनिश्चित किया जा सके।

निजता का महत्त्व

  • निजता वह अधिकार है जो किसी व्यक्ति की स्वायतता और गरिमा की रक्षा के लिये ज़रूरी है। वास्तव में यह कई अन्य महत्त्वपूर्ण अधिकारों की आधारशिला है।
  • दरअसल निजता का अधिकार हमारे लिये एक आवरण की तरह है, जो हमारे जीवन में होने वाले अनावश्यक और अनुचित हस्तक्षेप से हमें बचाता है।
  • यह हमें अवगत कराता है कि हमारी सामाजिक आर्थिक और राजनैतिक हैसियत क्या है और हम स्वयं को दुनिया से किस हद तक बाँटना चाहते हैं।
  • वह निजता ही है जो हमें यह निर्णित करने का अधिकार देती है कि हमारे शरीर पर किसका अधिकार है?
  • आधुनिक समाज में निजता का महत्त्व और भी बढ़ जाता है। फ्रांस की क्रांति के बाद समूची दुनिया से निरंकुश राजतंत्र की विदाई शुरू हो गई और समानता, मानवता और आधुनिकता के सार्वभौमिक सिद्धांतों पर आधारित लोकतंत्र ने पैर पसारना शुरू कर दिया।
  • अब राज्य लोगों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ चलाने लगे तो यह प्रश्न प्रासंगिक हो उठा कि जिस गरिमा के भाव के साथ जीने का आनंद लोकतंत्र के माध्यम से मिला उसे निजता के हनन द्वारा छिना क्यों जा रहा है?
  • तकनीक और अधिकारों के बीच हमेशा से टकराव होते आया है और 21वीं शताब्दी में तो तकनीकी विकास अपने उच्चतम स्तर पर पहुँच चुका है। ऐसे में निजता को राज्य की नीतियों और तकनीकी उन्नयन की दोहरी मार झेलनी पड़ी।
  • आज हम सभी स्मार्टफोंस का प्रयोग करते हैं। चाहे एपल का आईओएस हो या गूगल का एंड्राइड या फिर कोई अन्य ऑपरेटिंग सिस्टम, जब हम कोई भी एप डाउनलोड करते हैं, तो यह हमारे फ़ोन के कॉन्टेक्ट, गैलरी और स्टोरेज़ आदि के प्रयोग की इज़ाज़त मांगता है और इसके बाद ही वह एप डाउनलोड किया जा सकता है।
  • ऐसे में यह खतरा है कि यदि किसी गैर-अधिकृत व्यक्ति ने उस एप के डाटाबेस में सेंध लगा दी तो उपयोगकर्ताओं की निजता खतरे में पड़ सकती है।
  • तकनीक के माध्यम से निजता में दखल, राज्य की दखलंदाज़ी से कम गंभीर है। हम ऐसा इसलिये कह रहे हैं क्योंकि तकनीक का उपयोग करना हमारी इच्छा पर निर्भर है, किन्तु राज्य प्रायः निजता के उल्लंघन में लोगों की इच्छा की परवाह नहीं करता।
  • आधार का मामला इसका जीता जागता उदाहरण है। जब पहली बार आधार का क्रियान्वयन आरंभ किया गया तो कहा यह गया कि यह सभी भारतीयों को एक विशेष पहचान संख्या देने के उद्देश्य से लाई गई है। जल्द ही मनरेगा सहित कई बड़ी योजनाओं में बेनिफिट ट्रान्सफर के लिये आधार अनिवार्य कर दिया गया।
  • यहाँ तक कि आधार पर किसी भी प्रकार के विचार-विमर्श से किनारा करते हुए इसे मनी बिल यानी धन विधेयक के तौर पर संसद में पारित कर दिया गया। इन सभी बातों से पता चलता है कि निजता जो कि लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखने के लिये आवश्यक है, गंभीर खतरे में है।

गोपनीयता का उल्लंघन

  • सोशल मीडिया चैनलों और साइटों पर गोपनीयता भंग होने के अधिक मामले देखे जा सकते हैं, जिसमें साइबर अपराधियों द्वारा व्यक्ति के जीवन को नष्ट करने वाले जघन्य अपराध करने के लिए लोगों की व्यक्तिगत जानकारी और डेटा को हैक किया जाता है।
  • कई हैकर्स हमारे सोशल मीडिया और बैंकिंग खातों में घुस जाते हैं और लीक हुई जानकारी के जरिए पैसा कमाने के लिए संवेदनशील डेटा चुरा लेते हैं।
  • इतना ही नहीं, बल्कि कई अन्य क्षेत्र भी हैं जो गोपनीयता के उल्लंघन से पीड़ित हैं। इसलिए, यह एक प्रमुख चिंता का विषय है और सरकार को इससे निपटना चाहिए।

इंटरनेट के उपयोग के साथ, इस युग में, फेसबुक और ट्यूटर जैसे सामाजिक नेटवर्क सामाजिक संपर्क के नए रूपों को चला रहे हैं और उपलब्धता ने गोपनीयता संबंधी चिंताओं को बढ़ा दिया है। इसके लिए सरकार को साइबर सुरक्षा प्रणाली को मजबूत करना चाहिए और कानून के माध्यम से आश्वासन देना चाहिए कि निजता के अधिकार का उल्लंघन  न हो और निजी जानकारी को निजी रखा जाये।

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Essays

Essay on Women’s Safety in India

Short Essay on Women’s Safety in India

Introduction :

Women safety in India is a big concern which has been a most important topic regarding women safety. India is a most famous country all over the world for its great tradition and culture where women are given most respected place. Women are given the place of Goddess Lakshmi in the Indian society. Indian women are found working in all fields like aeronautics, space, politics, banks, schools, sports, businesses, army, police, and many more however we also cannot ignore the negative aspect of women position in India.

  • Every day and every minute some women are getting harassed, molested, assaulted, and violated at various places all over the country. 
  • There is a big list of crimes against women in India such as acid attack, domestic violence, child abuse, dowry deaths, honor killings, rape, sexual harassment, forced prostitution, and many more.
  • In order to improve the condition regarding women safety in India self-defense techniques are the first and foremost thing to which each and every woman must be aware of for their safety.
  • They must have all the emergency numbers with them so that they can immediately contact to their family members and police.
  • There is a list of safety laws for women from all type of crimes against women but the number and frequency of crimes against women are increasing day by day. 

Conclusion :

We should not blame the government because women safety is not only the responsibility of government only, it is the responsibility of every citizen. There is an urgent need to understand and solve this problem of women safety so that they can also grow equally like men in their own country.

Long Essay on Women’s Safety in India

Introduction :

Women safety in India has now become one of the major issues in India. The crime rate in India is constantly increasing. Women are neither safe outside nor at their own home. Women travellers from other part of the world are also in a dubious state while thinking about coming to India. There are many laws but there should be proper safety measures which we have to follow strictly to protect the women from any kind of violence in India.

  • Women’s are facing many dire issues due to violence and discrimination and also this kept them away from being a part of any social activity.
  • In India, the crimes against women and violence is on the hike due to the fact that Durga, Sati, Sabitri are worshipped by the people treating them as the goddess in India.
  • In these days Women showed their talent in every field ranging from the taxi driver to the CEO of multinational companies. People must give up the idea that women can’t do anything by going out of the house.
  • They should accept the fact that she has set foot on the moon i.e. Kalpana Chawala, the first Indian woman astronaut stepping on the moon, became a role model for not only women around the world. She became an inspiration in front of the whole world.
  • Women safety is a very important issue in India and a lot of organizations started working on it after Nirbhaya’s case. Women should adopt some self-defence tips and tricks so that it proves helpful during the worst and trying situations for them.
  • There are lots of videos and information about such defensive techniques are available online plateforms for educating about the safety of women.
  • Primary tip for women is if it seems unsafe it’s better to get out of that place immediately and call the family members or cops as soon as possible. 

Conclusion :

In today’s senario, violence is widely seen in public transports, so she should try to avoid travelling with public transports at night, and if it’s not possible then make sure you travel with enough crowd. If she is driving alone, she should not give a lift to strangers, because we are not sure about their intentions. Using a smartphone wisely can provide a help in emergencies. There is plenty of handy equipment available in the market which will provide assistance at the time of emergencies. Keeping such equipment, sprays, small blades in the purse can be useful if things go wrong. Precautions are always better than cure this is the right statement in this regard.

Women’s Safety in India Vs Women Empowerment – Necessity of present Time

Introduction :

Women Empowerment refers to the creation of an environment for women where they can make decisions of their own for their personal benefits as well as for the society. A lot is being heard these days on the need for the empowerment of women.  With regards to current scenario the question arises that “Are women become really strong?” Many programs have been implemented and run by the government such as international Women’s Day, Mother’s Day etc. in order to bring awareness in the society about the true rights and value of the women in the development of the nation.

  • There is a high level of gender inequality in India where women are ill-treated by their family members and outsiders. The percentage of literate population in India is around 74% in which 65% is covered by women.
  • The real meaning of the women empowerment is to make them well educated and leave them free so that they can be capable of taking their own decisions in any field.
  • In modern India, women have held high offices including that of the President, Prime Minister, Speaker of the Lok Sabha, Leader of the Opposition, Union Ministers, Chief Ministers and Governors.
  • Women in India now participate fully in areas such as education, sports, politics, media, art and culture, service sectors, science and technology, etc.
  • Women’s empowerment is the most crucial point for the overall development of a country. Suppose, in a family, there is one earning person, while in another family, both men and women are earning, then who will have a better lifestyle.
  • The answer is simple, the family where both men and women are earning money. Thus, the country where men and women work together develops at a faster rate.
  • Crime against women such as rape, acid throwing, dowry killings, honor killings, and the forced prostitution of young girls has been reported in India.
  • India needs to take some advance steps to improve the women’s position in the society through the proper health, higher education, and economic participation.
  • Women can be empowered in various ways. It can be done through government schemes as well as on an individual basis.

Conclusion :

At the individual level, we should start respecting women and start giving them opportunities equal to men. We should promote and encourage them for jobs, higher education, business activities, etc. The Government has come up with various schemes such as Beti Bachao Beti Padhao Yojana, Mahila-E-Haat, Mahila Shakti Kendra, Working Women Hostel, Sukanya Samriddhi Yojana, etc.; to empower women. Apart from these schemes, we as individuals can also empower women by abolishing social evils like the dowry system, child marriage. These small steps will change the situation of women in society and make them feel empowered.

Essay on Women In Indian Armed Forces

Introduction :

Women have done incredible things within the history of the world. They have proven time to time that they are equal in just about every way with the men. In today’s times, women are walking shoulder to shoulder with men in all sphere of life. The Supreme Court of India allowed women to serve as permanently commissioned officers in 10 combat support arms and services of the Indian Army. If we take global perspective, women are serving in the defense forces of many other countries such as the USA, Israel, Canada, Britain Germany etc. But women are normally not included in on-field combat roles.

  • They either serve in technical and administrative posts or sometimes on voluntary basis on the battlefield. The argument behind it is that women might be weaker physically. Thus, they would not possess the physical attributes suitable to become combat soldiers.
  • As per the report of an NGO, female soldiers are, on average, shorter and smaller than men, with 45-50% less upper body strength and 25-30% less aerobic capacity, which is essential for endurance. 
  • In addition, a concern is that romantic relationships between men and women belonging to the same unit could disrupt a unit’s fighting capacity.
  • Another argument against the inclusion of women in combat units is that placing women in combat would create a risk of them being captured, tortured and sexually harassed. 
  • Marriage and the subsequent birth of their children are major turning points in the careers of service women.  Now if we talk about some pros, allowing a mixed gender force keeps the military strong. 
  • Women are more effective in some circumstances than men. Allowing women to serve doubles the talent pool for delicate and sensitive jobs that require interpersonal skills. 
  • Currently, only Indian Air Force inducts women in a combat role as fighter pilots. The Air Force has around 13% of women officers, the highest among all three forces. The Army has approx 4% of women officers, while the Navy has 6% of women officers. 

Conclusion :

We can also say that India has limited experience as regards the induction of women in the armed forces. Hence, our knowledge of the complexities and long-term effects of the issues involved are very limited. On the other hand, women have been serving in the militaries of developed countries for a long time. These countries have acquired a deep understanding of all the issues. It is the responsibility of the Government to create both administrative and social infrastructure for the easy induction of women into the Armed Forces so that they can serve their country too.

Long essay on Women In Indian Armed Forces

Introduction : 

The Indian armed forces comprises of Army, Navy, Air Force and Coast Guard. The Coast Guard was set up as an Armed Force more recently in 1978. Due to their unique roles as protectors of the nation’s land, sea and airspace respectively, the nature of work in each service is different. Apart from their main roles of defending the country, they may also be required to perform tasks to ease civil administration during times of crisis. The Indian president is the supreme commander of the armed forces. In carrying out the primary role of defending the nation, the armed forces personnel are bound by certain rules that govern their conduct. 

  • Bright, young and energetic men and women make up the bulk of manpower in the armed forces. Recruitment is voluntary, which implies that every citizen of India is eligible to be a part of it, provided he/she fulfils the specified criteria for selection. 
  • Caste, region or religion, do not come in the way of the selection process, thereby making it a heterogeneous work place. Personnel retire earlier than many other government sectors, to keep the armed forces team, young and dynamic.
  •  Manpower in each of the services is broadly divided into ‘Commissioned officers’, ‘JCO’s (Junior Commissioned Officers)’ and ‘Other Ranks’ based on their qualifications and seniority.
  • The role of women in the armed forces for a long time, was limited to the medical profession i.e. doctors and nurses. In 1992, the doors were thrown open for women entry as regular officers in aviation, logistics, law, engineering and executive cadres. 
  • Thousands of spirited young women applied against advertisements and it was a turning point in the history of time. These women chose a new field where they had to painstakingly pave a path for the others to follow.
  • The initial adjustment problems weren’t as much for the women as it was for the men. Wrapped in their tradition of chivalry and respect to women, most gentlemen officers could not treat their female counterparts at par with themselves.
  • Their subordinates too, were men who came from conservative families where they saw women playing only traditional roles. The emergence of these women into totally male dominated bastions did initially create embarrassing moments for both. 
  • Men hushed their talks and behaved courteously, while women had to do with makeshift arrangements to suit their needs within units. Over the years and having come a long way now, men have realized that these women in uniform are their efficient and able co-workers. 
  • Currently, women in the non-medical cadre, serve as Short Service Commissioned (SSC) officers. Under this type of commission, they can serve in the armed forces for a period ranging from 5-14 years. On release they can pursue a career in the civil sector. 
  • SSC officers are released with gratuity and can avail some benefits as ex-serviceperson, but they do not get pension.  Women in the medical branch i.e. doctors and nurses can serve as Permanent Commissioned (PC) officers and are eligible for pension after retirement. They also have the option to serve as Short Service Commissioned officers.

 In the modern day of electronic warfare, it’s more about overcoming stress in warfare than physical combat. It has been proven scientifically that women handle stress better and are also mentally tougher. This is not to undermine a woman’s physical capability. Women have done extremely well in physical training as well. In the first few batches at the armed forces training academies women displayed more endurance and some even outran their male counterparts in cross-country runs and long distance marches. They carry on this tradition and keep setting new records. As most lady officers are married to gentlemen officers in the armed forces, as per government policies, they are transferred together. Women officers can also avail of maternity leave; furlough and annual leave in succession, to cater to pre and post-natal care. On retirement too, they enjoy medical facilities and coveted club memberships. 

Women’s Safety in India Vs Beti Bachao Beti Padhao – Empowering girl childs in India

Introduction :

Beti Bachao, Beti Padhao is a social campaign of the Government of India that aims to generate awareness and improve the position for girls. This program was launched to make some positive changes in the Indian society in status of girl child.  BBBP scheme was launched on 22 January 2015 by the Prime Minister Narendra Modi. There are many restrictions for the girl child in the Indian society which hinders the proper growth and development of the girl child.

  • It aims to address the issue of the declining child sex ratio. This scheme hinders the practice of female foeticide, girl child insecurity, sex discrimination etc against girl child.
  • Parents think that only boys are their property as they have to look after them in the old age however girls have to go another place to care her in-laws.
  • Such thinking of the people about girl is really embarrassing and need to be eradicated from the people’s mind for giving the full rights of girl child from birth.
  • The condition of girl child was much worse in the last decades as female foeticide was getting practiced to a great extent. This practice was continued to reduce the number of girl child as well as avoid the responsibility of a girl child.
  • Olympics 2016 bronze medallist Sakshi Malik was made brand ambassador for BBBP to bring awareness in the country about the actual position of the girl child.
  • BBBP scheme aims at making girls independent, both monetarily and socially. The government also wishes to improve the efficiency of delivery of welfare services meant for women. 
  • The impact of Beti Bachao Beti Padhao scheme is visible from its launch date. However, the sex ratio has reportedly crossed up to 950 females per 1000 males.

Conclusion :

A large number of women are now free to join fields and careers of their own choices. These careers ranging from armed forces, science, journalism, sports, wrestling, engineering among others. The Beti Bachao Beti Padhao mission aimed to bring three significant impacts- The achievement of the education access to the girl child, balance of the male-female ratio, and then to highlight the focus of the child rights. The government is continually stressing on quality education for girls and encouraging parents to send their girl child to school.

Women’s Safety in India Vs Women Entrepreneurs in India

Introduction :

Women constitute around half of the total world population. So is in India also. They are regarded as the better half of the society. In traditional societies, they were confined to the four walls of houses performing household activities. In modem societies, they have come out of the four walls to participate in all sorts of activities.

  • Women have been performing exceedingly well in different spheres of activities like academics, politics, administration, social work and so on. 
  • The person who has an idea, and who executes this idea and makes sure that it functions smoothly is called an entrepreneur. Entrepreneurs can also helm a business and make sure it runs smoothly.
  • Some of the most famous women entrepreneurs in India are Chanda Kocchar, (MD and CEO, ICICI Bank), Simone Tata (Chairperson, Trent Limited), Neelam Dhawan (MD, HP-India), and Kiran Mazumdar (Chairman and MD, Biocon).
  • The rapid strides that these women have taken over the past few decades have shown us the calibre that all women inherently possess. Indian women are coming out from the daily routine of their lives inside the doors of their houses.

Conclusion :

Multitasking women all over the country balance their work, home and family perfectly. Family members too are helping out and supporting women to achieve successful careers. If all women decide to explore themselves and not limit their lives to certain jobs, then each one of them can become a successful entrepreneur, working by their own rules and contently living their own life. Indian women can achieve this dream and in the coming decades women will do brilliantly in all domains of human lives.

Essay on Crime Against Women In India & Its Challenges

Introduction :

“You can tell the condition of a nation by looking at the status of its women.” This quote is given by Pt. Jawaharlal Nehru which shows that the status of women depicts the social, economic and mental condition of a nation. Crime against women in India is refers to physical, emotional or sexual crime committed against women. It can be in form of domestic violence, sexual assault, acid throwing, child marriage and murder. The main reason behind it is gender inequality present in our patriarchal society. 

  • According to National Crime Records Bureau (NCRB) report 2020, there were 4 lakh cases recorded against women and even more have unreported that really makes our country India one of the most dangerous country for women.
  • In these more than 30% cases were of domestic violence. In the lockdown phase due to covid-19, there was an upsurge in cases of domestic violence that’s why the National Commission for Women (NCW) had to launch WhatsApp number to report these cases.
  • Women are continuously facing and suffering from many threats ranging from molestation, sexual abuse, harassment at workplace, domestic violence, gang rape, eve teasing, cyber bulling, acid attack, marital rape, dowry system to honour killings.
  • These are visible offences against women and covid-19 makes the condition even worse. India also degraded at 140th rank in Global Gender Gap Report 2021 produced by world economic forum.
  • Metropolitans are infamous for heinous rapes like Nirbhaya case of Delhi. For checking such crimes, pilot projects for ‘Safe City Program’ is launched by the government.
  • There is one death every hour due to domestic violence for dowry. To check this, government came up with Dowry prohibition Act 1961 and domestic violence prevention Act 2005.
  • In the aftermath of ‘Kathua Rape Case’ government came up with ‘Protection of Children Against Sexual Offences (POCSO) Act 2012 which aims to provide protection to children against sexual abuse.
  • There should be more strict laws for protecting women, fast track courts also be there for crime against women, training centres should be opened for self defence.

Capital punishment should be mandatory for heinous crimes like rape, acid attack, sexual assault etc. The cases like Kathua kand and Nirbhaya gang rape put a question mark on women’s rights to live with dignity. Social revolution is the need of the hour to root out this menace from our society and we should give respect and recognition to women. This can be done by educating boys & girls and promoting gender equality in our country.

Essay On Beti Bachao Beti Padhao :

Introduction :

Beti Bachao, Beti Padhao is a social campaign of the Government of India that aims to generate awareness and improve the position for girls. This program was launched to make some positive changes in the Indian society in status of girl child.  BBBP scheme was launched on 22 January 2015 by the Prime Minister Narendra Modi. There are many restrictions for the girl child in the Indian society which hinders the proper growth and development of the girl child.

  • It aims to address the issue of the declining child sex ratio. This scheme hinders the practice of female foeticide, girl child insecurity, sex discrimination etc against girl child.
  • Parents think that only boys are their property as they have to look after them in the old age however girls have to go another place to care her in-laws.
  • Such thinking of the people about girl is really embarrassing and need to be eradicated from the people’s mind for giving the full rights of girl child from birth.
  • The condition of girl child was much worse in the last decades as female foeticide was getting practiced to a great extent.
  • This practice was continued to reduce the number of girl child as well as avoid the responsibility of a girl child.
  • Olympics 2016 bronze medallist Sakshi Malik was made brand ambassador for BBBP to bring awareness in the country about the actual position of the girl child.
  • BBBP scheme aims at making girls independent, both monetarily and socially. The government also wishes to improve the efficiency of delivery of welfare services meant for women. 
  • The impact of Beti Bachao Beti Padhao scheme is visible from its launch date. However, the sex ratio has reportedly crossed up to 950 females per 1000 males.

Conclusion :

A large number of women are now free to join fields and careers of their own choices. These careers ranging from armed forces, science, journalism, sports, wrestling, engineering among others. The Beti Bachao Beti Padhao mission aimed to bring three significant impacts- The achievement of the education access to the girl child, balance of the male-female ratio, and then to highlight the focus of the child rights. The government is continually stressing on quality education for girls and encouraging parents to send their girl child to school.

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Essays

महिला सुरक्षा पर निबंध – Essay on women’s safety in hindi 250 words

महिला सुरक्षा पर निबंध – Essay on women’s safety in hindi

Introduction : 

महिलाओं की सुरक्षा यह एक महत्वपूर्ण विषय हैं | भारत अपनी महान परंपरा और संस्कृति के लिए दुनिया भर में सबसे प्रसिद्ध देश है जहां महिलाओं को सबसे सम्मानित स्थान दिया जाता है। आज की महिलाएं सभी क्षेत्रों में काम कर रही हैं, जैसे – वैमानिकी, अंतरिक्ष, राजनीति, बैंक, स्कूल, खेल, व्यवसाय, सेना, पुलिस, लेकिन हम भारत में महिलाओं की स्थिति के नकारात्मक पहलूओ को भी नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। हर दिन, हर मिनट कुछ महिलाओं को देश भर में विभिन्न स्थानों पर उत्पीड़न, छेड़छाड़, मारपीट जैसे अपराधों का सामना करना पड़ता है।

  • आंकड़ों के अनुसार, यह पाया गया है कि भारत में हर 20 मिनट में एक महिला का बलात्कार होता है। भारत की राष्ट्रीय राजधानी में निर्भया सामूहिक बलात्कार एक भयानक घटना थी जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।
  • भारत में महिला सुरक्षा के संबंध में स्थिति को सुधारने के लिए आत्मरक्षा तकनीक सबसे महत्वपूर्ण है जिसके लिए प्रत्येक महिला को अपनी सुरक्षा के लिए जागरूक होना चाहिए।
  • उनके पास सभी आपातकालीन नंबर होने चाहिए ताकि वे तुरंत अपने परिवार के सदस्यों और पुलिस से संपर्क कर सकें। 

Conclusion : 

महिलाओं के खिलाफ होने वाले सभी प्रकार के अपराधों के लिए सुरक्षा कानूनों की एक सूची है लेकिन महिलाओं के खिलाफ अपराधों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। हमें इसके लिए केवल सरकार को दोष नहीं देना चाहिए क्योंकि महिला सुरक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, यह प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। महिला सुरक्षा की इस समस्या को समझने और हल करने की तत्काल आवश्यकता है ताकि वे भी अपने देश में पुरुषों की तरह समान रूप से विकसित और हमारे देश की तरक्की में अपना योगदान दे सकें।

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महिला सुरक्षा पर निबंध – Long Essay on women’s safety in hindi

Introduction : 

महिलाओं की सुरक्षा यह एक महत्वपूर्ण विषय हैं | भारत अपनी महान परंपरा और संस्कृति के लिए दुनिया भर में सबसे प्रसिद्ध देश है जहां महिलाओं को सबसे सम्मानित स्थान दिया जाता है। भारतीय महिलाएं सभी क्षेत्रों में काम कर रही हैं, जैसे कि वैमानिकी, अंतरिक्ष, राजनीति, बैंक, स्कूल, खेल, व्यवसाय, सेना, पुलिस, लेकिन हम भारत में महिलाओं की स्थिति के नकारात्मक पहलू को भी नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। हर दिन, हर मिनट कुछ महिलाओं को देश भर में विभिन्न स्थानों पर उत्पीड़न, छेड़छाड़, मारपीट जैसे अपराधों का सामना करना पड़ता है। 

आंकड़ों के अनुसार, यह पाया गया है कि भारत में हर 20 मिनट में एक महिला का बलात्कार होता है। भारत की राष्ट्रीय राजधानी में निर्भया सामूहिक बलात्कार एक भयानक घटना थी जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। भारत में महिला सुरक्षा के संबंध में स्थिति को सुधारने के लिए आत्मरक्षा तकनीक सबसे महत्वपूर्ण है जिसके लिए प्रत्येक महिला को अपनी सुरक्षा के लिए जागरूक होना चाहिए। उनके पास सभी आपातकालीन नंबर होने चाहिए ताकि वे तुरंत अपने परिवार के सदस्यों और पुलिस से संपर्क कर सकें।

  • भारत के बदलते युग के साथ-साथ नारी को लेकर सोच को भी काफी हद तक बदल गई है आज की नारी हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ चलकर काम कर रही है।
  • शिक्षित होकर अपने जीवन में नई ऊँचाइयों को पा रही है, फिर भी वह अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित है, आज के युग में नारी सुरक्षा एक बड़ी समस्या बन चुका है, नारी सुरक्षा के कानून और कायदे होते हुए भी उस पे अत्याचार होते रहते हैं, वह अत्याचार घरेलू हिंसा, सामाजिक संस्थानों पर नारी शोषण, दहेज़ को लेकर कई प्रकार से परेशान किया जाता है।
  • आज वह पढ़ लिख कर शिक्षित तो बन गई है मगर फिर भी अपने हक और अपनी स्वतंत्रता के लिए उसे कई बार लड़ना पड़ता है सरकार के नियम और कानून होते हुए भी पुरुष प्रधान देश में वह कई बार लाचार बन जाती है।
  • आजकल तो नारी ना तो घर में सुरक्षित है ना ही बाहर सुरक्षित है ऐसे हालातों से नारी गुज़र रही है। उसपे बलात्कार जैसी घटनाएँ आए दिन बढ़ रही है देश के विकसित समाज के लिए यह घटनाएँ एक कलंक रूप में साबित हो रही है।
  • बलात्कार जैसी घटनाएँ देश और नारी दोनों के लिए एक सवाल रुक बन चुकी है। क्यों होती है ऐसी घटनाएँ ! क्यों नारी आज के जमाने में पूर्ण रूप में सुरक्षित रूप से नहीं रह पा रही है। आज की बदलती इस दौर में नारी का सुरक्षित रह पाना मुश्किल बन गया है।
  • नारी आज घर से बाहर निकलने से डर रही है, आज के समय में बलात्कार जैसी घटनाएँ काफी हद तक बढ़ गई है, नारी आज किसी भी क्षेत्र में अपने को सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रही है।
  • नारी को जो देश देवी के रूप में पूजा जाता था वहीं आज उसका चीर हरण कर रहा है। इसके पीछे का एक कारण इंटरनेट का दुरुपयोग भी माना जा रहा है। मोबाइल में सब कुछ देखने को मिल जाता है जिससे आज का युवा वर्ग सोचे समझे इसका अनुकरण भी कर लेता है।
  • जो आज के समाज और नारी दोनों के लिए ख़तरा रूप साबित हो रहा है उसके साथ साथ आज की फिल्में में दिखाई जाने वाली उत्तेजित दृश्य, सीरियल में भी आज देश आने वाले दृश्य भी बलात्कार जैसी वारदातों के लिए का रूप माना गया है। 
  • इन सब से बचने के लिए किसी भी नारी को अपनी सुरक्षा के लिए खुद तैयार होना पड़ेगा। हर जगह साकार या परिवार साथ नहीं रह सकता इसलिए आज के जमाने में नारी को अपनी रक्षा के लिए खुद ही मजबूत होना पड़ेगा अपनी अपनी सुरक्षा के लिए मिर्ची स्प्रे, कराटे जैसी चीजों को सीख कर आत्मनिर्भर बनना पड़ेगा।
  • आज के विकसित और बदलते भारत के साथ नारी अपनी सुरक्षा खुद ही कर सकें ऐसे कार्यक्रमों को बढ़ावा देना चाहिए नारी को अपनी सुरक्षा को लेकर खुद ही तैयार होना पड़ेगा भारत सरकार नारी सुरक्षा को लेकर जागृत हे, और उसके लिए कड़े कानून और नियम के साथ-साथ सजा भी करता है।
  • महिलाएं घर की इज़्ज़त होती है। उनका सम्मान और रक्षा करना एक सच्चे नागरिक का कर्त्तव्य है। लोगो को समझना चाहिए अगर महिलाएं ना होती तो बच्चे भी ना होते और परिवार नहीं बनता।
  • हम जो भी है ,जिस मुकाम पर है उसके पीछे हमारी माँ का हाथ है। माँ , बहन इत्यादि सारे रिश्तो का सम्मान सिर्फ पुरुषो को करना चाहिए। सिर्फ कहने के लिए नहीं होने चाहिए।
  • गाँव के कुछ जगहों में महिलाओं पर दैनिक अत्याचार होते है। पति और सास -ससुर का बहु को मारना। उसको दहेज़ के लिए प्रताड़ित करना , यह सब शामिल है। वहां महिलाएं अपने ऊपर हो रहे जुल्मो के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाती है और सहती रहती है। यह बिलकुल गलत है।
  • निर्भया बलात्कार केस ने सम्पूर्ण देश को हिलाकर रख दिया था और नारियों की सुरक्षा के विषय में सोचने पर मज़बूर कर दिया था। इकीसवीं शताब्दी में आकर भी देश में लड़कियां सुरक्षित नहीं है। आये दिन दर्दनाक घटनाओ को सुनकर , मानवता शर्मसार हो रही है
  • आज कल सरकार पहले की तुलना में काफी जागरूक हुयी है। पुलिस वाले भी रात होने पर निगरानी करते है , कि सब कुछ ठीक है या नहीं। लड़कियों के सुरक्षा के लिए हेल्पलाइन नंबर्स भी जारी किये गए है।

Conclusion : 

महिलाओं के खिलाफ होने वाले सभी प्रकार के अपराधों के लिए सुरक्षा कानूनों की एक सूची है लेकिन महिलाओं के खिलाफ अपराधों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। हमें इसके लिए केवल सरकार को दोष नहीं देना चाहिए क्योंकि महिला सुरक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, यह प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। महिला सुरक्षा की इस समस्या को समझने और हल करने की तत्काल आवश्यकता है ताकि वे भी अपने देश में पुरुषों की तरह समान रूप से विकसित और हमारे देश की तरक्की में अपना योगदान दे सकें।

महिला सशक्तिकरण पर निबंध

Introduction :

नारी सशक्तिकरण के नारे के साथ एक प्रश्न उठता है कि “क्या महिलाएँ सचमुच में मजबूत बनी है” और “क्या उसका लंबे समय का संघर्ष खत्म हो चुका है”। राष्ट्र के विकास में महिलाओं की सच्ची महत्ता और अधिकार के बारे में समाज में जागरुकता लाने के लिये मातृ दिवस, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस आदि जैसे कई सारे कार्यक्रम सरकार द्वारा चलाये जा रहे और लागू किये गये है। महिलाओं को कई क्षेत्र में विकास की जरुरत है। ‘सशक्तिकरण’ से तात्पर्य किसी व्यक्ति की उस क्षमता से है जिससे उसमें ये योग्यता आ जाती है जिसमें वो अपने जीवन से जुड़े सभी निर्णय स्वयं ले सके। महिला सशक्तिकरण में भी हम उसी क्षमता की बात कर रहे है जहाँ महिलाएँ परिवार और समाज के सभी बंधनों से मुक्त होकर अपने निर्णयों की निर्माता खुद हो।

अपनी निजी स्वतंत्रता और स्वयं के फैसले लेने के लिये महिलाओं को अधिकार देना ही महिला सशक्तिकरण है। वें देश और परिवार की आर्थिक स्थिति का प्रबंधन करने में पूरी तरह से सक्षम है। अत: महिलाओं के सशक्त होने से पूरा समाज अपने आप सशक्त हो जायेगा। भारत में, महिलाओं को सशक्त बनाने के लिये सबसे पहले समाज में उनके अधिकारों और मूल्यों को मारने वाले उन सभी राक्षसी सोच को मारना जरुरी है जैसे दहेज प्रथा, अशिक्षा, यौन हिंसा, असमानता, भ्रूण हत्या, महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा, वैश्यावृति और मानव तस्करी ।

  • पुरुष और महिला को बराबरी पर लाने के लिये महिला सशक्तिकरण में तेजी लाने की जरुरत है। सभी क्षेत्रों में महिलाओं का उत्थान राष्ट्र की प्राथमिकता में शामिल होना चाहिये। महिला और पुरुष के बीच की असमानता कई समस्याओं को जन्म देती है जो राष्ट्र के विकास में बड़ी बाधा के रुप में सामने आ सकती है।
  • ये महिलाओं का जन्मसिद्ध अधिकार है कि उन्हें समाज में पुरुषों के बराबर महत्व मिले। वास्तव में सशक्तिकरण को लाने के लिये महिलाओं को अपने अधिकारों से अवगत होना चाहिये। न केवल घरेलू और पारिवारिक जिम्मेदारियों बल्कि महिलाओं को हर क्षेत्रों में सक्रिय और सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिये। उन्हें अपने आस-पास और देश में होने वाली घटनाओं को भी जानना चाहिये।
  • महिला सशक्तिकरण में ये ताकत है कि वो समाज और देश में बहुत कुछ बदल सकें। वो समाज में किसी समस्या को पुरुषों से बेहतर ढ़ंग से निपट सकती है। वो देश और परिवार के लिये अधिक जनसंख्या के नुकसान को अच्छी तरह से समझ सकती है।
  • अच्छे पारिवारिक योजना से वो देश और परिवार की आर्थिक स्थिति का प्रबंधन करने में पूरी तरह से सक्षम है। पुरुषों की अपेक्षा महिलाएँ किसी भी प्रभावकारी हिंसा को संभालने में सक्षम है चाहे वो पारिवारिक हो या सामाजिक।
  • महिला सशक्तिकरण के द्वारा ये संभव है कि एक मजबूत अर्थव्यवस्था के महिला-पुरुष समानता वाले वाले देश को पुरुषवादी प्रभाव वाले देश से बदला जा सकता है। महिला सशक्तिकरण की मदद से बिना अधिक प्रयास किये परिवार के हर सदस्य का विकास आसानी से हो सकता है।
  • एक महिला परिवार में सभी चीजों के लिये बेहद जिम्मेदार मानी जाती है अत: वो सभी समस्याओं का समाधान अच्छी तरह से कर सकती है। महिलाओं के सशक्त होने से पूरा समाज अपने आप सशक्त हो जायेगा।
  • महिलाओं के लिये प्राचीन काल से समाज में चले आ रहे गलत और पुराने चलन को नये रिती-रिवाजों और परंपरा में ढ़ाल दिया गया था। भारतीय समाज में महिलाओं को सम्मान देने के लिये माँ, बहन, पुत्री, पत्नी के रुप में महिला देवियो को पूजने की परंपरा है लेकिन इसका ये कतई मतलब नहीं कि केवल महिलाओं को पूजने भर से देश के विकास की जरुरत पूरी हो जायेगी।
  • आज जरुरत है कि देश की आधी आबादी यानि महिलाओं का हर क्षेत्र में सशक्तिकरण किया जाए जो देश के विकास का आधार बनेंगी।
  • भारत एक प्रसिद्ध देश है जिसने ‘विविधता में एकता’ के मुहावरे को साबित किया है, जहाँ भारतीय समाज में विभिन्न धर्मों को मानने वाले लोग रहते है। महिलाओं को हर धर्म में एक अलग स्थान दिया गया है जो लोगों की आँखों को ढ़के हुए बड़े पर्दे के रुप में और कई वर्षों से आदर्श के रुप में महिलाओं के खिलाफ कई सारे गलत कार्यों (शारीरिक और मानसिक) को जारी रखने में मदद कर रहा है।
  • प्राचीन भारतीय समाज दूसरी भेदभावपूर्ण दस्तूरों के साथ सती प्रथा, नगर वधु व्यवस्था, दहेज प्रथा, यौन हिंसा, घरेलू हिंसा, गर्भ में बच्चियों की हत्या, पर्दा प्रथा, कार्य स्थल पर यौन शोषण, बाल मजदूरी, बाल विवाह तथा देवदासी प्रथा आदि परंपरा थी। इस तरह की कुप्रथा का कारण पितृसत्तामक समाज और पुरुष श्रेष्ठता मनोग्रन्थि है।
  • पुरुष पारिवारिक सदस्यों द्वारा सामाजिक राजनीतिक अधिकार (काम करने की आजादी, शिक्षा का अधिकार आदि) को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया। महिलाओं के खिलाफ कुछ बुरे चलन को खुले विचारों के लोगों और महान भारतीय लोगों द्वारा हटाया गया जिन्होंने महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण कार्यों के लिये अपनी आवाज उठायी।
  • राजा राम मोहन रॉय की लगातार कोशिशों की वजह से ही सती प्रथा को खत्म करने के लिये अंग्रेज मजबूर हुए। बाद में दूसरे भारतीय समाज सुधारकों (ईश्वर चंद्र विद्यासागर, आचार्य विनोभा भावे, स्वामी विवेकानंद आदि) ने भी महिला उत्थान के लिये अपनी आवाज उठायी और कड़ा संघर्ष किया। भारत में विधवाओं की स्थिति को सुधारने के लिये ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने अपने लगातार प्रयास से विधवा पुर्न विवाह अधिनियम 1856 की शुरुआत करवाई।
  • पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं के खिलाफ होने वाले लैंगिक असमानता और बुरी प्रथाओं को हटाने के लिये सरकार द्वारा कई सारे संवैधानिक और कानूनी अधिकार बनाए और लागू किये गये है।

Conclusion : 

हालाँकि ऐसे बड़े विषय को सुलझाने के लिये महिलाओं सहित सभी का लगातार सहयोग की जरुरत है। आधुनिक समाज महिलाओं के अधिकार को लेकर ज्यादा जागरुक है जिसका परिणाम हुआ कि कई सारे स्वयं-सेवी समूह और एनजीओ आदि इस दिशा में कार्य कर रहे है। महिलाएँ ज्यादा खुले दिमाग की होती है और सभी आयामों में अपने अधिकारों को पाने के लिये सामाजिक बंधनों को तोड़ रही है। हालाँकि अपराध इसके साथ-साथ चल रहा है। भारतीय समाज में सच में महिला सशक्तिकरण लाने के लिये महिलाओं के खिलाफ बुरी प्रथाओं के मुख्य कारणों को समझना और उन्हें हटाना होगा। जरुरत है कि हम महिलाओं के खिलाफ पुरानी सोच को बदले और संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों में भी बदलाव लाये।

बेटी बचाओबेटी पढ़ाओ पर निबंध

Introduction :

बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ योजना की शुरुआत भारतीय सरकार द्वारा 2015 के जनवरी महीने में हुई। इस योजना का मकसद भारतीय समाज में लड़कियों और महिलाओं के लिये कल्याणकारी कार्यों की कुशलता को बढ़ाने के साथ-साथ लोगों के बीच जागरुकता उत्पन्न करने के लिये भी है। 22 जनवरी 2015 को भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा सफलतापूर्वक इस योजना का आरंभ हुआ। इस योजना को सभी राज्य और केन्द्र शासित प्रदेशों में लागू करने के लिये एक राष्ट्रीय अभियान के द्वारा देश के 100 चुनिंदा शहरों में इस योजना को लागू किया गया । इस कार्यक्रम की शुरुआत करते समय प्रधनमंत्री ने कहा कि, भारतीय लोगों की ये सामान्य धारणा है कि लड़कियाँ अपने माता-पिता के बजाय पराया धन होती है।

अभिवावक सोचते है कि लड़के तो उनके अपने होते है जो बुढ़ापे में उनकी देखभाल करेंगे जबकि लड़कियाँ तो दूसरे घर जाकर अपने ससुराल वालों की सेवा करती हैं। लड़कियों या महिलाओं को कम महत्ता देने से धरती पर मानव समाज खतरे में पड़ सकता है क्योंकि अगर महिलाएँ नहीं तो जन्म नहीं। इसमें कुछ सकारात्मक पहलू ये है कि ये योजना लड़कियों के खिलाफ होने वाले अपराध और गलत प्रथाओं को हटाने के लिये एक बड़े कदम के रुप में साबित होगी।

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान के उद्देश्य –

  • इस अभियान के मुख्य उद्देश्य बालिकाओं की सुरक्षा करना और कन्या भ्रूण हत्या को रोकना है। इसके अलावा बालिकाओं की शिक्षा को बढ़ावा देना और उनके भविष्य को संवारना भी इसका उद्देश्य है। सरकार ने लिंग अनुपात में समानता लाने के लिए ये योजना शुरू की।
  • ताकि बालिकाएं दुनिया में सर उठकर जी पाएं और उनका जीवन स्तर भी ऊंचा उठे। इसका उद्देश्य बेटियों के अस्तित्व को बचाना एवं उनकी सुरक्षा को सुनिश्चित करना भी है। शिक्षा के साथ-साथ बालिकाओं को अन्य क्षेत्रों में भी आगे बढ़ाना एवं उनकी इसमें भागीदारी को सुनिश्चित करना भी इसका मुख्य लक्ष्य है|
  • इस अभियान के द्वारा समाज में महिलाओं के साथ हो रहे अन्याय और अत्याचार के विरूद्ध एक पहल हुई है। इससे बालक और बालिकाओं के बीच समानता का व्यवहार होगा। बेटियों को उनकी शिक्षा के लिए और साथ ही उनके विवाह के लिए भी सहायता उपलब्ध करवाई जाएगी, जिससे उनके विवाह में किसी प्रकार की दिक्कत नहीं होगी।
  • इस योजना से बालिकाओं को उनके अधिकार प्राप्त होंगे जिनकी वे हकदार हैं साथ ही महिला सशक्तिकरण के लिए भी यह अभियान एक मजबूत कड़ी है।

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान के कार्य –

  • हर थोड़े दिनों बाद हमें कन्या भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा, महिलाओं पर शारीरिक और मानसिक अत्याचार जैसे अपराधों की खबर देखने और सुनने को मिलती है। जिसके लिए भारत देश की सरकार इन बालिकाओं को बचाने और उनके अच्छे भविष्य के लिए हर संभव कोशिश कर रही है और अलग अलग योजनाएं चला रही है|
  • बालिकाओं की देखभाल और परवरिश अच्छी हो इसके लिए कई तरह के नए नियम कानून भी लागू किये जा रहे हैं। इसके साथ ही पुराने नियम कानूनों को बदला भी जा रहा है|
  • इस योजना के तहत मुख्य रूप से लड़के एवं लड़कियों के लिंग अनुपात में ध्यान केन्द्रित किया गया है, ताकि महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव और सेक्स डेटरमिनेशन टेस्ट को रोका जा सके।
  • इस अभियान का संचालन तीन स्तर पर हो रहा है, राष्ट्रीय स्तर पर, राजकीय स्तर पर और जिला स्तर पर। इस योजना में माता पिता एक निश्चित धनराशि अपनी बेटी के बैंक खाते में जमा करवाते हैं और सरकार उस राशि पर लाभ प्रदान करती है ताकि वह धनराशि बालिका की उच्च शिक्षा में और विवाह में काम आए।
  • जिससे बेटियों को बोझ ना समझा जाए। सरकार इस अभियान के द्वारा बालिकाओं की सुरक्षा और उनके उज्जवल भविष्य की कामना करती है।
  • इस अभियान के शुरुआती दौर में सभी ने इसका स्वागत और समर्थन किया लेकिन फिर भी ये इतना सफल नहीं हो पाया जितना सोचा गया था। बालिकाओं की स्थिति में सुधार लाने के लिए लोगों को जागरूक होना होगा और सभी को एकजुट होकर इस समस्या का समाधान करना होगा।
  • एक बच्ची दुनिया में आकर सबसे पहले बेटी बनती है। वे अपने माता पिता के लिए विपत्ति के समय में ढाल बनकर खड़ी रहती है। बालिका बन कर भाई की मदद करती है। बाद में धर्मपत्नी बनकर अपने पति और ससुराल वालों का हर अच्छी बुरी परिस्थिति में साथ निभाती है।
  • वह त्यागमूर्ति मां के रूप में अपने बच्चों पर सब कुछ कुर्बान कर जाती है और अपने बच्चों में अच्छे संस्कारों के बीज बोती है, जिससे वे आगे चलकर अच्छे इंसान बनें। सभी को बेटी और बेटों के साथ एक समान व्यवहार करना चाहिए।

Conclusion : 

उन्हें समान रूप से शिक्षा और जीवन स्तर देना चाहिए, समान अधिकार और प्यार – दुलार देना चाहिए, क्योंकि किसी भी देश के विकास के लिए बेटियां समान रूप से जिम्मेदार है। हम ये आशा करते हैं कि आने वाले दिनों में सामाजिक-आर्थिक कारणों की वजह से किसी भी लड़की को गर्भ में नहीं मारा जायेगा, अशिक्षित नहीं रहेंगी, असुरक्षित नहीं रहेंगी, अत: पूरे देश में लैंगिक भेदभाव को मिटाने के द्वारा बेटी-बचाओ बेटी-पढ़ाओ योजना का लक्ष्य लड़कियों को आर्थिक और सामाजिक दोनों तरह से स्वतंत्र बनाने का है। लडकियों को लडकों के समान समझा जाना चाहिए और उन्हें सभी कार्यक्षेत्रों में समान अवसर प्रदान करने चाहिए।

शिक्षा का अधिकार पर निबंध

Introduction :

प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में शिक्षा का बड़ा महत्व हैं,शिक्षा को जीवन का आधार माना गया हैं। किसी भी देश के आधुनिक या विकसित होने का प्रमाण उस देश के नागरिकों के शिक्षा स्तर पर निर्भर करता हैं। आधुनिक समय में शिक्षा को ही किसी राष्ट्र या समाज की प्रगति का सूचक समझा जाता हैं। शिक्षा का अधिकार अधिनियम संसद का एक अधिनियम है जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 ए के तहत भारत में 6 से 14 वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए नि: शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के महत्व का वर्णन करता है। यह अधिनियम 1 अप्रैल 2010 से लागू हुआ। इस अधिनियम की खास बात यह है कि गरीब परिवार के वे बच्चे, जो प्राथमिक शिक्षा से वंचित हैं, के लिए निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान रखा गया है ।

शिक्षा के अधिकार के साथ बच्चों एवं युवाओं का विकास होता है तथा राष्ट्र शक्तिशाली एवं समृद्ध बनता है । यह उत्तरदायी एवं सक्रिय नागरिक बनाने में भी सहायक है । इसमें देश के सभी लोगों, अभिभावकों एवं शिक्षकों का भी सहयोग आवश्यक है । इस कानून के लागू करने पर आने वाले खर्च केंद्र (55 प्रतिशत) और राज्य सरकार (45 प्रतिशत) मिलकर उठाएंगे।

  • आज विश्व के सभी राष्ट्रों द्वारा भारतीय युवाओं की प्रतिमा का मुक्त कण्ठ से गुणगान किया जाना इसका प्रमाण है । बावजूद इसके सम्पूर्ण राष्ट्र की शिक्षा को आधार मानकर विश्लेषण किया जाए तो अभी भी भारत शिक्षा के क्षेत्र में विकसित राष्ट्रों की तुलना में काफी पीछे है ।
  • वर्तमान में भारतीय शिक्षा दर अनुमानतः 74% है, जो वैश्विक स्तर पर बहुत कम है । तब इस अनुपात में और वृद्धि करने के लिए बुद्धिजीवियों ने अपने-अपने सुझाव दिए ।
  • उन सभी के सुझावों पर गौर अते हुए भारत सरकर ने शिक्षा को अनिवार्य रूप से लागू करने हेतु शिक्षा का अधिकार कानून (RTE Act) बनाकर पूरे देश में समान रूप से प्रस्तुत कर दिया ।
  • ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009’, 1 अप्रैल, 2010 से सम्पूर्ण भारत में लागू कर दिया गया । इसका प्रमुख उद्देश्य है- वर्ष आयु तक के सभी बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य, गुणवतायुक्त शिक्षा को सुनिश्चित करना । इस अधिनियम को सर्व शिक्षा अभियान तथा वर्ष 2005 के विधेयक का ही संशोधित रूप कहा जाए, तो समीचीन ही होगा ।
  • क्षेत्रीय सरकारों, अधिकारियों तथा अभिभावकों का यह दायित्व है कि वे बच्चे को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा दिलाने का प्रबन्ध करें । इस कार्य हेतु वित्तीय प्रबन्धन का पूर्ण दायित्व केन्द्र व राज्य सरकार द्वारा मिश्रित रूप से उठाया जाएगा । कोई भी बच्चा किसी समय विद्यालय में प्रवेश पाने को स्वतन्त्र है ।
  • आयु प्रमाण-पत्र न होने के बावजूद, बच्चा विद्यालय में प्रवेश ले सकता है । बच्चों की आवश्यकता का ध्यान रखते हुए पुस्तकालय, खेल के मैदान, स्वच्छ व मजबूत विद्यालय कक्ष, इमारत आदि का प्रबन्ध राज्य सरकार द्वारा किया जाएगा ।
  • शिक्षण की गुणवत्ता में सुधार हेतु 35 छात्रों पर एक शिक्षक का प्रावधान किया गया है तथा साथ ही यह सुनिश्चित किया गया है कि ग्रामीण ब शहरी किसी भी क्षेत्र में यह अनुपात प्रभावित न हो। 
  • इसके साथ ही अध्यापन की गुणवत्ता हेतु केवल प्रशिक्षित अध्यापकों को ही नियुक्त करने का प्रावधान किया गया है जो अप्रशिक्षित अध्यापक, प्राचीन समय से अध्यापनरत हैं, उन्हें सीमित अवधि में अध्यापक-प्रशिक्षण पूर्ण करने का आदेश पारित किया गया है, अन्यथा उन्हें पद-मुक्त किया जा सकता हे।

इसके अतिरिक्त निम्न कार्यों का पूर्ण रूप से निषेध है –

  • छात्रों को शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना देना ।
  • प्रवेश के दौरान छात्रों से कोई लिखित परीक्षा लेना ।
  • छात्रों या उनके अभिभावकों से किसी प्रकार का शुल्क लेना।
  • छात्रों को ट्‌यूशन पढ़ने के लिए बाध्य करना ।
  • बिना मान्यता प्राप्ति के विद्यालय का संचालन करना ।
  • इसी प्रकार निजी विद्यालयों में भी कक्षा 1 से प्रवेश के समय आर्थिक रूप से कमजोर समुदायों के छात्रों हेतु 25% आरक्षण का प्रावधान सुनिश्चित किया गया है ।
  • इस अधिनियम को प्रभावी बनाने का उत्तरदायित्व केन्द्र ब राज्य सरकार दोनों का है, जिसका वित्तीय बहन भी दोनों संयुक्त रूप से करेंगे ।
  • इस अधिनियम के अनुसार, वित्तीय बहन का दायित्व सर्वप्रथम राज्य सरकार को सौंपा गया था, परन्तु राज्य सरकार ने अपनी विवशता का हवाला देते हुए इसे अस्वीकार कर दिया तथा केन्द्र सरकार से मदद का अनुरोध किया, तदुपरान्त केन्द्र तथा राज्य सरकार द्वारा 65:36 अनुपात के तहत वित्तीय प्रबन्धन का विभाजन किया गया । उत्तर-पूर्वी राज्यों में यह अनुपात 90:10 है।

केन्द्र सरकार के दायित्व –

(i) बच्चों का चहुँमुखी विकास ।

(ii) संवैधानिक मूल्यों का विकास ।

(iii) जहाँ तक हो सके, मातृभाषा में शिक्षण दिया जाए ।

(iv) बच्चों के मानसिक बिकास के अनुरूप, उनका नियमित विश्लेषण । (धारा-29 के अन्तर्गत)

(v) बच्चों को भयमुक्त माहौल प्रदान कराना तथा अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का विकास करना ।

राज्य सरकार के दायित्व –

(i) वह प्रत्येक बच्चे को नि:शुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराएगी ।

(ii) अपने क्षेत्र के 14 वर्ष आयु तक के बच्चों का पूर्ण रिकॉर्ड रखेगी ।

(iii) शैक्षणिक कलेण्डर का निर्धारण करेगी (धारा-9 के अन्तर्गत)।

सर्व शिक्षा अभियान द्वारा पारित लक्ष्य वर्ष 2010 तक पूर्ण न हो पाया था, इसके अतिरिक्त यह अधिनियम भी लागू कर दिया गया । अतः यह कहना समीचीन ही होगा कि इस अधिनियम में सर्व शिक्षा अभियान के सभी नियम समाहित है ।

Conclusion : 

अधिनियम शिक्षा को 6 से 14 वर्ष की आयु के बीच हर बच्चे का मौलिक अधिकार बनाता है। अब भारत में 74% आबादी साक्षर है जिसमें पुरुषों में 80% और महिला 65% शामिल हैं। यह शिक्षा का मौलिक अधिकार 6 से 14 वर्षो के बालक-बालिकाओं के लिए निशुल्क और गुणवतापूर्ण शिक्षा की सहायता से उन्हें समान रूप से शिक्षा और रोजगार के समान अवसरों की उपलब्धता सुनिश्चित करवाएगा, इससे हमारा भारत शिक्षित और विकसित बनेगा।

निजता का अधिकार पर निबंध

Introduction :

मनुष्य की ज़रूरतें सबसे प्राथमिक ज़रूरतों जैसे कि भोजन, कपड़े और आश्रय से लेकर माध्यमिक ज़रूरतों जैसे शिक्षा, काम और मनोरंजन और आगे की ज़रूरतों जैसे मनोरंजन, भोजन, अवकाश, यात्रा, आदि से शुरू होती हैं। यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि इन सभी जरूरतों और इच्छाओ (wants) में गोपनीयता कहाँ है ? किसी भी सभ्य समाज में गोपनीयता की एक बुनियादी डिग्री एक प्राथमिक आवश्यकता है। जैसे-जैसे गोपनीयता की डिग्री बढ़ती है, यह एक माध्यमिक जरूरत और आगे एक इच्छा में विकसित हो जाती है।

निजता का अधिकार नागरिकों की निजता के अधिकार को लेकरकर यह सुनिश्चित करता है की सभी समान रूप से संरक्षित हो और अमीर और गरीब के लिए समान न्याय और अधिकार हो। आधार के लिए भारत के निवासियों के व्यक्तिगत डेटा के संग्रह की आवश्यकता होती है, और इसके परिणामस्वरूप चूक होने की संभावना को लेकर विवाद पैदा हो सकता है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि इसमें बायोमेट्रिक विवरण जैसे कि आईरिस स्कैनिंग और फिंगर प्रिंट के संग्रह की आवश्यकता होती है जो अनिवार्य रूप से महत्वपूर्ण विवरण हैं और इसका दुरुपयोग किया जा सकता है। साइबर स्पेस एक संवेदनशील स्थान है और यहाँ खतरे की संभावना अधिक है हालांकि, आधार अपने आप में एक सुविचारित कार्यक्रम है ताकि वित्तीय समावेशन सुनिश्चित किया जा सके।

निजता का महत्त्व

  • निजता वह अधिकार है जो किसी व्यक्ति की स्वायतता और गरिमा की रक्षा के लिये ज़रूरी है। वास्तव में यह कई अन्य महत्त्वपूर्ण अधिकारों की आधारशिला है।
  • दरअसल निजता का अधिकार हमारे लिये एक आवरण की तरह है, जो हमारे जीवन में होने वाले अनावश्यक और अनुचित हस्तक्षेप से हमें बचाता है।
  • यह हमें अवगत कराता है कि हमारी सामाजिक आर्थिक और राजनैतिक हैसियत क्या है और हम स्वयं को दुनिया से किस हद तक बाँटना चाहते हैं।
  • वह निजता ही है जो हमें यह निर्णित करने का अधिकार देती है कि हमारे शरीर पर किसका अधिकार है?
  • आधुनिक समाज में निजता का महत्त्व और भी बढ़ जाता है। फ्रांस की क्रांति के बाद समूची दुनिया से निरंकुश राजतंत्र की विदाई शुरू हो गई और समानता, मानवता और आधुनिकता के सार्वभौमिक सिद्धांतों पर आधारित लोकतंत्र ने पैर पसारना शुरू कर दिया।
  • अब राज्य लोगों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ चलाने लगे तो यह प्रश्न प्रासंगिक हो उठा कि जिस गरिमा के भाव के साथ जीने का आनंद लोकतंत्र के माध्यम से मिला उसे निजता के हनन द्वारा छिना क्यों जा रहा है?
  • तकनीक और अधिकारों के बीच हमेशा से टकराव होते आया है और 21वीं शताब्दी में तो तकनीकी विकास अपने उच्चतम स्तर पर पहुँच चुका है। ऐसे में निजता को राज्य की नीतियों और तकनीकी उन्नयन की दोहरी मार झेलनी पड़ी।
  • आज हम सभी स्मार्टफोंस का प्रयोग करते हैं। चाहे एपल का आईओएस हो या गूगल का एंड्राइड या फिर कोई अन्य ऑपरेटिंग सिस्टम, जब हम कोई भी एप डाउनलोड करते हैं, तो यह हमारे फ़ोन के कॉन्टेक्ट, गैलरी और स्टोरेज़ आदि के प्रयोग की इज़ाज़त मांगता है और इसके बाद ही वह एप डाउनलोड किया जा सकता है।
  • ऐसे में यह खतरा है कि यदि किसी गैर-अधिकृत व्यक्ति ने उस एप के डाटाबेस में सेंध लगा दी तो उपयोगकर्ताओं की निजता खतरे में पड़ सकती है।
  • तकनीक के माध्यम से निजता में दखल, राज्य की दखलंदाज़ी से कम गंभीर है। हम ऐसा इसलिये कह रहे हैं क्योंकि तकनीक का उपयोग करना हमारी इच्छा पर निर्भर है, किन्तु राज्य प्रायः निजता के उल्लंघन में लोगों की इच्छा की परवाह नहीं करता।
  • आधार का मामला इसका जीता जागता उदाहरण है। जब पहली बार आधार का क्रियान्वयन आरंभ किया गया तो कहा यह गया कि यह सभी भारतीयों को एक विशेष पहचान संख्या देने के उद्देश्य से लाई गई है। जल्द ही मनरेगा सहित कई बड़ी योजनाओं में बेनिफिट ट्रान्सफर के लिये आधार अनिवार्य कर दिया गया।
  • यहाँ तक कि आधार पर किसी भी प्रकार के विचार-विमर्श से किनारा करते हुए इसे मनी बिल यानी धन विधेयक के तौर पर संसद में पारित कर दिया गया। इन सभी बातों से पता चलता है कि निजता जो कि लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखने के लिये आवश्यक है, गंभीर खतरे में है।

गोपनीयता का उल्लंघन

  • सोशल मीडिया चैनलों और साइटों पर गोपनीयता भंग होने के अधिक मामले देखे जा सकते हैं, जिसमें साइबर अपराधियों द्वारा व्यक्ति के जीवन को नष्ट करने वाले जघन्य अपराध करने के लिए लोगों की व्यक्तिगत जानकारी और डेटा को हैक किया जाता है।
  • कई हैकर्स हमारे सोशल मीडिया और बैंकिंग खातों में घुस जाते हैं और लीक हुई जानकारी के जरिए पैसा कमाने के लिए संवेदनशील डेटा चुरा लेते हैं।
  • इतना ही नहीं, बल्कि कई अन्य क्षेत्र भी हैं जो गोपनीयता के उल्लंघन से पीड़ित हैं। इसलिए, यह एक प्रमुख चिंता का विषय है और सरकार को इससे निपटना चाहिए।

इंटरनेट के उपयोग के साथ, इस युग में, फेसबुक और ट्यूटर जैसे सामाजिक नेटवर्क सामाजिक संपर्क के नए रूपों को चला रहे हैं और उपलब्धता ने गोपनीयता संबंधी चिंताओं को बढ़ा दिया है। इसके लिए सरकार को साइबर सुरक्षा प्रणाली को मजबूत करना चाहिए और कानून के माध्यम से आश्वासन देना चाहिए कि निजता के अधिकार का उल्लंघन  न हो और निजी जानकारी को निजी रखा जाये।

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