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नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 पर निबंध (Essay on New Education Policy 2020 in Hindi)

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 पर निबंध (Essay on New Education Policy 2020)

Introduction : 

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को देश की शिक्षा प्रणाली में समयनुसार उचित बदलाव करने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा 29 जुलाई, 2020 को मंजूरी दी गई। यह नीति देश में स्कूल और उच्च शिक्षा प्रणालियों में परिवर्तनकारी सुधार लेन में बहुत मददगार साबित होगी। यह 21 वीं सदी की पहली शिक्षा नीति है। नई नीति का उद्देश्य 2030 तक स्कूली शिक्षा में 100% सकल नामांकन अनुपात (GER) के साथ पूर्व-माध्यमिक से माध्यमिक स्तर तक शिक्षा का सार्वभौमिकरण करना है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति द्वारा कुछ नए बदलाव लाये गए है, जिसमें भारतीय उच्च शिक्षा को विदेशी विश्वविद्यालयों में बढ़ावा देना, चार-वर्षीय बहु-विषयक स्नातक कार्यक्रम के लिए कई निकास विकल्पों के साथ प्रस्तुत करना शामिल है। 

इस  नई नीति का उद्देश्य भारत को वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनाना है। स्कूली शिक्षा में, इस नीति में पाठ्यक्रम को ओवरहाल करने, पाठ्यक्रम में कमी लाने और अनुभवात्मक शिक्षा पर जोर देने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। स्कूल में वर्तमान 10 + 2 प्रणाली को एक नयी  5 + 3 + 3 + 4 पाठ्यक्रम प्रणाली से बदल दिया जाएगा। नई नीति के अनुसार, तीन साल की आंगनवाड़ी / प्री-स्कूलिंग के साथ 12 साल की स्कूली शिक्षा होगी। स्कूल और उच्च शिक्षा में, छात्रों के लिए एक विकल्प के रूप में संस्कृत को भी सभी स्तरों पर शामिल किया जाएगा। यह नीति औपचारिक स्कूली शिक्षा के दायरे में प्री-स्कूलिंग को शामिल करेगी ।

National Education Policy 2021 के विशेषताएं –

  • मानव संसाधन प्रबंधन मंत्रालय अब शिक्षा मंत्रालय के नाम से जाना जाएगा।
  • National Education Policy के अंतर्गत शिक्षा का सार्वभौमीकरण किया जाएगा जिसमें मेडिकल और लॉ की पढ़ाई शामिल नहीं की गई है।
  • पहले 10+2 का पैटर्न फॉलो किया जाता था परंतु अब नई नेशनल एजुकेशन पॉलिसी के अंतर्गत 5+3+3+4 का पैटर्न फॉलो किया जाएगा। जिसमें 12 साल की स्कूली शिक्षा होगी और 3 साल की प्री स्कूली शिक्षा होगी।
  • छठी कक्षा से व्यवसायिक परीक्षण इंटर्नशिप आरंभ कर दी जाएगी।
  • पांचवी कक्षा तक शिक्षा मातृभाषा या फिर क्षेत्रीय भाषा में प्रदान की जाएगी।
  • पहले साइंस, कॉमर्स तथा अर्ट स्ट्रीम होती थी। अब ऐसी कोई भी स्ट्रीम नहीं होगी। छात्र अपनी इच्छा अनुसार विषय चुन सकते हैं। छात्र फिजिक्स के साथ अकाउंट या फिर आर्ट्स का कोई सब्जेक्ट भी पढ़ सकते हैं।
  • छात्रों को छठी कक्षा से कोडिंग सिखाई जाएगी।
  • सभी स्कूल डिजिटल इक्विप्ड किए जाएंगे।
  • सभी प्रकार की इकॉन्टेंट को क्षेत्रीय भाषा में ट्रांसलेट किया जाएगा।
  • वर्चुअल लैब डिवेलप की जाएंगी।

नई शिक्षा नीति 2020 के सिद्धांत –

  • प्रत्येक बच्चे की क्षमता की पहचान एवं क्षमता का विकास करना
  • साक्षरता एवं संख्यामकता के ज्ञान को बच्चों के अंतर्गत विकसित करना
  • शिक्षा को लचीला बनाना
  • एक सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली में निवेश करना
  • गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को विकसित करना
  • बच्चों को भारतीय संस्कृति से जोड़ना
  • उत्कृष्ट स्तर पर शोध करना
  • बच्चों को सुशासन सिखाना एवं सशक्तिकरण करना
  • शिक्षा नीति को पारदर्शी बनाना
  • तकनीकी यथासंभव उपयोग पर जोर
  • मूल्यांकन पर जोर देना
  • विभिन्न प्रकार की भाषाएं सिखाना
  • बच्चों की सोच को रचनात्मक एवं तार्किक करना

नई शिक्षा नीति 2020 के फायदे –

  • नई शिक्षा नीति शिक्षार्थियों के एकीकृत विकास पर केंद्रित है।
  • यह 10+2 सिस्टम को 5+3+3+4 संरचना के साथ बदल देता है, जिसमें 12 साल की स्कूली शिक्षा और 3 साल की प्री-स्कूलिंग होती है, इस प्रकार बच्चों को पहले चरण में स्कूली शिक्षा का अनुभव होता है।
  • परीक्षाएं केवल 3, 5 और 8वीं कक्षा में आयोजित की जाएंगी, अन्य कक्षाओं का परिणाम नियमित मूल्यांकन के तौर पर लिए जाएंगे। बोर्ड परीक्षा को भी आसान बनाया जाएगा और एक वर्ष में दो बार आयोजित किया जाएगा ताकि प्रत्येक बच्चे को दो मौका मिलें।
  • नीति में पाठ्यक्रम से बाहर निकलने के अधिक लचीलेपन के साथ स्नातक कार्यक्रमों के लिए एक बहु-अनुशासनात्मक और एकीकृत दृष्टिकोण की परिकल्पना की गई है।
  • राज्य और केंद्र सरकार दोनों शिक्षा के लिए जनता द्वारा अधिक से अधिक सार्वजनिक निवेश की दिशा में एक साथ काम करेंगे, और जल्द से जल्द जीडीपी को 6% तक बढ़ाएंगे।
  • नई शिक्षा नीति सीखने के लिए पुस्तकों का भोझ बढ़ाने के बजाय व्यावहारिक शिक्षा को बढ़ाने पर ज्यादा केंद्रित है।
  • एनईपी यानी नई शिक्षा निति सामान्य बातचीत, समूह चर्चा और तर्क द्वारा बच्चों के विकास और उनके सीखने की अनुमति देता है।
  • एनटीए राष्ट्रीय स्तर पर विश्वविद्यालयों के लिए एक आम प्रवेश परीक्षा आयोजित करेगा।
  • छात्रों को पाठ्यक्रम के विषयों के साथ-साथ सीखने की इच्छा रखने वाले पाठ्यक्रम का चयन करने की भी स्वतंत्रता होगी, इस तरह से कौशल विकास को भी बढ़ावा मिलेगा।
  • सरकार एनआरएफ (नेशनल रिसर्च फाउंडेशन) की स्थापना करके विश्वविद्यालय और कॉलेज स्तर पर अनुसंधान और नवाचारों के नए तरीके स्थापित करेगी।

नई शिक्षा नीति 2020 के नुकसान –

  • भाषा का कार्यान्वयन यानि क्षेत्रीय भाषाओं में जारी रखने के लिए 5वीं कक्षा तक पढ़ाना एक बड़ी समस्या हो सकती है। बच्चे को क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाया जाएगा और इसलिए अंग्रेजी भाषा के प्रति कम दृष्टिकोण होगा, जो 5वीं कक्षा पूरा करने के बाद आवश्यक है।
  • बच्चों को संरचनात्मक तरीके से सीखने के अधीन किया गया है, जिससे उनके छोटे दिमाग पर बोझ बढ़ सकता है।

Conclusion :

नेशनल एजुकेशन पालिसी का मुख्य उद्देश्य भारत मैं प्रदान की जाने वाली शिक्षा को वैश्विक स्तर पर लाना है। जिससे कि भारत एक वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बन सके। नेशनल एजुकेशन पॉलिसी के माध्यम से शिक्षा का सार्वभौमीकरण किया जाएगा। नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2021 में सरकार के माध्यम से पुरानी एजुकेशन पॉलिसी में काफी सारे संशोधन किए हैं। जिससे कि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार आएगा और बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त कर पाएंगे। मिड दे मील कार्यक्रम को प्री-स्कूल बच्चों तक बढ़ाया जाएगा। यह नीति यह भी प्रस्तावित करती है कि सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को 2040 तक बहु-विषयक बनने का लक्ष्य रखना होगा। यह नीति देश में रोजगार के अवसरो को बढ़ावा देगी और हमारी शैक्षिक प्रणाली को मौलिक रूप से बदल देगी।

शिक्षा का अधिकार पर निबंध

Introduction : 

प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में शिक्षा का बड़ा महत्व हैं,शिक्षा को जीवन का आधार माना गया हैं। किसी भी देश के आधुनिक या विकसित होने का प्रमाण उस देश के नागरिकों के शिक्षा स्तर पर निर्भर करता हैं। आधुनिक समय में शिक्षा को ही किसी राष्ट्र या समाज की प्रगति का सूचक समझा जाता हैं। शिक्षा का अधिकार अधिनियम संसद का एक अधिनियम है जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 ए के तहत भारत में 6 से 14 वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए नि: शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के महत्व का वर्णन करता है। यह अधिनियम 1 अप्रैल 2010 से लागू हुआ। इस अधिनियम की खास बात यह है कि गरीब परिवार के वे बच्चे, जो प्राथमिक शिक्षा से वंचित हैं, के लिए निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान रखा गया है ।

शिक्षा के अधिकार के साथ बच्चों एवं युवाओं का विकास होता है तथा राष्ट्र शक्तिशाली एवं समृद्ध बनता है । यह उत्तरदायी एवं सक्रिय नागरिक बनाने में भी सहायक है । इसमें देश के सभी लोगों, अभिभावकों एवं शिक्षकों का भी सहयोग आवश्यक है । इस कानून के लागू करने पर आने वाले खर्च केंद्र (55 प्रतिशत) और राज्य सरकार (45 प्रतिशत) मिलकर उठाएंगे।

  • आज विश्व के सभी राष्ट्रों द्वारा भारतीय युवाओं की प्रतिमा का मुक्त कण्ठ से गुणगान किया जाना इसका प्रमाण है । बावजूद इसके सम्पूर्ण राष्ट्र की शिक्षा को आधार मानकर विश्लेषण किया जाए तो अभी भी भारत शिक्षा के क्षेत्र में विकसित राष्ट्रों की तुलना में काफी पीछे है ।
  • वर्तमान में भारतीय शिक्षा दर अनुमानतः 74% है, जो वैश्विक स्तर पर बहुत कम है । तब इस अनुपात में और वृद्धि करने के लिए बुद्धिजीवियों ने अपने-अपने सुझाव दिए ।
  • उन सभी के सुझावों पर गौर अते हुए भारत सरकर ने शिक्षा को अनिवार्य रूप से लागू करने हेतु शिक्षा का अधिकार कानून (RTE Act) बनाकर पूरे देश में समान रूप से प्रस्तुत कर दिया ।
  • ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009’, 1 अप्रैल, 2010 से सम्पूर्ण भारत में लागू कर दिया गया । इसका प्रमुख उद्देश्य है- वर्ष आयु तक के सभी बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य, गुणवतायुक्त शिक्षा को सुनिश्चित करना । इस अधिनियम को सर्व शिक्षा अभियान तथा वर्ष 2005 के विधेयक का ही संशोधित रूप कहा जाए, तो समीचीन ही होगा ।
  • क्षेत्रीय सरकारों, अधिकारियों तथा अभिभावकों का यह दायित्व है कि वे बच्चे को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा दिलाने का प्रबन्ध करें । इस कार्य हेतु वित्तीय प्रबन्धन का पूर्ण दायित्व केन्द्र व राज्य सरकार द्वारा मिश्रित रूप से उठाया जाएगा । कोई भी बच्चा किसी समय विद्यालय में प्रवेश पाने को स्वतन्त्र है ।
  • आयु प्रमाण-पत्र न होने के बावजूद, बच्चा विद्यालय में प्रवेश ले सकता है । बच्चों की आवश्यकता का ध्यान रखते हुए पुस्तकालय, खेल के मैदान, स्वच्छ व मजबूत विद्यालय कक्ष, इमारत आदि का प्रबन्ध राज्य सरकार द्वारा किया जाएगा ।
  • शिक्षण की गुणवत्ता में सुधार हेतु 35 छात्रों पर एक शिक्षक का प्रावधान किया गया है तथा साथ ही यह सुनिश्चित किया गया है कि ग्रामीण ब शहरी किसी भी क्षेत्र में यह अनुपात प्रभावित न हो। 
  • इसके साथ ही अध्यापन की गुणवत्ता हेतु केवल प्रशिक्षित अध्यापकों को ही नियुक्त करने का प्रावधान किया गया है जो अप्रशिक्षित अध्यापक, प्राचीन समय से अध्यापनरत हैं, उन्हें सीमित अवधि में अध्यापक-प्रशिक्षण पूर्ण करने का आदेश पारित किया गया है, अन्यथा उन्हें पद-मुक्त किया जा सकता हे।

इसके अतिरिक्त निम्न कार्यों का पूर्ण रूप से निषेध है –

  • छात्रों को शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना देना ।
  • प्रवेश के दौरान छात्रों से कोई लिखित परीक्षा लेना ।
  • छात्रों या उनके अभिभावकों से किसी प्रकार का शुल्क लेना।
  • छात्रों को ट्‌यूशन पढ़ने के लिए बाध्य करना ।
  • बिना मान्यता प्राप्ति के विद्यालय का संचालन करना ।
  • इसी प्रकार निजी विद्यालयों में भी कक्षा 1 से प्रवेश के समय आर्थिक रूप से कमजोर समुदायों के छात्रों हेतु 25% आरक्षण का प्रावधान सुनिश्चित किया गया है ।
  • इस अधिनियम को प्रभावी बनाने का उत्तरदायित्व केन्द्र ब राज्य सरकार दोनों का है, जिसका वित्तीय बहन भी दोनों संयुक्त रूप से करेंगे ।
  • इस अधिनियम के अनुसार, वित्तीय बहन का दायित्व सर्वप्रथम राज्य सरकार को सौंपा गया था, परन्तु राज्य सरकार ने अपनी विवशता का हवाला देते हुए इसे अस्वीकार कर दिया तथा केन्द्र सरकार से मदद का अनुरोध किया, तदुपरान्त केन्द्र तथा राज्य सरकार द्वारा

65:36 अनुपात के तहत वित्तीय प्रबन्धन का विभाजन किया गया । उत्तर-पूर्वी राज्यों में यह अनुपात 90:10 है।

केन्द्र सरकार के दायित्व –

(i) बच्चों का चहुँमुखी विकास ।

(ii) संवैधानिक मूल्यों का विकास ।

(iii) जहाँ तक हो सके, मातृभाषा में शिक्षण दिया जाए ।

(iv) बच्चों के मानसिक बिकास के अनुरूप, उनका नियमित विश्लेषण । (धारा-29 के अन्तर्गत)

(v) बच्चों को भयमुक्त माहौल प्रदान कराना तथा अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का विकास करना ।

राज्य सरकार के दायित्व –

(i) वह प्रत्येक बच्चे को नि:शुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराएगी ।

(ii) अपने क्षेत्र के 14 वर्ष आयु तक के बच्चों का पूर्ण रिकॉर्ड रखेगी ।

(iii) शैक्षणिक कलेण्डर का निर्धारण करेगी (धारा-9 के अन्तर्गत)।

Conclusion :

सर्व शिक्षा अभियान द्वारा पारित लक्ष्य वर्ष 2010 तक पूर्ण न हो पाया था, इसके अतिरिक्त यह अधिनियम भी लागू कर दिया गया । अतः यह कहना समीचीन ही होगा कि इस अधिनियम में सर्व शिक्षा अभियान के सभी नियम समाहित है । अधिनियम शिक्षा को 6 से 14 वर्ष की आयु के बीच हर बच्चे का मौलिक अधिकार बनाता है। अब भारत में 74% आबादी साक्षर है जिसमें पुरुषों में 80% और महिला 65% शामिल हैं। यह शिक्षा का मौलिक अधिकार 6 से 14 वर्षो के बालक-बालिकाओं के लिए निशुल्क और गुणवतापूर्ण शिक्षा की सहायता से उन्हें समान रूप से शिक्षा और रोजगार के समान अवसरों की उपलब्धता सुनिश्चित करवाएगा, इससे हमारा भारत शिक्षित और विकसित बनेगा।

बेटी बचाओबेटी पढ़ाओ पर निबंध

Introduction :

बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ योजना की शुरुआत भारतीय सरकार द्वारा 2015 के जनवरी महीने में हुई। इस योजना का मकसद भारतीय समाज में लड़कियों और महिलाओं के लिये कल्याणकारी कार्यों की कुशलता को बढ़ाने के साथ-साथ लोगों के बीच जागरुकता उत्पन्न करने के लिये भी है। 22 जनवरी 2015 को भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा सफलतापूर्वक इस योजना का आरंभ हुआ। इस योजना को सभी राज्य और केन्द्र शासित प्रदेशों में लागू करने के लिये एक राष्ट्रीय अभियान के द्वारा देश के 100 चुनिंदा शहरों में इस योजना को लागू किया गया । इस कार्यक्रम की शुरुआत करते समय प्रधनमंत्री ने कहा कि, भारतीय लोगों की ये सामान्य धारणा है कि लड़कियाँ अपने माता-पिता के बजाय पराया धन होती है।

अभिवावक सोचते है कि लड़के तो उनके अपने होते है जो बुढ़ापे में उनकी देखभाल करेंगे जबकि लड़कियाँ तो दूसरे घर जाकर अपने ससुराल वालों की सेवा करती हैं। लड़कियों या महिलाओं को कम महत्ता देने से धरती पर मानव समाज खतरे में पड़ सकता है क्योंकि अगर महिलाएँ नहीं तो जन्म नहीं। इसमें कुछ सकारात्मक पहलू ये है कि ये योजना लड़कियों के खिलाफ होने वाले अपराध और गलत प्रथाओं को हटाने के लिये एक बड़े कदम के रुप में साबित होगी।

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान के उद्देश्य –

  • इस अभियान के मुख्य उद्देश्य बालिकाओं की सुरक्षा करना और कन्या भ्रूण हत्या को रोकना है। इसके अलावा बालिकाओं की शिक्षा को बढ़ावा देना और उनके भविष्य को संवारना भी इसका उद्देश्य है। सरकार ने लिंग अनुपात में समानता लाने के लिए ये योजना शुरू की।
  • ताकि बालिकाएं दुनिया में सर उठकर जी पाएं और उनका जीवन स्तर भी ऊंचा उठे। इसका उद्देश्य बेटियों के अस्तित्व को बचाना एवं उनकी सुरक्षा को सुनिश्चित करना भी है। शिक्षा के साथ-साथ बालिकाओं को अन्य क्षेत्रों में भी आगे बढ़ाना एवं उनकी इसमें भागीदारी को सुनिश्चित करना भी इसका मुख्य लक्ष्य है|
  • इस अभियान के द्वारा समाज में महिलाओं के साथ हो रहे अन्याय और अत्याचार के विरूद्ध एक पहल हुई है। इससे बालक और बालिकाओं के बीच समानता का व्यवहार होगा। बेटियों को उनकी शिक्षा के लिए और साथ ही उनके विवाह के लिए भी सहायता उपलब्ध करवाई जाएगी, जिससे उनके विवाह में किसी प्रकार की दिक्कत नहीं होगी।
  • इस योजना से बालिकाओं को उनके अधिकार प्राप्त होंगे जिनकी वे हकदार हैं साथ ही महिला सशक्तिकरण के लिए भी यह अभियान एक मजबूत कड़ी है।

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान के कार्य –

  • हर थोड़े दिनों बाद हमें कन्या भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा, महिलाओं पर शारीरिक और मानसिक अत्याचार जैसे अपराधों की खबर देखने और सुनने को मिलती है। जिसके लिए भारत देश की सरकार इन बालिकाओं को बचाने और उनके अच्छे भविष्य के लिए हर संभव कोशिश कर रही है और अलग अलग योजनाएं चला रही है|
  • बालिकाओं की देखभाल और परवरिश अच्छी हो इसके लिए कई तरह के नए नियम कानून भी लागू किये जा रहे हैं। इसके साथ ही पुराने नियम कानूनों को बदला भी जा रहा है|
  • इस योजना के तहत मुख्य रूप से लड़के एवं लड़कियों के लिंग अनुपात में ध्यान केन्द्रित किया गया है, ताकि महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव और सेक्स डेटरमिनेशन टेस्ट को रोका जा सके।
  • इस अभियान का संचालन तीन स्तर पर हो रहा है, राष्ट्रीय स्तर पर, राजकीय स्तर पर और जिला स्तर पर। इस योजना में माता पिता एक निश्चित धनराशि अपनी बेटी के बैंक खाते में जमा करवाते हैं और सरकार उस राशि पर लाभ प्रदान करती है ताकि वह धनराशि बालिका की उच्च शिक्षा में और विवाह में काम आए।
  • जिससे बेटियों को बोझ ना समझा जाए। सरकार इस अभियान के द्वारा बालिकाओं की सुरक्षा और उनके उज्जवल भविष्य की कामना करती है।
  • इस अभियान के शुरुआती दौर में सभी ने इसका स्वागत और समर्थन किया लेकिन फिर भी ये इतना सफल नहीं हो पाया जितना सोचा गया था। बालिकाओं की स्थिति में सुधार लाने के लिए लोगों को जागरूक होना होगा और सभी को एकजुट होकर इस समस्या का समाधान करना होगा।
  • एक बच्ची दुनिया में आकर सबसे पहले बेटी बनती है। वे अपने माता पिता के लिए विपत्ति के समय में ढाल बनकर खड़ी रहती है। बालिका बन कर भाई की मदद करती है। बाद में धर्मपत्नी बनकर अपने पति और ससुराल वालों का हर अच्छी बुरी परिस्थिति में साथ निभाती है।
  • वह त्यागमूर्ति मां के रूप में अपने बच्चों पर सब कुछ कुर्बान कर जाती है और अपने बच्चों में अच्छे संस्कारों के बीज बोती है, जिससे वे आगे चलकर अच्छे इंसान बनें। सभी को बेटी और बेटों के साथ एक समान व्यवहार करना चाहिए।
  • उन्हें समान रूप से शिक्षा और जीवन स्तर देना चाहिए, समान अधिकार और प्यार – दुलार देना चाहिए, क्योंकि किसी भी देश के विकास के लिए बेटियां समान रूप से जिम्मेदार है।

Conclusion :

हम ये आशा करते हैं कि आने वाले दिनों में सामाजिक-आर्थिक कारणों की वजह से किसी भी लड़की को गर्भ में नहीं मारा जायेगा, अशिक्षित नहीं रहेंगी, असुरक्षित नहीं रहेंगी, अत: पूरे देश में लैंगिक भेदभाव को मिटाने के द्वारा बेटी-बचाओ बेटी-पढ़ाओ योजना का लक्ष्य लड़कियों को आर्थिक और सामाजिक दोनों तरह से स्वतंत्र बनाने का है। लडकियों को लडकों के समान समझा जाना चाहिए और उन्हें सभी कार्यक्षेत्रों में समान अवसर प्रदान करने चाहिए।

शिक्षा में यात्रा का महत्व

Introduction :

“दुनिया एक किताब है, और जो लोग यात्रा नहीं करते वे केवल इसका एक पन्नाही पढ़ते हैं।” यह एक प्रसिद्ध कहावत है। यात्रा हमें किसी भी विश्वविद्यालय या कॉलेज से अधिक सिखा सकती है। जब हम यात्रा करते हैं तो हम जिस देश की यात्रा करते हैं उसकी संस्कृति के बारे में सीखते हैं। यात्रा हमें एक सुखद अनुभव प्रदान करती हैं। ज्यादातर लोग, यात्रा के बाद, एक नए दृष्टिकोण, नए उत्साह और एक बेहतर दृढ़ संकल्प के साथ घर लौटते हैं। यात्रा के माध्यम से हमें  बहुत सी नई चीजों का ज्ञान प्राप्त होता है। हमें यात्रा से किसी विशेष समुदाय के लोगो के रहने के तरीके, सामाजिक जीवन, कृषि, पूजा, मान्यताओं, कला रूपों आदि के बारे में पता चलता है। 

छात्रों के लिए भी यात्रा का एक विशेष महत्व है। जब हम विभिन्न स्थानों पर जाते हैं, तो पाठ्यपुस्तकों में सीखी जाने वाली कई चीजें व्यावहारिक रूप से समझी जा सकती हैं। यात्रा एक व्यक्ति को उनके सभी साधारण सुखों और आराम से दूर, उनके आराम क्षेत्र से बाहर ले जाती है। यह हमें साहसी बनने, जीवन को पूर्ण रूप से जीने और समय का उपयोग करने के लिए नई चीजों की खोज करने और नए लोगों से मिलने के लिए मजबूर करता है। इसमें हमारे स्वास्थ्य को बेहतर बनाने की क्षमता है।

  • शिक्षा किसी भी बड़ी पारिवारिक, सामाजिक और यहाँ तक कि राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को भी हर करने की क्षमता प्रदान करती है। हम से कोई भी जीवन के हरेक पहलू में शिक्षा के महत्व को अनदेखा नहीं कर सकता। यह मस्तिष्क को सकारात्मक ओर मोड़ती है और सभी मानसिक और नकारात्मक विचारधाराओं को हटाती है।
  • यह लोगों की सोच को सकारात्मक विचार लाकर बदलती है और नकारात्मक विचारों को हटाती है। बचपन में ही हमारे माता-पिता हमारे मस्तिष्क को शिक्षा की ओर ले जाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे प्रसिद्ध शैक्षणिक संस्था में हमारा दाखिला कराकर हमें अच्छी शिक्षा प्रदान करने का हरसंभव प्रयास करते हैं।
  • यह हमें तकनीकी और उच्च कौशल वाले ज्ञान के साथ ही पूरे संसार में हमारे विचारों को विकसित करने की क्षमता प्रदान करती है। अपने कौशल और ज्ञान को बढ़ाने का सबसे अच्छे तरीके अखबारों को पढ़ना, टीवी पर ज्ञानवर्धक कार्यक्रमों को देखना, अच्छे लेखकों की किताबें पढ़ना आदि हैं। शिक्षा हमें अधिक सभ्य और बेहतर शिक्षित बनाती है। यह समाज में बेहतर पद और नौकरी में कल्पना की गए पद को प्राप्त करने में हमारी मदद करती है।
  • आधुनिक तकनीकी संसार में शिक्षा मुख्य भूमिका को निभाती है। आजकल, शिक्षा के स्तर को बढ़ाने के लिए बहुत तरीके हैं। शिक्षा का पूरा तंत्र अब बदल दिया गया है। हम अब 12वीं कक्षा के बाद दूरस्थ शिक्षा कार्यक्रम (डिस्टेंस एजूकेशन) के माध्यम से भी नौकरी के साथ ही पढ़ाई भी कर सकते हैं।
  • शिक्षा बहुत महंगी नहीं है, कोई भी कम धन होने के बाद भी अपनी पढ़ाई जारी रख सकता है। दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से हम आसानी से किसी भी बड़े और प्रसिद्ध विश्वविद्यालय में बहुत कम शुल्क पर प्रवेश ले सकते हैं। अन्य छोटे संस्थान भी किसी विशेष क्षेत्र में कौशल को बढ़ावा देने के लिए शिक्षा प्रदान कर रहे हैं।
  • पहले, शिक्षा प्रणाली बहुत ही महंगी और कठिन थी, गरीब लोग 12वीं कक्षा के बाद उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सक्षम नहीं थे। समाज में लोगों के बीच बहुत अन्तर और असमानता थी। उच्च जाति के लोग, अच्छे से शिक्षा प्राप्त करते थे और निम्न जाति के लोगों को स्कूल या कालेज में शिक्षा प्राप्त करने की अनुमति नहीं थी।
  • यद्यपि, अब शिक्षा की पूरी प्रक्रिया और विषय में बड़े स्तर पर परिवर्तन किए गए हैं। इस विषय में भारत सरकार के द्वारा सभी के लिए शिक्षा प्रणाली को सुगम और कम महंगी करने के लिए बहुत से नियम और कानून लागू किये गये हैं।
  • सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण, दूरस्थ शिक्षा प्रणाली ने उच्च शिक्षा को सस्ता और सुगम बनाया है, ताकि पिछड़े क्षेत्रों, गरीबों और मध्यम वर्ग के लोगों के लिए भविष्य में समान शिक्षा और सफलता प्राप्त करने के अवसर मिलें।
  • भलीभाँति शिक्षित व्यक्ति एक देश के मजबूत आधार स्तम्भ होते हैं और भविष्य में इसको आगे ले जाने में सहयोग करते हैं। इस तरह, शिक्षा वो उपकरण है, जो जीवन, समाज और राष्ट्र में सभी असंभव स्थितियों को संभव बनाती है।
  • शिक्षा हम सभी के उज्ज्वल भविष्य के लिए आवश्यक उपकरण है। हम जीवन में शिक्षा के इस उपकरण का प्रयोग करके कुछ भी अच्छा प्राप्त कर सकते हैं। शिक्षा का उच्च स्तर लोगों को सामाजिक और पारिवारिक आदर और एक अलग पहचान बनाने में मदद करता है।
  • शिक्षा का समय सभी के लिए सामाजिक और व्यक्तिगत रुप से बहुत महत्वपूर्ण समय होता है। यह एक व्यक्ति को जीवन में एक अलग स्तर और अच्छाई की भावना को विकसित करती है। शिक्षा किसी भी बड़ी पारिवारिक, सामाजिक और यहाँ तक कि राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को भी हर करने की क्षमता प्रदान करती है।
  • हम से कोई भी जीवन के हरेक पहलू में शिक्षा के महत्व को अनदेखा नहीं कर सकता। यह मस्तिष्क को सकारात्मक ओर मोड़ती है और सभी मानसिक और नकारात्मक विचारधाराओं को हटाती है।

Conclusion :

शिक्षा लोगों के मस्तिष्क को बड़े स्तर पर विकसित करने का कार्य करती है तथा इसके साथ ही यह समाज में लोगों के बीच के सभी भेदभावों को हटाने में भी सहायता करती है। यह हमें अच्छा अध्ययन कर्ता बनने में मदद करती है और जीवन के हर पहलू को समझने के लिए सूझ-बूझ को विकसित करती है। यह सभी मानव अधिकारों, सामाजिक अधिकारों, देश के प्रति कर्तव्यों और दायित्वों को समझने में हमारी सहायता करती है। नैनीताल, दार्जिलिंग, पंचमढ़ी, ऊटी आदि स्थानों की यात्रा से हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत प्रभाव पड़ता है। यह हमारे मानसिक ज्ञान को बढ़ा देता है और हमारे स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है, यात्रा हमारी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और पर्यटन उद्योग के विकास को भी बढ़ावा देती है। यात्रा किसी भी उम्र के व्यक्ति के लिए सही मनोरंजन है।

शहरी बेरोजगारी पर निबंध

Introduction :

बेरोजगारी एक गंभीर समस्या है जिसका सामना दुनिया के हर देश को करना पड़ रहा है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें एक कुशल और प्रतिभाशाली व्यक्ति नौकरी करना तो चाहता था लेकिन उसे नौकरी नहीं मिल पाती है। भारत उन विकासशील देशों में से एक है जो बेरोजगारी की समस्या से बुरी तरह से पीड़ित है। लेकिन भारत में बेरोजगारी की समस्या मांग की कमी का परिणाम नहीं है, बल्कि अधिक जनसंख्या वृद्धि के कारण है। चूंकि COVID-19 महामारी ने भारतीय अर्थव्यवस्था को चरमरा कर रख दिया है और बड़े पैमाने पर लोगो की नौकरियाँ छीन चुकी है, कोरोनोवायरस संक्रमण के बाद बेरोजगारी शहरी भारतीयों के लिए दूसरी सबसे बड़ी चिंता बन चुकी है। 

भारत भर में किए गए एक सर्वेक्षण में, शहरी क्षेत्रों में लगभग 87 प्रतिशत स्व-नियोजित उत्तरदाताओं ने कोरोनोवायरस (COVID-19) महामारी के कारण अपना रोजगार खो दिया है। इसका प्रभाव देश के ग्रामीण क्षेत्रों से आये श्रमिकों पर भी अधिक पड़ा था। सामान्य तौर पर, शहरी क्षेत्रों में रोजगार की हानि सर्वेक्षण के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक थी। सरकार ने 20 लाख करोड़ रुपये के विशेष आर्थिक पैकेज की घोषणा की है जो 2019-20 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 10% है, जो गरीब, मजदूरों, प्रवासियों को रोजगार प्रदान करने के लिए है, जिनकी कोरोनावाइरस महामारी की वजह से अपनी नौकरी खो दी है।

अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी के रूप –

1) खुली बेरोजगारी –

इस प्रकार की बेरोजगारी में श्रमिकों को कार्य करने के लिए अवसर प्राप्त नहीं होते जिनसे उन्हे नियमित आय प्राप्त हो सके । इस बेरोजगारी का मुख्य कार पूरक साधनों और पूंजी का अभाव है। यहाँ जनसंख्या वृद्धि की तुलना में पूंजी निर्माण की गति भी बहुत धीमी होती है । इसलिए, पूंजी-निर्माण की तुलना में श्रम-शक्ति अधिक तीव्रता से बद है। इसे ‘संरचनात्मक बेरोजगारी’ भी कहते हैं ।

2) अल्प रोजगारी-

अल्पविकसित अर्थव्यवस्था मे अल्प-रोजगारी को दो प्रकार से परिभाषा कर सकते हैं: प्रथम अवस्था वह है जिसमें एक व्यक्ति को उसकी योग्यतानुसार रोजगार मिल पाता । द्वितीय अवस्था वह है जिसमें एक श्रमिक को सम्पूर्ण दिन या कार्य से सम्पूर्ण स के अनुसार पर्याप्त कार्य नहीं मिलता । अत: श्रमिकों को पूर्णकालिक रोजगार नहीं मिल पा अर्थात् वर्ष में कुछ दिनों या किसी विशेष मौसम में ही कार्य मिल पाता है । इसी कारण इसे ‘मीर बेरोजगारी’ भी कहते हैं ।

3) ग्रामीण बेरोजगारी –

ग्रामीण क्षेत्रों में जनसंख्या बढ़ने से भूमि पर जनसंख्या का भा जाता है । भूमि पर जनसंख्या की मात्रा बढ़ने से कृषकों की संख्या भी बद जाती है । जिसके प्रच्छन्न बेरोजगारी की मात्रा बढ जाती है । अधिकांश श्रम-शक्ति प्राथमिक व्यवसायों में पं रहती है तथा व्यावसायिक ढाँचे के बेलोच होने के कारण गैर-व्यस्त मौसम में मी यह श्रमिक बाहर नहीं जाते ।

इसी कारण मौसमी बेरोजगारी पैदा होती है । मौसमी बेरोजगारी की मानव शक्ति के अल्प-प्रयोग से सम्बंधित है । यदि किसी विशेष मौसम में बेरोजगार श्रमित सहायक व्यवसायों में कार्य मिल भी जाता है, तो भी वह बेरोजगार बने ही रहते हैं ।

4) शहरी बेरोजगारी –

शहरी बेरोजगारी ग्रामीण बेरोजगारी की ही प्रशाखा है । कृषि में पुंजीवादी प्रणाली के विकास के कारण तथा भूमि पर जनसंख्या के भार में वृद्धि के कारण कृषक की आर्थिक दशा प्रतिदिन बिगड़ती जाती है, जिसके कारण भारी संख्या में श्रमिक ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर स्थानान्तरित होने लगते हैं ।

गाँवों से शहरी की ओर जनसंख्या की यह गतिशीलता शहरी आकर्षण के परिणामस्वरूप नहीं अपितु गाँवो मे पर्याप्त रोजगार के अवसर उपलब्ध न के कारण होती है ।

भारत में बेरोजगारी के कारण –

  • जनसंख्या वृद्धि की ऊँची दर बेरोजगारी की समस्या को जन्म देती है । इस दृष्टि से भारत की भूमि पर जनसंख्या का भार पहले से ही बहुत अधिक है । ऐसी स्थिति में नये रो के अवसर उपलब्ध कराने का दायित्व सहायक एवं सेवा क्षेत्र पर होता है।
  • यदि उद्योग क्षेत्र एवं सेवा क्षेत्र अपने दायित्व को पूर्ण करने में असमर्थ होते हैं तो जनसंख्या वृद्धि की तुलना में तो बेरी में वृद्धि होती है अथवा ग्रामीण क्षेत्रों में प्रच्छन्न बेरोजगारी उत्पन्न होती है ।
  • दूसरी बेरोजगारी की समस्या है कि भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि क्षेत्र का विकास उप धीमा एवं निस्तेज रहा है । यह क्षेत्र विकासशील अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं को पूए में असमर्थ रहा है । इसका कारण कृषि क्षेत्र की उत्पादकता का स्तर कम होना है ।
  • भारत में दोषपूर्ण आर्थिक नियोजन भी रोजगार के अवसरों में कमी का एक प्रमु बना ध्या है । भारत मे अभी तक आर्थिक विकास हेतु आधारभूत ढाँचे का विकास नहीं है । विभिन्न योजनाओं में ग्रामीण क्षेत्रों का समुचित ढंग से विकास नहीं हो सकता है, ग्रामीण जनसंख्या के स्थानान्तरण को नहीं रोका जा सका है । गावों में सेवा क्षेत्रो नहीं हो सका है ।
  • योजनाकाल में कृषि एवं उद्योगों मे तकनीकी विकास नहीं हो सका है जिससे कि उत्पादन में श्रम-शक्ति का अधिक उपयोग किया जा सके । योजनाओ में बेकार पडी हुई भूमि में उपयोग, सिचाई के साधनो का समुचित विकास, भूमि संरक्षण तथा कृषि में सहायब जैसे डेयरी, मछली पालन, मुर्गी पालन आदि का पर्याप्त विकास नहीं हो सका है जिसके कारण, शिक्षित, अशिक्षित एवं प्रशिक्षित व्यक्तियों हेतु नये रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं हो सके हैं ।
  • शहरों में बेरोजगारी को दूर करने के लिये सर्वप्रथम हमें शिक्षा प्रणाली में सुधार करना होगा इसके लिये आवश्यक यह है कि विद्यालय एवं विश्वविद्यालय स्तर पर व्यावसायिक शिक्षा को अपनार जाए ताकि शिक्षा प्राप्त कर यह व्यवसाय उम्मुख हो तथा स्नातकोत्तर स्तर पर या शोध पर केवर मेधावी विद्यार्थियों को ही प्रवेश दिया जाए ।
  • ऐसे उद्योगों में निवेश को प्रोत्साहित करना चाहिये जिनमें शीघ्र ही पूंजी का प्रतिफल प्राप्त होने त् सम्भावना हो । बढे शहरों में बेरोजगारी के केन्द्रीयकरण को रोकने हेतु औद्योगिक क्रियाओं विचलन एवं विकेन्द्रीकरण किया जाना चाहिए ।
  • राष्ट्रीयकृत बैंकों को छोटे उद्योगों एवं स्व-रोजग युक्त इंजीनियरों द्वारा आरम्भ किये गए उद्योगों को विकसित करने के लिये पर्याप्त मात्रा में सा सुविधाएँ उपलब्ध करानी चाहिए।

Conclusion :

सरकार द्वारा रोजगार के अवसरों में वृद्धि करने के लिए इस दृष्टि अनेक योजनाएं जैसे नेहरू रोजगार योजना रोजगार गारन्टी कार्यक्रम आदि क्रियान्वित गये हैं । भारत में बेरोजगारी की समस्या चरम पर है, लेकिन अब सरकार और स्थानीय अधिकारियों ने इस समस्या को गंभीरता से लिया है और इसे कम करने के लिए काम कर रहे हैं। नीति निर्माताओं और नागरिकों को अधिक नौकरियों के निर्माण के साथ ही रोजगार के लिए सही कौशल प्राप्त करने के लिए उचित प्रयास भी करते रहना चाहिए।

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Essays

Essay on National Education Policy (NEP) 2020

Short Essay on New National Education Policy (NEP) 2020

Introduction :

The New Educational policy 2020 is approved by the Central Govenment on 29 July, 2020 to overhaul the country’s education system. It aims to bring transformational reforms in school and higher education systems in India. This is the first educational policy of the 21st century in India.  This new policy has  covered the universalization of education from pre-school to secondary level with 100% Gross Enrolment Ratio in school education by 2030.

  • The New Educational policy 2020 proposes some variation including opening up of Indian higher education to foreign universities, introduction of a four-year multidisciplinary undergraduate programme with multiple exit options.
  • This educational policy focus at making India a global knowledge superpower. This policy is also focusing on overhauling the curriculum, reduction in the syllabus to retain core essentials and thrust on experiential learning and critical thinking.
  • With the introduction of this new policy the current 10+2 school system will be replaced by a new 5+3+3+4 curricular structure. As the new policy suggest, there will be 12 years of schooling with three years of Anganwadi/ pre-schooling.
  • At schools and higher education, there will be provision of inclusion of Sanskrit language at all levels as an option for students. This will introduce the early childhood education under the ambit of formal schooling.

Conclusion :

In this policy, the mid-day meal programme will be extended to pre-school children. According to New Educational policy 2020, the students should be taught in their mother tongue or regional language until Class 5. According to new educational policy all the universities and colleges must target to become multidisciplinary by 2040. This new policy will bring employment in the country and completely transform our educational system.

 

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Long Essay on New National Education Policy 2020

Introduction :

The New National Education Policy is approved by the Union Cabinet on 29 July, 2020 to overhaul the country’s education system. It will bring transformational reforms in school and higher education systems in the country. This is the first education policy of the 21st century. NEP-2020, which will replace the National Policy on Education-1986, is an inclusive framework focusing on the elementary-level of education to higher education in the country.

  • The aim of the new policy is the universalization of education from pre-school to secondary level with 100% Gross Enrolment Ratio (GER) in school education by 2030.
  • The NEP proposes some changes including opening up of Indian higher education to foreign universities, introduction of a four-year multidisciplinary undergraduate programme with multiple exit options.
  • The NEP 2020 aims at making India a global knowledge superpower. In school education, the policy focuses on overhauling the curriculum, reduction in the syllabus to retain core essentials and thrust on experiential learning and critical thinking.
  • As the objective of any education system is to benefit children so that no child loses any opportunity to learn and excel because of circumstances of birth or background.
  • The current 10+2 system in the school will be replaced by a new 5+3+3+4 curricular structure. As per the new policy, there will be 12 years of schooling with three years of Anganwadi/ pre-schooling.
  • At school and higher education, Sanskrit will also be included at all levels as an option for students. This brings early childhood education under the ambit of formal schooling.
  • The Policy reaffirms that bridging social gaps in access, participation, and learning outcomes in school education will continue to be one of the major goals of all education sector development programmes.
  • The NEP 2020 talks about creating higher performance standards for teachers clearly stating out the role of the teacher at different levels of expertise and competencies required for that stage. Teachers will also have to be digitally trained to blend into the digital learning processes.

Conclusion :

NEP 2020 recognises now the need to evaluate higher-order skills, such as analysis, critical thinking and conceptual clarity, and hence shifting the focus of assessments from marks based to competency based. The mid-day meal programme will be extended to pre-school children. According to NEP 2020, the students should be taught in their mother tongue or regional language until Class 5. The policy also proposes that all universities and colleges must aim to become multidisciplinary by 2040. This policy will boost employment in the country and will radically transform our educational system.

New education policy 2020 Vs Online Education

Introduction :

Education is an important part of our live, it can either make us or break us in the future depending on the careers we choose. Online education or e-education consist of electronic mode of learning and teaching. Online education occurs outside the classroom through digital platforms. With online education students can acquire educational experiences through technology.

  • Online education can be delivered in the form of text, animation, audio, video and images. The corona virus pandemic has resulted in closure of schools all across the world.
  • Over 1.2 billion children globally are out of schools. As a result, education has changed drastically with the rise of e-learning, whereby teaching is undertaken on digital platforms.
  • Online learning has increased retention of information, and take less time. Due to huge demand, many online learning platforms are offering free access to their services, including platforms like BYJU’S & Unacademy.
  • There are some challenges are also there to overcome. Research reveals that on average, students retain 35-60% more material when learning online compared to only 8-10% in a classroom.

Conclusion :

This is commonly because of the students being able to learn faster online. Online learning requires 40-60% less time to learn than in a traditional classroom because students can learn at their own pace, revise the concepts as and when they want. Online education has made learning flexible because learners have the freedom to study at suitable time. But tt is truth that learning is highly dependent on the individual’s motivation to learn.

Long essay on New education policy 2020 Vs Online Education

Introduction :

Online education is quick and have very fast delivery process that includes any learning that takes place with the help of the internet. Online learning enables the educators to communicate with students who otherwise will not be able to enroll in a traditional classroom course and assists students by adjusting their own pace or speed of learning. In todays senario, the schools and institutions that offering online education  or online courses are growing very quickly.

  • Students have an option that they can  pursue degrees courses through online methods through a valued and credentialed university.
  • Online education is also well known to offer the benefits of effficiency and synergy. The Online Education programmes makes room for dynamic communications between students and the teachers.
  • With the help of these communications, sources can be shared, and an open-ended synergy developed between the teacher and students through a learning process.
  • When each person provides his own opinion through discussions and comments on others’ work course, it benefits the student to learn better and faster.
  • This unique advantage is shown in a student-centred virtual learning environment that online learning format alone can provide.
  • Through online classes, there is no need to travel to a different city or commute long distances at all. We can stay where we are and keep our current job while we work toward improving our career with an online degree courses.
  • Online education also helps digital nomads as their own lifestyle. We can watch lectures and complete our course along with our work wherever we are.
  • It does not matters whether we are a full-time or part-time online student, the online education experience provides a much more manageable schedule for all of us.
  • Online education has gained much more approval due to its cheapness and easy affordability. Online courses are also more affordable than those offered at schools or colleges in these days.
  • While studying in universities, we may have to spend some additional amount of money in other allied activities such as transportation, lodging, and meals, but online education will not require such expenses at all.
  • The most important aspects of online learning is its flexibility of time, however, one has to be extremely self-motivated for studying.
  • The Online students develop various approaches for staying up to date for their study. Things like taking extra time every week to study with least distractions can help immensely and help in drastice progress.

Conclusion :

Online education has great potential and many advantages that have increased educational access. It provides a high-quality learning opportunities to every student, improves their outcomes and skills, and expands educational choice options. Therefore, location, time, and quality are no longer considered major obsticles in seeking higher education just because of online education or e-learning.

New education policy 2020 – A step towards Right to Education (RTE)

Introduction :

The Right to Education (RTE) Act, 2009 empowers children belonging to the backward section of the economy to free and compulsory education.  It describes the importance of free and compulsory education for children between the age of 6 to 14 years in India under Article 21A of the Indian Constitution. This act came into force on 1 April 2010. The right to education also includes a responsibility to provide basic education for individuals who have not completed primary education.

  • All children between the ages of 6 to 14 can get free education from class 1 to class 8, in a nearby government school.
  • The Right to Education Act states that it is the responsibility of the government to endow every child with free and compulsory education and it should also ensure their attendance and accomplishment of their elementary education.
  • It specifically explains that free education should be provided wherein no child should pay any kind of amount or fees to the school for acquiring elementary education.
  • Parents of the child should not be charged for any kind of educational facilities provided to the children. Hence, it is the complete liability of the government to sustain all the expenditure incurred in the process of providing education to the children.
  • It is not only the government schools but private schools are also supposed to reserve 25% of the seats for unprivileged children of the society.
  • Children must be given admission in a school even if they don’t have documents like transfer certificate and age proof. Children cannot be forced to give tests for getting admission in a school.
  • Every private school has to keep 25% of its seats in class 1 for children from ‘disadvantaged groups’ and ‘weaker sections’. The school has to give free education to these children till class 8.
  • National Council of Educational Research and Training (NCERT) is the apex body located at New Delhi, It makes the curriculum related matters for school education across India.

Conclusion :

The NCERT provides support, guidance and technical assistance to a number of schools in India. India has made progress in terms of increasing the primary education attendance rate and expanding literacy to approximately three-quarters of the population. The Act makes education a fundamental right of every child between the ages of 6 and 14. Now in India 74% of the population is literate in which males comprise 80% and females 65%.

 

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नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 पर निबंध- New Education Policy 2020 essay in hindi 250 words

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 पर निबंध- New Education Policy 2020 essay in hindi 250 words :

Introduction : 

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को देश की शिक्षा प्रणाली में समयनुसार उचित बदलाव करने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा 29 जुलाई, 2020 को मंजूरी दी गई। यह नीति देश में स्कूल और उच्च शिक्षा प्रणालियों में परिवर्तनकारी सुधार लेन में बहुत मददगार साबित होगी। यह 21 वीं सदी की पहली शिक्षा नीति है। नई नीति का उद्देश्य 2030 तक स्कूली शिक्षा में 100% सकल नामांकन अनुपात (GER) के साथ पूर्व-माध्यमिक से माध्यमिक स्तर तक शिक्षा का सार्वभौमिकरण करना है।

  • नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति द्वारा कुछ नए बदलाव लाये गए है, जिसमें भारतीय उच्च शिक्षा को विदेशी विश्वविद्यालयों में बढ़ावा देना, चार-वर्षीय बहु-विषयक स्नातक कार्यक्रम के लिए कई निकास विकल्पों के साथ प्रस्तुत करना शामिल है। 
  • इस  नई नीति का उद्देश्य भारत को वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनाना है। स्कूल में वर्तमान 10 + 2 प्रणाली को एक नयी  5 + 3 + 3 + 4 पाठ्यक्रम प्रणाली से बदल दिया जाएगा। नई नीति के अनुसार, तीन साल की आंगनवाड़ी / प्री-स्कूलिंग के साथ 12 साल की स्कूली शिक्षा होगी।
  • स्कूल और उच्च शिक्षा में, छात्रों के लिए एक विकल्प के रूप में संस्कृत को भी सभी स्तरों पर शामिल किया जाएगा। यह नीति औपचारिक स्कूली शिक्षा के दायरे में प्री-स्कूलिंग को शामिल करेगी ।

Conclusion :

मिड दे मील कार्यक्रम को प्री-स्कूल बच्चों तक बढ़ाया जाएगा। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के अनुसार, छात्रों को कक्षा 5 तक उनकी मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाया जाएगा। यह नीति यह भी प्रस्तावित करती है कि सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को 2040 तक बहु-विषयक बनने का लक्ष्य रखना होगा। यह नीति देश में रोजगार के अवसरो को बढ़ावा देगी और हमारी शैक्षिक प्रणाली को मौलिक रूप से बदल देगी।

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नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 पर निबंध (Long essay on New Education Policy 2020)

Introduction : 

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को देश की शिक्षा प्रणाली में समयनुसार उचित बदलाव करने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा 29 जुलाई, 2020 को मंजूरी दी गई। यह नीति देश में स्कूल और उच्च शिक्षा प्रणालियों में परिवर्तनकारी सुधार लेन में बहुत मददगार साबित होगी। यह 21 वीं सदी की पहली शिक्षा नीति है। नई नीति का उद्देश्य 2030 तक स्कूली शिक्षा में 100% सकल नामांकन अनुपात (GER) के साथ पूर्व-माध्यमिक से माध्यमिक स्तर तक शिक्षा का सार्वभौमिकरण करना है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति द्वारा कुछ नए बदलाव लाये गए है, जिसमें भारतीय उच्च शिक्षा को विदेशी विश्वविद्यालयों में बढ़ावा देना, चार-वर्षीय बहु-विषयक स्नातक कार्यक्रम के लिए कई निकास विकल्पों के साथ प्रस्तुत करना शामिल है। 

इस  नई नीति का उद्देश्य भारत को वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनाना है। स्कूली शिक्षा में, इस नीति में पाठ्यक्रम को ओवरहाल करने, पाठ्यक्रम में कमी लाने और अनुभवात्मक शिक्षा पर जोर देने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। स्कूल में वर्तमान 10 + 2 प्रणाली को एक नयी  5 + 3 + 3 + 4 पाठ्यक्रम प्रणाली से बदल दिया जाएगा। नई नीति के अनुसार, तीन साल की आंगनवाड़ी / प्री-स्कूलिंग के साथ 12 साल की स्कूली शिक्षा होगी। स्कूल और उच्च शिक्षा में, छात्रों के लिए एक विकल्प के रूप में संस्कृत को भी सभी स्तरों पर शामिल किया जाएगा। यह नीति औपचारिक स्कूली शिक्षा के दायरे में प्री-स्कूलिंग को शामिल करेगी ।

National Education Policy 2021 के विशेषताएं –

  • मानव संसाधन प्रबंधन मंत्रालय अब शिक्षा मंत्रालय के नाम से जाना जाएगा।
  • National Education Policy के अंतर्गत शिक्षा का सार्वभौमीकरण किया जाएगा जिसमें मेडिकल और लॉ की पढ़ाई शामिल नहीं की गई है।
  • पहले 10+2 का पैटर्न फॉलो किया जाता था परंतु अब नई नेशनल एजुकेशन पॉलिसी के अंतर्गत 5+3+3+4 का पैटर्न फॉलो किया जाएगा। जिसमें 12 साल की स्कूली शिक्षा होगी और 3 साल की प्री स्कूली शिक्षा होगी।
  • छठी कक्षा से व्यवसायिक परीक्षण इंटर्नशिप आरंभ कर दी जाएगी।
  • पांचवी कक्षा तक शिक्षा मातृभाषा या फिर क्षेत्रीय भाषा में प्रदान की जाएगी।
  • पहले साइंस, कॉमर्स तथा अर्ट स्ट्रीम होती थी। अब ऐसी कोई भी स्ट्रीम नहीं होगी। छात्र अपनी इच्छा अनुसार विषय चुन सकते हैं। छात्र फिजिक्स के साथ अकाउंट या फिर आर्ट्स का कोई सब्जेक्ट भी पढ़ सकते हैं।
  • छात्रों को छठी कक्षा से कोडिंग सिखाई जाएगी।
  • सभी स्कूल डिजिटल इक्विप्ड किए जाएंगे।
  • सभी प्रकार की इकॉन्टेंट को क्षेत्रीय भाषा में ट्रांसलेट किया जाएगा।
  • वर्चुअल लैब डिवेलप की जाएंगी।

नई शिक्षा नीति 2020 के सिद्धांत –

  • प्रत्येक बच्चे की क्षमता की पहचान एवं क्षमता का विकास करना
  • साक्षरता एवं संख्यामकता के ज्ञान को बच्चों के अंतर्गत विकसित करना
  • शिक्षा को लचीला बनाना
  • एक सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली में निवेश करना
  • गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को विकसित करना
  • बच्चों को भारतीय संस्कृति से जोड़ना
  • उत्कृष्ट स्तर पर शोध करना
  • बच्चों को सुशासन सिखाना एवं सशक्तिकरण करना
  • शिक्षा नीति को पारदर्शी बनाना
  • तकनीकी यथासंभव उपयोग पर जोर
  • मूल्यांकन पर जोर देना
  • विभिन्न प्रकार की भाषाएं सिखाना
  • बच्चों की सोच को रचनात्मक एवं तार्किक करना

नई शिक्षा नीति 2020 के फायदे –

  • नई शिक्षा नीति शिक्षार्थियों के एकीकृत विकास पर केंद्रित है।
  • यह 10+2 सिस्टम को 5+3+3+4 संरचना के साथ बदल देता है, जिसमें 12 साल की स्कूली शिक्षा और 3 साल की प्री-स्कूलिंग होती है, इस प्रकार बच्चों को पहले चरण में स्कूली शिक्षा का अनुभव होता है।
  • परीक्षाएं केवल 3, 5 और 8वीं कक्षा में आयोजित की जाएंगी, अन्य कक्षाओं का परिणाम नियमित मूल्यांकन के तौर पर लिए जाएंगे। बोर्ड परीक्षा को भी आसान बनाया जाएगा और एक वर्ष में दो बार आयोजित किया जाएगा ताकि प्रत्येक बच्चे को दो मौका मिलें।
  • नीति में पाठ्यक्रम से बाहर निकलने के अधिक लचीलेपन के साथ स्नातक कार्यक्रमों के लिए एक बहु-अनुशासनात्मक और एकीकृत दृष्टिकोण की परिकल्पना की गई है।
  • राज्य और केंद्र सरकार दोनों शिक्षा के लिए जनता द्वारा अधिक से अधिक सार्वजनिक निवेश की दिशा में एक साथ काम करेंगे, और जल्द से जल्द जीडीपी को 6% तक बढ़ाएंगे।
  • नई शिक्षा नीति सीखने के लिए पुस्तकों का भोझ बढ़ाने के बजाय व्यावहारिक शिक्षा को बढ़ाने पर ज्यादा केंद्रित है।
  • एनईपी यानी नई शिक्षा निति सामान्य बातचीत, समूह चर्चा और तर्क द्वारा बच्चों के विकास और उनके सीखने की अनुमति देता है।
  • एनटीए राष्ट्रीय स्तर पर विश्वविद्यालयों के लिए एक आम प्रवेश परीक्षा आयोजित करेगा।
  • छात्रों को पाठ्यक्रम के विषयों के साथ-साथ सीखने की इच्छा रखने वाले पाठ्यक्रम का चयन करने की भी स्वतंत्रता होगी, इस तरह से कौशल विकास को भी बढ़ावा मिलेगा।
  • सरकार एनआरएफ (नेशनल रिसर्च फाउंडेशन) की स्थापना करके विश्वविद्यालय और कॉलेज स्तर पर अनुसंधान और नवाचारों के नए तरीके स्थापित करेगी।

नई शिक्षा नीति 2020 के नुकसान –

  • भाषा का कार्यान्वयन यानि क्षेत्रीय भाषाओं में जारी रखने के लिए 5वीं कक्षा तक पढ़ाना एक बड़ी समस्या हो सकती है। बच्चे को क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाया जाएगा और इसलिए अंग्रेजी भाषा के प्रति कम दृष्टिकोण होगा, जो 5वीं कक्षा पूरा करने के बाद आवश्यक है।
  • बच्चों को संरचनात्मक तरीके से सीखने के अधीन किया गया है, जिससे उनके छोटे दिमाग पर बोझ बढ़ सकता है।

Conclusion :

नेशनल एजुकेशन पालिसी का मुख्य उद्देश्य भारत मैं प्रदान की जाने वाली शिक्षा को वैश्विक स्तर पर लाना है। जिससे कि भारत एक वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बन सके। नेशनल एजुकेशन पॉलिसी के माध्यम से शिक्षा का सार्वभौमीकरण किया जाएगा। नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2021 में सरकार के माध्यम से पुरानी एजुकेशन पॉलिसी में काफी सारे संशोधन किए हैं। जिससे कि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार आएगा और बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त कर पाएंगे। मिड दे मील कार्यक्रम को प्री-स्कूल बच्चों तक बढ़ाया जाएगा। यह नीति यह भी प्रस्तावित करती है कि सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को 2040 तक बहु-विषयक बनने का लक्ष्य रखना होगा। यह नीति देश में रोजगार के अवसरो को बढ़ावा देगी और हमारी शैक्षिक प्रणाली को मौलिक रूप से बदल देगी।

शिक्षा का अधिकार पर निबंध

Introduction : 

प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में शिक्षा का बड़ा महत्व हैं,शिक्षा को जीवन का आधार माना गया हैं। किसी भी देश के आधुनिक या विकसित होने का प्रमाण उस देश के नागरिकों के शिक्षा स्तर पर निर्भर करता हैं। आधुनिक समय में शिक्षा को ही किसी राष्ट्र या समाज की प्रगति का सूचक समझा जाता हैं। शिक्षा का अधिकार अधिनियम संसद का एक अधिनियम है जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 ए के तहत भारत में 6 से 14 वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए नि: शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के महत्व का वर्णन करता है। यह अधिनियम 1 अप्रैल 2010 से लागू हुआ। इस अधिनियम की खास बात यह है कि गरीब परिवार के वे बच्चे, जो प्राथमिक शिक्षा से वंचित हैं, के लिए निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान रखा गया है ।

शिक्षा के अधिकार के साथ बच्चों एवं युवाओं का विकास होता है तथा राष्ट्र शक्तिशाली एवं समृद्ध बनता है । यह उत्तरदायी एवं सक्रिय नागरिक बनाने में भी सहायक है । इसमें देश के सभी लोगों, अभिभावकों एवं शिक्षकों का भी सहयोग आवश्यक है । इस कानून के लागू करने पर आने वाले खर्च केंद्र (55 प्रतिशत) और राज्य सरकार (45 प्रतिशत) मिलकर उठाएंगे।

  • आज विश्व के सभी राष्ट्रों द्वारा भारतीय युवाओं की प्रतिमा का मुक्त कण्ठ से गुणगान किया जाना इसका प्रमाण है । बावजूद इसके सम्पूर्ण राष्ट्र की शिक्षा को आधार मानकर विश्लेषण किया जाए तो अभी भी भारत शिक्षा के क्षेत्र में विकसित राष्ट्रों की तुलना में काफी पीछे है ।
  • वर्तमान में भारतीय शिक्षा दर अनुमानतः 74% है, जो वैश्विक स्तर पर बहुत कम है । तब इस अनुपात में और वृद्धि करने के लिए बुद्धिजीवियों ने अपने-अपने सुझाव दिए ।
  • उन सभी के सुझावों पर गौर अते हुए भारत सरकर ने शिक्षा को अनिवार्य रूप से लागू करने हेतु शिक्षा का अधिकार कानून (RTE Act) बनाकर पूरे देश में समान रूप से प्रस्तुत कर दिया ।
  • ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009’, 1 अप्रैल, 2010 से सम्पूर्ण भारत में लागू कर दिया गया । इसका प्रमुख उद्देश्य है- वर्ष आयु तक के सभी बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य, गुणवतायुक्त शिक्षा को सुनिश्चित करना । इस अधिनियम को सर्व शिक्षा अभियान तथा वर्ष 2005 के विधेयक का ही संशोधित रूप कहा जाए, तो समीचीन ही होगा ।
  • क्षेत्रीय सरकारों, अधिकारियों तथा अभिभावकों का यह दायित्व है कि वे बच्चे को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा दिलाने का प्रबन्ध करें । इस कार्य हेतु वित्तीय प्रबन्धन का पूर्ण दायित्व केन्द्र व राज्य सरकार द्वारा मिश्रित रूप से उठाया जाएगा । कोई भी बच्चा किसी समय विद्यालय में प्रवेश पाने को स्वतन्त्र है ।
  • आयु प्रमाण-पत्र न होने के बावजूद, बच्चा विद्यालय में प्रवेश ले सकता है । बच्चों की आवश्यकता का ध्यान रखते हुए पुस्तकालय, खेल के मैदान, स्वच्छ व मजबूत विद्यालय कक्ष, इमारत आदि का प्रबन्ध राज्य सरकार द्वारा किया जाएगा ।
  • शिक्षण की गुणवत्ता में सुधार हेतु 35 छात्रों पर एक शिक्षक का प्रावधान किया गया है तथा साथ ही यह सुनिश्चित किया गया है कि ग्रामीण ब शहरी किसी भी क्षेत्र में यह अनुपात प्रभावित न हो। 
  • इसके साथ ही अध्यापन की गुणवत्ता हेतु केवल प्रशिक्षित अध्यापकों को ही नियुक्त करने का प्रावधान किया गया है जो अप्रशिक्षित अध्यापक, प्राचीन समय से अध्यापनरत हैं, उन्हें सीमित अवधि में अध्यापक-प्रशिक्षण पूर्ण करने का आदेश पारित किया गया है, अन्यथा उन्हें पद-मुक्त किया जा सकता हे।

इसके अतिरिक्त निम्न कार्यों का पूर्ण रूप से निषेध है –

  • छात्रों को शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना देना ।
  • प्रवेश के दौरान छात्रों से कोई लिखित परीक्षा लेना ।
  • छात्रों या उनके अभिभावकों से किसी प्रकार का शुल्क लेना।
  • छात्रों को ट्‌यूशन पढ़ने के लिए बाध्य करना ।
  • बिना मान्यता प्राप्ति के विद्यालय का संचालन करना ।
  • इसी प्रकार निजी विद्यालयों में भी कक्षा 1 से प्रवेश के समय आर्थिक रूप से कमजोर समुदायों के छात्रों हेतु 25% आरक्षण का प्रावधान सुनिश्चित किया गया है ।
  • इस अधिनियम को प्रभावी बनाने का उत्तरदायित्व केन्द्र ब राज्य सरकार दोनों का है, जिसका वित्तीय बहन भी दोनों संयुक्त रूप से करेंगे ।
  • इस अधिनियम के अनुसार, वित्तीय बहन का दायित्व सर्वप्रथम राज्य सरकार को सौंपा गया था, परन्तु राज्य सरकार ने अपनी विवशता का हवाला देते हुए इसे अस्वीकार कर दिया तथा केन्द्र सरकार से मदद का अनुरोध किया, तदुपरान्त केन्द्र तथा राज्य सरकार द्वारा

65:36 अनुपात के तहत वित्तीय प्रबन्धन का विभाजन किया गया । उत्तर-पूर्वी राज्यों में यह अनुपात 90:10 है।

केन्द्र सरकार के दायित्व –

(i) बच्चों का चहुँमुखी विकास ।

(ii) संवैधानिक मूल्यों का विकास ।

(iii) जहाँ तक हो सके, मातृभाषा में शिक्षण दिया जाए ।

(iv) बच्चों के मानसिक बिकास के अनुरूप, उनका नियमित विश्लेषण । (धारा-29 के अन्तर्गत)

(v) बच्चों को भयमुक्त माहौल प्रदान कराना तथा अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का विकास करना ।

राज्य सरकार के दायित्व –

(i) वह प्रत्येक बच्चे को नि:शुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराएगी ।

(ii) अपने क्षेत्र के 14 वर्ष आयु तक के बच्चों का पूर्ण रिकॉर्ड रखेगी ।

(iii) शैक्षणिक कलेण्डर का निर्धारण करेगी (धारा-9 के अन्तर्गत)।

Conclusion :

सर्व शिक्षा अभियान द्वारा पारित लक्ष्य वर्ष 2010 तक पूर्ण न हो पाया था, इसके अतिरिक्त यह अधिनियम भी लागू कर दिया गया । अतः यह कहना समीचीन ही होगा कि इस अधिनियम में सर्व शिक्षा अभियान के सभी नियम समाहित है । अधिनियम शिक्षा को 6 से 14 वर्ष की आयु के बीच हर बच्चे का मौलिक अधिकार बनाता है। अब भारत में 74% आबादी साक्षर है जिसमें पुरुषों में 80% और महिला 65% शामिल हैं। यह शिक्षा का मौलिक अधिकार 6 से 14 वर्षो के बालक-बालिकाओं के लिए निशुल्क और गुणवतापूर्ण शिक्षा की सहायता से उन्हें समान रूप से शिक्षा और रोजगार के समान अवसरों की उपलब्धता सुनिश्चित करवाएगा, इससे हमारा भारत शिक्षित और विकसित बनेगा।

बेटी बचाओबेटी पढ़ाओ पर निबंध

Introduction :

बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ योजना की शुरुआत भारतीय सरकार द्वारा 2015 के जनवरी महीने में हुई। इस योजना का मकसद भारतीय समाज में लड़कियों और महिलाओं के लिये कल्याणकारी कार्यों की कुशलता को बढ़ाने के साथ-साथ लोगों के बीच जागरुकता उत्पन्न करने के लिये भी है। 22 जनवरी 2015 को भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा सफलतापूर्वक इस योजना का आरंभ हुआ। इस योजना को सभी राज्य और केन्द्र शासित प्रदेशों में लागू करने के लिये एक राष्ट्रीय अभियान के द्वारा देश के 100 चुनिंदा शहरों में इस योजना को लागू किया गया । इस कार्यक्रम की शुरुआत करते समय प्रधनमंत्री ने कहा कि, भारतीय लोगों की ये सामान्य धारणा है कि लड़कियाँ अपने माता-पिता के बजाय पराया धन होती है।

अभिवावक सोचते है कि लड़के तो उनके अपने होते है जो बुढ़ापे में उनकी देखभाल करेंगे जबकि लड़कियाँ तो दूसरे घर जाकर अपने ससुराल वालों की सेवा करती हैं। लड़कियों या महिलाओं को कम महत्ता देने से धरती पर मानव समाज खतरे में पड़ सकता है क्योंकि अगर महिलाएँ नहीं तो जन्म नहीं। इसमें कुछ सकारात्मक पहलू ये है कि ये योजना लड़कियों के खिलाफ होने वाले अपराध और गलत प्रथाओं को हटाने के लिये एक बड़े कदम के रुप में साबित होगी।

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान के उद्देश्य –

  • इस अभियान के मुख्य उद्देश्य बालिकाओं की सुरक्षा करना और कन्या भ्रूण हत्या को रोकना है। इसके अलावा बालिकाओं की शिक्षा को बढ़ावा देना और उनके भविष्य को संवारना भी इसका उद्देश्य है। सरकार ने लिंग अनुपात में समानता लाने के लिए ये योजना शुरू की।
  • ताकि बालिकाएं दुनिया में सर उठकर जी पाएं और उनका जीवन स्तर भी ऊंचा उठे। इसका उद्देश्य बेटियों के अस्तित्व को बचाना एवं उनकी सुरक्षा को सुनिश्चित करना भी है। शिक्षा के साथ-साथ बालिकाओं को अन्य क्षेत्रों में भी आगे बढ़ाना एवं उनकी इसमें भागीदारी को सुनिश्चित करना भी इसका मुख्य लक्ष्य है|
  • इस अभियान के द्वारा समाज में महिलाओं के साथ हो रहे अन्याय और अत्याचार के विरूद्ध एक पहल हुई है। इससे बालक और बालिकाओं के बीच समानता का व्यवहार होगा। बेटियों को उनकी शिक्षा के लिए और साथ ही उनके विवाह के लिए भी सहायता उपलब्ध करवाई जाएगी, जिससे उनके विवाह में किसी प्रकार की दिक्कत नहीं होगी।
  • इस योजना से बालिकाओं को उनके अधिकार प्राप्त होंगे जिनकी वे हकदार हैं साथ ही महिला सशक्तिकरण के लिए भी यह अभियान एक मजबूत कड़ी है।

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान के कार्य –

  • हर थोड़े दिनों बाद हमें कन्या भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा, महिलाओं पर शारीरिक और मानसिक अत्याचार जैसे अपराधों की खबर देखने और सुनने को मिलती है। जिसके लिए भारत देश की सरकार इन बालिकाओं को बचाने और उनके अच्छे भविष्य के लिए हर संभव कोशिश कर रही है और अलग अलग योजनाएं चला रही है|
  • बालिकाओं की देखभाल और परवरिश अच्छी हो इसके लिए कई तरह के नए नियम कानून भी लागू किये जा रहे हैं। इसके साथ ही पुराने नियम कानूनों को बदला भी जा रहा है|
  • इस योजना के तहत मुख्य रूप से लड़के एवं लड़कियों के लिंग अनुपात में ध्यान केन्द्रित किया गया है, ताकि महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव और सेक्स डेटरमिनेशन टेस्ट को रोका जा सके।
  • इस अभियान का संचालन तीन स्तर पर हो रहा है, राष्ट्रीय स्तर पर, राजकीय स्तर पर और जिला स्तर पर। इस योजना में माता पिता एक निश्चित धनराशि अपनी बेटी के बैंक खाते में जमा करवाते हैं और सरकार उस राशि पर लाभ प्रदान करती है ताकि वह धनराशि बालिका की उच्च शिक्षा में और विवाह में काम आए।
  • जिससे बेटियों को बोझ ना समझा जाए। सरकार इस अभियान के द्वारा बालिकाओं की सुरक्षा और उनके उज्जवल भविष्य की कामना करती है।
  • इस अभियान के शुरुआती दौर में सभी ने इसका स्वागत और समर्थन किया लेकिन फिर भी ये इतना सफल नहीं हो पाया जितना सोचा गया था। बालिकाओं की स्थिति में सुधार लाने के लिए लोगों को जागरूक होना होगा और सभी को एकजुट होकर इस समस्या का समाधान करना होगा।
  • एक बच्ची दुनिया में आकर सबसे पहले बेटी बनती है। वे अपने माता पिता के लिए विपत्ति के समय में ढाल बनकर खड़ी रहती है। बालिका बन कर भाई की मदद करती है। बाद में धर्मपत्नी बनकर अपने पति और ससुराल वालों का हर अच्छी बुरी परिस्थिति में साथ निभाती है।
  • वह त्यागमूर्ति मां के रूप में अपने बच्चों पर सब कुछ कुर्बान कर जाती है और अपने बच्चों में अच्छे संस्कारों के बीज बोती है, जिससे वे आगे चलकर अच्छे इंसान बनें। सभी को बेटी और बेटों के साथ एक समान व्यवहार करना चाहिए।
  • उन्हें समान रूप से शिक्षा और जीवन स्तर देना चाहिए, समान अधिकार और प्यार – दुलार देना चाहिए, क्योंकि किसी भी देश के विकास के लिए बेटियां समान रूप से जिम्मेदार है।

Conclusion :

हम ये आशा करते हैं कि आने वाले दिनों में सामाजिक-आर्थिक कारणों की वजह से किसी भी लड़की को गर्भ में नहीं मारा जायेगा, अशिक्षित नहीं रहेंगी, असुरक्षित नहीं रहेंगी, अत: पूरे देश में लैंगिक भेदभाव को मिटाने के द्वारा बेटी-बचाओ बेटी-पढ़ाओ योजना का लक्ष्य लड़कियों को आर्थिक और सामाजिक दोनों तरह से स्वतंत्र बनाने का है। लडकियों को लडकों के समान समझा जाना चाहिए और उन्हें सभी कार्यक्षेत्रों में समान अवसर प्रदान करने चाहिए।

शिक्षा में यात्रा का महत्व

Introduction :

“दुनिया एक किताब है, और जो लोग यात्रा नहीं करते वे केवल इसका एक पन्नाही पढ़ते हैं।” यह एक प्रसिद्ध कहावत है। यात्रा हमें किसी भी विश्वविद्यालय या कॉलेज से अधिक सिखा सकती है। जब हम यात्रा करते हैं तो हम जिस देश की यात्रा करते हैं उसकी संस्कृति के बारे में सीखते हैं। यात्रा हमें एक सुखद अनुभव प्रदान करती हैं। ज्यादातर लोग, यात्रा के बाद, एक नए दृष्टिकोण, नए उत्साह और एक बेहतर दृढ़ संकल्प के साथ घर लौटते हैं। यात्रा के माध्यम से हमें  बहुत सी नई चीजों का ज्ञान प्राप्त होता है। हमें यात्रा से किसी विशेष समुदाय के लोगो के रहने के तरीके, सामाजिक जीवन, कृषि, पूजा, मान्यताओं, कला रूपों आदि के बारे में पता चलता है। 

छात्रों के लिए भी यात्रा का एक विशेष महत्व है। जब हम विभिन्न स्थानों पर जाते हैं, तो पाठ्यपुस्तकों में सीखी जाने वाली कई चीजें व्यावहारिक रूप से समझी जा सकती हैं। यात्रा एक व्यक्ति को उनके सभी साधारण सुखों और आराम से दूर, उनके आराम क्षेत्र से बाहर ले जाती है। यह हमें साहसी बनने, जीवन को पूर्ण रूप से जीने और समय का उपयोग करने के लिए नई चीजों की खोज करने और नए लोगों से मिलने के लिए मजबूर करता है। इसमें हमारे स्वास्थ्य को बेहतर बनाने की क्षमता है।

  • शिक्षा किसी भी बड़ी पारिवारिक, सामाजिक और यहाँ तक कि राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को भी हर करने की क्षमता प्रदान करती है। हम से कोई भी जीवन के हरेक पहलू में शिक्षा के महत्व को अनदेखा नहीं कर सकता। यह मस्तिष्क को सकारात्मक ओर मोड़ती है और सभी मानसिक और नकारात्मक विचारधाराओं को हटाती है।
  • यह लोगों की सोच को सकारात्मक विचार लाकर बदलती है और नकारात्मक विचारों को हटाती है। बचपन में ही हमारे माता-पिता हमारे मस्तिष्क को शिक्षा की ओर ले जाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे प्रसिद्ध शैक्षणिक संस्था में हमारा दाखिला कराकर हमें अच्छी शिक्षा प्रदान करने का हरसंभव प्रयास करते हैं।
  • यह हमें तकनीकी और उच्च कौशल वाले ज्ञान के साथ ही पूरे संसार में हमारे विचारों को विकसित करने की क्षमता प्रदान करती है। अपने कौशल और ज्ञान को बढ़ाने का सबसे अच्छे तरीके अखबारों को पढ़ना, टीवी पर ज्ञानवर्धक कार्यक्रमों को देखना, अच्छे लेखकों की किताबें पढ़ना आदि हैं। शिक्षा हमें अधिक सभ्य और बेहतर शिक्षित बनाती है। यह समाज में बेहतर पद और नौकरी में कल्पना की गए पद को प्राप्त करने में हमारी मदद करती है।
  • आधुनिक तकनीकी संसार में शिक्षा मुख्य भूमिका को निभाती है। आजकल, शिक्षा के स्तर को बढ़ाने के लिए बहुत तरीके हैं। शिक्षा का पूरा तंत्र अब बदल दिया गया है। हम अब 12वीं कक्षा के बाद दूरस्थ शिक्षा कार्यक्रम (डिस्टेंस एजूकेशन) के माध्यम से भी नौकरी के साथ ही पढ़ाई भी कर सकते हैं।
  • शिक्षा बहुत महंगी नहीं है, कोई भी कम धन होने के बाद भी अपनी पढ़ाई जारी रख सकता है। दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से हम आसानी से किसी भी बड़े और प्रसिद्ध विश्वविद्यालय में बहुत कम शुल्क पर प्रवेश ले सकते हैं। अन्य छोटे संस्थान भी किसी विशेष क्षेत्र में कौशल को बढ़ावा देने के लिए शिक्षा प्रदान कर रहे हैं।
  • पहले, शिक्षा प्रणाली बहुत ही महंगी और कठिन थी, गरीब लोग 12वीं कक्षा के बाद उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सक्षम नहीं थे। समाज में लोगों के बीच बहुत अन्तर और असमानता थी। उच्च जाति के लोग, अच्छे से शिक्षा प्राप्त करते थे और निम्न जाति के लोगों को स्कूल या कालेज में शिक्षा प्राप्त करने की अनुमति नहीं थी।
  • यद्यपि, अब शिक्षा की पूरी प्रक्रिया और विषय में बड़े स्तर पर परिवर्तन किए गए हैं। इस विषय में भारत सरकार के द्वारा सभी के लिए शिक्षा प्रणाली को सुगम और कम महंगी करने के लिए बहुत से नियम और कानून लागू किये गये हैं।
  • सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण, दूरस्थ शिक्षा प्रणाली ने उच्च शिक्षा को सस्ता और सुगम बनाया है, ताकि पिछड़े क्षेत्रों, गरीबों और मध्यम वर्ग के लोगों के लिए भविष्य में समान शिक्षा और सफलता प्राप्त करने के अवसर मिलें।
  • भलीभाँति शिक्षित व्यक्ति एक देश के मजबूत आधार स्तम्भ होते हैं और भविष्य में इसको आगे ले जाने में सहयोग करते हैं। इस तरह, शिक्षा वो उपकरण है, जो जीवन, समाज और राष्ट्र में सभी असंभव स्थितियों को संभव बनाती है।
  • शिक्षा हम सभी के उज्ज्वल भविष्य के लिए आवश्यक उपकरण है। हम जीवन में शिक्षा के इस उपकरण का प्रयोग करके कुछ भी अच्छा प्राप्त कर सकते हैं। शिक्षा का उच्च स्तर लोगों को सामाजिक और पारिवारिक आदर और एक अलग पहचान बनाने में मदद करता है।
  • शिक्षा का समय सभी के लिए सामाजिक और व्यक्तिगत रुप से बहुत महत्वपूर्ण समय होता है। यह एक व्यक्ति को जीवन में एक अलग स्तर और अच्छाई की भावना को विकसित करती है। शिक्षा किसी भी बड़ी पारिवारिक, सामाजिक और यहाँ तक कि राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को भी हर करने की क्षमता प्रदान करती है।
  • हम से कोई भी जीवन के हरेक पहलू में शिक्षा के महत्व को अनदेखा नहीं कर सकता। यह मस्तिष्क को सकारात्मक ओर मोड़ती है और सभी मानसिक और नकारात्मक विचारधाराओं को हटाती है।

Conclusion :

शिक्षा लोगों के मस्तिष्क को बड़े स्तर पर विकसित करने का कार्य करती है तथा इसके साथ ही यह समाज में लोगों के बीच के सभी भेदभावों को हटाने में भी सहायता करती है। यह हमें अच्छा अध्ययन कर्ता बनने में मदद करती है और जीवन के हर पहलू को समझने के लिए सूझ-बूझ को विकसित करती है। यह सभी मानव अधिकारों, सामाजिक अधिकारों, देश के प्रति कर्तव्यों और दायित्वों को समझने में हमारी सहायता करती है। नैनीताल, दार्जिलिंग, पंचमढ़ी, ऊटी आदि स्थानों की यात्रा से हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत प्रभाव पड़ता है। यह हमारे मानसिक ज्ञान को बढ़ा देता है और हमारे स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है, यात्रा हमारी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और पर्यटन उद्योग के विकास को भी बढ़ावा देती है। यात्रा किसी भी उम्र के व्यक्ति के लिए सही मनोरंजन है।

शहरी बेरोजगारी पर निबंध

Introduction :

बेरोजगारी एक गंभीर समस्या है जिसका सामना दुनिया के हर देश को करना पड़ रहा है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें एक कुशल और प्रतिभाशाली व्यक्ति नौकरी करना तो चाहता था लेकिन उसे नौकरी नहीं मिल पाती है। भारत उन विकासशील देशों में से एक है जो बेरोजगारी की समस्या से बुरी तरह से पीड़ित है। लेकिन भारत में बेरोजगारी की समस्या मांग की कमी का परिणाम नहीं है, बल्कि अधिक जनसंख्या वृद्धि के कारण है। चूंकि COVID-19 महामारी ने भारतीय अर्थव्यवस्था को चरमरा कर रख दिया है और बड़े पैमाने पर लोगो की नौकरियाँ छीन चुकी है, कोरोनोवायरस संक्रमण के बाद बेरोजगारी शहरी भारतीयों के लिए दूसरी सबसे बड़ी चिंता बन चुकी है। 

भारत भर में किए गए एक सर्वेक्षण में, शहरी क्षेत्रों में लगभग 87 प्रतिशत स्व-नियोजित उत्तरदाताओं ने कोरोनोवायरस (COVID-19) महामारी के कारण अपना रोजगार खो दिया है। इसका प्रभाव देश के ग्रामीण क्षेत्रों से आये श्रमिकों पर भी अधिक पड़ा था। सामान्य तौर पर, शहरी क्षेत्रों में रोजगार की हानि सर्वेक्षण के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक थी। सरकार ने 20 लाख करोड़ रुपये के विशेष आर्थिक पैकेज की घोषणा की है जो 2019-20 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 10% है, जो गरीब, मजदूरों, प्रवासियों को रोजगार प्रदान करने के लिए है, जिनकी कोरोनावाइरस महामारी की वजह से अपनी नौकरी खो दी है।

अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी के रूप –

1) खुली बेरोजगारी –

इस प्रकार की बेरोजगारी में श्रमिकों को कार्य करने के लिए अवसर प्राप्त नहीं होते जिनसे उन्हे नियमित आय प्राप्त हो सके । इस बेरोजगारी का मुख्य कार पूरक साधनों और पूंजी का अभाव है। यहाँ जनसंख्या वृद्धि की तुलना में पूंजी निर्माण की गति भी बहुत धीमी होती है । इसलिए, पूंजी-निर्माण की तुलना में श्रम-शक्ति अधिक तीव्रता से बद है। इसे ‘संरचनात्मक बेरोजगारी’ भी कहते हैं ।

2) अल्प रोजगारी-

अल्पविकसित अर्थव्यवस्था मे अल्प-रोजगारी को दो प्रकार से परिभाषा कर सकते हैं: प्रथम अवस्था वह है जिसमें एक व्यक्ति को उसकी योग्यतानुसार रोजगार मिल पाता । द्वितीय अवस्था वह है जिसमें एक श्रमिक को सम्पूर्ण दिन या कार्य से सम्पूर्ण स के अनुसार पर्याप्त कार्य नहीं मिलता । अत: श्रमिकों को पूर्णकालिक रोजगार नहीं मिल पा अर्थात् वर्ष में कुछ दिनों या किसी विशेष मौसम में ही कार्य मिल पाता है । इसी कारण इसे ‘मीर बेरोजगारी’ भी कहते हैं ।

3) ग्रामीण बेरोजगारी –

ग्रामीण क्षेत्रों में जनसंख्या बढ़ने से भूमि पर जनसंख्या का भा जाता है । भूमि पर जनसंख्या की मात्रा बढ़ने से कृषकों की संख्या भी बद जाती है । जिसके प्रच्छन्न बेरोजगारी की मात्रा बढ जाती है । अधिकांश श्रम-शक्ति प्राथमिक व्यवसायों में पं रहती है तथा व्यावसायिक ढाँचे के बेलोच होने के कारण गैर-व्यस्त मौसम में मी यह श्रमिक बाहर नहीं जाते ।

इसी कारण मौसमी बेरोजगारी पैदा होती है । मौसमी बेरोजगारी की मानव शक्ति के अल्प-प्रयोग से सम्बंधित है । यदि किसी विशेष मौसम में बेरोजगार श्रमित सहायक व्यवसायों में कार्य मिल भी जाता है, तो भी वह बेरोजगार बने ही रहते हैं ।

4) शहरी बेरोजगारी –

शहरी बेरोजगारी ग्रामीण बेरोजगारी की ही प्रशाखा है । कृषि में पुंजीवादी प्रणाली के विकास के कारण तथा भूमि पर जनसंख्या के भार में वृद्धि के कारण कृषक की आर्थिक दशा प्रतिदिन बिगड़ती जाती है, जिसके कारण भारी संख्या में श्रमिक ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर स्थानान्तरित होने लगते हैं ।

गाँवों से शहरी की ओर जनसंख्या की यह गतिशीलता शहरी आकर्षण के परिणामस्वरूप नहीं अपितु गाँवो मे पर्याप्त रोजगार के अवसर उपलब्ध न के कारण होती है ।

भारत में बेरोजगारी के कारण –

  • जनसंख्या वृद्धि की ऊँची दर बेरोजगारी की समस्या को जन्म देती है । इस दृष्टि से भारत की भूमि पर जनसंख्या का भार पहले से ही बहुत अधिक है । ऐसी स्थिति में नये रो के अवसर उपलब्ध कराने का दायित्व सहायक एवं सेवा क्षेत्र पर होता है।
  • यदि उद्योग क्षेत्र एवं सेवा क्षेत्र अपने दायित्व को पूर्ण करने में असमर्थ होते हैं तो जनसंख्या वृद्धि की तुलना में तो बेरी में वृद्धि होती है अथवा ग्रामीण क्षेत्रों में प्रच्छन्न बेरोजगारी उत्पन्न होती है ।
  • दूसरी बेरोजगारी की समस्या है कि भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि क्षेत्र का विकास उप धीमा एवं निस्तेज रहा है । यह क्षेत्र विकासशील अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं को पूए में असमर्थ रहा है । इसका कारण कृषि क्षेत्र की उत्पादकता का स्तर कम होना है ।
  • भारत में दोषपूर्ण आर्थिक नियोजन भी रोजगार के अवसरों में कमी का एक प्रमु बना ध्या है । भारत मे अभी तक आर्थिक विकास हेतु आधारभूत ढाँचे का विकास नहीं है । विभिन्न योजनाओं में ग्रामीण क्षेत्रों का समुचित ढंग से विकास नहीं हो सकता है, ग्रामीण जनसंख्या के स्थानान्तरण को नहीं रोका जा सका है । गावों में सेवा क्षेत्रो नहीं हो सका है ।
  • योजनाकाल में कृषि एवं उद्योगों मे तकनीकी विकास नहीं हो सका है जिससे कि उत्पादन में श्रम-शक्ति का अधिक उपयोग किया जा सके । योजनाओ में बेकार पडी हुई भूमि में उपयोग, सिचाई के साधनो का समुचित विकास, भूमि संरक्षण तथा कृषि में सहायब जैसे डेयरी, मछली पालन, मुर्गी पालन आदि का पर्याप्त विकास नहीं हो सका है जिसके कारण, शिक्षित, अशिक्षित एवं प्रशिक्षित व्यक्तियों हेतु नये रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं हो सके हैं ।
  • शहरों में बेरोजगारी को दूर करने के लिये सर्वप्रथम हमें शिक्षा प्रणाली में सुधार करना होगा इसके लिये आवश्यक यह है कि विद्यालय एवं विश्वविद्यालय स्तर पर व्यावसायिक शिक्षा को अपनार जाए ताकि शिक्षा प्राप्त कर यह व्यवसाय उम्मुख हो तथा स्नातकोत्तर स्तर पर या शोध पर केवर मेधावी विद्यार्थियों को ही प्रवेश दिया जाए ।
  • ऐसे उद्योगों में निवेश को प्रोत्साहित करना चाहिये जिनमें शीघ्र ही पूंजी का प्रतिफल प्राप्त होने त् सम्भावना हो । बढे शहरों में बेरोजगारी के केन्द्रीयकरण को रोकने हेतु औद्योगिक क्रियाओं विचलन एवं विकेन्द्रीकरण किया जाना चाहिए ।
  • राष्ट्रीयकृत बैंकों को छोटे उद्योगों एवं स्व-रोजग युक्त इंजीनियरों द्वारा आरम्भ किये गए उद्योगों को विकसित करने के लिये पर्याप्त मात्रा में सा सुविधाएँ उपलब्ध करानी चाहिए।

Conclusion :

सरकार द्वारा रोजगार के अवसरों में वृद्धि करने के लिए इस दृष्टि अनेक योजनाएं जैसे नेहरू रोजगार योजना रोजगार गारन्टी कार्यक्रम आदि क्रियान्वित गये हैं । भारत में बेरोजगारी की समस्या चरम पर है, लेकिन अब सरकार और स्थानीय अधिकारियों ने इस समस्या को गंभीरता से लिया है और इसे कम करने के लिए काम कर रहे हैं। नीति निर्माताओं और नागरिकों को अधिक नौकरियों के निर्माण के साथ ही रोजगार के लिए सही कौशल प्राप्त करने के लिए उचित प्रयास भी करते रहना चाहिए।

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Essays

Essay on new education policy 2020 in english 250 words

Short Essay on new education policy 2020 in english 250 words

Introduction :

The New Educational policy 2020 is approved by the Central Govenment on 29 July, 2020 to overhaul the country’s education system. It aims to bring transformational reforms in school and higher education systems in India. This is the first educational policy of the 21st century in India.  This new policy has  covered the universalization of education from pre-school to secondary level with 100% Gross Enrolment Ratio in school education by 2030.

  • The New Educational policy 2020 proposes some variation including opening up of Indian higher education to foreign universities, introduction of a four-year multidisciplinary undergraduate programme with multiple exit options.
  • This educational policy focus at making India a global knowledge superpower. This policy is also focusing on overhauling the curriculum, reduction in the syllabus to retain core essentials and thrust on experiential learning and critical thinking.
  • With the introduction of this new policy the current 10+2 school system will be replaced by a new 5+3+3+4 curricular structure. As the new policy suggest, there will be 12 years of schooling with three years of Anganwadi/ pre-schooling.
  • At schools and higher education, there will be provision of inclusion of Sanskrit language at all levels as an option for students. This will introduce the early childhood education under the ambit of formal schooling.

Conclusion :

In this policy, the mid-day meal programme will be extended to pre-school children. According to New Educational policy 2020, the students should be taught in their mother tongue or regional language until Class 5. According to new educational policy all the universities and colleges must target to become multidisciplinary by 2040. This new policy will bring employment in the country and completely transform our educational system.

 

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Long Essay on New National Education Policy 2020

Introduction :

The New National Education Policy is approved by the Union Cabinet on 29 July, 2020 to overhaul the country’s education system. It will bring transformational reforms in school and higher education systems in the country. This is the first education policy of the 21st century. NEP-2020, which will replace the National Policy on Education-1986, is an inclusive framework focusing on the elementary-level of education to higher education in the country.

  • The aim of the new policy is the universalization of education from pre-school to secondary level with 100% Gross Enrolment Ratio (GER) in school education by 2030.
  • The NEP proposes some changes including opening up of Indian higher education to foreign universities, introduction of a four-year multidisciplinary undergraduate programme with multiple exit options.
  • The NEP 2020 aims at making India a global knowledge superpower. In school education, the policy focuses on overhauling the curriculum, reduction in the syllabus to retain core essentials and thrust on experiential learning and critical thinking.
  • As the objective of any education system is to benefit children so that no child loses any opportunity to learn and excel because of circumstances of birth or background.
  • The current 10+2 system in the school will be replaced by a new 5+3+3+4 curricular structure. As per the new policy, there will be 12 years of schooling with three years of Anganwadi/ pre-schooling.
  • At school and higher education, Sanskrit will also be included at all levels as an option for students. This brings early childhood education under the ambit of formal schooling.
  • The Policy reaffirms that bridging social gaps in access, participation, and learning outcomes in school education will continue to be one of the major goals of all education sector development programmes.
  • The NEP 2020 talks about creating higher performance standards for teachers clearly stating out the role of the teacher at different levels of expertise and competencies required for that stage. Teachers will also have to be digitally trained to blend into the digital learning processes.

Conclusion :

NEP 2020 recognises now the need to evaluate higher-order skills, such as analysis, critical thinking and conceptual clarity, and hence shifting the focus of assessments from marks based to competency based. The mid-day meal programme will be extended to pre-school children. According to NEP 2020, the students should be taught in their mother tongue or regional language until Class 5. The policy also proposes that all universities and colleges must aim to become multidisciplinary by 2040. This policy will boost employment in the country and will radically transform our educational system.

New education policy 2020 Vs Online Education

Introduction :

Education is an important part of our live, it can either make us or break us in the future depending on the careers we choose. Online education or e-education consist of electronic mode of learning and teaching. Online education occurs outside the classroom through digital platforms. With online education students can acquire educational experiences through technology.

  • Online education can be delivered in the form of text, animation, audio, video and images. The corona virus pandemic has resulted in closure of schools all across the world.
  • Over 1.2 billion children globally are out of schools. As a result, education has changed drastically with the rise of e-learning, whereby teaching is undertaken on digital platforms.
  • Online learning has increased retention of information, and take less time. Due to huge demand, many online learning platforms are offering free access to their services, including platforms like BYJU’S & Unacademy.
  • There are some challenges are also there to overcome. Research reveals that on average, students retain 35-60% more material when learning online compared to only 8-10% in a classroom.

Conclusion :

This is commonly because of the students being able to learn faster online. Online learning requires 40-60% less time to learn than in a traditional classroom because students can learn at their own pace, revise the concepts as and when they want. Online education has made learning flexible because learners have the freedom to study at suitable time. But tt is truth that learning is highly dependent on the individual’s motivation to learn.

Long essay on New education policy 2020 Vs Online Education

Introduction :

Online education is quick and have very fast delivery process that includes any learning that takes place with the help of the internet. Online learning enables the educators to communicate with students who otherwise will not be able to enroll in a traditional classroom course and assists students by adjusting their own pace or speed of learning. In todays senario, the schools and institutions that offering online education  or online courses are growing very quickly.

  • Students have an option that they can  pursue degrees courses through online methods through a valued and credentialed university.
  • Online education is also well known to offer the benefits of effficiency and synergy. The Online Education programmes makes room for dynamic communications between students and the teachers.
  • With the help of these communications, sources can be shared, and an open-ended synergy developed between the teacher and students through a learning process.
  • When each person provides his own opinion through discussions and comments on others’ work course, it benefits the student to learn better and faster.
  • This unique advantage is shown in a student-centred virtual learning environment that online learning format alone can provide.
  • Through online classes, there is no need to travel to a different city or commute long distances at all. We can stay where we are and keep our current job while we work toward improving our career with an online degree courses.
  • Online education also helps digital nomads as their own lifestyle. We can watch lectures and complete our course along with our work wherever we are.
  • It does not matters whether we are a full-time or part-time online student, the online education experience provides a much more manageable schedule for all of us.
  • Online education has gained much more approval due to its cheapness and easy affordability. Online courses are also more affordable than those offered at schools or colleges in these days.
  • While studying in universities, we may have to spend some additional amount of money in other allied activities such as transportation, lodging, and meals, but online education will not require such expenses at all.
  • The most important aspects of online learning is its flexibility of time, however, one has to be extremely self-motivated for studying.
  • The Online students develop various approaches for staying up to date for their study. Things like taking extra time every week to study with least distractions can help immensely and help in drastice progress.

Conclusion :

Online education has great potential and many advantages that have increased educational access. It provides a high-quality learning opportunities to every student, improves their outcomes and skills, and expands educational choice options. Therefore, location, time, and quality are no longer considered major obsticles in seeking higher education just because of online education or e-learning.

New education policy 2020 – A step towards Right to Education (RTE)

Introduction :

The Right to Education (RTE) Act, 2009 empowers children belonging to the backward section of the economy to free and compulsory education.  It describes the importance of free and compulsory education for children between the age of 6 to 14 years in India under Article 21A of the Indian Constitution. This act came into force on 1 April 2010. The right to education also includes a responsibility to provide basic education for individuals who have not completed primary education.

  • All children between the ages of 6 to 14 can get free education from class 1 to class 8, in a nearby government school.
  • The Right to Education Act states that it is the responsibility of the government to endow every child with free and compulsory education and it should also ensure their attendance and accomplishment of their elementary education.
  • It specifically explains that free education should be provided wherein no child should pay any kind of amount or fees to the school for acquiring elementary education.
  • Parents of the child should not be charged for any kind of educational facilities provided to the children. Hence, it is the complete liability of the government to sustain all the expenditure incurred in the process of providing education to the children.
  • It is not only the government schools but private schools are also supposed to reserve 25% of the seats for unprivileged children of the society.
  • Children must be given admission in a school even if they don’t have documents like transfer certificate and age proof. Children cannot be forced to give tests for getting admission in a school.
  • Every private school has to keep 25% of its seats in class 1 for children from ‘disadvantaged groups’ and ‘weaker sections’. The school has to give free education to these children till class 8.
  • National Council of Educational Research and Training (NCERT) is the apex body located at New Delhi, It makes the curriculum related matters for school education across India.

Conclusion :

The NCERT provides support, guidance and technical assistance to a number of schools in India. India has made progress in terms of increasing the primary education attendance rate and expanding literacy to approximately three-quarters of the population. The Act makes education a fundamental right of every child between the ages of 6 and 14. Now in India 74% of the population is literate in which males comprise 80% and females 65%.

 

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Essays

Essay on New educational policy in hindi

नई शिक्षा नीति 2020 पर निबंध – Essay on New educational policy in hindi :

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को देश की शिक्षा प्रणाली में समयनुसार उचित बदलाव करने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा 29 जुलाई, 2020 को मंजूरी दी गई। यह नीति देश में स्कूल और उच्च शिक्षा प्रणालियों में परिवर्तनकारी सुधार लेन में बहुत मददगार साबित होगी।

यह 21 वीं सदी की पहली शिक्षा नीति है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मुख्य उद्देश्य 2030 तक स्कूली शिक्षा में 100% सकल नामांकन अनुपात के साथ पूर्व-माध्यमिक से माध्यमिक स्तर तक शिक्षा का सार्वभौमिकरण करना है।

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति द्वारा कुछ नए बदलाव लाये गए है, जिसमें भारतीय उच्च शिक्षा को विदेशी विश्वविद्यालयों में बढ़ावा देना, चार-वर्षीय बहु-विषयक स्नातक कार्यक्रम के लिए कई निकास विकल्पों के साथ प्रस्तुत करना शामिल है। इस  नई नीति का उद्देश्य भारत को वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनाना है।

 

स्कूल में वर्तमान 10 + 2 प्रणाली को एक नयी  5 + 3 + 3 + 4 पाठ्यक्रम प्रणाली से बदल दिया जाएगा। नई नीति के अनुसार, तीन साल की आंगनवाड़ी / प्री-स्कूलिंग के साथ 12 साल की स्कूली शिक्षा होगी।

स्कूल और उच्च शिक्षा में, छात्रों के लिए एक विकल्प के रूप में संस्कृत को भी सभी स्तरों पर शामिल किया जाएगा। यह नीति औपचारिक स्कूली शिक्षा के दायरे में प्री-स्कूलिंग को शामिल करेगी ।

मिड दे मील कार्यक्रम को प्री-स्कूल बच्चों तक बढ़ाया जाएगा। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के अनुसार, छात्रों को कक्षा 5 तक उनकी मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाया जाएगा।

यह नीति यह भी प्रस्तावित करती है कि सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को 2040 तक बहु-विषयक बनने का लक्ष्य रखना होगा। यह नीति देश में रोजगार के अवसरो को बढ़ावा देगी और हमारी शैक्षिक प्रणाली को मौलिक रूप से बदल देगी।

 

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