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भारत 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था पर निबंध

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भारत 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था पर निबंध (India 5 trillion economy essay in hindi)

भारत 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था पर निबंध (India 5 trillion economy essay in hindi)

Introduction :

भारत ने 1991 में अर्थव्यवस्था को गति देने के लिये उदारीकरण की नीति को अपनाया, इसके अंतर्गत विभिन्न क्षेत्रों को निजी क्षेत्र के लिये खोल दिया गया और धीरे-धीरे भारत की अर्थव्यवस्था की गति तीव्र होती गई। भारत कुछ समय पूर्व ही विश्व की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। किंतु भारत के आकार और क्षमता के अनुपात को देखते हुए अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति की सराहना नहीं की जा सकती है। इस तथ्य को ध्यान में रखकर भारत के नीति निर्माताओं ने वर्ष 2024 तक भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखा है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी अपने बजट भाषण के दौरान देश को साल 2024 तक ‘फाइव ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी’ की अर्थव्यवस्था बनाने की बात कही।

हालांकि बजट के पहले भी हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने अपने कई कार्यक्रमों के दौरान इस लक्ष्य को हासिल करने की बात कही है। बजट भाषण के दौरान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि भारत ने आज़ादी के बाद आर्थिक क्षेत्र में तीव्र वृद्धि नहीं की। इसका नतीजा यह रहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था को एक ट्रिलियन डॉलर तक पहुँचने में 55 सालों का समय लग गया, जबकि इसी दौरान चीन की अर्थव्यवस्था बड़ी तेज़ी से आगे बढ़ी।

ऐसे में, आर्थिक क्षमता सीमित होने के चलते अक्सर देश के तमाम क्षेत्रों जैसे रेलवे, सामाजिक क्षेत्र, रक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर में ज़रूरी संसाधन उपलब्ध नहीं हो पाए।

सरकार द्वारा उठाये गए मुख्य कदम

  • सरकार ने इंफ्रास्ट्रक्चर पर विशेष ध्यान देते हुए अकेले प्रधानमंत्री आवास योजना में ही 1.95 करोड़ आवासों के निर्माण का लक्ष्य तय किया। साथ ही,होम लोन के ब्याज भुगतान पर 1.5 लाख रुपए की अतिरिक्त कटौती को भी मंज़ूरी दी गई है।
  • ‘स्टडी इन इंडिया’ पहल के तहत निजी उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिये कई एलान किए गए। इसके अलावा, विश्वस्तरीय संस्थानों के निर्माण और ‘खेलो भारत’ योजना के तहत खेल विश्वविद्यालयों की भीस्थापना की जा रही है। सरकार ने एक संप्रभु ऋण बाज़ार की स्थापना का भी ऐलान किया। इसके तहत सरकार अंतरराष्ट्रीय बाजार से कर्ज लेकर देश में निजी निवेश के लिए धन मुहैया करवाएगी। इस प्रकार ब्याज दर में कमी लाने में मदद मिलेगी।
  • इसके अलावा निजी पूंजी निर्माण में मदद करने के लिहाज से सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में 70,000 करोड़ रुपए के नए पूंजी निवेश की योजना बनाई है। मौजूदा वक्त में निजी क्षेत्र कर्ज़ के दबाव और पूंजी की कमी की समस्या से जूझ रहा है। ऐसे में, पूंजी निर्माण के लिये सरकार को विदेशी पूंजी को बेहतर तरीके से इस्तेमाल करना होगा।
  • इसलिये सरकार कई क्षेत्रों खासकर बीमा, विमानन और एकल ब्रांड खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रही है। एमएसएमई पर विशेष ध्यान देने के साथ-साथ सरकार ने श्रम सुधार की दिशा में भी कई कदम उठाए हैं। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बल देने के लिहाज से 44 श्रम कानूनों को मिलाकर चार संहिताओं के रूप में बनाने की दिशा में काम किया जा रहा है।
  • 400 करोड़ रुपए तक के टर्नओवर वाले छोटे उद्यमों के लिये कॉर्पोरेट कर को घटाकर 25 प्रतिशत कर दिया गया है। सरकार ने रेलवे के आधुनिकीकरण के लिये करीब 50 लाख करोड़ रुपए के निवेश की ज़रूरत बताई है। इस तरह,रेलवे के संसाधनों में बढ़ोत्तरी के लिये सार्वजनिक निजी भागीदारी (PPP) का प्रस्ताव किया गया है।

इस सम्बन्ध में मुख्य चुनौतियाँ

  • जलवायु परिवर्तन ने मॉनसून की रफ्तार को बिगाड़ रखा है जिसका असर भारतीय कृषि को भुगतान पड़ रहा है। साथ ही, भारतीय अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ा हिस्सा रखने वाले सेवा क्षेत्र में हालात बहुत अच्छे नहीं हैं। भारत का ऊर्जा क्षेत्र मुश्किलों के दौर से गुज़र रहा है तथा इस क्षेत्र को संरचनात्मक स्तर पर सुधार की आवश्यकता है।
  • केंद्र को राज्य सरकारों के साथ मिलकर टैरिफ नीति में सुधार करने की ज़रूरत है ताकि उद्योगों एवं बड़े उपभोक्ताओं को इसका लाभ प्राप्त हो सके, साथ ही कृषि क्षेत्र एवं घरेलू उपभोक्ताओं के लिये टैरिफ की दरों में वृद्धि भी की जानी ज़रूरी है।
  • कृषि क्षेत्र पहले से ही अधिक बिजली उपयोग के कारण सिंचाई संकट से जूझ रहा है। परिवहन के क्षेत्र में भारत में वैश्विक स्तर के इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी है, साथ ही अभी भी ग्रामीण एवं दूरदराज़ के क्षेत्र कनेक्टिविटी से दूर हैं।
  • भारत का रेलवे विश्व के कुछ सबसे बड़े रेलवे मार्गों में शामिल है फिर भी इसमें सुधार की आवश्यकता है। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि रेलवे के आधुनिकीकरण के लिये लगभग 50 लाख करोड़ रूपए के निवेश की आवश्यकता है।
  • इसी प्रकार उच्च गुणवत्ता के सड़क मार्ग, बंदरगाहों की क्षमता में वृद्धि तथा इनको रेल एवं सड़क के ज़रिये देश के विभिन्न आर्थिक प्रतिष्ठानों से जोड़ना भी ज़रूरी है। इस प्रकार से भारत की परिवहन क्षमता में वृद्धि हो सकेगी जिससे अर्थव्यवस्था तीव्र गति से वृद्धि कर सकेगी।
  • भारत में टेलिकॉम सेक्टर भी कई समस्याओं से जूझ रह है। अन्य देश जहाँ 5G का उपयोग आरंभ कर चुके है भारत में अभी इसके लिये ज़रुरी प्रयास भी नहीं किये जा सके हैं। पहले ही TRAI एवं सरकार की स्पेक्ट्रम और इसकी बेस कीमतों की नीति के कारण टेलिकॉम सेक्टर संघर्ष कर रहा है। भारत नेट परियोजना जो भारत में स्थानीय स्तर तक इंटरनेट सेवा पहुँचाने के लिये आरंभ की गई थी, अभी भी पूर्ण नहीं हो सकी है।

Conclusion :

यह माना जा रहा है कि 5 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये भारत को GDP के लगभग 8 प्रतिशत की वृद्धि दर की आवश्यकता होगी। वर्तमान में भारतीय अर्थव्यवस्था की गति धीमी हैं, साथ ही इस स्थिति में उच्च आर्थिक वृद्धि दर को प्राप्त करना एक कठिन लक्ष्य साबित हो सकता हैं। लेकिन मौजूदा हालातों को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि अर्थव्यवस्था के लिए चुनौतियां लगातार बढ़ती जा रही हैं। लेकिन फिर भी 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का सपना कोई असंभव बात नहीं है। शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार, बेरोज़गारी, आर्थिक असमानता, महिलाओं की स्थिति, कुपोषण, जातिगत भेदभाव, गरीबी जैसे भी कई ज़रूरी मुद्दे हैं जिनको हल करना आवश्यक है। इन समस्याओं को दूर करके ही भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल हो सकेगा।

कोरोना वायरस का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

Introduction :

कोरोनावायरस (COVID-19) एक संक्रामक रोग है जो कोरोनावायरस के कारण होता है। इसकी शुरुआत पहली बार दिसंबर 2019 में चीन के वुहान शहर से हुई। डब्ल्यूएचओ ने 30 जनवरी को कोरोनवायरस को अंतरराष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किया है। कोरोनावायरस न केवल लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है बल्कि दुनिया के सभी देशों की अर्थव्यवस्थाओं को भी प्रभावित कर रहा है। विश्व व्यापार संगठन के अनुसार, व्यापार के मामले में, चीन दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक और दूसरा सबसे बड़ा आयातक है।

विश्व के निर्यात का 13% और आयात का 11% केवल चीन से होता है। दुनिया के कई उद्योग अपने कच्चे माल के लिए चीन पर निर्भर हैं। पुरे विश्व में खरीदी जाने वाली लगभग एक तिहाई मशीनरी चीन से आती है, इसलिए कोरोनवायरस ने वैश्विक आपूर्ति पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। चीन में कई कारखाने अब बंद हो गए हैं, निर्भर कंपनियों के लिए उत्पादन भी बंद हो गया है। उत्पादन में मंदी के कारण खपत में भी गिरावट आई है और इस तरह से दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं पर असर पड़ रहा है। कोरोनोवायरस फैलने के कारण लोगों की आवाजाही पर प्रतिबंध के कारण पर्यटन उद्योग को भी भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

कोरोना वायरस का आयात पर प्रभाव-

  • स वायरस से हवाई यात्रा, शेयर बाज़ार, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं सहित लगभग सभी क्षेत्र प्रभावित हो रहे हैं।
  • यह वायरस अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है, जबकि इसके कारण चीनी अर्थव्यवस्था पहले से ही मुश्किल स्थिति में है।
  • इन दो अर्थव्यवस्थाओं, जिन्हें वैश्विक आर्थिक इंजन के रूप में जाना जाता है, संपूर्ण वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुस्ती तथा आगे जाकर मंदी का कारण बन सकता है।
  • निवेशकों के बाज़ारों से बाहर निकलने के कारण शेयर बाज़ार सूचकांक में लगातार गिरावट आई है। लोग बड़ी राशि को अपेक्षाकृत सुरक्षित क्षेत्र यथा- ‘सरकारी बाॅण्ड’ में लगा रहे हैं जिससे कीमतों में तेज़ी तथा उत्पादकता में कमी देखी गई है।
  • अमेरिकी बाज़ार में वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद सबसे खराब अनुभव हाल ही में कोरोना वायरस के कारण महसूस किया गया, ध्यातव्य है कि अमेरिकी बाज़ार में 12% से अधिक की गिरावट आई है।
  • यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि जो निवेशक ऐसे संकट के समय सामान्यत: स्वर्ण में निवेश करते हैं, इस संकट के समय उन्होंने इसका भी बहिष्कार कर दिया जिससे सोने की कीमतों में गिरावट देखी गई, तथा लोगों ने सरकारी गारंटी युक्त ‘ट्रेज़री बिल’ (Treasury Bills) में अधिक निवेश करना उचित समझा।
  • Apple, Nvidia, Adidas जैसी कंपनियाँ इससे अधिक प्रभावित हो सकती हैं क्योंकि ये चीन के आपूर्तिकर्त्ताओं पर निर्भर हैं, इन्हें भविष्य में बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है।

भारत की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव –

  • भारत जब अर्थव्यवस्था को पुन: पटरी पर लाने की कोशिश कर रहा है, ऐसे समय में इस वायरस का केवल सतही प्रभाव नहीं पड़ेगा तथा ऐसे कठिन समय में समस्या का समाधान मात्र ‘एयर लिफ्टिंग’ से संभव नहीं है।
  • यह समस्या न केवल आपूर्ति शृंखला को प्रभावित करेगी, अपितु यह भारत के फार्मास्यूटिकल, इलेक्ट्रॉनिक, ऑटोमोबाइल जैसे उद्योगों को गंभीर रूप से प्रभावित करेगी।
  • निर्यात, जिसे अर्थव्यवस्था के विकास का इंजन माना जाता है, इसमें वैश्विक मंदी की स्थिति में और गिरावट देखी जा सकती है, साथ ही निवेश में भी गिरावट आ सकती है।
  • भारतीय कंपनियाँ चीन आधारित ‘वैश्विक आपूर्ति शृंखला’ में शामिल प्रमुख भागीदार नहीं हैं, अत: भारतीय कंपनियाँ इससे अधिक प्रभावित नहीं होंगी।
  • दूसरा, कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आ रही है, जो कि वृहद् अर्थव्यवस्था और उच्च मुद्रास्फीति के चलते अच्छी खबर है।
  • भारत सरकार को लगातार विकास की गति का अवलोकन करने की आवश्यकता है, साथ ही चीन पर निर्भर भारतीय उद्योगों को आवश्यक समर्थन एवं सहायता प्रदान करनी चाहिये।
  • कोरोना वायरस जैसी बीमारी की पहचान, प्रभाव, प्रसार एवं रोकथाम पर चर्चा अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों द्वारा की जानी चाहिये ताकि इस बीमारी पर नियंत्रण पाया जा सके।

Conclusion :

वायरस जनित यह संकट किसी अन्य वित्तीय संकट से बिलकुल अलग है। अन्य वित्तीय संकटों का समाधान समय-परीक्षणित उपायों जैसे- दर में कटौती, बेल-आउट पैकेज (विशेष वित्तीय प्रोत्साहन) आदि से किया जा सकता है, परंतु वायरस जनित संकट का समाधान इन वित्तीय उपायों द्वारा किया जाना संभव नहीं है। ऑटोमोबाइल उद्योग पहले ही आर्थिक मंदी के कारण संकट में है और अब माल और सेवाओं की आपूर्ति बाधित होने के कारण उत्पादन में कमी आ रही है। चीन से आपूर्ति में रुकावट के कारण वैश्विक वित्तीय बाजार में उतार-चढ़ाव हो रहा है। यद्यपि दुनिया की अर्थव्यवस्था पर कोरोनोवायरस के सटीक प्रभाव को निर्धारित करना मुश्किल है, फिर भी यह स्पष्ट है कि यह प्रभाव लंबे समय तक रहेगा।

जीएसटी और इसका अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पर निबंध

Introduction :

जीएसटी, गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स का संक्षिप्त रूप है इस कर को भारत सरकार द्वारा लगाया जाता है। यह भारत के कर ढांचे में सुधार के लिए एक बड़ा कदम साबित हुआ है। जीएसटी को 1 जुलाई 2017 से लागू किया गया। इसने सभी तरह के अप्रत्यक्ष करों को एक कर में मिला दिया है। जीएसटी लागू करने के पीछे मुख्य विचार राष्ट्र की अर्थव्यवस्था में सुधार करना है।जीएसटी पहली बार 1954 में फ्रांस में लागू किया गया ।

इसमें सभी अप्रत्यक्ष कर जैसे वैट, मनोरंजन कर, सेवा कर आदि शामिल हैं। जीएसटी तीन प्रकार के करों से बना है, वे हैं केंद्रीय जीएसटी, राज्य जीएसटी और अंतरराज्यीय जीएसटी जो माल या सेवा के लेन-देन से निर्धारित होते हैं। जीएसटी एक सरल कर प्रणाली है। अब केवल एक ही टैक्स होगा, जो जीएसटी है। जीएसटी लागू करने के पीछे सरकार का एजेंडा “वन नेशन, वन टैक्स” है।

जीएसटी

  • वैश्विक वित्तीय संस्थानों, भारतीय मीडिया और विपक्षी राजनीतिक दलों और भारतीय व्यापारियों ने जीएसटी की आलोचना की। व्यापारियों को कर वापसी में देरी और अधिक प्रशासनिक रुकावटों की समस्याओं का सामना करना पड़ा है। सभी के लिए केवल एक कर की दर वस्तुओं और सेवाओं के लेन-देन के संदर्भ में एक एकीकृत बाजार बनाएगी।
  • दुनिया भर में आर्थिक संकट के बीच, भारत ने महत्वाकांक्षी विकास लक्ष्यों के साथ आशा की किरण के रूप में पेश किया है, जो ‘मेक इन इंडिया’, ‘डिजिटल इंडिया’, आदि जैसे रणनीतिक मिशनों का समर्थन करता है। माल और सेवा कर (जीएसटी) अपेक्षित है। अर्थव्यवस्था के भीतर वस्तुओं और सेवाओं के मुक्त प्रवाह की दिशा में अप्रत्यक्ष कराधान के मौजूदा आधार को बदलकर और कर पर कर के प्रभाव को कम करने के लिए भारत में आर्थिक विकास के लिए बहुत आवश्यक उत्तेजक प्रदान करते हैं।
  • आने वाले वर्षों में भारत की विश्व अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की उम्मीद के मद्देनजर, जीएसटी लागू होने की उम्मीद देश के भीतर ही नहीं, बल्कि पड़ोसी देशों और दुनिया की विकसित अर्थव्यवस्थाओं में भी है। गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) एक विशाल अवधारणा है जो किसी देश की आर्थिक वृद्धि को समर्थन और बढ़ाकर विशाल कर संरचना को सरल बनाता है। जीएसटी राष्ट्रीय स्तर पर वस्तुओं और सेवाओं के विनिर्माण, बिक्री और उपभोग पर एक व्यापक कर लेवी है।
  • गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स बिल या जीएसटी बिल, जिसे संविधान (एक सौ और बीस-दूसरा संशोधन) विधेयक, 2014 के रूप में भी जाना जाता है, भारत में एक राष्ट्रीय स्तर पर लागू होने वाले मूल्य वर्धित कर की शुरुआत करता है। जीएसटी प्रणाली में एकरूपता लाने के लिए उत्पादन के सभी चरणों में एक अप्रत्यक्ष कर होगा।
  • जीएसटी को व्यवहार में लाने पर, एकल कर भुगतान में केंद्र और राज्य करों का समामेलन होगा। यह घरेलू, अंतर्राष्ट्रीय बाजार के साथ-साथ भारत की स्थिति को भी बढ़ाएगा। उपभोक्ता स्तर पर, GST समग्र कर बोझ को कम करेगा, जो वर्तमान में 25-30% अनुमानित है। इस प्रणाली के तहत, उपभोक्ता अंतिम कर का भुगतान करता है लेकिन एक कुशल इनपुट टैक्स क्रेडिट सिस्टम यह सुनिश्चित करता है कि माल के निर्माण में जाने वाले इनपुट पर चुकाए गए कर पर कोई कर नहीं है।
  • केंद्रीय स्तर पर उत्पाद शुल्क और सेवा कर और राज्य स्तर पर वैट जैसे कई करों के भुगतान से बचने के लिए, जीएसटी इन करों को एकीकृत करेगा और पूरे देश में एक समान बाजार तैयार करेगा।
  • जीएसटी प्रणाली में विभिन्न करों का एकीकरण क्रेडिट के प्रभावी क्रॉस-उपयोग के बारे में लाएगा। वर्तमान प्रणाली कर उत्पादन का उत्पादन करती है, जबकि जीएसटी का लक्ष्य कर की खपत होगी। जीएसटी के कार्यान्वयन से भारत में एक साझा बाजार बनाने और वस्तुओं और सेवाओं की लागत पर कर के प्रभाव को कम करने में मदद मिलेगी।
  • न केवल कर बल्कि वस्तुओं और सेवाओं की लागत भी कुछ क्षेत्रों में प्रभावित हो सकती है, और राजस्व में वृद्धि होगी। ऑक्ट्रोई, केंद्रीय और राज्य बिक्री कर और प्रवेश शुल्क जैसे कई कर अब मौजूद नहीं होंगे और सभी को जीएसटी के तहत लाया जाएगा। सब सब में, हम मानते हैं कि जीवन केवल सरल हो जाएगा।

जीएसटी का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

  • जीएसटी भारत में “एक राष्ट्र, एक बाजार, एक कर” की धारणा पर स्थापित सबसे बड़ा कर सुधार आखिरकार यहां है। जिस पल का भारत सरकार को एक दशक से इंतजार था वह आखिरकार आ गया है।
  • एकल सबसे बड़े अप्रत्यक्ष कर शासन ने व्यापार के संबंध में सभी अंतर-राज्य बाधाओं को समाप्त करते हुए लागू किया है। एक ही झटके के साथ जीएसटी रोलआउट ने भारत को 1.3 बिलियन नागरिकों के एकीकृत बाजार में बदल दिया है।
  • मूल रूप से, $ 2.4 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था आंतरिक टैरिफ बाधाओं को दूर करके और केंद्रीय, राज्य और स्थानीय करों को एकीकृत जीएसटी में शामिल करके खुद को बदलने का प्रयास कर रही है।
  • रोलआउट ने भारत के राजकोषीय सुधार कार्यक्रम की उम्मीद को फिर से बढ़ाया है और अर्थव्यवस्था को व्यापक बनाया है। फिर, वहाँ विघटन की आशंका है, जो एक कथित संक्रमण के रूप में माना जाता है जो देश के हितों की सहायता नहीं कर सकता है।
  • क्या अनिश्चितता से अधिक होने वाली आशाओं से तय होगा कि हमारी सरकार जीएसटी को “अच्छा और सरल कर” बनाने की दिशा में कैसे काम करती है। 29 राज्यों और 7 केंद्र शासित प्रदेशों में देश भर में जीएसटी लागू करने के पीछे यह विचार है कि यह सभी के लिए एक जीत की स्थिति की पेशकश करेगा।

Conclusion :

कम टैक्स फाइलिंग, पारदर्शी नियमों और आसान बहीखाता पद्धति से निर्माताओं और व्यापारियों को फायदा होगा; उपभोक्ताओं को वस्तुओं और सेवाओं के लिए कम भुगतान करना होगा, और सरकार अधिक राजस्व उत्पन्न करेगी क्योंकि राजस्व लीक को प्लग किया जाएगा। जमीनी हकीकत, जैसा कि हम सभी जानते हैं, बदलती हैं। तो, जीएसटी ने भारत को वास्तव में कैसे प्रभावित किया है? चलो एक नज़र डालते हैं। जीएसटी लागू होने के बाद वस्तुओं और सेवाओं का निर्यात कम्पेटिव हो जाएगा क्योंकि वस्तुओं और सेवाओं पर करों का कोई व्यापक प्रभाव नहीं होगा। जीएसटी पिछले कानून प्रावधान की तुलना में अधिक पारदर्शी है, इसलिए यह सरकार को अधिक राजस्व उत्पन्न करायेगा और भ्रष्टाचार को कम करने में अधिक प्रभावी होगा। जीएसटी को इस तरह से तैयार किया गया है, जिससे यह कारोबारीयो और उपभोक्ताओं को लंबे समय तक लाभान्वित करे।

भारत में बेरोजगारी की समस्या पर निबंध

Introduction :

बेरोजगारी भारत में एक अहम मुद्दा बनता जा रहा है  जब कोई व्यक्ति काम करने योग्य हो और काम करने की इच्छा भी रखे किन्तु उसे काम का अवसर प्राप्त न हो तो वह बेरोजगार कहलाता हैं। आज हमारे देश मे लाखो लोग बेरोजगार है। ऐसा इसलिए है क्योंकि नौकरियाँ सीमित हैं और नौकरी पाने वालो की संख्या असीमित। भारत में बेरोजगारी की स्थिति एक गंभीर सामाजिक समस्या है। शिक्षा का अभाव और रोजगार के अवसरों की कमी ऐसे कारक हैं जो बेरोज़गारी का प्रमुख कारण हैं। बेरोज़गारी न केवल देश के आर्थिक विकास में बाधा डालती है बल्कि व्यक्तिगत और पूरे समाज पर भी एक साथ कई तरह के नकारात्मक प्रभाव डालती है।

2011 की जनगणना के अनुसार युवा आबादी का 20 प्रतिशत जिसमें 4.7 करोड़ पुरूष और 2.6 करोड़ महिलाएं पूर्ण रूप से बेरोजागार हैं। यह युवा 25 से 29 वर्ष की आयु समूह से हैं। यही कारण है कि जब कोई सरकारी नौकरी निकलती है तो आवेदको की संख्या लाखों मे होती हैं। तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या भारत मे बेरोजगारी का प्रमुख कारण हैं। वर्तमान शिक्षा प्रणाली भी दोषपूर्ण है। बेरोजगारी को दूर करने में जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण आवश्यक है। जिस अनुपात में रोजगार से साधन बढ़ते है, उससे कई गुना जनसंख्या में वृद्धि हो  जाती है।

  • सबसे खराब स्थिति तो वह है जब पढ़े-लिखे युवकों को भी रोजगार नहीं मिलता शिक्षित युवकों की यह बेरोजगारी देश के लिए सर्वाधिक चिन्तनीय है, क्योंकि ऐसे युवक जिस तनाव और अवसाद से गुजरते हैं, उससे उनकी आशाएं टूट जाती हैं और वे गुमराह होकर उग्रवादी, आतंकवादी तक बन जाते हैं।
  • पंजाब, कश्मीर और असम के आतंकवादी संगठनों में कार्यरत उग्रवादियों में अधिकांश इसी प्रकार के शिक्षित बेरोजगार युवक हैं। बेरोजगारी देश की आर्थिक स्थिति को डाँवाडोल कर देती है। इससे राष्ट्रीय आय में कमी आती है, उत्पादन घट जाता है और देश में राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न हो जाती है।
  • बेरोजगारी से क्रय शक्ति घट जाती है, जीवन स्तर गिर जाता है जिसका दुष्प्रभाव परिवार एवं बच्चों पर पड़ता है। बेरोजगारी मानसिक तनाव को जन्म देती है जिससे समाज एवं सरकार के प्रति कटुता के भाव जाग्रत होते हैं परिणामतः व्यक्ति का सोच नकारात्मक हो जाता है और वह समाज विरोधी एवं देश विरोधी कार्य करने में भी संकोच नहीं करता।

बेरोजगारी के कारण –

  • भारत में बढ़ती हुई इस बेरोजगारी के प्रमुख कारणों में से एक है— तेजी से बढ़ती जनसंख्या। पिछले पाँच दशकों में देश की जनसंख्या लगभग चार गुनी हो गई है। सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की आबादी 125 करोड को पार कर गई है।
  • यद्यपि सरकार ने विभिन्न योजनाओं के द्वारा रोजगार को अनेक नए अवसर सुलभ कराए हैं, तथापि जिस अनुपात में जनसंख्या वृद्धि हुई है उस अनुपात में रोजगार के अवसर सुलभ करा पाना सम्भव नहीं हो सका, परिणामतः बेरोजगारों की फौज बढ़ती गई।
  • प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में बेरोजगारों की वृद्धि हो रही है। बढ़ती हुई बेरोजगारी से प्रत्येक बुद्धि-सम्पन्न व्यक्ति चिन्तित है। हमारी शिक्षा पद्धति भी दोषपूर्ण है जो रोजगारपरक नहीं है।
  • कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से लाखों स्नातक प्रतिवर्ष निकलते हैं। किन्तु उनमें से कुछ ही रोजगार पाने का सौभाग्य प्राप्त कर पाते हैं। उनकी डिग्री रोजी-रोटी को जुटा पाने में उनकी सहायता नहीं कर पाती।
  • वैज्ञानिक एवं तकनीकी प्रगति ने उद्योगों का मशीनीकरण कर दिया है परिणामतः आदमी के स्थान पर मशीन से काम लिया जाने लगा। मशीन आदमी की तुलना में अधिक कुशलता से एवं अधिक गुणवत्ता से कम कीमत पर कार्य सम्पन्न कर देती है, अतः स्वाभाविक रूप से आदमी को हटाकर मशीन से काम लिया जाने लगा।
  • फिर एक मशीन सैकड़ों श्रमिकों का काम अकेले ही कर देती है। परिणामतः औद्योगिक क्षेत्रों में बेकारी पनप गई। लघु उद्योग एवं कुटीर उद्योगों की खस्ता हालत ने भी बेरोजगारी में वृद्धि की है।

बेरोजगारी दूर करने के उपाय –

भारत एक विकासशील राष्ट्र है, किन्तु आर्थिक संकट से घिरा हुआ है। उसके पास इतनी क्षमता भी नहीं है कि वह अपने संसाधनों से प्रत्येक व्यक्ति को रोजगार सुलभ करा सके। ऐसी स्थिति में न तो यह कल्पना की जा सकती है है कि वह प्रत्येक व्यक्ति को बेरोजगारी भत्ता दे सकता है और न ही यह सम्भव है, किन्तु सरकार का यह कर्तव्य अवश्य है कि वह बेरोजगारी को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाए। यद्यपि बेरोजगारी की समस्या भारत में सुरसा के मुख की तरह बढ़ती जा रही है फिर भी हर समस्या का निदान तो होता ही है।

  • भारत में वर्तमान में जनसंख्या वृद्धि 2.1% वार्षिक है जिसे रोकना अत्यावश्यक है। अब ‘हम दो हमारे दो’ का युग भी बीत चुका, अब तो ‘एक दम्पति एक सन्तान’ का नारा ही महत्वपूर्ण होगा, इसके लिए यदि सरकार को कड़ाई भी करनी पड़े तो वोट बैंक की चिन्ता किए बिना उसे इस ओर सख्ती करनी होगी। यह कठोरता भले ही किसी भी प्रकार की हो।
  • देश में आधारभूत उद्योगों के पर्याप्त विनियोग के पश्चात् उपभोग वस्तुओं से सम्बन्धित उद्योगों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। इन उद्योगों में उत्पादन के साथ ही वितरण परिवहन, आदि में रोजगार उपलब्ध होंगे।
  • शिक्षा को रोजगारोन्मुख बनाना आवश्यक है। हमारी शिक्षा पद्धति भी दोषपूर्ण है जो रोजगारपरक नहीं है। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से लाखों स्नातक प्रतिवर्ष निकलते हैं। किन्तु उनमें से कुछ ही रोजगार पाने का सौभाग्य प्राप्त कर पाते हैं। उनकी डिग्री रोजी-रोटी को जुटा पाने में उनकी सहायता नहीं कर पाती।
  • धन्धों का विकास गांवों में कृषि सहायक उद्योग-धन्धों का विकास किया जाना आवश्यक है। इससे क्रषक खाली समय में अनेक कार्य कर सकेंगे। बागवानी, दुग्ध उत्पादन, मत्स्य अथवा मुर्गी पालन, पशुपालन, दुग्ध व्यवसाय, आदि ऐसे ही धन्धे है।
  • कुटीरोद्योग एवं लघु उद्योगों के विकास से ग्रामीण एवं शहरी दोनों ही क्षेत्रों में रोजगार के अवसर सुलभ कराए जा सकते हैं।
  • आज स्थिति यह है कि एक ओर विशिष्ट प्रकार के दक्ष श्रमिक नहीं मिल रहे हैं तो दूसरे प्रकार के दक्ष श्रमिकों को कार्य नहीं मिल रहा है।

Conclusion : 

बेरोजगारी की दूर करने के सरकार द्वारा अनेक प्रयास किए गए है जिनमे राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम, ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारंटी कार्यक्रम, जवाहर रोजगार योजना, प्रधानमंत्री रोजगार योजना आदि कार्यक्रम शामिल है। लेकिन अभी भी कुछ सख्त कदम उठाने बाकि है। बेरोजगारी को दूर करना देश का सबसे प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए। नागरिकों को अधिक नौकरियों के निर्माण के साथ ही रोजगार के लिए सही कौशल प्राप्त करने के लिए प्रयास करना चाहिए।

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