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इलेक्ट्रिक वाहनों के लाभ

Essays

Essay on E Transportation in hindi | essay on electric vehicles in india (Hindi)

Essay on E Transportation in hindi | essay on electric vehicles in india (Hindi)

Introduction :

“परिवर्तन के अलावा कुछ भी स्थाई नहीं है।” यह कथन दर्शाता है कि हमें परिस्थिति और आवश्यकता के अनुसार स्वयं को बदलते रहना चाहिए तभी हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकेंग। भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा उद्योग है और 2030 तक तीसरा सबसे बड़ा उद्योग बन जाएगा । यात्रियो को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने वाले साधनो को परिवहन कहते है, जो परिवहन के साधन बगैर ईंधन के बैटरी के माध्यम से चलते है उन्हें ‘ई- परिवहन’ के नाम से जाना जाता है। वर्तमान समय में, ई-वाहनो की उपयोगिता, सस्ती लागत और पर्यावरण के अनुकूल होने के कारण इनकी मांग तेज़ी से बढ़ती जा रही है।

  • ये वाहन पेट्रोल की बजाय इलेक्ट्रिक मोटर से चलते है और इसके उपयोग से लागत में भी कमी होती है। निजी क्षेत्र ने भी ई-वाहनों को सराहना मिल रही है यानी अमेज़न, स्विगी और ज़ोमैटो जैसी कंपनियां भी अपने उत्पादों की डिलीवरी के लिए इन ई-वाहनों का उपयोग कर रही हैं।
  • ई-वाहनों का सबसे बड़ा लाभ यह है की ये पर्यावरण के अनुकूल है तथा इनसे प्रदुषण भी नहीं होता। विभिन्न कम्पनियाँ जैसे महिंद्रा एवं टेस्ला के द्वारा इलेक्ट्रॉनिक कार, स्कूटर और बाइक का निर्माण बहुत तेज़ी से किया जा रहा है।
  • हाल ही की जलवायु परिवर्तन रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर है और यहाँ का वायु गुणवत्ता सूचकांक बहुत ख़राब होता जा रहा है। यह दर्शाता है कि यह दूषित वायु मानव जीवन काल को औसतन 7 वर्ष कम कर रही है जो कि एक गंभीर मुद्दा है।
  • हालाँकि ई-वाहनों के बहुत सारे फायदे हैं लेकिन इससे सम्बंधित कुछ चुनौतियाँ भी हैं क्योंकि ई-वाहन लिथियम आधारित बैटरी पर चलते है।
  • इन वाहनों को हर 200 से 250 किलोमीटर पर चार्ज करना होता है। भारत में ई-वाहन चार्जिंग स्टेशनों और इस संबंध में उचित नीतियों का अभाव बना हुआ है।

Conclusion :

सरकार द्वारा लोगों को इन वाहनों को खरीदने पर सब्सिडी देकर ई-वाहनों के उपयोग को प्रोत्साहित करना चाहिए । उबर, टीवीएस और टाटा जैसी कुछ कंपनियां पहले ही अपना ई-वाहन लॉन्च कर चुकी हैं। हाल ही में सरकार ने आत्मनिर्भर होने के लिए मेक इन इंडिया कार्यक्रम शुरू किया है जो एक अच्छा कदम है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि भारत का भविष्य उज्ज्वल है और यदि हम लगातार ई-वाहनो की उपयोगिता की दिशा में काम करते हैं तो हम अपने पर्यावरण को संरक्षित कर सकेंगे और हमारी पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भरता भी कम हो जाएगी हैं। इस सम्बन्ध में यह कहना गलत नहीं होगा की “ई-परिवाहनो को प्रयोग में लाये, प्रदुषण रहित पर्यावरण पायें।”

वर्क फ्रॉम होम पर निबंध (essay on work from home in hindi)

Introduction :

‘वर्क फ्रॉम होम’ कार्य करने का एक आधुनिक तरीका है, जहां कंपनी या फर्म के कर्मचारी अपने घर से ही अपना काम कर सकते हैं। घर से काम करने से कर्मचारियों के साथ-साथ कंपनियों के प्रबन्धको को भी आसानी रहती है क्योंकि पूरा काम समय पर बड़ी आसानी से समाप्त किया जा सकता है। कोरोना महामारी के खतरे को देखते हुए दुनिया भर की कंपनियों ने वर्क फ्रॉम होम की नीति अपनाई। भारत के लिए यह भले ही नई बात हो, लेकिन दुनिया के अन्य देशों में यह चलन पहले से ही मौजूद था। ‘वर्क फ्रॉम होम’ ने कई व्यावसायो और कंपनियों के लिए काम करने की नई संभावनाओं की राहे खोल दी है। कई कम्पनियाँ इसके माध्यम से अपने व्यापार मॉडल में सुधार कर रही है और साथ ही इसका फायदा उनके कर्मचारियों को भी मिल रहा है।

यदि कोई कर्मचारी स्वास्थ संबंधित समस्याओं का सामना कर रहा हैं, तो ‘वर्क फ्रॉम होम उनके लिए एक अच्छा उपाय साबित हो सकता है। यही कारण है कि आजकल, अधिकांश आईटी और अन्य संबंधित कंपनियां अपने कर्मचारियों को यह विकल्प दे रही हैं। लेकिन वर्क फ्रॉम होम हर किसी की क्षमता और व्यक्तित्व के लिए उपयुक्त नहीं है। कुछ कर्मचारी कार्यालय के वातावरण में काम करना पसंद करते हैं।

  • कोरोना वाय़रस संक्रमण के खतरे को देखते हुए दुनिया भर की कंपनियों ने वर्क फ्रॉम होम की नीति अपनाई है. भारत के कॉरपोरेट कल्चर के लिए यह भले ही नई बात है और आपदा के दौर में अपनाई गई व्यवस्था है, लेकिन दुनिया के अन्य देशों में यह चलन पहले से ही है.
  • कई कंपनियों ने कर्मचारियों को घर से काम करने (वर्क फ्रॉम होम) की सुविधा दी है. यह कदम इसलिए उठाया गया है ताकि ‘कम्युनिटी ट्रांसमिशन’ को रोका जा सके.
  • हालांकि घर से काम करने वाले अधिकतर लोग अब नई मुश्किलों से जूझ रहे हैं. कई लोग मानसिक तनाव और दबाव झेल रहे हैं. इसकी कई वजहें हैं.
  • कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए किये गए लॉकडाउन की वजह से ज्यादातर कंपनियों ने कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम का विकल्प दे दिया है. घर से काम करने के कारण कुछ लोग आलस्य महसूस करने लगे हैं. कुछ लोगों का मानना है कि घर पर काम करने के कारण अक्सर उनके गर्दन और कंधों में दर्द रहने लगा है.
  • नेशनल करियर सर्विस ने कहा है कि वर्क फ्रॉम होम को सफल बनाने के लिए जरूरी है आप हर दिन के काम की पूरी लिस्ट बनाएं और उसे शाम में चेक करें कि आपने सारे काम पूरे कर लिए हैं या नहीं. दूसरी बात यह है कि घर पर आप ऑफिस जैसा माहौल बनायें.
  • वर्क फ्रॉम होम के दौरान आप अपने काम के समय को लेकर स्पष्ट रहें. जैसे आप ऑफिस जाने के बाद एक निर्धारित समय तक काम करते हैं, वैसे ही आप घर से भी निर्धारित समय में ही काम करें. आप उस काम के बीच में ना डिस्टर्ब हों, ना कोई और काम करें. इसके साथ ही नेशनल करियर सर्विस ने कहा है कि ऑफिस के समय में केवल ऑफिस का काम करें.
  • अपने घर से काम करते समय भी आपको अपने सहकर्मियों के साथ संपर्क में रहना चाहिए. दूसरी बात यह है कि ऑफिस के कामकाज से संबंधित बातचीत करने के लिए आप डिजिटल संचार माध्यम का उपयोग करें. आप ईमेल कर सकते हैं, आप फोन कर सकते हैं, आप चैट कर सकते हैं या वीडियो कॉल कर सकते हैं. 
  • घर से ग्रॉसरी का सामान खरीदने के लिए बाहर निकलें तो साथ में सैनिटाइजर जरूर रखें. वजह यह है कि ग्रॉसरी शॉप या सुपरमार्केट में कई चीजों को छूना पड़ सकता है. कार्ट, काउंटर, शेल्‍फ वगैरह को छूने पर हाथों पर सैनिटाइजर जरूर लगाएं
  • जरूरी नहीं है कि आप सर्जिकल मास्‍क ही पहनें. हेल्‍थकेयर प्रोफेशनल्‍स को इनकी ज्‍यादा जरूरत होती है. घर पर कपड़े से बने मास्‍क भी आपकी सुरक्षा करने में मददगार होते हैं. आवश्‍यक वस्‍तुएं खरीदने के लिए बाहर निकलें तो मास्‍क जरूर पहन लें.
  • हफ्तेभर की ग्रॉसरी खरीदना पर्याप्‍त है. सरकार ने भरोसा दिया है कि वह आवश्‍यक वस्‍तुओं की आपूर्ति में बाधा नहीं आने देगी. इस दौरान प्रोटीनयुक्‍त खाना खाने की सलाह दी जाती है क्‍योंकि यह इम्‍यूनिटी को बढ़ाता है और सेहतमंद होता है.
  • ज्‍यादातर दुकानों के सामने अब दुकानदारों ने गोले खींच दिए हैं. ऐसा सोशल डिस्‍टेंसिंग यानी सामाजिक दूरी को बनाए रखने के लिए किया गया है. ग्रॉसरी खरीदते वक्‍त एक-दूसरे से छह फीट की दूरी बनाकर रखना सही है.
  • जितना संभव हो डिजिटल पेमेंट का इस्‍तेमाल करें. यह न केवल संक्रमण के खतरे को कम करता है, बल्कि कैश बचाने में भी मदद करता है. इसके चलते लॉकडाउन में छोटी-छोटी अवधियों में आपको एटीएम नहीं भागना पड़ता है. ग्रॉसरी खरीदकर घर वापस लौटने पर 20 सेकेंड तक अपने हाथों को साबुन से धुलना नहीं भूलें.
  • इसकी वजह यह है कि ज्यादातर मोबाइल ‘हाई-टच सरफेस’ माने जाते हैं. यहां हम ऐसी बातें बता रहे हैं जिनका ध्यान आपको स्मार्टफोन और लैपटॉप सहित गैजेट्स को साफ करते वक्त रखना है.

Conclusion :

वर्क फ्रॉम होम करते हुए शुरुआती समय में कई बार काफी थकान महसूस होती है और काम नीरस लगने लगता है। वर्क फ्रॉम होम करने वाले कर्मचारीयो के कार्य की निगरानी करने में भी कठिनाई होती है। कंपनियां कर्मचारियों को घर से काम करने के लिए प्रोत्साहित कर सकती हैं लेकिन बेहतर परिणाम के लिए कुछ नियम भी होने चाहिए ताकि घर से काम प्रभावी ढंग से और समय सीमा के भीतर हो सके। वर्क फ्रॉम होम रोमांचक और लाभदायक है, लेकिन काम में स्वतंत्रता से जिम्मेदारियां भी बढ़ जाती हैं।

मानसिक स्वास्थ्य

Introduction :

गांधी जी ने एक बार कहा था, ” स्वास्थ्य ही वास्तविक धन है सोना और चांदी नहीं”। यह कथन हमारे जीवन में स्वास्थ्य के महत्व को इंगित करता है। लोग आमतौर पर अपने शारीरिक स्वस्थ पर अधिक ध्यान देते हैं और मानसिक फिटनेस को अनदेखा करते हैं। लेकिन यह भी सत्य है कि मानसिक स्वास्थ्य उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि शारीरिक स्वास्थ्य। हम अपने विकसित मस्तिष्क के कारण अपने जीवन को नियंत्रित कर पाते हैं। इसलिए, बेहतर प्रदर्शन और परिणाम के लिए हमारे शरीर और दिमाग को फिट और स्वस्थ रखना हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।

आक्रामकता, नकारात्मक सोच, निराशा और भय ऐसे कारक हैं जो हमारे फिटनेस स्तर पर बहुत प्रभाव डालते हैं। मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति हमेशा अच्छे मूड में होता है और आसानी से संकट और ख़राब स्थितियों को आसानी से व्यवस्थित कर सकता है। मानसिक फिटनेस महसूस करने और सोच की सकारात्मकता को दर्शाता है जो जीवन का आनंद लेने की हमारी क्षमता में सुधार करता है।

आजकल फिटनेस शब्द का इस्तेमाल मनोवैज्ञानिकों, स्कूलों, संगठनों और सामान्य लोगो द्वारा तार्किक सोच और तर्क क्षमता को दर्शाने के लिए किया जा रहा है। उसी तरह मानसिक इलनेस स्वास्थ्य की अस्थिरता है, जिसमें सोच और व्यवहार में अप्रत्याशित परिवर्तन आता हैं। तनाव या अन्य घटनाओं के कारण मानसिक बीमारी हो सकती है। यह आनुवंशिक कारकों, सामाजिक तनाव और खराब शारीरिक स्वास्थ्य से भी उत्पन्न हो सकती  है।

  • शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य का निकट संबंध है और यह निस्संदेह रूप से सिद्ध हो चुका है कि अवसाद के कारण हृदय और रक्तवाहिकीय रोग होते हैं।
  • मानसिक विकार व्यक्ति के स्वास्थ्य-संबंधी बर्तावों जैसे, समझदारी से भोजन करने, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद, सुरक्षित यौन व्यवहार, मद्य और धूम्रपान, चिकित्सकीय उपचारों का पालन करने आदि को प्रभावित करते हैं और इस तरह शारीरिक रोग के जोख़िम को बढ़ाते हैं।
  • मानसिक अस्वस्थता के कारण सामाजिक समस्याएं भी उत्पन्न होती हैं जैसे, बेरोजगार, बिखरे हुए परिवार, गरीबी, नशीले पदार्थों का दुर्व्यसन और संबंधित अपराध।
  • मानसिक अस्वस्थता रोगनिरोधक क्रियाशीलता के ह्रास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  • अवसाद से ग्रस्त चिकित्सकीय रोगियों का हश्र बिना अवसाद से ग्रस्त रोगियों से अधिक बुरा होता है।
  • लंबे चलने वाले रोग जैसे, मधुमेह, कैंसर,हृदय रोग अवसाद के जोखिम को बढ़ाते हैं।
  • कोई व्यक्ति जो शारीरिक रूप से अयोग्य है वह अपने परिवार की देखभाल नहीं कर सकता है। इसी तरह कोई व्यक्ति मानसिक तनाव का सामना कर रहा है और अपनी भावनाओं को संभालने में अक्षम है तो वह परिवार के साथ अच्छे रिश्तों का निर्माण और उनको बढ़ावा नहीं दे सकता है।
  • यह कहना बिल्कुल सही है कि एक शारीरिक रूप से अयोग्य व्यक्ति ठीक से काम नहीं कर सकता। कुशलतापूर्वक काम करने के लिए अच्छा मानसिक स्वास्थ्य बहुत आवश्यक है। काम पर पकड़ बनाने के लिए अच्छे सामाजिक और संज्ञानात्मक स्वास्थ्य का आनंद लेना चाहिए।
  • ख़राब शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य भी अध्ययन में एक बाधा है। अच्छी तरह से अध्ययन करने के लिए शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के अलावा अच्छा संज्ञानात्मक स्वास्थ्य बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है।
  • हमारा मानसिक स्वास्थ्य मूल रूप से, जिस तरह से हम महसूस करते हैं, अलग-अलग परिस्थितियों में सोचते हैं और स्थिति को नियंत्रित करते हैं, आदि को प्रभावित करता है। मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए शारीरिक स्वास्थ्य को बरकरार रखना महत्वपूर्ण है।
  • सामाजिक स्वास्थ्य समाज में अपने दोस्तों, पड़ोसियों, रिश्तेदारों और अन्य लोगों के साथ पारस्परिक संबंधों को संवारने और बनाए रखने की क्षमता रखता है। यह उचित रूप से कार्य करने और विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों के अनुकूल होने के लिए किसी व्यक्ति की क्षमता को दर्शाता है।
  • जब एक व्यक्ति का मस्तिष्क सभी मानसिक प्रक्रियाओं को कुशलता से निष्पादित करता है तो उसे अच्छे संज्ञानात्मक स्वास्थ्य का आनंद लेना कहा जाता है। प्रक्रियाओं और क्रियाकलापों में नई बातें, अच्छे निर्णय, अपनी बात और मजबूत संवाद करने के लिए भाषा का कुशल उपयोग करना शामिल है।
  • आध्यात्मिक स्वास्थ्य को बरकरार रखने से एक व्यक्ति अधिक सकारात्मक, जुझारू और सुलझा हुआ बनता है।
  • स्वास्थ्य का मतलब केवल आपकी शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य नहीं है बल्कि इसके बारे में ऊपर बताए गए विभिन्न तत्व भी इसमें शामिल हैं। जहाँ अच्छा शारीरिक स्वास्थ्य एक स्वस्थ जीवन के लिए आधार है वहीँ आपको एक स्वस्थ्य जीवन का आनंद लेने के लिए अन्य सभी स्वास्थ्य घटकों को बनाए रखना आवश्यक है।

Conclusion :

जीवन में हर कदम पर प्रतिस्पर्धा होती है। प्रत्येक व्यक्ति दूसरे की बराबरी करना चाहता है चाहे वह स्कूल या कॉलेज स्तर पर हो या जीवन में स्वास्थ्य शैली को बनाए रखनी की हो। लोगों को इस तथ्य को पहचानना चाहिए कि स्वास्थ्य पहले है। हम यह सब तभी कर सकते हैं जब हम स्वस्थ होते हैं और जीवन के अन्य पहलुओं पर बेहतर काम करते हैं। सरकार को देश की भलाई के लिए अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएँ भी प्रदान करनी चाहिए।

मानसिक बीमारी का इलाज़ संभव है। हम सकारात्मक सोच और अपनी जीवनशैली में बदलाव लाकर इस बीमारी को दूर कर सकते हैं। नियमित व्यायाम जैसे कि सुबह की सैर, योग और ध्यान मानसिक स्वास्थ्य को ठीक करने के लिए बेहतरीन औषधि साबित हुए हैं। अच्छा भोजन और पर्याप्त नींद लेना भी बहुत जरूरी है। तनावमुक्त और निरोगी जीवन के लिए अच्छा मानसिक स्वास्थ्य बहुत जरूरी है, क्योंकि हम सभी को अपने -अपने जीवन में बड़ी सफलताएं हासिल करनी है जिसके लिए अच्छे मानसिक स्वास्थ्य की बहुत जरूरत होती है।

कोरोना महामारी में जीवन

Introduction :

कोरोना महामारी ने हमारे दैनिक जीवन को पूरी बदल कर रख दिया है। इस महामारी के कारण लाखो लोग बुरी तरह से प्रभावित हुए है, जो या तो बीमार हैं या इस बीमारी के फैलने के कारण मारे जा रहे हैं। इस वायरल संक्रमण के सबसे आम लक्षण बुखार, सर्दी, खांसी, हड्डियों में दर्द और सांस लेने में समस्या है। यह, पहली बार लोगों को प्रभावित करने वाला एक नया वायरल रोग होने के कारण, अभी तक इसकी वैक्सीन उपलब्ध नहीं हो सकी हैं। इसलिए अतिरिक्त सावधानी बरतने पर जोर दिया जाना बहुत जरुरी है, जैसे कि स्वच्छता, नियमित रूप से हाथ धोना, सामाजिक दूरी और मास्क पहनना आदि। 

विभिन्न उद्योग और व्यापारिक क्षेत्र इस महामारी के कारण प्रभावित हुए हैं जिनमें फार्मास्यूटिकल्स उद्योग, बिजली क्षेत्र और पर्यटन शामिल हैं। यह वायरस नागरिकों के दैनिक जीवन के साथ-साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी भारी प्रभाव डाल रहा है। एक देश से दूसरे देश की यात्रा करने पर प्रतिबंध है। यात्रा के दौरान, कोरोना मामलों की संख्या बढ़ते हुए देखी गयी है जब परीक्षण किया गया, खासकर जब वे अंतरराष्ट्रीय दौरे से लौट रहे हों।

  • कोरोना वायरस ने भारत की शिक्षा को प्रभावित किया है। फिलहाल मार्च महीने से लॉकडाउन की वजह से विद्यालय बंद कर दिए गए है। सरकार ने अस्थायी रूप से स्कूलों और कॉलेजों को बंद कर दिया।
  • शिक्षा क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण समय है क्यों कि इस अवधि के दौरान प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रवेश परीक्षा आयोजित की जाती है। इसके साथ बोर्ड परीक्षाओं और नर्सरी स्कूल प्रवेश इत्यादि सब रुक गए है।
  • शिक्षा संस्थानों के बंद होने का कारण दुनिया भर में लगभग 600  मिलियन शिक्षार्थियों को प्रभावित करने की आशंका जातायी जा रही है।
  • ऑनलाइन क्लासेस के ज़रिये विद्यार्थी इस प्रकार के अनोखे शिक्षा प्रणाली को समझ पाए है। लॉकडाउन के दुष्प्रभाव को ऑनलाइन शिक्षा पद्धति से कम कर दिया है।
  • केंद्र सरकार ने शिक्षा प्रणाली को विकसित करने हेतु पहले साल की तुलना में इस साल व्यय अधिक किया है ताकि कोरोना संकटकाल के नकारात्मक प्रभाव शिक्षा पर न पड़े। सीबीएसई ने विशेष टोल फ्री नंबर लागू किया है जिसके माध्यम से विद्यार्थी घर पर रहकर अधिकारयों से मदद ले सकते है।
  • बारहवीं कक्षा के विषय संबंधित पुस्तकें ऑनलाइन जारी की गयी है ताकि बच्चो की शिक्षा में बिलकुल बाधा न आये।
  • लॉक डाउन में कुछ बच्चे शिक्षा को लेकर ज़्यादा गंभीर नहीं रहे, वह सोशल मीडिया में चैट मोबाइल में गेम्स खेलते है और अपने कीमती समय को बर्बाद कर रहे थे।
  • अभी माता -पिता की यह जिम्मेदारी है कि लॉकडाउन में भी बच्चे घर पर अनुशासन का पालन करे और ऑनलाइन शिक्षा को गम्भीरतापूर्वक ले और खाली समय में ऑनलाइन एनिमेटेड शिक्षा संबंधित वीडियोस और विभिन्न ऑनलाइन वर्कशीट्स के प्रश्नो को हल करें।
  • कोविड-19 की महामारी ने आज समूचे विश्व की अर्थव्यवस्था, शैक्षिक व्यवस्था तथा सामाजिक स्तर को अत्यंत प्रभावित किया है।
  • कोरोना वायरस ने पुरे विश्व केशक्तिशाली देशों को घुटनो पर लाकर रख दिया है। सारे देश मिलकर कोरोना वायरस से मुक्ति पाने में जुटी है और डॉक्टर्स ,नर्सेज एकजुट होकर लड़ रहे है। उनकी जितनी भी सराहना की जाए कम होगी।
  • नरेंद्र मोदी जी ने कोरोना वायरस से लड़ने के लिए कठोर कदम उठाये है जो हमारे देश की भलाई के लिए है और हम सभी को एक भारतीय होने के नाते इस कठोर समय में उनका साथ देना चाहिए ताकि हम देश को रोगमुक्त कर सके। ऐसा करने पर जल्द ही ज़िन्दगी फिर से वापस पटरी पर आ जाएगी। कोरोना वायरस के खिलाफ यह महायुद्ध तब तक जारी रहेगा जब तक हम इस वायरस को जड़ से ख़त्म ने करे।
  • एयरपोर्ट पर यात्रियों की स्क्रीनिंग हो या फिर लैब में लोगों की जांच, सरकार ने कोरोना वायरस से निपटने के लिए कई तरह की तैयारी की है। इसके अलावा किसी भी तरह की अफवाह से बचने, खुद की सुरक्षा के लिए कुछ निर्देश जारी किए हैं जिससे कि कोरोना वायरस से निपटा जा सकता है।
  • कोरोनावायरस से बचाव के लिए वर्तमान में कोवैक्सीन तथा कोवीशील्ड नामक दो टीके लगाए जाना शुरू हो चुके है। एक्सपर्ट्स के अनुसार दोनों ही टीके सुरक्षित है। इस वैक्सीन की दो डोज निश्चित समय के अंतराल पर दी जाती है। अभी यह वैक्सीन आयु के अनुसार देश में लगाई जा रही है।

Conclusion :

लॉकडाउन ने प्रवासी श्रमिकों को भी प्रभावित किया है, जिनमें से कई उद्योगों को बंद करने के कारण अपनी नौकरी खो चुके हैं और सरकार ने प्रवासियों के लिए राहत उपायों की घोषणा भी की ताकि वे अपने अपने घर वापस लौट सके। सभी सरकारें, स्वास्थ्य संगठन और अन्य प्राधिकरण लगातार कोरोना से प्रभावित मामलों की पहचान करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। डॉक्टर और सम्बंधित अधिकारी इन दिनों स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता को बनाए रखने में बहुत कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं।

शहरी बेरोजगारी

Introduction :

बेरोजगारी एक गंभीर समस्या है जिसका सामना दुनिया के हर देश को करना पड़ रहा है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें एक कुशल और प्रतिभाशाली व्यक्ति नौकरी करना तो चाहता था लेकिन उसे नौकरी नहीं मिल पाती है। भारत उन विकासशील देशों में से एक है जो बेरोजगारी की समस्या से बुरी तरह से पीड़ित है। लेकिन भारत में बेरोजगारी की समस्या मांग की कमी का परिणाम नहीं है, बल्कि अधिक जनसंख्या वृद्धि के कारण है। चूंकि COVID-19 महामारी ने भारतीय अर्थव्यवस्था को चरमरा कर रख दिया है और बड़े पैमाने पर लोगो की नौकरियाँ छीन चुकी है, कोरोनोवायरस संक्रमण के बाद बेरोजगारी शहरी भारतीयों के लिए दूसरी सबसे बड़ी चिंता बन चुकी है। 

भारत भर में किए गए एक सर्वेक्षण में, शहरी क्षेत्रों में लगभग 87 प्रतिशत स्व-नियोजित उत्तरदाताओं ने कोरोनोवायरस (COVID-19) महामारी के कारण अपना रोजगार खो दिया है। इसका प्रभाव देश के ग्रामीण क्षेत्रों से आये श्रमिकों पर भी अधिक पड़ा था। सामान्य तौर पर, शहरी क्षेत्रों में रोजगार की हानि सर्वेक्षण के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक थी। सरकार ने 20 लाख करोड़ रुपये के विशेष आर्थिक पैकेज की घोषणा की है जो 2019-20 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 10% है, जो गरीब, मजदूरों, प्रवासियों को रोजगार प्रदान करने के लिए है, जिनकी कोरोनावाइरस महामारी की वजह से अपनी नौकरी खो दी है।

अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी के रूप –

1) खुली बेरोजगारी –

इस प्रकार की बेरोजगारी में श्रमिकों को कार्य करने के लिए अवसर प्राप्त नहीं होते जिनसे उन्हे नियमित आय प्राप्त हो सके । इस बेरोजगारी का मुख्य कार पूरक साधनों और पूंजी का अभाव है। यहाँ जनसंख्या वृद्धि की तुलना में पूंजी निर्माण की गति भी बहुत धीमी होती है । इसलिए, पूंजी-निर्माण की तुलना में श्रम-शक्ति अधिक तीव्रता से बद है। इसे ‘संरचनात्मक बेरोजगारी’ भी कहते हैं ।

2) अल्प रोजगारी-

अल्पविकसित अर्थव्यवस्था मे अल्प-रोजगारी को दो प्रकार से परिभाषा कर सकते हैं: प्रथम अवस्था वह है जिसमें एक व्यक्ति को उसकी योग्यतानुसार रोजगार मिल पाता । द्वितीय अवस्था वह है जिसमें एक श्रमिक को सम्पूर्ण दिन या कार्य से सम्पूर्ण स के अनुसार पर्याप्त कार्य नहीं मिलता । अत: श्रमिकों को पूर्णकालिक रोजगार नहीं मिल पा अर्थात् वर्ष में कुछ दिनों या किसी विशेष मौसम में ही कार्य मिल पाता है । इसी कारण इसे ‘मीर बेरोजगारी’ भी कहते हैं ।

3) ग्रामीण बेरोजगारी –

ग्रामीण क्षेत्रों में जनसंख्या बढ़ने से भूमि पर जनसंख्या का भा जाता है । भूमि पर जनसंख्या की मात्रा बढ़ने से कृषकों की संख्या भी बद जाती है । जिसके प्रच्छन्न बेरोजगारी की मात्रा बढ जाती है । अधिकांश श्रम-शक्ति प्राथमिक व्यवसायों में पं रहती है तथा व्यावसायिक ढाँचे के बेलोच होने के कारण गैर-व्यस्त मौसम में मी यह श्रमिक बाहर नहीं जाते ।

इसी कारण मौसमी बेरोजगारी पैदा होती है । मौसमी बेरोजगारी की मानव शक्ति के अल्प-प्रयोग से सम्बंधित है । यदि किसी विशेष मौसम में बेरोजगार श्रमित सहायक व्यवसायों में कार्य मिल भी जाता है, तो भी वह बेरोजगार बने ही रहते हैं ।

4) शहरी बेरोजगारी –

शहरी बेरोजगारी ग्रामीण बेरोजगारी की ही प्रशाखा है । कृषि में पुंजीवादी प्रणाली के विकास के कारण तथा भूमि पर जनसंख्या के भार में वृद्धि के कारण कृषक की आर्थिक दशा प्रतिदिन बिगड़ती जाती है, जिसके कारण भारी संख्या में श्रमिक ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर स्थानान्तरित होने लगते हैं ।

गाँवों से शहरी की ओर जनसंख्या की यह गतिशीलता शहरी आकर्षण के परिणामस्वरूप नहीं अपितु गाँवो मे पर्याप्त रोजगार के अवसर उपलब्ध न के कारण होती है ।

भारत में बेरोजगारी के कारण –

  • जनसंख्या वृद्धि की ऊँची दर बेरोजगारी की समस्या को जन्म देती है । इस दृष्टि से भारत की भूमि पर जनसंख्या का भार पहले से ही बहुत अधिक है । ऐसी स्थिति में नये रो के अवसर उपलब्ध कराने का दायित्व सहायक एवं सेवा क्षेत्र पर होता है।
  • यदि उद्योग क्षेत्र एवं सेवा क्षेत्र अपने दायित्व को पूर्ण करने में असमर्थ होते हैं तो जनसंख्या वृद्धि की तुलना में तो बेरी में वृद्धि होती है अथवा ग्रामीण क्षेत्रों में प्रच्छन्न बेरोजगारी उत्पन्न होती है ।
  • दूसरी बेरोजगारी की समस्या है कि भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि क्षेत्र का विकास उप धीमा एवं निस्तेज रहा है । यह क्षेत्र विकासशील अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं को पूए में असमर्थ रहा है । इसका कारण कृषि क्षेत्र की उत्पादकता का स्तर कम होना है ।
  • भारत में दोषपूर्ण आर्थिक नियोजन भी रोजगार के अवसरों में कमी का एक प्रमु बना ध्या है । भारत मे अभी तक आर्थिक विकास हेतु आधारभूत ढाँचे का विकास नहीं है । विभिन्न योजनाओं में ग्रामीण क्षेत्रों का समुचित ढंग से विकास नहीं हो सकता है, ग्रामीण जनसंख्या के स्थानान्तरण को नहीं रोका जा सका है । गावों में सेवा क्षेत्रो नहीं हो सका है ।
  • योजनाकाल में कृषि एवं उद्योगों मे तकनीकी विकास नहीं हो सका है जिससे कि उत्पादन में श्रम-शक्ति का अधिक उपयोग किया जा सके । योजनाओ में बेकार पडी हुई भूमि में उपयोग, सिचाई के साधनो का समुचित विकास, भूमि संरक्षण तथा कृषि में सहायब जैसे डेयरी, मछली पालन, मुर्गी पालन आदि का पर्याप्त विकास नहीं हो सका है जिसके कारण, शिक्षित, अशिक्षित एवं प्रशिक्षित व्यक्तियों हेतु नये रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं हो सके हैं ।
  • शहरों में बेरोजगारी को दूर करने के लिये सर्वप्रथम हमें शिक्षा प्रणाली में सुधार करना होगा इसके लिये आवश्यक यह है कि विद्यालय एवं विश्वविद्यालय स्तर पर व्यावसायिक शिक्षा को अपनार जाए ताकि शिक्षा प्राप्त कर यह व्यवसाय उम्मुख हो तथा स्नातकोत्तर स्तर पर या शोध पर केवर मेधावी विद्यार्थियों को ही प्रवेश दिया जाए ।
  • ऐसे उद्योगों में निवेश को प्रोत्साहित करना चाहिये जिनमें शीघ्र ही पूंजी का प्रतिफल प्राप्त होने त् सम्भावना हो । बढे शहरों में बेरोजगारी के केन्द्रीयकरण को रोकने हेतु औद्योगिक क्रियाओं विचलन एवं विकेन्द्रीकरण किया जाना चाहिए ।
  • राष्ट्रीयकृत बैंकों को छोटे उद्योगों एवं स्व-रोजग युक्त इंजीनियरों द्वारा आरम्भ किये गए उद्योगों को विकसित करने के लिये पर्याप्त मात्रा में सा सुविधाएँ उपलब्ध करानी चाहिए।

Conclusion :

सरकार द्वारा रोजगार के अवसरों में वृद्धि करने के लिए इस दृष्टि अनेक योजनाएं जैसे नेहरू रोजगार योजना रोजगार गारन्टी कार्यक्रम आदि क्रियान्वित गये हैं । भारत में बेरोजगारी की समस्या चरम पर है, लेकिन अब सरकार और स्थानीय अधिकारियों ने इस समस्या को गंभीरता से लिया है और इसे कम करने के लिए काम कर रहे हैं। नीति निर्माताओं और नागरिकों को अधिक नौकरियों के निर्माण के साथ ही रोजगार के लिए सही कौशल प्राप्त करने के लिए उचित प्रयास भी करते रहना चाहिए।

कोरोना वायरस का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

Introduction :

कोरोनावायरस (COVID-19) एक संक्रामक रोग है जो कोरोनावायरस के कारण होता है। इसकी शुरुआत पहली बार दिसंबर 2019 में चीन के वुहान शहर से हुई। डब्ल्यूएचओ ने 30 जनवरी को कोरोनवायरस को अंतरराष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किया है। कोरोनावायरस न केवल लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है बल्कि दुनिया के सभी देशों की अर्थव्यवस्थाओं को भी प्रभावित कर रहा है। विश्व व्यापार संगठन के अनुसार, व्यापार के मामले में, चीन दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक और दूसरा सबसे बड़ा आयातक है। विश्व के निर्यात का 13% और आयात का 11% केवल चीन से होता है। दुनिया के कई उद्योग अपने कच्चे माल के लिए चीन पर निर्भर हैं। 

पुरे विश्व में खरीदी जाने वाली लगभग एक तिहाई मशीनरी चीन से आती है, इसलिए कोरोनवायरस ने वैश्विक आपूर्ति पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है।चीन में कई कारखाने अब बंद हो गए हैं, निर्भर कंपनियों के लिए उत्पादन भी बंद हो गया है। उत्पादन में मंदी के कारण खपत में भी गिरावट आई है और इस तरह से दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं पर असर पड़ रहा है। कोरोनोवायरस फैलने के कारण लोगों की आवाजाही पर प्रतिबंध के कारण पर्यटन उद्योग को भी भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

कोरोना वायरस का आयात पर प्रभाव –

  • इस वायरस से हवाई यात्रा, शेयर बाज़ार, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं सहित लगभग सभी क्षेत्र प्रभावित हो रहे हैं।
  • यह वायरस अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है, जबकि इसके कारण चीनी अर्थव्यवस्था पहले से ही मुश्किल स्थिति में है।
  • इन दो अर्थव्यवस्थाओं, जिन्हें वैश्विक आर्थिक इंजन के रूप में जाना जाता है, संपूर्ण वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुस्ती तथा आगे जाकर मंदी का कारण बन सकता है।
  • निवेशकों के बाज़ारों से बाहर निकलने के कारण शेयर बाज़ार सूचकांक में लगातार गिरावट आई है। लोग बड़ी राशि को अपेक्षाकृत सुरक्षित क्षेत्र यथा- ‘सरकारी बाॅण्ड’ में लगा रहे हैं जिससे कीमतों में तेज़ी तथा उत्पादकता में कमी देखी गई है।
  • अमेरिकी बाज़ार में वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद सबसे खराब अनुभव हाल ही में कोरोना वायरस के कारण महसूस किया गया, ध्यातव्य है कि अमेरिकी बाज़ार में 12% से अधिक की गिरावट आई है।
  • यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि जो निवेशक ऐसे संकट के समय सामान्यत: स्वर्ण में निवेश करते हैं, इस संकट के समय उन्होंने इसका भी बहिष्कार कर दिया जिससे सोने की कीमतों में गिरावट देखी गई, तथा लोगों ने सरकारी गारंटी युक्त ‘ट्रेज़री बिल’ (Treasury Bills) में अधिक निवेश करना उचित समझा।
  • Apple, Nvidia, Adidas जैसी कंपनियाँ इससे अधिक प्रभावित हो सकती हैं क्योंकि ये चीन के आपूर्तिकर्त्ताओं पर निर्भर हैं, इन्हें भविष्य में बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है।

भारत की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव –

  • भारत जब अर्थव्यवस्था को पुन: पटरी पर लाने की कोशिश कर रहा है, ऐसे समय में इस वायरस का केवल सतही प्रभाव नहीं पड़ेगा तथा ऐसे कठिन समय में समस्या का समाधान मात्र ‘एयर लिफ्टिंग’ से संभव नहीं है।
  • यह समस्या न केवल आपूर्ति शृंखला को प्रभावित करेगी, अपितु यह भारत के फार्मास्यूटिकल, इलेक्ट्रॉनिक, ऑटोमोबाइल जैसे उद्योगों को गंभीर रूप से प्रभावित करेगी।
  • निर्यात, जिसे अर्थव्यवस्था के विकास का इंजन माना जाता है, इसमें वैश्विक मंदी की स्थिति में और गिरावट देखी जा सकती है, साथ ही निवेश में भी गिरावट आ सकती है।
  • भारतीय कंपनियाँ चीन आधारित ‘वैश्विक आपूर्ति शृंखला’ में शामिल प्रमुख भागीदार नहीं हैं, अत: भारतीय कंपनियाँ इससे अधिक प्रभावित नहीं होंगी।
  • दूसरा, कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आ रही है, जो कि वृहद् अर्थव्यवस्था और उच्च मुद्रास्फीति के चलते अच्छी खबर है।
  • भारत सरकार को लगातार विकास की गति का अवलोकन करने की आवश्यकता है, साथ ही चीन पर निर्भर भारतीय उद्योगों को आवश्यक समर्थन एवं सहायता प्रदान करनी चाहिये।
  • कोरोना वायरस जैसी बीमारी की पहचान, प्रभाव, प्रसार एवं रोकथाम पर चर्चा अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों द्वारा की जानी चाहिये ताकि इस बीमारी पर नियंत्रण पाया जा सके।

Conclusion :

वायरस जनित यह संकट किसी अन्य वित्तीय संकट से बिलकुल अलग है। अन्य वित्तीय संकटों का समाधान समय-परीक्षणित उपायों जैसे- दर में कटौती, बेल-आउट पैकेज (विशेष वित्तीय प्रोत्साहन) आदि से किया जा सकता है, परंतु वायरस जनित संकट का समाधान इन वित्तीय उपायों द्वारा किया जाना संभव नहीं है। ऑटोमोबाइल उद्योग पहले ही आर्थिक मंदी के कारण संकट में है और अब माल और सेवाओं की आपूर्ति बाधित होने के कारण उत्पादन में कमी आ रही है। चीन से आपूर्ति में रुकावट के कारण वैश्विक वित्तीय बाजार में उतार-चढ़ाव हो रहा है। यद्यपि दुनिया की अर्थव्यवस्था पर कोरोनोवायरस के सटीक प्रभाव को निर्धारित करना मुश्किल है, फिर भी यह स्पष्ट है कि यह प्रभाव लंबे समय तक रहेगा।

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