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Essay on Life during covid-19 in hindi

कोरोना महामारी में जीवन पर निबंध – Essay on Life during covid-19 in hindi

Introduction :

कोरोना महामारी ने हमारे दैनिक जीवन को पूरी बदल कर रख दिया है। इस महामारी के कारण लाखो लोग बुरी तरह से प्रभावित हुए है, जो या तो बीमार हैं या इस बीमारी के फैलने के कारण मारे जा रहे हैं। इस वायरल संक्रमण के सबसे आम लक्षण बुखार, सर्दी, खांसी, हड्डियों में दर्द और सांस लेने में समस्या है। यह, पहली बार लोगों को प्रभावित करने वाला एक नया वायरल रोग होने के कारण, अभी तक इसकी वैक्सीन उपलब्ध नहीं हो सकी हैं। इसलिए अतिरिक्त सावधानी बरतने पर जोर दिया जाना बहुत जरुरी है, जैसे कि स्वच्छता, नियमित रूप से हाथ धोना, सामाजिक दूरी और मास्क पहनना आदि।

विभिन्न उद्योग और व्यापारिक क्षेत्र इस महामारी के कारण प्रभावित हुए हैं जिनमें फार्मास्यूटिकल्स उद्योग, बिजली क्षेत्र और पर्यटन शामिल हैं। यह वायरस नागरिकों के दैनिक जीवन के साथ-साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी भारी प्रभाव डाल रहा है। एक देश से दूसरे देश की यात्रा करने पर प्रतिबंध है। यात्रा के दौरान, कोरोना मामलों की संख्या बढ़ते हुए देखी गयी है जब परीक्षण किया गया, खासकर जब वे अंतरराष्ट्रीय दौरे से लौट रहे हों।

  • कोरोना वायरस ने भारत की शिक्षा को प्रभावित किया है। फिलहाल मार्च महीने से लॉकडाउन की वजह से विद्यालय बंद कर दिए गए है। सरकार ने अस्थायी रूप से स्कूलों और कॉलेजों को बंद कर दिया।
  • शिक्षा क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण समय है क्यों कि इस अवधि के दौरान प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रवेश परीक्षा आयोजित की जाती है। इसके साथ बोर्ड परीक्षाओं और नर्सरी स्कूल प्रवेश इत्यादि सब रुक गए है।
  • शिक्षा संस्थानों के बंद होने का कारण दुनिया भर में लगभग 600  मिलियन शिक्षार्थियों को प्रभावित करने की आशंका जातायी जा रही है।
  • ऑनलाइन क्लासेस के ज़रिये विद्यार्थी इस प्रकार के अनोखे शिक्षा प्रणाली को समझ पाए है।
  • लॉकडाउन के दुष्प्रभाव को ऑनलाइन शिक्षा पद्धति से कम कर दिया है।
  • केंद्र सरकार ने शिक्षा प्रणाली को विकसित करने हेतु पहले साल की तुलना में इस साल व्यय अधिक किया है ताकि कोरोना संकटकाल के नकारात्मक प्रभाव शिक्षा पर न पड़े। सीबीएसई ने विशेष टोल फ्री नंबर लागू किया है जिसके माध्यम से विद्यार्थी घर पर रहकर अधिकारयों से मदद ले सकते है।

बारहवीं कक्षा के विषय संबंधित पुस्तकें ऑनलाइन जारी की गयी है ताकि बच्चो की शिक्षा में बिलकुल बाधा न आये। लॉक डाउन में कुछ बच्चे शिक्षा को लेकर ज़्यादा गंभीर नहीं रहे, वह सोशल मीडिया में चैट मोबाइल में गेम्स खेलते है और अपने कीमती समय को बर्बाद कर रहे थे। अभी माता -पिता की यह जिम्मेदारी है कि लॉकडाउन में भी बच्चे घर पर अनुशासन का पालन करे और ऑनलाइन शिक्षा को गम्भीरतापूर्वक ले और खाली समय में ऑनलाइन एनिमेटेड शिक्षा संबंधित वीडियोस और विभिन्न ऑनलाइन वर्कशीट्स के प्रश्नो को हल करें।

  • कोविड-19 की महामारी ने आज समूचे विश्व की अर्थव्यवस्था, शैक्षिक व्यवस्था तथा सामाजिक स्तर को अत्यंत प्रभावित किया है।
  • कोरोना वायरस ने पुरे विश्व केशक्तिशाली देशों को घुटनो पर लाकर रख दिया है। सारे देश मिलकर कोरोना वायरस से मुक्ति पाने में जुटी है और डॉक्टर्स ,नर्सेज एकजुट होकर लड़ रहे है। उनकी जितनी भी सराहना की जाए कम होगी।
  • नरेंद्र मोदी जी ने कोरोना वायरस से लड़ने के लिए कठोर कदम उठाये है जो हमारे देश की भलाई के लिए है और हम सभी को एक भारतीय होने के नाते इस कठोर समय में उनका साथ देना चाहिए ताकि हम देश को रोगमुक्त कर सके। ऐसा करने पर जल्द ही ज़िन्दगी फिर से वापस पटरी पर आ जाएगी। कोरोना वायरस के खिलाफ यह महायुद्ध तब तक जारी रहेगा जब तक हम इस वायरस को जड़ से ख़त्म ने करे।
  • एयरपोर्ट पर यात्रियों की स्क्रीनिंग हो या फिर लैब में लोगों की जांच, सरकार ने कोरोना वायरस से निपटने के लिए कई तरह की तैयारी की है। इसके अलावा किसी भी तरह की अफवाह से बचने, खुद की सुरक्षा के लिए कुछ निर्देश जारी किए हैं जिससे कि कोरोना वायरस से निपटा जा सकता है।

Conclusion :

कोरोनावायरस से बचाव के लिए वर्तमान में कोवैक्सीन तथा कोवीशील्ड नामक दो टीके लगाए जाना शुरू हो चुके है। एक्सपर्ट्स के अनुसार दोनों ही टीके सुरक्षित है। इस वैक्सीन की दो डोज निश्चित समय के अंतराल पर दी जाती है। अभी यह वैक्सीन आयु के अनुसार देश में लगाई जा रही है।लॉकडाउन ने प्रवासी श्रमिकों को भी प्रभावित किया है, जिनमें से कई उद्योगों को बंद करने के कारण अपनी नौकरी खो चुके हैं और सरकार ने प्रवासियों के लिए राहत उपायों की घोषणा भी की ताकि वे अपने अपने घर वापस लौट सके। सभी सरकारें, स्वास्थ्य संगठन और अन्य प्राधिकरण लगातार कोरोना से प्रभावित मामलों की पहचान करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। डॉक्टर और सम्बंधित अधिकारी इन दिनों स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता को बनाए रखने में बहुत कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं।

कोरोना वायरस का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

Introduction :

कोरोनावायरस (COVID-19) एक संक्रामक रोग है जो कोरोनावायरस के कारण होता है। इसकी शुरुआत पहली बार दिसंबर 2019 में चीन के वुहान शहर से हुई। डब्ल्यूएचओ ने 30 जनवरी को कोरोनवायरस को अंतरराष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किया है। कोरोनावायरस न केवल लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है बल्कि दुनिया के सभी देशों की अर्थव्यवस्थाओं को भी प्रभावित कर रहा है। विश्व व्यापार संगठन के अनुसार, व्यापार के मामले में, चीन दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक और दूसरा सबसे बड़ा आयातक है। विश्व के निर्यात का 13% और आयात का 11% केवल चीन से होता है।

दुनिया के कई उद्योग अपने कच्चे माल के लिए चीन पर निर्भर हैं। पुरे विश्व में खरीदी जाने वाली लगभग एक तिहाई मशीनरी चीन से आती है, इसलिए कोरोनवायरस ने वैश्विक आपूर्ति पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। चीन में कई कारखाने अब बंद हो गए हैं, निर्भर कंपनियों के लिए उत्पादन भी बंद हो गया है। उत्पादन में मंदी के कारण खपत में भी गिरावट आई है और इस तरह से दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं पर असर पड़ रहा है। कोरोनोवायरस फैलने के कारण लोगों की आवाजाही पर प्रतिबंध के कारण पर्यटन उद्योग को भी भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

कोरोना वायरस का आयात पर प्रभाव

  • इस वायरस से हवाई यात्रा, शेयर बाज़ार, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं सहित लगभग सभी क्षेत्र प्रभावित हो रहे हैं।
  • यह वायरस अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है, जबकि इसके कारण चीनी अर्थव्यवस्था पहले से ही मुश्किल स्थिति में है।
  • इन दो अर्थव्यवस्थाओं, जिन्हें वैश्विक आर्थिक इंजन के रूप में जाना जाता है, संपूर्ण वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुस्ती तथा आगे जाकर मंदी का कारण बन सकता है।
  • निवेशकों के बाज़ारों से बाहर निकलने के कारण शेयर बाज़ार सूचकांक में लगातार गिरावट आई है। लोग बड़ी राशि को अपेक्षाकृत सुरक्षित क्षेत्र यथा- ‘सरकारी बाॅण्ड’ में लगा रहे हैं जिससे कीमतों में तेज़ी तथा उत्पादकता में कमी देखी गई है।
  • अमेरिकी बाज़ार में वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद सबसे खराब अनुभव हाल ही में कोरोना वायरस के कारण महसूस किया गया, ध्यातव्य है कि अमेरिकी बाज़ार में 12% से अधिक की गिरावट आई है।
  • यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि जो निवेशक ऐसे संकट के समय सामान्यत: स्वर्ण में निवेश करते हैं, इस संकट के समय उन्होंने इसका भी बहिष्कार कर दिया जिससे सोने की कीमतों में गिरावट देखी गई, तथा लोगों ने सरकारी गारंटी युक्त ‘ट्रेज़री बिल’ (Treasury Bills) में अधिक निवेश करना उचित समझा।
  • Apple, Nvidia, Adidas जैसी कंपनियाँ इससे अधिक प्रभावित हो सकती हैं क्योंकि ये चीन के आपूर्तिकर्त्ताओं पर निर्भर हैं, इन्हें भविष्य में बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है।

भारत की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव

  • भारत जब अर्थव्यवस्था को पुन: पटरी पर लाने की कोशिश कर रहा है, ऐसे समय में इस वायरस का केवल सतही प्रभाव नहीं पड़ेगा तथा ऐसे कठिन समय में समस्या का समाधान मात्र ‘एयर लिफ्टिंग’ से संभव नहीं है।
  • यह समस्या न केवल आपूर्ति शृंखला को प्रभावित करेगी, अपितु यह भारत के फार्मास्यूटिकल, इलेक्ट्रॉनिक, ऑटोमोबाइल जैसे उद्योगों को गंभीर रूप से प्रभावित करेगी।
  • निर्यात, जिसे अर्थव्यवस्था के विकास का इंजन माना जाता है, इसमें वैश्विक मंदी की स्थिति में और गिरावट देखी जा सकती है, साथ ही निवेश में भी गिरावट आ सकती है।
  • भारतीय कंपनियाँ चीन आधारित ‘वैश्विक आपूर्ति शृंखला’ में शामिल प्रमुख भागीदार नहीं हैं, अत: भारतीय कंपनियाँ इससे अधिक प्रभावित नहीं होंगी।
  • दूसरा, कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आ रही है, जो कि वृहद् अर्थव्यवस्था और उच्च मुद्रास्फीति के चलते अच्छी खबर है।
  • भारत सरकार को लगातार विकास की गति का अवलोकन करने की आवश्यकता है, साथ ही चीन पर निर्भर भारतीय उद्योगों को आवश्यक समर्थन एवं सहायता प्रदान करनी चाहिये।
  • कोरोना वायरस जैसी बीमारी की पहचान, प्रभाव, प्रसार एवं रोकथाम पर चर्चा अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों द्वारा की जानी चाहिये ताकि इस बीमारी पर नियंत्रण पाया जा सके।

Conclusion :

वायरस जनित यह संकट किसी अन्य वित्तीय संकट से बिलकुल अलग है। अन्य वित्तीय संकटों का समाधान समय-परीक्षणित उपायों जैसे- दर में कटौती, बेल-आउट पैकेज (विशेष वित्तीय प्रोत्साहन) आदि से किया जा सकता है, परंतु वायरस जनित संकट का समाधान इन वित्तीय उपायों द्वारा किया जाना संभव नहीं है। ऑटोमोबाइल उद्योग पहले ही आर्थिक मंदी के कारण संकट में है और अब माल और सेवाओं की आपूर्ति बाधित होने के कारण उत्पादन में कमी आ रही है। चीन से आपूर्ति में रुकावट के कारण वैश्विक वित्तीय बाजार में उतार-चढ़ाव हो रहा है। यद्यपि दुनिया की अर्थव्यवस्था पर कोरोनोवायरस के सटीक प्रभाव को निर्धारित करना मुश्किल है, फिर भी यह स्पष्ट है कि यह प्रभाव लंबे समय तक रहेगा।

अर्थव्यवस्था पर कोरोना वायरस का प्रभाव पर निबंध

Introduction :

कोरोना वायरस एक प्रकार का वायरस है जो मानव और अन्य स्तनधारियों के श्वसन पथ को प्रभावित करता है। ये सामान्य सर्दी, निमोनिया और अन्य श्वसन लक्षणों से जुड़े हैं। कोरोना वायरस दुनिया भर में बीमारी बन गया है और दुनिया के सभी देश इसका सामना कर रहे हैं। जिसके कारण दुनिया की आबादी अपने घर के अंदर रहने को मजबूर है। कोरोना वायरस के प्रकोप के कारण देश में 53% तक व्यवसाय प्रभावित हुए है।

कोरोना वायरस का प्रकोप सबसे पहले 31 दिसंबर, 2019 को चीन के वुहान में पड़ा। विश्व स्वास्थ्य संगठन इसको रोकने के उपायों के बारे में देशों को सलाह देने के लिए वैश्विक विशेषज्ञों, सरकारों और अन्य स्वास्थ्य संगठनों के साथ मिलकर काम कर रहा है। व्यापार के मामले में, चीन दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक और दूसरा सबसे बड़ा आयातक है। चीन विश्व के कुल निर्यात का 13% और आयात का 11% हिस्सेदार है।

इसका असर भारतीय उद्योग पर पड़ेगा। भारत का कुल इलेक्ट्रॉनिक आयात चीन से करीब 45% है। दुनिया भर में भारत से खरीदी जाने वाली लगभग एक तिहाई मशीनरी चीन से आती है और लगभग 90% मोबाइल फोन चीन से आते हैं। इसलिए, हम कह सकते हैं कि कोरोनावायरस के मौजूदा प्रकोप के कारण, चीन पर आयात निर्भरता का भारतीय उद्योग पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा। देश भर में बड़ी संख्या में किसानों को भी अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है।

  • इस वायरस से हवाई यात्रा, शेयर बाज़ार, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं सहित लगभग सभी क्षेत्र प्रभावित हो रहे हैं।
  • यह वायरस अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है, जबकि इसके कारण चीनी अर्थव्यवस्था पहले से ही मुश्किल स्थिति में है।
  • इन दो अर्थव्यवस्थाओं, जिन्हें वैश्विक आर्थिक इंजन के रूप में जाना जाता है, संपूर्ण वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुस्ती तथा आगे जाकर मंदी का कारण बन सकता है।
  • निवेशकों के बाज़ारों से बाहर निकलने के कारण शेयर बाज़ार सूचकांक में लगातार गिरावट आई है। लोग बड़ी राशि को अपेक्षाकृत सुरक्षित क्षेत्र यथा- ‘सरकारी बाॅण्ड’ में लगा रहे हैं जिससे कीमतों में तेज़ी तथा उत्पादकता में कमी देखी गई है।
  • अमेरिकी बाज़ार में वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद सबसे खराब अनुभव हाल ही में कोरोना वायरस के कारण महसूस किया गया, ध्यातव्य है कि अमेरिकी बाज़ार में 12% से अधिक की गिरावट आई है।
  • यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि जो निवेशक ऐसे संकट के समय सामान्यत: स्वर्ण में निवेश करते हैं, इस संकट के समय उन्होंने इसका भी बहिष्कार कर दिया जिससे सोने की कीमतों में गिरावट देखी गई, तथा लोगों ने सरकारी गारंटी युक्त ‘ट्रेज़री बिल’ (Treasury Bills) में अधिक निवेश करना उचित समझा।
  • Apple, Nvidia, Adidas जैसी कंपनियाँ इससे अधिक प्रभावित हो सकती हैं क्योंकि ये चीन के आपूर्तिकर्त्ताओं पर निर्भर हैं, इन्हें भविष्य में बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है।

भारत की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव

  • भारत जब अर्थव्यवस्था को पुन: पटरी पर लाने की कोशिश कर रहा है, ऐसे समय में इस वायरस का केवल सतही प्रभाव नहीं पड़ेगा तथा ऐसे कठिन समय में समस्या का समाधान मात्र ‘एयर लिफ्टिंग’ से संभव नहीं है।
  • यह समस्या न केवल आपूर्ति शृंखला को प्रभावित करेगी, अपितु यह भारत के फार्मास्यूटिकल, इलेक्ट्रॉनिक, ऑटोमोबाइल जैसे उद्योगों को गंभीर रूप से प्रभावित करेगी।
  • निर्यात, जिसे अर्थव्यवस्था के विकास का इंजन माना जाता है, इसमें वैश्विक मंदी की स्थिति में और गिरावट देखी जा सकती है, साथ ही निवेश में भी गिरावट आ सकती है।
  • भारतीय कंपनियाँ चीन आधारित ‘वैश्विक आपूर्ति शृंखला’ में शामिल प्रमुख भागीदार नहीं हैं, अत: भारतीय कंपनियाँ इससे अधिक प्रभावित नहीं होंगी।
  • दूसरा, कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आ रही है, जो कि वृहद् अर्थव्यवस्था और उच्च मुद्रास्फीति के चलते अच्छी खबर है।
  • भारत सरकार को लगातार विकास की गति का अवलोकन करने की आवश्यकता है, साथ ही चीन पर निर्भर भारतीय उद्योगों को आवश्यक समर्थन एवं सहायता प्रदान करनी चाहिये।
  • कोरोना वायरस जैसी बीमारी की पहचान, प्रभाव, प्रसार एवं रोकथाम पर चर्चा अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों द्वारा की जानी चाहिये ताकि इस बीमारी पर नियंत्रण पाया जा सके।
  • वायरस जनित यह संकट किसी अन्य वित्तीय संकट से बिलकुल अलग है। अन्य वित्तीय संकटों का समाधान समय-परीक्षणित उपायों जैसे- दर में कटौती, बेल-आउट पैकेज (विशेष वित्तीय प्रोत्साहन) आदि से किया जा सकता है, परंतु वायरस जनित संकट का समाधान इन वित्तीय उपायों द्वारा किया जाना संभव नहीं है।

Conclusion :

ऑटोमोबाइल उद्योग पहले ही आर्थिक मंदी के कारण संकट में है और अब माल और सेवाओं की आपूर्ति बाधित होने के कारण उत्पादन में कमी आ रही है। होटल और एयरलाइंस जैसे विभिन्न व्यवसाय अपने कर्मचारियों का वेतन काट रहे हैं और छंटनी भी कर रहे हैं। भारत में काम करने वाली प्रमुख कंपनियों ने अस्थायी रूप से काम को निलंबित कर दिया है। चीन से आपूर्ति में रुकावट के कारण वैश्विक वित्तीय बाजार में उतार-चढ़ाव हो रहा है। यद्यपि दुनिया की अर्थव्यवस्था पर कोरोनोवायरस के सटीक प्रभाव को निर्धारित करना मुश्किल है, फिर भी यह स्पष्ट है कि यह प्रभाव लंबे समय तक रहेगा। विश्व बैंक और क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने 2021 के लिए भारत की वृद्धि को कम कर दिया है, हालांकि, वित्तीय वर्ष 2021-22 में भारत के लिए जीडीपी विकास दर का आकलन अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष  ने 1.9% बताया है जो जी -20 देशों में सबसे अधिक है।

भारत में COVID-19 का सामाजिक प्रभाव पर निबंध

Introduction :

कोरोनावायरस (COVID-19) महामारी एक वैश्विक समस्या बन चुकी है और इस बीमारी का मुकाबला करने के लिए भारत सरकार ने 24 मार्च, 2020 को देश में लॉकडाउन लागू किया। सरकार ने कोरोनोवायरस महामारी के खिलाफ लड़ाई में सफलता का दावा किया है, जिसमें कहा गया है कि यदि राष्ट्रव्यापी तालाबंदी नहीं की गई होती तो यहाँ COVID-19 मामलों की संख्या अधिक होती। COVID-19 महामारी के दौरान लॉकडाउन में हमारे खानपान से लेकर हमारी कार्यशैली बदल चुकी है जिसके कारण शारीरिक गतिविधियो में कमी आयी है जिसके कारण मोटापा, मधुमेह और हृदय रोगों के जोखिम को बढ़ा दिया है।

कोरोना वायरस की वजह से कारोबार ठप्प पड़ गए हैं, कई देशों में अंतरराष्ट्रीय यात्राएं रद्द कर दी गई हैं, होटल-रेस्त्रां तो बंद कर दिए गए हैं, कई कंपनियां ख़ासतौर पर, आईटी सेक्टर की कंपनियों ने लोगों को वर्क फ्रॉम होम यानी घर से काम करने की सुविधा दे रही हैं। दुनिया भर के क्षेत्रों में इस महामारी का प्रभाव दिखाई दे रहा है, लेकिन भारत में कमज़ोर वर्गों, महिलाओं और बच्चों पर इसका प्रभाव सबसे अधिक हुआ है। लॉकडाउन के परिणामस्वरूप, समाज के कमजोर वर्ग के बीच कुपोषण की संभावना बढ़ गयी है।

भारतीय खाद्य निगम (FCI) ने हाल ही में COVID-19 के खिलाफ अपनी लड़ाई में सरकार की पहल के रूप में प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्ना योजना (PMGKAY) के तहत 12.96 लाख मीट्रिक टन अनाज आवंटित किया। प्रवासी श्रमिकों का मुद्दा इस महामारी का सबसे प्रमुख मुद्दा रहा, जहाँ लाखों लोग बेरोजगार हो गए और बिना पैसे, भोजन और आश्रय के अपने अपने घरो तक पैदल जाने को मजबूर हुए हलाकि सरकार ने बाद में उनके वापस लौटने की व्यवस्था भी कराई।

शिक्षा के क्षेत्र में

  • अप्रैल माह के अंत में जब विश्व के अधिकांश देशों में लॉकडाउन लागू किया गया तो विद्यालयों को पूरी तरह से बंद कर दिया गया था, जिसके कारण विश्व के लगभग 90 प्रतिशत छात्रों की शिक्षा बाधित हुई थी और विश्व के लगभग 1.5 बिलियन से अधिक स्कूली छात्र प्रभावित हुए थे।
  • कोरोना वायरस के कारण शिक्षा में आई इस बाधा का सबसे अधिक प्रभाव गरीब छात्रों पर देखने को मिला है और अधिकांश छात्र ऑनलाइन शिक्षा के माध्यमों का उपयोग नहीं कर सकते हैं, इसके कारण कई छात्रों विशेषतः छात्राओं के वापस स्कूल न जाने की संभावना बढ़ गई है।
  • नवंबर 2020 तक 30 देशों के 572 मिलियन छात्र इस महामारी के कारण प्रभावित हुए हैं, जो कि दुनिया भर में नामांकित छात्रों का 33% है।

लैंगिक हिंसा में वृद्धि

  • लॉकडाउन और स्कूल बंद होने से बच्चों के विरुद्ध लैंगिक हिंसा की स्थिति भी काफी खराब हुई है। कई देशों ने घरेलू हिंसा और लैंगिक हिंसा के मामलों में वृद्धि दर्ज की गई है।
  • जहाँ एक ओर बच्चों के विरुद्ध अपराध के मामलों में वृद्धि हो रही है, वहीं दूसरी ओर अधिकांश देशों में बच्चों एवं महिलाओं के विरुद्ध होने वाली हिंसा की रोकथाम से संबंधित सेवाएँ भी बाधित हुई हैं।

आर्थिक प्रभाव

  • वैश्विक स्तर महामारी के कारण वर्ष 2020 में बहुआयामी गरीबी में रहने वाले बच्चों की संख्या में 15% तक बढ़ोतरी हुई है और इसमें अतिरिक्त 150 मिलियन बच्चे शामिल हो गए हैं।
  • बहुआयामी गरीबी के निर्धारण में लोगों द्वारा दैनिक जीवन में अनुभव किये जाने वाले सभी अभावों/कमी जैसे- खराब स्वास्थ्य, शिक्षा की कमी, निम्न जीवन स्तर, कार्य की खराब गुणवत्ता, हिंसा का खतरा आदि को समाहित किया जाता है। 
  • महामारी का दूसरा सामाजिक प्रभाव ‘नस्लभेदी प्रभाव’ का उत्पन्न होना है। जैसा कि हमें मालूम है इस बीमारी की शुरुआत चीन से हुई है इसलिए चीनी नागरिकों को आगामी कुछ वर्षो तक इस महामारी के चलते जाना-पहचाना जा सकता है।
  • भारत में तो नॉर्थ ईस्ट के भारतीयों पर पहले से ही चीनी, नेपाली, चिंकी-पिंकी, मोमोज़ जैसी नस्लभेदी टिप्पणियां होती रही हैं। अब इस क्रम में कोरोना का नाम भी जुड़ना तय है, जिसे एक सामाजिक समस्या के रूप में देखा जाना चाहिए। 

इस सम्बन्ध में उपाय

  • सभी देशों की सरकारों को डिजिटल डिवाइड को कम करके यह सुनिश्चित करने का प्रयास करना चाहिये कि सभी बच्चों को सीखने के समान अवसर प्राप्त हों और किसी भी छात्र के सीखने की क्षमता प्रभावित न हो।
  • सभी की पोषण और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच सुनिश्चित की जानी चाहिये और जिन देशों में टीकाकरण अभियान प्रभावित हुए हैं उन्हें फिर से शुरू किया जाना चाहिये।
  • बच्चों और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान दिया जाना चाहिये और बच्चों के साथ दुर्व्यवहार और लैंगिक हिंसा जैसे मुद्दों को संबोधित किया जाना चाहिये।

Conclusion :

सुरक्षित पेयजल और स्वच्छता आदि तक बच्चों की पहुँच को बढ़ाने का प्रयास किया जाए और पर्यावरणीय अवमूल्यन तथा जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों को संबोधित किया जाए। बाल गरीबी की दर में कमी करने का प्रयास किया जाए और बच्चों की स्थिति में समावेशी सुधार सुनिश्चित किया जाए। सरकार को समस्याओं के समाधान को खोजने का प्रयास करना चाहिए ताकि ऐसी समस्याएँ दोबारा पैदा न हो। इस वायरस से लड़ने के लिए सभी व्यक्तियों, सरकारों और स्वास्थ्य संगठनों को एकसाथ मिलकर योजना बनाकर सामूहिक प्रयास करने की आवश्यकता है।

पर्यावरण पर कोरोना वायरस का सकारात्मक प्रभाव पर निबंध

Introduction :

कोरोना वायरस दुनिया भर में महामारी बन चुका है और सभी देश इसका सामना कर रहे हैं। जिसके कारण सभी देशो के लोग अपने घरो के अंदर रहने को मजबूर है। कोरोना वायरस के कारण देश में व्यावसायिक गतिविधियां भी प्रभावित हुईं। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि कोरोनोवायरस ने दुनिया भर में बहुत सारे लोगों का जीवन ले चूका है। कोरोनोवायरस के प्रसार को रोकने के लिए, विभिन्न देशों की सरकारें इसके प्रसार को नियंत्रित करने के लिए कई कदम उठा रही हैं। जहां तक हमारे पर्यावरण का सवाल है, इसपर कई सकारात्मक प्रभाव देखने को मिल रहे है। अब धुएँ का उत्सर्जन कम हो गया है जिसके परिणामस्वरूप आसमान स्वच्छ हो गया है।

यही नहीं, सड़को पर वाहनों का उपयोग भी कम हुआ है, जिसके कारण  CO2 गैसों का उत्सर्जन भी काम हुआ है। और अन्य गैसे, जैसे नाइट्रोजन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन भी पर्यावरण में सीमित हो पाया है। यह इंगित करता है कि हवा अधिक शुद्ध हो गई है और हम शुद्ध हवा में सांस ले सकते हैं। कोरोनावायरस से निपटने के लिए, कंपनियों ने श्रमिकों को घर से काम करने के लिए कहा है। इससे सड़क पर वाहन कम हो गए हैं। इसके अलावा, प्लास्टिक की खपत भी कम हो गई है क्योंकि अब लोग डिस्पोजेबल ग्लास का प्रयोग चाय या कॉफी के लिए नहीं कर रहे है।

पर्यावरण को फायदा

  • भारत में कई राज्यों से उन नदियों के अचानक साफ हो जाने की ख़बरें आ रही हैं जिनके प्रदूषण को दूर करने के असफल प्रयास दशकों से चल रहे हैं. दिल्ली की जीवनदायिनी यमुना नदी के बारे में भी ऐसी ही ख़बरें आ रही हैं.
  • पिछले दिनों सोशल मीडिया पर कई तस्वीरें आईं जिन्हें डालने वालों ने दावा किया कि दिल्ली में जिस यमुना का पानी काला और झाग भरा हुआ करता था, उसी यमुना में आज कल साफ पानी बह रहा है. 
  • झील नगरी नैनीताल समेत भीमताल, नौकुचियाताल, सातताल सभी में झीलों का पानी न केवल पारदर्शी और निर्मल दिखाई दे रहा है, बल्कि इन झीलों की खूबसूरती भी बढ़ गई है.
  • पिछले कई साल से झील के जलस्तर में जो गिरावट दिखती थी, वह भी इस बार नहीं दिख रही. पर्यावरणीय तौर पर इस कारण हवा भी इतनी शुद्ध है कि शहरों से पहाड़ों की चोटियां साफ दिख रही हैं.
  • उत्तराखंड स्पेस एप्लिकेशन सेंटर के निदेशक के अनुसार हिमालय की धवल चोटियां साफ दिखने लगी हैं. लॉकडाउन के कारण वायुमंडल में बड़े पैमाने पर बदलाव देखने को मिला है. इससे पहले कभी उत्तर भारत के ऊपरी क्षेत्र में वायु प्रदूषण का इतना कम स्तर देखने को नहीं मिला.

लॉकडाउन के बाद 27 मार्च से कुछ इलाकों में रूक-रूक के बारिश हो रही है. इससे हवा में मौजूद एयरोसॉल नीचे आ गए. यह लिक्विड और सॉलिड से बने ऐसे सूक्ष्म कण हैं, जिनके कारण फेफड़ों और हार्ट को नुकसान होता है. एयरोसॉल की वजह से ही विजिबिलिटी घटती है. जिन शहरों की एयर क्वालिटी इंडेक्स यानी AQI ख़तरे के निशान से ऊपर होते थे. वहां आसमान गहरा नीला दिखने लगा है. न तो सड़कों पर वाहन चल रहे हैं और न ही आसमां में हवाई जहाज. बिजली उत्पादन और औद्योगिक इकाइयों जैसे अन्य क्षेत्रों में भी बड़ी गिरावट आई है. इससे वातावरण में डस्ट पार्टिकल न के बराबर हैं और कार्बन मोनोऑक्साइड का उत्सर्जन भी सामान्य से बहुत अधिक नीचे आ गया है. इस तरह की हवा मनुष्यों के लिए बेहद लाभदायक है. अगर देखा जाये तो झारखंड के भी शहरों में इस लॉकडाउन का प्रभाव दिखा रहा है.

  • झारखण्ड की राजधानी रांची के कुछ जगहों में मोर देखे जाने की भी सूचना है. रूक रूक के बारिश भी हो रही है. लोग एयर कंडीशनर और कूलर का भी इस्तेमाल नहीं के बराबर कर रहे हैं जो की इस गर्मी के मौसम में एक आश्चर्य घटना है.
  • ध्वनि प्रदूषण भी अभूतपूर्व ढंग से कम हो गया है. तापमान ज्य़ादा होने पे भी उतनी गर्मी नहीं लग रही है जितनी पिछले साल थी.
  • बता दें कि कई महीनों से झारखंड में वाहन प्रदूषण के खिलाफ़ जांच अभियान चलाया जा रहा था. जगह-जगह दोपहिये एवं चार पहिये वाहन, मिनी बस और टेंपो समेत विभिन्न कॉमर्शियल वाहनों के प्रदूषण स्तर को चेक किया जा रहा था और निर्धारित मात्रा से अधिक प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर कार्रवाई की जा रही थी.
  • इसके बाद भी न तो वाहनों द्वारा छोड़े जा रहे प्रदूषणकारी गैसों की मात्रा कम हो रही थी और न ही वायु प्रदूषण में कमी आ रही थी. लेकिन, कोरोना के भय से सड़क पर चलने वाले वाहनों की संख्य़ा में आयी भारी गिरावट आने के कारण पिछले दो महीनों से से इसमें काफी सुधार दिखता है.
  • वाहनों की आवाजाही न होने से सड़कों से अब धूल के गुबार नहीं उठ रहे हैं. झारखंड का एयर क्वालिटी इंडेक्स वायु प्रदूषण के कम हो जाने से 50-40 के बीच आ गया है जो पिछले साल 150 से 250 तक रहता था.
  • ये हवा मनुष्य के स्वस्थ लिए फायदेमंद है. वायु और धूल प्रदूषण के काफी कम हो जाने से आसमन में रात को सारे तारे दिखा रहे हैं जो पहले नहीं दीखते थे. 
  • ध्वनि प्रदूषण तो इतना कम है की आपकी आवाज दूर तक सुनाई दे रही है. चिड़ियों का चहचहाना सुबह से ही शुरू हो जा रहा है.कुछ लोगों ने तो यहाँ तक कहा की रात दो बजे भी चिड़ियों की आवाज़ सुनाई दे रही है ख़ासकर कोयल और बुलबुल की. कुछ ऐसी भी चिड़ियाँ नज़र आ रही हैं जो पहले कम दिखती थीं. 

Conclusion :

इस प्रतिस्पर्धात्मक युग में, जहाँ हम सभी व्यस्त जीवन जी रहे है, हमें हमारी गतिविधियों के कारण पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में भी सोचना चाहिए  हालाँकि, अब लॉकडाउन के कारण हम घर पर रहने को मजबूर हैं, हमारे पास अपनी गतिविधियों के बारे में सोचने और सुधार करने के लिए पर्याप्त समय मिल चूका है। इस तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता कि कोरोनोवायरस का मानव जाति पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा है। हालांकि, इसने पर्यावरण पर निश्चित रूप से  सकारात्मक प्रभाव डाले है।

कोविड 19 वैक्सीन पर निबंध

Introduction :

भारत सरकार ने एस्ट्रा-ज़ेनेका और भारत बायोटेक द्वारा विकसित कोविशिल्ड और कोवाक्सिन नाम के कोविड -19 टीकों को मंजूरी दे दी है। इसे देखते हुए हमारे पीएम मोदी जी ने 16 जनवरी, 2021 को कोविड -19 टीकाकरण अभियान की शुरुआत की, जो हर साल लाखों लोगों की जान बचा सकता है। यह पूरे देश में लागू होने वाला दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण कार्यक्रम है। इस कार्यक्रम के शुभारंभ के दौरान सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इसके लिए कुल 3006 टीकाकरण केंद्र बनाए गए हैं । हालाँकि भारत में सम्पूर्ण रूप से टीकाकरण करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन इसके लिए कम से कम 30 से 40% लोगों का टीकाकरण करने की आवस्यकता होगी ।

  • वैक्सीन हमारे शरीर को किसी बीमारी, वायरस या संक्रमण से लड़ने के लिए तैयार करती है. वैक्सीन में किसी जीव के कुछ कमज़ोर या निष्क्रिय अंश होते हैं जो बीमारी का कारण बनते हैं.
  • ये शरीर के ‘इम्यून सिस्टम’ यानी प्रतिरक्षा प्रणाली को संक्रमण की पहचान करने के लिए प्रेरित करते हैं और उनके ख़िलाफ़ शरीर में एंटीबॉडी बनाते हैं जो बाहरी हमले से लड़ने में हमारे शरीर की मदद करती हैं.
  • वैक्सीन लगने का नकारात्मक असर कम ही लोगों पर होता है, लेकिन कुछ लोगों को इसके साइड इफ़ेक्ट्स का सामना करना पड़ सकता है.
  • हल्का बुख़ार या ख़ारिश होना, इससे सामान्य दुष्प्रभाव हैं. वैक्सीन लगने के कुछ वक़्त बाद ही हम उस बीमारी से लड़ने की इम्यूनिटी विकसित कर लेते हैं.
  • अमेरिका के सेंटर ऑफ़ डिज़ीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) का कहना है कि वैक्सीन बहुत ज़्यादा शक्तिशाली होती हैं क्योंकि ये अधिकांश दवाओं के विपरीत, किसी बीमारी का इलाज नहीं करतीं, बल्कि उन्हें होने से रोकती हैं.
  • भारत में दो टीके तैयार किए गए हैं. एक का नाम है कोविशील्ड जिसे एस्ट्राज़ेनेका और ऑक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने तैयार किया और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया ने इसका उत्पादन किया और दूसरा टीका है भारतीय कंपनी भारत बायोटेक द्वारा बनाया गया कोवैक्सीन.

रूस ने अपनी ही कोरोना वैक्सीन तैयार की है जिसका नाम है ‘स्पूतनिक-V’ और इसे वायरस के वर्ज़न में थोड़ बदलाव लाकर तैयार किया गया. इस वैक्सीन को भारत में इस्तेमाल की अनुमति मिल चुकी है. मॉडर्ना वैक्सीन को भी भारत में इस्तेमाल की मंज़ूरी मिल चुकी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि संक्रमण को रोकने के लिए कम से कम 65-70 प्रतिशत लोगों को वैक्सीन लगानी होगी, जिसका मतलब है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को टीका लगवाने के लिए प्रेरित करना होगा. कोरोना वायरस महामारी ने दुनिया भर में न सिर्फ करोड़ों लोगों की सेहत को प्रभाव किया है बल्कि समाज के सभी वर्गों में डिप्रेशन, तनाव का कारण भी बनी है. कोविड वैक्सीन लगवाने से एक स्पष्ट और आश्चर्यजनक फायदा मिलता है. ये आपको गंभीर रूप से बीमारी या वायरस की चपेट में आने पर मौत से बचाती है ये अपने आप में खुद हैरतअंगज फायदा है.

  • शोधकर्ताओं का कहना है कि टीकाकरण करानेवाले लोगों को मानसिक स्वास्थ्य मेंमहत्वपूर्ण सुधार का भी अनुभव हो सकता है. यूनिवर्सिटी ऑफ साउदर्न यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने कहा कि वैक्सीन संभावित तौर पर मानसिक स्वास्थ्य को फायदा पहुंचा सकती है.
  • प्लोस पत्रिका में प्रकाशित रिसर्च का मकसद ये मूल्यांकन करना था कि वैक्सीन का पहला डोज लगवाने से मानसिक परेशानी में कम समय के लिए क्या प्रभाव पड़ते हैं.
  • शोधकर्ताओं ने 8 हजार व्यस्को के मानसिक स्वास्थ्य का विश्लेषण रिसर्च के तौर पर 1 मार्च 2020 और 31 मार्च 2021 के बीच किया. रिसर्च में टीकाकरण से संक्षिप्त समय के लिए सीधे प्रभाव का खुलासा हुआ.
  • महत्वपूर्ण बात ये है कि रिसर्च ने टीकाकरण कराने के सरकारात्मक प्रभाव में इजाफा किया. शोधकर्ताओं ने बताया कि हम प्रमाणित करते हैं कि कैसे दिमागी सेहत की परेशानी टीकाकरण करानेवाले और वैक्सीन नहीं लगवानेवालों के बीच अलग हो गई.
  • आर्थिक अनिश्चितता और कोविड-19 से जुड़ी सेहत के जोखिम के बीच तुलना करने पर हमें दिमागी सेहत पर टीकाकरण के कम समय के प्रभाव मालूम हुए. 
  • कोविड-19 वैक्सीन से स्वास्थ्य के जोखिम को कम करने, आर्थिक और सामाजिक नतीजे सुधारने की उम्मीद की जाती है, जिसके बाद दिमागी सेहत के लिए संभावित लाभ होंगे.  डॉक्टर एचके महाजन ने कहा, “कोरोना महामारी ने रोजगार, आय और सेहत समेत लोगों की जिंदगी के कई पहलुओं को प्रभावित किया है.
  • इस वायरल बीमारी के मानसिक पहलू मनोवैज्ञानिक तनाव, चिंता, डिप्रेशन, सामाजिक अलगाव और खुदकुशी के विचार तक सीमित नहीं हैं.” उन्होंने आगे बताया, “बड़े पैमाने पर टीकाकरण ने हर्ड इम्यूनिटी बढ़ाने, लोगों के बीच चिंता कम करने में बड़ा योगदान दिया.
  • उसने आजीविका गंवाने वालों की दोबारा रोजगार के पहलू को भी बढ़ाया. टीकाकरण के गंभीर संक्रमण से सुरक्षा पर जागरुकता फैलने से लोग कोरोना से पहले की स्थिति में धीरे-धीरे लौट रहे हैं. इस तरह ये दिमागी सेहत के मुद्दे जैसे चिंता, डिप्रेशन दूर करने में मदद कर रहा है.”

Conclusion :

वैक्सीन को चरणबद्ध तरीके से लोगो को उपलब्ध कराया जाएगा। इसके पहले चरण में, सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में डॉक्टर, नर्स और अन्य चिकित्सा कर्मचारियों एवं स्वास्थ्य कर्मियों का टीकारण किया जाएगा। क्योंकि वे उन लोगों के निकट संपर्क में होते हैं जो कोविड -19 से संक्रमित हैं। फिर इसे पुलिस, सशस्त्र बलों, नगरपालिका कर्मचारियों और अन्य विभागीय कर्मचारियों को प्रदान किया जाएगा। तीसरे चरण में, 50 वर्ष से अधिक आयु के लोग और वे लोग जिन्हें मधुमेह, उच्च रक्तचाप है या जिन्होंने अंग प्रत्यारोपण कराया है, ऐसे लोगो का टीकाकरण किया जाएगा।

उसके बाद, स्वस्थ वयस्कों, किशोरों और बच्चों का टीकाकरण किया जाएगा। केंद्र सरकार स्वास्थ्यकर्मियों और अग्रिम कर्मियों पर टीकाकरण का खर्च खुद से वहन करेगी । टीकाकरण की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए, सरकार ने CoWIN नामक एक एप्लिकेशन भी विकसित की है, जो कोविड -19 वैक्सीन लाभार्थियों के लिए  वैक्सीन स्टॉक, भंडारण और व्यक्तिगत ट्रैकिंग की सम्पूर्ण जानकारी प्रदान करने में मददगार साबित हो रही है। कोविड -19 के लिए टीकाकरण भारत में स्वैच्छिक है। यह लोगों को इस बीमारी से बचाने का एक सुरक्षित और प्रभावी तरीका है। टीके हमारे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली के साथ काम करके बीमारियों के जोखिम को कम करते हैं।

कोविड 19 वैक्सीन पर निबंध

Introduction :

भारत सरकार ने एस्ट्रा-ज़ेनेका और भारत बायोटेक द्वारा विकसित कोविशिल्ड और कोवाक्सिन नाम के कोविड -19 टीकों को मंजूरी दे दी है। इसे देखते हुए हमारे पीएम मोदी जी ने 16 जनवरी, 2021 को कोविड -19 टीकाकरण अभियान की शुरुआत की, जो हर साल लाखों लोगों की जान बचा सकता है। यह पूरे देश में लागू होने वाला दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण कार्यक्रम है। इस कार्यक्रम के शुभारंभ के दौरान सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इसके लिए कुल 3006 टीकाकरण केंद्र बनाए गए हैं । हालाँकि भारत में सम्पूर्ण रूप से टीकाकरण करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन इसके लिए कम से कम 30 से 40% लोगों का टीकाकरण करने की आवस्यकता होगी ।

  • वैक्सीन हमारे शरीर को किसी बीमारी, वायरस या संक्रमण से लड़ने के लिए तैयार करती है. वैक्सीन में किसी जीव के कुछ कमज़ोर या निष्क्रिय अंश होते हैं जो बीमारी का कारण बनते हैं. 
  • ये शरीर के ‘इम्यून सिस्टम’ यानी प्रतिरक्षा प्रणाली को संक्रमण की पहचान करने के लिए प्रेरित करते हैं और उनके ख़िलाफ़ शरीर में एंटीबॉडी बनाते हैं जो बाहरी हमले से लड़ने में हमारे शरीर की मदद करती हैं.
  • वैक्सीन लगने का नकारात्मक असर कम ही लोगों पर होता है, लेकिन कुछ लोगों को इसके साइड इफ़ेक्ट्स का सामना करना पड़ सकता है. हल्का बुख़ार या ख़ारिश होना, इससे सामान्य दुष्प्रभाव हैं. वैक्सीन लगने के कुछ वक़्त बाद ही हम उस बीमारी से लड़ने की इम्यूनिटी विकसित कर लेते हैं.
  • अमेरिका के सेंटर ऑफ़ डिज़ीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) का कहना है कि वैक्सीन बहुत ज़्यादा शक्तिशाली होती हैं क्योंकि ये अधिकांश दवाओं के विपरीत, किसी बीमारी का इलाज नहीं करतीं, बल्कि उन्हें होने से रोकती हैं.
  • भारत में दो टीके तैयार किए गए हैं. एक का नाम है कोविशील्ड जिसे एस्ट्राज़ेनेका और ऑक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने तैयार किया और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया ने इसका उत्पादन किया और दूसरा टीका है भारतीय कंपनी भारत बायोटेक द्वारा बनाया गया कोवैक्सीन.
  • रूस ने अपनी ही कोरोना वैक्सीन तैयार की है जिसका नाम है ‘स्पूतनिक-V’ और इसे वायरस के वर्ज़न में थोड़ बदलाव लाकर तैयार किया गया. इस वैक्सीन को भारत में इस्तेमाल की अनुमति मिल चुकी है. 
  • मॉडर्ना वैक्सीन को भी भारत में इस्तेमाल की मंज़ूरी मिल चुकी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि संक्रमण को रोकने के लिए कम से कम 65-70 प्रतिशत लोगों को वैक्सीन लगानी होगी, जिसका मतलब है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को टीका लगवाने के लिए प्रेरित करना होगा.

कोरोना वायरस महामारी ने दुनिया भर में न सिर्फ करोड़ों लोगों की सेहत को प्रभाव किया है बल्कि समाज के सभी वर्गों में डिप्रेशन, तनाव का कारण भी बनी है. कोविड वैक्सीन लगवाने से एक स्पष्ट और आश्चर्यजनक फायदा मिलता है. ये आपको गंभीर रूप से बीमारी या वायरस की चपेट में आने पर मौत से बचाती है ये अपने आप में खुद हैरतअंगज फायदा है. शोधकर्ताओं का कहना है कि टीकाकरण करानेवाले लोगों को मानसिक स्वास्थ्य मेंमहत्वपूर्ण सुधार का भी अनुभव हो सकता है. यूनिवर्सिटी ऑफ साउदर्न यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने कहा कि वैक्सीन संभावित तौर पर मानसिक स्वास्थ्य को फायदा पहुंचा सकती है.

  • प्लोस पत्रिका में प्रकाशित रिसर्च का मकसद ये मूल्यांकन करना था कि वैक्सीन का पहला डोज लगवाने से मानसिक परेशानी में कम समय के लिए क्या प्रभाव पड़ते हैं. 
  • शोधकर्ताओं ने 8 हजार व्यस्को के मानसिक स्वास्थ्य का विश्लेषण रिसर्च के तौर पर 1 मार्च 2020 और 31 मार्च 2021 के बीच किया. रिसर्च में टीकाकरण से संक्षिप्त समय के लिए सीधे प्रभाव का खुलासा हुआ.
  • महत्वपूर्ण बात ये है कि रिसर्च ने टीकाकरण कराने के सरकारात्मक प्रभाव में इजाफा किया. शोधकर्ताओं ने बताया कि हम प्रमाणित करते हैं कि कैसे दिमागी सेहत की परेशानी टीकाकरण करानेवाले और वैक्सीन नहीं लगवानेवालों के बीच अलग हो गई. 
  • आर्थिक अनिश्चितता और कोविड-19 से जुड़ी सेहत के जोखिम के बीच तुलना करने पर हमें दिमागी सेहत पर टीकाकरण के कम समय के प्रभाव मालूम हुए. 
  • कोविड-19 वैक्सीन से स्वास्थ्य के जोखिम को कम करने, आर्थिक और सामाजिक नतीजे सुधारने की उम्मीद की जाती है, जिसके बाद दिमागी सेहत के लिए संभावित लाभ होंगे.  डॉक्टर एचके महाजन ने कहा, “कोरोना महामारी ने रोजगार, आय और सेहत समेत लोगों की जिंदगी के कई पहलुओं को प्रभावित किया है.
  • इस वायरल बीमारी के मानसिक पहलू मनोवैज्ञानिक तनाव, चिंता, डिप्रेशन, सामाजिक अलगाव और खुदकुशी के विचार तक सीमित नहीं हैं.” उन्होंने आगे बताया, “बड़े पैमाने पर टीकाकरण ने हर्ड इम्यूनिटी बढ़ाने, लोगों के बीच चिंता कम करने में बड़ा योगदान दिया.
  • उसने आजीविका गंवाने वालों की दोबारा रोजगार के पहलू को भी बढ़ाया. टीकाकरण के गंभीर संक्रमण से सुरक्षा पर जागरुकता फैलने से लोग कोरोना से पहले की स्थिति में धीरे-धीरे लौट रहे हैं. इस तरह ये दिमागी सेहत के मुद्दे जैसे चिंता, डिप्रेशन दूर करने में मदद कर रहा है.”

Conclusion :

वैक्सीन को चरणबद्ध तरीके से लोगो को उपलब्ध कराया जाएगा। इसके पहले चरण में, सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में डॉक्टर, नर्स और अन्य चिकित्सा कर्मचारियों एवं स्वास्थ्य कर्मियों का टीकारण किया जाएगा। क्योंकि वे उन लोगों के निकट संपर्क में होते हैं जो कोविड -19 से संक्रमित हैं। फिर इसे पुलिस, सशस्त्र बलों, नगरपालिका कर्मचारियों और अन्य विभागीय कर्मचारियों को प्रदान किया जाएगा। तीसरे चरण में, 50 वर्ष से अधिक आयु के लोग और वे लोग जिन्हें मधुमेह, उच्च रक्तचाप है या जिन्होंने अंग प्रत्यारोपण कराया है, ऐसे लोगो का टीकाकरण किया जाएगा। 

उसके बाद, स्वस्थ वयस्कों, किशोरों और बच्चों का टीकाकरण किया जाएगा। केंद्र सरकार स्वास्थ्यकर्मियों और अग्रिम कर्मियों पर टीकाकरण का खर्च खुद से वहन करेगी । टीकाकरण की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए, सरकार ने CoWIN नामक एक एप्लिकेशन भी विकसित की है, जो कोविड -19 वैक्सीन लाभार्थियों के लिए  वैक्सीन स्टॉक, भंडारण और व्यक्तिगत ट्रैकिंग की सम्पूर्ण जानकारी प्रदान करने में मददगार साबित हो रही है। कोविड -19 के लिए टीकाकरण भारत में स्वैच्छिक है। यह लोगों को इस बीमारी से बचाने का एक सुरक्षित और प्रभावी तरीका है। टीके हमारे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली के साथ काम करके बीमारियों के जोखिम को कम करते हैं।

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Essays

Essay on Garib Kalyan Rojgar Abhiyan in hindi

गरीब कल्याण रोजगार अभियान पर निबंध (Essay on Garib Kalyan Rojgar Abhiyan in  hindi)

Introduction :

हमारे प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने गरीब कल्याण रोज़गार अभियान की शुरुआत की, जो प्रवासी मजदूरों के लिए एक रोजगार योजना है, जिससे लॉकडाउन के दौरान शहरों से गांवों में लौटे मजदूरों की मदत होगी। इस अभियान को पांच राज्यों मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, झारखंड और ओडिशा के मुख्यमंत्रियों की मौजूदगी में बिहार के तेलिहार गाँव से 20 जून, 2020 को वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से शुरू किया गया। इस योजना के तहत, देश के ग्रामीण हिस्सों में ग्रामीण नागरिकों, विशेषकर प्रवासी श्रमिकों के लिए आजीविका सहायता प्रदान करके देश के ग्रामीण हिस्सों में होने वाले आर्थिक प्रभाव को कम करना ही इस अभियान का मुख्य उद्देश्य है। 

केंद्र सरकार ने गरीब कल्याण रोज़गार अभियान के तहत लगभग 25 योजनाओं को एक साथ देश भर के 116 जिलों में लागू किया है तथा इस योजना के लिए 125 दिनों का लक्ष्य रखा गया है। पैकेजिंग और स्थानीय उत्पाद बनाने के लिए गांवों, कस्बों और छोटे शहरों के पास उद्योग समूह बनाए जाएंगे। फसलों को स्थानीय स्तर पर स्टोर करने के लिए 1 लाख करोड़ की लागत से कोल्ड स्टोरेज सुविधाएं विकसित की जाएंगी।

  • इस अभियान की शुरुआत प्रधानमंत्री द्वारा वीडियो-कॉन्फ्रेंस के माध्यम से बिहार के खगड़िया ज़िले के ग्राम तेलिहार से की।
  • ‘गरीब कल्याण रोज़गार अभियान’ के अंतर्गत सरकार द्वारा लगभग 50 हज़ार करोड़ रुपए का निवेश किया किया गया है।
  • यह 125 दिनों का अभियान होगा, जिसे मिशन मोड रूप में संचालित किया किया गया।
  • इस अभियान में छ: राज्यों बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड तथा ओडिशा को शामिल किया गया है।
  • छ: ज़िलों के 25,000 से अधिक प्रवासी श्रमिकों के साथ कुल 116 ज़िलों को इस अभियान के लिये चुना गया है, जिसमें 27 आकांक्षी ज़िले (aspirational districts) भी शामिल हैं।
  • इस कार्यक्रम में शामिल छ: राज्यों के 116 ज़िलों के गाँव कॉमन सर्विस सेंटर (Common Service Centres) तथा ‘कृषि विज्ञान केंद्रों’ (Krishi Vigyan Kendras) के माध्यम से शामिल होंगे, जो कोरोना के कारण लागू शारीरिक दूरी के मानदंडों को भी ध्यान में रखा गया।
  • इस अभियान में 12 विभिन्न मंत्रालयों को समनवित किया जाएगा, जिसमें पंचायती राज, ग्रामीण विकास, सड़क परिवहन और राजमार्ग, खान, पेयजल और स्वच्छता, पर्यावरण, रेलवे, नवीकरणीय ऊर्जा, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस, सीमा सड़कें, दूरसंचार तथा कृषि मंत्रालय शामिल हैं।
  • इस अभियान को ऐसे समय में शुरू किया जा रहा है जब COVID-19 के प्रकोप के कारण लाखों प्रवासी मज़दूर गाँवों की तरफ लौट रहे हैं जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार की समस्या उत्पन्न हो रही है।
  • मनरेगा के तहत काम करने वाले परिवारों की संख्या भी मई 2020 में एक स्तर पर पहुँच गई है।
  • यह अभियान ग्रामीण क्षेत्रों में ही प्रवासी श्रमिकों को रोज़गार प्रदान करने के साथ-साथ गाँवों के टिकाऊ बुनियादी ढाँचे का निर्माण करने में सहायक है।
  • यह अभियान प्रवासी श्रमिकों तथा ग्रामीण नागरिकों के सशक्तीकरण तथा उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करेगा अर्थात् गाँवों में ही आजीविका के अवसरों को इस अभियान के माध्यम से विकसित किया है।
  • PMGKRA में 50000 करोड़ की लागत लगी है जिसकी उद्घोषणा भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सहाय पैकेज के दौरान की थी। इस अभियान के लिए बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड और ओडिशा के 25,000 से अधिक अपने गाँव पलायन कर गए प्रवासी श्रमिकों के साथ कुल 116 जिलों को चुना गया है।

इस अभियान के द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में आधुनिक सुविधाएं भी प्रदान की जाएंगी है। फाइबर केबल बिछाने और इंटरनेट के प्रावधान को भी अभियान का हिस्सा बनाया गया है। यह अभियान ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे का निर्माण करते हुए प्रवासी श्रमिकों के परिवारों को तत्काल राहत प्रदान करेगा। प्रवासी श्रमिकों की वर्तमान स्थिति के अनुसार गरीब कल्याण योजना जैसी योजना की बहुत आवश्यकता है। हालांकि, कार्यक्रम की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि क्या इसका लाभ प्रवासी श्रमिकों तक समय पर पहुंच पायेगा या नहीं। सरकार को सभी प्रवासी मजदूरों का एक डेटाबेस भी बनाना चाहिए जो भविष्य में उनके लिए एक सामाजिक सुरक्षा प्रणाली बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सके।

प्रधानमंत्री किसान मानधन योजना पर निबंध (pm kisan mandhan yojana essay in hindi)

Introduction : 

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रधान मंत्री किसान मानधन योजना का शुभारंभ 12 सितंबर 2019 को झारखंड के रांची में किया गया। इस योजना के तहत, छोटे और सीमांत किसानों को 60 वर्ष की आयु पूर्ण करने पर 3,000 रुपये की न्यूनतम निश्चित पेंशन प्रदान की जाएगी। पीएम किसान मानधन योजना 18 से 40 वर्ष की आयु के किसानों के लिए है। भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) द्वारा प्रबंधित पेंशन फंड के तहत पंजीकरण करके लाभार्थी PM-KMY योजना के सदस्य बन सकते है। इस प्रकार सदस्यों को केंद्र सरकार द्वारा समान योगदान के प्रावधान के साथ उनकी आयु के आधार पर पेंशन फंड में 55 से 200 रुपये के बीच मासिक योगदान करने की आवश्यकता होती है। 

यह योजना सभी छोटे और सीमांत किसानों के लिए लागू है। इस योजना के तहत उनके और केंद्र सरकार द्वारा किए जाने वाले योगदान का अनुपात 1: 1 है। पीएम किसान मानधन योजना के तहत सरकारी योगदान किसान द्वारा किए गए मासिक योगदान के बराबर है। छोटे और सीमांत किसान जो पहले से ही अन्य योजनाओं जैसे राष्ट्रीय पेंशन योजना (एनपीएस), कर्मचारी राज्य बीमा निगम योजना, कर्मचारी कोष संगठन योजना आदि के तहत पंजीकृत हैं, पीएम किसान मानधन योजना के लिए पात्र नहीं होंगे।

  • बेशक, कृषि के आधुनिकीकरण से किसानों के जीवन स्तर में बदलाव आया है, लेकिन लघु और सीमांत किसानों की बदहाली जस की तस कायम है।
  • साल दर साल होने वाली उनकी आत्महत्या की खबरें भी किसी से छिपी हुई नहीं हैं क्योंकि अधिक लागत और कम आय भारतीय कृषि से सम्बद्ध किसानों के लिए अभिशाप साबित हो रही है। जिसके कारण खेती-किसानी से लोगों की अभिरुचि घट रही है।
  • आलम यह है कि किसान व उनके बच्चे रोजगार की तलाश में शहरों की ओर भाग रहे हैं, जिससे न केवल हरित क्रांति, श्वेत क्रांति और नीली क्रांति आदि के संजोए सपने तार तार हो रहे हैं.
  • यही वजह है कि कृषि को बढ़ावा देने के लिए और किसानों की आय दुगुना करने के लिए नरेंद्र मोदी सरकार ने अपनी दूसरी पारी की पहली कैबिनेट की बैठक में ही किसानों के लिए एक नई और आकर्षक पेंशन योजना की शुरुआत कर दी और उससे आम लोगों व गरीबों को भी जोड़ दिया है।

प्रधानमंत्री किसान मानधन योजना विशेषताएं –

  • केंद्र सरकार किसानों के हित में कई योजनाएं चला रही हैं. इसी में एक पीएम किसान मानधन योजना है, जिसके तहत 60 साल की उम्र के बाद पेंशन का प्रावधान है.
  • इस योजना में 18 साल से 40 साल तक की उम्र का कोई भी किसान भाग ले सकता है, जिसे उम्र के हिसाब से मंथली आंशदान करने पर 60 की उम्र के बाद 3000 रुपये मंथली या 36000 रुपये सालाना पेंशन मिलेगी. इसके लिए अंशदान 55 रुपये से 200 रुपये तक मंथली है. 
  • पीएम किसान मानधन में जितना योगदान किसान का होगा, उसी के बराबर योगदान सरकार भी पीएम किसान अकाउंट में करेगी. यानी अगर आपका योगदान 55 रुपये है तो सरकार भी 55 रुपये का योगदान करेगी. इस पेंशन कोष का प्रबंधन भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) कर रहा है.
  • इस योजना के तहत कम से कम 20 साल और अधिकतम 40 साल तक 55 रुपये से 200 रुपये तक मासिक अंशदान करना होगा, जो उनकी उम्र पर निर्भर है.
  • अगर 18 साल की उम्र में जुड़ते हैं तो मासिक अंशदान 55 रुपये या सालाना 660 रुपये होगा. वहीं अगर 40 की उम्र में जुड़ते हैं तो 200 रुपये महीना या 2400 रुपये सालाना योगदान करना होगा.
  • अगर कोई किसान बीच में स्कीम छोड़ना चाहता है तो उसका पैसा नहीं डूबेगा. उसके स्कीम छोड़ने तक जो पैसे जमा किए होंगे उस पर बैंकों के सेविंग अकाउंट के बराबर का ब्याज मिलेगा. अगर पॉलिसी होल्डर किसान की मौत हो गई, तो उसकी पत्नी को 50 फीसदी रकम मिलती रहेगी.
  • नेशनल पेंशन स्कीम, कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC) स्कीम, कर्मचारी भविष्य निधि स्कीम (EPFO) जैसी किसी अन्य सामाजिक सुरक्षा स्कीम के दायरे में शामिल लघु और सीमांत किसानो को इस योजना का लाभ नहीं प्राप्त होगा.
  • अथवा वे किसान जिन्होंने श्रम एवं रोजगार मंत्रालय दवारा संचालित प्रधानमंत्री श्रम योगी मान धन योजना के लिए विकल्प चुना है. वे किसान जिन्होंने श्रम और रोजगार मंत्रालय दवारा संचालित प्रधानमंत्री लघु व्यापारी मान-धन योजना के लिए विकल्प चुना है वे भी इस योजना से वंचित रहेंगे.

Conclusion :

लाभार्थी के साथ, स्पाउस भी इस योजना के लिए पात्र हैं और निधि में अलग-अलग योगदान देकर रु 3000 की अलग से पेंशन प्राप्त कर सकते हैं। यदि स्पाउस नहीं है, तो ब्याज के साथ कुल योगदान नामांकित व्यक्ति को भुगतान किया जाएगा। यदि किसान की सेवानिवृत्ति की तारीख के मृत्यु हो जाती है, तो स्पाउस को परिवार पेंशन के रूप में पेंशन का 50% भाग प्राप्त होगा। यह उम्मीद की जाती है कि कम से कम 10 करोड़ किसान अगले पांच वर्षों के भीतर इस योजना का लाभ प्राप्त करेंगे, जो इसे दुनिया की सबसे बड़ी पेंशन योजनाओं में से एक बना देगा।

गरीब कल्याण रोजगार अभियान पर निबंध

Introduction : 

हमारे प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने गरीब कल्याण रोज़गार अभियान की शुरुआत की, जो प्रवासी मजदूरों के लिए एक रोजगार योजना है, जिससे लॉकडाउन के दौरान शहरों से गांवों में लौटे मजदूरों की मदत होगी। इस अभियान को पांच राज्यों मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, झारखंड और ओडिशा के मुख्यमंत्रियों की मौजूदगी में बिहार के तेलिहार गाँव से 20 जून, 2020 को वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से शुरू किया गया। इस योजना के तहत, देश के ग्रामीण हिस्सों में ग्रामीण नागरिकों, विशेषकर प्रवासी श्रमिकों के लिए आजीविका सहायता प्रदान करके देश के ग्रामीण हिस्सों में होने वाले आर्थिक प्रभाव को कम करना ही इस अभियान का मुख्य उद्देश्य है। 

केंद्र सरकार ने गरीब कल्याण रोज़गार अभियान के तहत लगभग 25 योजनाओं को एक साथ देश भर के 116 जिलों में लागू किया है तथा इस योजना के लिए 125 दिनों का लक्ष्य रखा गया है। पैकेजिंग और स्थानीय उत्पाद बनाने के लिए गांवों, कस्बों और छोटे शहरों के पास उद्योग समूह बनाए जाएंगे। फसलों को स्थानीय स्तर पर स्टोर करने के लिए 1 लाख करोड़ की लागत से कोल्ड स्टोरेज सुविधाएं विकसित की जाएंगी।

  • इस अभियान की शुरुआत प्रधानमंत्री द्वारा वीडियो-कॉन्फ्रेंस के माध्यम से बिहार के खगड़िया ज़िले के ग्राम तेलिहार से की।
  • ‘गरीब कल्याण रोज़गार अभियान’ के अंतर्गत सरकार द्वारा लगभग 50 हज़ार करोड़ रुपए का निवेश किया किया गया है।
  • यह 125 दिनों का अभियान होगा, जिसे मिशन मोड रूप में संचालित किया किया गया।
  • इस अभियान में छ: राज्यों बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड तथा ओडिशा को शामिल किया गया है।
  • छ: ज़िलों के 25,000 से अधिक प्रवासी श्रमिकों के साथ कुल 116 ज़िलों को इस अभियान के लिये चुना गया है, जिसमें 27 आकांक्षी ज़िले (aspirational districts) भी शामिल हैं।
  • इस कार्यक्रम में शामिल छ: राज्यों के 116 ज़िलों के गाँव कॉमन सर्विस सेंटर (Common Service Centres) तथा ‘कृषि विज्ञान केंद्रों’ (Krishi Vigyan Kendras) के माध्यम से शामिल होंगे, जो कोरोना के कारण लागू शारीरिक दूरी के मानदंडों को भी ध्यान में रखा गया।
  • इस अभियान में 12 विभिन्न मंत्रालयों को समनवित किया जाएगा, जिसमें पंचायती राज, ग्रामीण विकास, सड़क परिवहन और राजमार्ग, खान, पेयजल और स्वच्छता, पर्यावरण, रेलवे, नवीकरणीय ऊर्जा, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस, सीमा सड़कें, दूरसंचार तथा कृषि मंत्रालय शामिल हैं।
  • इस अभियान को ऐसे समय में शुरू किया जा रहा है जब COVID-19 के प्रकोप के कारण लाखों प्रवासी मज़दूर गाँवों की तरफ लौट रहे हैं जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार की समस्या उत्पन्न हो रही है।
  • मनरेगा के तहत काम करने वाले परिवारों की संख्या भी मई 2020 में एक स्तर पर पहुँच गई है।
  • यह अभियान ग्रामीण क्षेत्रों में ही प्रवासी श्रमिकों को रोज़गार प्रदान करने के साथ-साथ गाँवों के टिकाऊ बुनियादी ढाँचे का निर्माण करने में सहायक है।
  • यह अभियान प्रवासी श्रमिकों तथा ग्रामीण नागरिकों के सशक्तीकरण तथा उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करेगा अर्थात् गाँवों में ही आजीविका के अवसरों को इस अभियान के माध्यम से विकसित किया है।
  • PMGKRA में 50000 करोड़ की लागत लगी है जिसकी उद्घोषणा भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सहाय पैकेज के दौरान की थी। इस अभियान के लिए बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड और ओडिशा के 25,000 से अधिक अपने गाँव पलायन कर गए प्रवासी श्रमिकों के साथ कुल 116 जिलों को चुना गया है।

Conclusion :

इस अभियान के द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में आधुनिक सुविधाएं भी प्रदान की जाएंगी है। फाइबर केबल बिछाने और इंटरनेट के प्रावधान को भी अभियान का हिस्सा बनाया गया है। यह अभियान ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे का निर्माण करते हुए प्रवासी श्रमिकों के परिवारों को तत्काल राहत प्रदान करेगा। प्रवासी श्रमिकों की वर्तमान स्थिति के अनुसार गरीब कल्याण योजना जैसी योजना की बहुत आवश्यकता है। हालांकि, कार्यक्रम की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि क्या इसका लाभ प्रवासी श्रमिकों तक समय पर पहुंच पायेगा या नहीं। सरकार को सभी प्रवासी मजदूरों का एक डेटाबेस भी बनाना चाहिए जो भविष्य में उनके लिए एक सामाजिक सुरक्षा प्रणाली बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सके।

पीएम स्वनिधि योजना पर निबंध

Introduction : 

हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के द्वारा 1 जून 2020 को प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना को शुरू करने का फैसला लिया गया | इस योजना के अंतर्गत  देश के रेहड़ी और सड़क विक्रेताओं को अपना खुद का काम नए सिरे से शुरू करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा 10000 रूपये तक का लोन मुहैया कराया जायेगा | इस स्वनिधि योजना को प्रधानमंत्री स्ट्रीट वेंडर्स आत्म निर्भर निधि के नाम से भी जाना जाता है | इस लोन को समय पर चुकाने वाले स्ट्रीट वेंडर्स को 7 फीसद का वार्षिक ब्याज सब्सिडी के तौर पर उनके अकाउंट में सरकार की ओर से ट्रांसफर किया जाएगा। देश के जो इच्छुक लाभार्थी इस योजना का लाभ उठाना चाहते है तो उन्हें इस योजना के तहत आवेदन करना होगा |  

स्ट्रीट वेंडर आत्मनिर्भर निधि के अंतर्गत विभिन्न क्षेत्रों में वेंडर, हॉकर, ठेले वाले, रेहड़ी वाले, ठेली फलवाले आदि सहित 50 लाख से अधिक लोगों को योजना से लाभ प्रदान किया जायेगा | स्ट्रीट वेंडर आत्मनिर्भर निधि के अंतर्गत रेहड़ी पटरी वालो को अपना काम दोबारा से शुरू करने के लिए सरकार द्वारा लोन मुहैया कराया गया है |

  • इस योजना के तहत छोटे दुकानदार 10,000 रुपए तक के ऋण के लिये आवेदन कर सकेंगे।
  • ऋण प्राप्त करने के लिये आवेदकों को किसी प्रकार की ज़मानत या कोलैट्रल (Collateral) की आवश्यकता नहीं होगी।
  • इस योजना के तहत प्राप्त हुई पूंजी को चुकाने के लिये एक वर्ष का समय दिया जाएगा, विक्रेता इस अवधि के दौरान मासिक किश्तों के माध्यम से ऋण का भुगतान कर सकेंगे।
  • साथ ही इस योजना के तहत यदि लाभार्थी लिये गए ऋण पर भुगतान समय से या निर्धारित तिथि से पहले ही करते हैं तो उन्हें 7% (वार्षिक) की ब्याज सब्सिडी प्रदान की जाएगी, जो ‘प्रत्यक्ष लाभ अंतरण’ (Direct Benefit Transfer- DBT) के माध्यम से 6 माह के अंतराल पर सीधे लाभार्थी के बैंक खाते में जमा की जाएगी।
  • पीएम स्वनिधि के तहत निर्धारित तिथि से पहले ऋण के पूर्ण भुगतान पर कोई ज़ुर्माना नहीं लागू होगा।
  • इस योजना के तहत ऋण जारी करने की प्रक्रिया जुलाई माह से शुरू की जाएगी।
  • इस योजना के लिये सरकार द्वारा 5,000 करोड़ रुपए की राशि मंज़ूर की गई है, यह योजना मार्च 2022 तक लागू रहेगी।
  • यह पहली बार है जब सूक्ष्म-वित्त संस्थानों (Micro finance Institutions(MFI), गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (Non Banking Financial Company- (NBFC), स्वयं सहायता समूह (Self Help Group-SHG),  बैंकों को शहरी क्षेत्र की गरीब आबादी से जुड़ी किसी योजना में शामिल किया गया है।
  • इन संस्थानों को ज़मीनी स्तर पर उनकी उपस्थिति और छोटे व्यापारियों व शहरों की गरीब आबादी के साथ निकटता के कारण इस योजना में शामिल किया गया है।

तकनीकी का प्रयोग और पारदर्शिता –

  • इस योजना के प्रभावी वितरण और इसके क्रियान्वयन में पारदर्शिता लाने के लियेवेब पोर्टल और मोबाइल एप युक्त एक डिजिटल प्लेटफॉर्म का विकास किया जा रहा है।
  • यह प्लेटफॉर्म क्रेडिट प्रबंधन के लिये वेब पोर्टल और मोबाइल एप कोभारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (सिडबी) के ‘उद्यम मित्र’ पोर्टल से तथा ब्याज सब्सिडी के स्वचालित प्रबंधन हेतु MoHUA के ‘पैसा पोर्टल’ (PAiSA Portal) से जोड़ेगा।  
  • इस योजना के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रो और पृष्ठभूमि के 50 लाख से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रूप से लाभ प्राप्त होगा।
  • इस योजना को विशेष रूप से छोटे दुकानदारों (ठेले और रेहड़ी-पटरी वाले) के लिये तैयार किया गया है, इस योजना के माध्यम से छोटे व्यापारी COVID-19 के कारण प्रभावित हुए अपने व्यापार को पुनः शुरू कर सकेंगे।
  • इस योजना के माध्यम से सरकार द्वारा छोटे व्यापारियों के बीच डिजिटल बैंकिंग को बढ़ावा देने का प्रयास किया जाएगा।
  • इसके तहत ऋण चुकाने के लिये डिजिटल भुगतान करने वाले लाभार्थियों को हर माह कैश-बैक प्रदान कर उन्हें अधिक-से-अधिक डिजिटल बैंकिंग अपनाने के लिये प्रोत्साहित किया जाएगा।
  • इस योजना के ज़रिये रेहड़ी पटरी वालो को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाया जायगा तथा गरीब लोगो की स्थिति में सुधार होगा |
  • इस योजना के तहत MoHUA द्वारा जून माह में पूरे देश में राज्य सरकारों, दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन के राज्य कार्यालय, भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम, शहरी स्थानीय निकायों, सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों के लिए क्रेडिट गारंटी निधि ट्रस्ट और अन्य हितधारकों के सहयोग से क्षमता विकास और वित्तीय साक्षरता कार्यक्रम की शुरुआत की जाएगी।
  • COVID-19 महामारी के कारण देश की औद्योगिक इकाइयों और संगठित क्षेत्र के अन्य व्यवसायों के अतिरिक्त असंगठित क्षेत्र और छोटे व्यापारियों को भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ा है।
  • देश में बड़े पैमाने पर असंगठित क्षेत्र के प्रमाणिक आँकड़े उपलब्ध न होने से इससे जुड़े लोगों को सहायता पहुँचाना एक बड़ी चुनौती रही है। साथ ही इस क्षेत्र के लिये किसी विशेष आर्थिक तंत्र के अभाव में छोटे व्यापारियों को स्थानीय कर्ज़दारों से महँगी दरों पर ऋण लेना पड़ता है। 

Conclusion :

पीएम स्वनिधियोजना के माध्यम से छोटे व्यापारियों को आसान शर्तों पर ऋण उपलब्ध करा कर ऐसे लोगों को COVID-19 के कारण हुए नुकसान से उबरने में सहायता प्रदान की जा सकेगी। इस योजना के अंतर्गत 2 जुलाई 2020 को ऋण देने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद, राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 1.54 लाख से अधिक सड़क विक्रेताओं ने ऋण के लिए आवेदन किया है जिनमे से, 48,000 से अधिक को इस योजना के तहत ऋण स्वीकृत किया जा चूका है। यह प्रौद्योगिकी का उपयोग करते हुए लोगों की क्षमता को बढ़ाने और कोरोना संकट के समय कारोबार को नए सिरे से खड़ा कर आत्मनिर्भर भारत अभियान को गति देंगे।

प्रधान मंत्री जन धन योजना पर निबंध

Introduction : 

आजादी के बाद भी, भारत में बहुत से लोग बैंकिंग प्रणाली के भीतर नहीं लाए जा सके हैं, इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए सम्माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने प्रधान मंत्री जन-धन योजना को 28 अगस्त, 2014 को शुरू किया, ताकि समाज के बैंक से अपरिचित खंड को मुख्य धारा बैंकिंग में लाया जा सके । यह योजना देश में प्रत्येक परिवार को बैंक खाता और बैंकिंग सेवाएं प्रदान करने के लिए शुरू की गई ताकि व्यापक वित्तीय समावेशन किया जा सके । इस योजना के तहत 25 करोड़ से अधिक नए बैंक खाते खोल दिए गए । 

अधिकांश लोग, जिन्होंने अपने बैंक खाते खोले हैं वे पहले बैंकिंग प्रणाली की परिधि के बाहर थे। प्रधानमंत्री जन धन योजना के उद्घाटन के दिन ही एक करोड़ पचास लाख खाते खोले गये थे। इस योजना में 1 लाख रुपए का बीमा होगा जो विपत्ति के समय पर परिवार की बहुत मदद करेगा। इस योजना के तहत किसानों, आम जनता और अन्य ग्रामीण लोगों के लिए कृषि जैसे अन्य कारणों के लिए लोन लेना सरल हो जाएगा। भारत में नकद धन का कम प्रयोग होगा जिससे काले धन पर नियंत्रण लगेगा और सरकार का खर्च भी बच जाएगा इसके साथ-साथ आमदनी भी बढ़ेगी।

  • 28 अगस्त 2014 को भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के द्वारा शुरुआत की गयी लोगों की मुद्रा बचत योजना है जन धन योजना। इसे प्रधानमंत्री जन धन योजना भी कहा जाता है जोकि वास्तव में ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले आम भारतीय लोगों के लिये कुछ अवसर बनाने के लिये लोगों की एक संपत्ति योजना है।
  • प्रधानमंत्री के द्वारा शुरु की गयी ये योजना गरीब लोगों को पैसा बचाने में सक्षम बनाती है। लाल किले पर राष्ट्र को संबोधित करने के दौरान 15 अगस्त 2015 को उन्होंने इस योजना के बारे में घोषणा की। हालांकि इसकी शुरुआत दो हफ्ते बाद हुई।
  • यहाँ रहने वाले लोगों को स्वतंत्र बनाना ही सही मायने में एक स्वतंत्र भारत बनाना है। भारत एक ऐसा देश है जो भ्रामीण क्षेत्रों में रहने लोगों की पिछड़ेपन की स्थिति के कारण अभी भी एक विकासशील देशों में गिना जाता है।
  • अनुचित शिक्षा, असमानता, सामाजिक भेदभाव और बहुत सारी सामाजिक मुद्दों की वजह से भारत में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की दर उच्च है।
  • ये बहुत जरुरी है कि पैसा बचाने की आदत के बारे में लोगों के बीच जागरुकता बढ़े जिससे भविष्य में कुछ बेहतर करने के लिये वो स्वतंत्र हों और उनके भीतर कुछ विश्वास बढ़े।
  • बचत किये गये पैसों की मदद से वो बुरे दिनों में बिना किसी के सहारे अपनी मदद कर सकते हैं। जब हरेक भारतीय लोगों के पास अपना बैंक खाता होगा तब वो पैसों की बचत के महत्व को ज्यादा अच्छे से समझ सकेंगे।
  • इस योजना के अनुसार, इस योजना के शुरुआत होने के पहले दिन ही लगभग 1 करोड़ बैंक खाते खोले गये। भारत में अंतिम स्तर तक विकास लाने के लिये मुद्रा बचत योजना बहुत जरुरी है जिसको ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों में अपने बचत के बारे में अधिक सतर्क बनाने के द्वारा शुरुआत और प्राप्त किया जा सकता है।
  • खासतौर से, भारत के गरीब लोगों को खोले गये खातों के सभी लाभ को देने, बैंक खातों से उनको जोड़ने के लिये और पैसा बचत के लिये जन धन योजना स्कीम शुरु की गयी। भरतीय स्वतंत्रता दिवस से दो सप्ताह बाद 28 अगस्त को पीएम के द्वारा इस योजना की शुरुआत की गयी।
  • बैंक से उसके लाभ से सभी भारतीय नागरिकों को जोड़ने के लिये एक राष्ट्रीय चुनौती के रुप में इस खाता खोलने वाली और मुद्रा बचत योजना की शुरुआत की गयी थी।

Conclusion :

इस योजना को एक सफल योजना बनाने के लिये बहुत सारे कार्यक्रमों को लागू किया गया है। बैंक खातों के महत्व के बारे में जागरुक बनाने के साथ ही बैंक खाता खोलने के फायदे और प्रक्रिया के बारे में उनको समझाने और लोगों के दिमाग को इस ओर खींचने के लिये ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 60 हजार नामांकन कैंप लगाये गये। इस योजना के अंतर्गत ग्रामीण लोग भी वित्तीय सुविधाओं जैसे – इंश्योरेंस, वाहन लोन, गृह लोन, फसल बीमा आदि से जुड़ सकेंगे। प्रधान मंत्री जन धन योजना में सभी देशवासियो ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया, करोडो की तादात में अकाउंट खोले जा चुके है। अब हर व्यक्ति के पास अपना बैंक खाता होगा और वे पैसों की बचत के महत्व को और भी अच्छे से समझ सकेंगे।

प्रधान मंत्री आवास योजना

Introduction : 

सरकार ने 2022 तक ‘सभी के लिए आवास’ बनाने की दिशा में कुछ कदम उठाए हैं। प्रधान मंत्री आवास योजना ने हाल ही में मध्य आय वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर खंड और कम आय वाले समूह की आवास आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपने दायरे का विस्तार किया है । प्रधान मंत्री आवास योजना जून 2015 में लॉन्च की गई। सरकार ने पानी की सुविधा, स्वच्छता और बिजली की आपूर्ति के साथ सस्ती पक्का घरों के निर्माण की योजना बनाई है।

मूल रूप से यह योजना आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों और कम आय वाले समूह वर्गों में लोगों को कवर करने के लिए थी, लेकिन अब मध्य आय समूह को भी शामिल किया गया है। इसका उद्देश्य निजी डेवलपर्स के सहयोग से झोपड़पट्टी के निवासियों के लिए घरों का निर्माण करके झोपड़पट्टी के क्षेत्रों को बदलना है। यह नए निर्माण या मौजूदा घरों के नवीकरण के लिए उठाए गए ऋणों पर कमजोर और मध्यम आय वर्गों को क्रेडिट-लिंक्ड सब्सिडी देने की योजना है। ₹6 और ₹12 लाख के बीच के ऋण के लिए 3 प्रतिशत से 6.5 प्रतिशत की ब्याज सब्सिडी की घोषणा की गई है।

  • लॉन्च: वर्ष 2022 तक ‘सभी के लिये आवास’ के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिये 1 अप्रैल, 2016 को पूर्ववर्ती इंदिरा आवास योजना (Indira Awaas Yojana-IAY) का पुनर्गठन कर उसे  प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (PMAY-G) कर दिया गया था।
  • मंत्रालय:ग्रामीण विकास मंत्रालय।
  • उद्देश्य: मार्च 2022 तक सभी ग्रामीण परिवारों के आवासहीन और कच्चे तथा जीर्ण-शीर्ण घरों में रहने वाले लोगों को बुनियादी सुविधाओं के साथ पक्के घर उपलब्ध कराना।
  • पूर्ण अनुदान सहायता प्रदान करके आवास इकाइयों के निर्माण और मौजूदा गैर-लाभकारी कच्चे घरों के उन्नयन में गरीबी रेखा (बीपीएल) से नीचे रह रहे ग्रामीण लोगों की मदद करना।
  • लाभार्थी:इसके लाभार्थियों में एससी/एसटी, मुक्त बंधुआ मज़दूर और गैर-एससी/एसटी श्रेणियाँ, विधवाओं या कार्रवाई में मारे गए रक्षाकर्मियों के परिजन, पूर्व सैनिक एवं अर्द्धसैनिक बलों के सेवानिवृत्त सदस्य, विकलांग व्यक्ति तथा अल्पसंख्यक शामिल हैं।
  • लाभार्थियों का चयन:तीन चरणों के माध्यम से लाभार्थियों का सत्यापन किया जाएगा जिसमें 2011 की सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (SECC), ग्राम सभा एवं जियो टैगिंग शामिल है।
  • साझा लागत:इस योजना की कुल लागत का बँटवारा केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच 60:40 के अनुपात में किया जाता है, जबकि पूर्वोत्तर तथा हिमालयी राज्यों के लिये यह राशि 90:10 के अनुपात में साझा की जाती है।
  • घर के न्यूनतम आकार को 20 वर्ग मीटर से 25 वर्ग मीटर (एक स्वच्छ रसोई घर सहित) तक बढ़ाया गया है।
  • इकाई सहायता मैदानी क्षेत्रों में 70,000 रुपए से बढ़ाकर 1.20 लाख रुपए तथा पर्वतीय राज्यों में 75,000 रुपए से बढ़ाकर 1.30 लाख रुपए कर दी गई है।
  • शौचालय के निर्माण के लिये स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण (SBM-G), मनरेगाया वित्तपोषण के किसी अन्य स्रोत से तालमेल बिठाकर सहायता उपलब्ध कराई जाएगी।
  • पाइप के ज़रिये पेयजल आपूर्ति, बिजली कनेक्शन, एलपीजी गैस कनेक्शन इत्यादि के लिये विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों के माध्यम से भी प्रयास किया जाता है।
  • निर्माण लक्ष्य का केवल 55% पूरा हो चुका है।
  • ग्रामीण गरीबों के लिये बनाए जाने वाले 2.28 करोड़ घरों में से 1.27 करोड़ से कम घरों का कार्य जनवरी 2021 तक पूरा हो चुका था।
  • लगभग 85% लाभार्थियों के लिये धन स्वीकृत किया गया है।
  • इस योजना ने रोज़गार सृजन में मदद की है तथा कई राज्यों ने अपने प्रवासी मज़दूरों को लॉकडाउन के दौरान रोज़गार उपलब्ध कराया।

Conclusion :

आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों और कम आय वाले समूह श्रेणी में जो 6 लाख रुपये तक का ऋण लेना चाहते हैं, उनके लिए 15 वर्षों के कार्यकाल के लिए 6.5 प्रतिशत की ब्याज सब्सिडी है। सरकार आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए राज्यों/संघ शासित प्रदेशों के साथ साझेदारी में किए गए किफायती आवास परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करेगी। निचले और मध्यम आय वाले समूहों के लिए, प्रधान मंत्री आवास योजना ₹1 लाख से ₹2.3 लाख तक घर खरीदने की लागत को कम कर देगी।

प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना पर निबंध

Introduction : 

किसान भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, लेकिन उनका जीवन दिन ब दिन और अधिक कठिन होता जा रहा है। किसानो की बिगड़ती हालत को देखते हुए सरकार ने “प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना” की शुरूआत की। यह योजना 1 दिसंबर, 2018 से प्रभावी हो गई है। इस योजना के माध्यम से छोटे और सीमांत किसानों को एक सुनिश्चित आय सहायता प्रदान की जाएगी। इस योजना के तहत देश भर में सभी किसान परिवारों को हर चार महीने में रु 2000 की तीन समान किस्तों में रु 6,000 की आय सहायता प्रदान की जाती है।

फंड सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में स्थानांतरित किया जाता है। यह योजना नियमित रूप से किसानो को सुनिश्चित आय प्रदान करेगी। इस आय का उपयोग बीज, उर्वरक, उपकरण, श्रम और अन्य उभरती जरूरतों के लिए किया जा सकता है। लेकिन इस योजना की कुछ सीमाएँ भी हैं। इस योजना का का लक्ष्य छोटे और सीमांत किसानों को कवर करना है, भूमिहीन मजदूर और किरायेदार किसान इस योजना का लाभ नहीं उठा सकते। कुछ राज्यों को छोड़कर, अन्य राज्यों में अभी भी भूमि रिकॉर्ड के लिए डेटाबेस नहीं बन पाए हैं।

  • इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री ने पीएम-किसान मोबाइल एप भी लॉन्च किया है।
  • इस एप का उद्देश्य योजना की पहुँच को और अधिक व्यापक बनाना है। इस एप के माध्यम से किसान अपने भुगतान की स्थिति जान सकते हैं, साथ ही योजना से संबंधित अन्य मापदंडों के बारे में भी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

पीएम-किसान योजना की मौजूदा स्थिति –

  • मौजूदा वित्तीय वर्ष के केंद्रीय बजट में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) योजना के लिये 75,000 करोड़ रुपए की राशि प्रदान की गई है, जिसमें से 50,850 करोड़ रुपए से अधिक की राशि जारी की जा चुकी है।
  • आँकड़ों के अनुसार, अब तक 8.45 करोड़ से अधिक किसान परिवारों को इस योजना का लाभ पहुँचाया जा चुका है, जबकि इस योजना के तहत कवर किये जाने वाले लाभार्थियों की कुल संख्या 14 करोड़ है।
  • केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री ने घोषणा की है कि पीएम-किसान योजना के सभी लाभार्थियों को किसान क्रेडिट कार्ड (Kisan Credit Card-KCC) प्रदान किया जाएगा, ताकि वे आसानी से बैंक से ऋण प्राप्त कर सकें।

प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना –

  • प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) योजना एक केंद्रीय क्षेत्रक योजना है जिसकी शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 24 फरवरी, 2019 को लघु एवं सीमांत किसानों को आर्थिक सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से की गई थी।
  • इस योजना के तहत पात्र किसान परिवारों को प्रतिवर्ष 6,000 रुपए की दर से प्रत्यक्ष आय सहायता उपलब्ध कराई जाती है।
  • यह आय सहायता 2,000 रुपए की तीन समान किस्तों में लाभान्वित किसानों के बैंक खातों में प्रत्यक्ष रूप से हस्तांतरित की जाती है, ताकि संपूर्ण प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके।
  • आरंभ में यह योजना केवल लघु एवं सीमांत किसानों (2 हेक्टेयर से कम जोत वाले) के लिये ही शुरू की गई थी, किंतु 31 मई, 2019 को कैबिनेट द्वारा लिये गए निर्णय के उपरांत यह योजना देश भर के सभी किसानों हेतु लागू कर दी गई।
  • इस योजना का वित्तपोषण केंद्र सरकार द्वारा किया जा रहा है। इस योजना पर अनुमानतः 75 हज़ार करोड़ रुपए का वार्षिक व्यय आएगा।

योजना का उद्देश्य –

  • इस योजना का प्राथमिक उद्देश्य देश के लघु एवं सीमांत किसानों को प्रत्यक्ष आय संबंधी सहायता प्रदान करना है।
  • यह योजना लघु एवं सीमांत किसानों को उनकी निवेश एवं अन्य ज़रूरतों को पूरा करने के लिये आय का एक निश्चित माध्यम प्रदान करती है।
  • योजना के माध्यम से लघु एवं सीमांत किसानों को साहूकारों तथा अनौपचारिक ऋणदाता के चंगुल से बचाने का प्रयास किया जा रहा है।

Conclusion :

देश में किसानों की मौजूदा स्थिति को देखते हुए इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता की यह योजना किसानों को एक आर्थिक आधार प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है। हालाँकि कई विशेषज्ञों का मानना है कि योजना के तहत दी जा रही सहायता राशि अपेक्षाकृत काफी कम है, किंतु हमें यह समझना होगा कि इस योजना का उद्देश्य किसानों को उनकी निवेश संबंधी ज़रूरतों को पूरा करने के लिये एक आर्थिक आधार प्रदान करना है, ताकि वे फसल उत्पादन में नवीन तकनीक और गुणवत्तापूर्ण बीजों का प्रयोग कर उत्पादन में बढ़ोतरी कर सकें।

आवश्यक है कि योजना के मार्ग में स्थित विभिन्न बाधाओं को समाप्त कर इसे अधिक-से-अधिक किसानों के लिये लाभदायी बनाया जा सके। केंद्र सरकार को सार्वजनिक और निजी संस्थानों और बाजार एजेंसियों को उचित मूल्य पर कृषि क्षेत्र में सेवाएं प्रदान करने की अनुमति देनी चाहिए एवं उसका लक्ष्य गरीबी कम करना, स्थायी खाद्य सुरक्षा और समावेशी विकास और किसानों की भलाई सुनिश्चित करना होना चाहिए। यह योजना न केवल गरीब किसान परिवारों को सुनिश्चित आय प्रदान करेगी, बल्कि उनकी उभरती जरूरतों को भी पूरा करेगी।

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Essays

महिला सुरक्षा पर निबंध – Women’s safety essay in hindi

महिला सुरक्षा पर निबंध – Essay on women’s safety in hindi

Introduction : 

महिलाओं की सुरक्षा यह एक महत्वपूर्ण विषय हैं | भारत अपनी महान परंपरा और संस्कृति के लिए दुनिया भर में सबसे प्रसिद्ध देश है जहां महिलाओं को सबसे सम्मानित स्थान दिया जाता है। भारतीय महिलाएं सभी क्षेत्रों में काम कर रही हैं, जैसे कि वैमानिकी, अंतरिक्ष, राजनीति, बैंक, स्कूल, खेल, व्यवसाय, सेना, पुलिस, लेकिन हम भारत में महिलाओं की स्थिति के नकारात्मक पहलू को भी नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। हर दिन, हर मिनट कुछ महिलाओं को देश भर में विभिन्न स्थानों पर उत्पीड़न, छेड़छाड़, मारपीट जैसे अपराधों का सामना करना पड़ता है। 

आंकड़ों के अनुसार, यह पाया गया है कि भारत में हर 20 मिनट में एक महिला का बलात्कार होता है। भारत की राष्ट्रीय राजधानी में निर्भया सामूहिक बलात्कार एक भयानक घटना थी जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। भारत में महिला सुरक्षा के संबंध में स्थिति को सुधारने के लिए आत्मरक्षा तकनीक सबसे महत्वपूर्ण है जिसके लिए प्रत्येक महिला को अपनी सुरक्षा के लिए जागरूक होना चाहिए। उनके पास सभी आपातकालीन नंबर होने चाहिए ताकि वे तुरंत अपने परिवार के सदस्यों और पुलिस से संपर्क कर सकें।

  • भारत के बदलते युग के साथ-साथ नारी को लेकर सोच को भी काफी हद तक बदल गई है आज की नारी हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ चलकर काम कर रही है।
  • शिक्षित होकर अपने जीवन में नई ऊँचाइयों को पा रही है, फिर भी वह अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित है, आज के युग में नारी सुरक्षा एक बड़ी समस्या बन चुका है, नारी सुरक्षा के कानून और कायदे होते हुए भी उस पे अत्याचार होते रहते हैं, वह अत्याचार घरेलू हिंसा, सामाजिक संस्थानों पर नारी शोषण, दहेज़ को लेकर कई प्रकार से परेशान किया जाता है।
  • आज वह पढ़ लिख कर शिक्षित तो बन गई है मगर फिर भी अपने हक और अपनी स्वतंत्रता के लिए उसे कई बार लड़ना पड़ता है सरकार के नियम और कानून होते हुए भी पुरुष प्रधान देश में वह कई बार लाचार बन जाती है।
  • आजकल तो नारी ना तो घर में सुरक्षित है ना ही बाहर सुरक्षित है ऐसे हालातों से नारी गुज़र रही है। उसपे बलात्कार जैसी घटनाएँ आए दिन बढ़ रही है देश के विकसित समाज के लिए यह घटनाएँ एक कलंक रूप में साबित हो रही है।
  • बलात्कार जैसी घटनाएँ देश और नारी दोनों के लिए एक सवाल रुक बन चुकी है। क्यों होती है ऐसी घटनाएँ ! क्यों नारी आज के जमाने में पूर्ण रूप में सुरक्षित रूप से नहीं रह पा रही है। आज की बदलती इस दौर में नारी का सुरक्षित रह पाना मुश्किल बन गया है।
  • नारी आज घर से बाहर निकलने से डर रही है, आज के समय में बलात्कार जैसी घटनाएँ काफी हद तक बढ़ गई है, नारी आज किसी भी क्षेत्र में अपने को सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रही है।
  • नारी को जो देश देवी के रूप में पूजा जाता था वहीं आज उसका चीर हरण कर रहा है। इसके पीछे का एक कारण इंटरनेट का दुरुपयोग भी माना जा रहा है। मोबाइल में सब कुछ देखने को मिल जाता है जिससे आज का युवा वर्ग सोचे समझे इसका अनुकरण भी कर लेता है।
  • जो आज के समाज और नारी दोनों के लिए ख़तरा रूप साबित हो रहा है उसके साथ साथ आज की फिल्में में दिखाई जाने वाली उत्तेजित दृश्य, सीरियल में भी आज देश आने वाले दृश्य भी बलात्कार जैसी वारदातों के लिए का रूप माना गया है। 
  • इन सब से बचने के लिए किसी भी नारी को अपनी सुरक्षा के लिए खुद तैयार होना पड़ेगा। हर जगह साकार या परिवार साथ नहीं रह सकता इसलिए आज के जमाने में नारी को अपनी रक्षा के लिए खुद ही मजबूत होना पड़ेगा अपनी अपनी सुरक्षा के लिए मिर्ची स्प्रे, कराटे जैसी चीजों को सीख कर आत्मनिर्भर बनना पड़ेगा।
  • आज के विकसित और बदलते भारत के साथ नारी अपनी सुरक्षा खुद ही कर सकें ऐसे कार्यक्रमों को बढ़ावा देना चाहिए नारी को अपनी सुरक्षा को लेकर खुद ही तैयार होना पड़ेगा भारत सरकार नारी सुरक्षा को लेकर जागृत हे, और उसके लिए कड़े कानून और नियम के साथ-साथ सजा भी करता है।
  • महिलाएं घर की इज़्ज़त होती है। उनका सम्मान और रक्षा करना एक सच्चे नागरिक का कर्त्तव्य है। लोगो को समझना चाहिए अगर महिलाएं ना होती तो बच्चे भी ना होते और परिवार नहीं बनता।
  • हम जो भी है ,जिस मुकाम पर है उसके पीछे हमारी माँ का हाथ है। माँ , बहन इत्यादि सारे रिश्तो का सम्मान सिर्फ पुरुषो को करना चाहिए। सिर्फ कहने के लिए नहीं होने चाहिए।
  • गाँव के कुछ जगहों में महिलाओं पर दैनिक अत्याचार होते है। पति और सास -ससुर का बहु को मारना। उसको दहेज़ के लिए प्रताड़ित करना , यह सब शामिल है। वहां महिलाएं अपने ऊपर हो रहे जुल्मो के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाती है और सहती रहती है। यह बिलकुल गलत है।
  • निर्भया बलात्कार केस ने सम्पूर्ण देश को हिलाकर रख दिया था और नारियों की सुरक्षा के विषय में सोचने पर मज़बूर कर दिया था। इकीसवीं शताब्दी में आकर भी देश में लड़कियां सुरक्षित नहीं है। आये दिन दर्दनाक घटनाओ को सुनकर , मानवता शर्मसार हो रही है
  • आज कल सरकार पहले की तुलना में काफी जागरूक हुयी है। पुलिस वाले भी रात होने पर निगरानी करते है , कि सब कुछ ठीक है या नहीं। लड़कियों के सुरक्षा के लिए हेल्पलाइन नंबर्स भी जारी किये गए है।

Conclusion : 

महिलाओं के खिलाफ होने वाले सभी प्रकार के अपराधों के लिए सुरक्षा कानूनों की एक सूची है लेकिन महिलाओं के खिलाफ अपराधों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। हमें इसके लिए केवल सरकार को दोष नहीं देना चाहिए क्योंकि महिला सुरक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, यह प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। महिला सुरक्षा की इस समस्या को समझने और हल करने की तत्काल आवश्यकता है ताकि वे भी अपने देश में पुरुषों की तरह समान रूप से विकसित और हमारे देश की तरक्की में अपना योगदान दे सकें।

महिला सशक्तिकरण पर निबंध

Introduction :

नारी सशक्तिकरण के नारे के साथ एक प्रश्न उठता है कि “क्या महिलाएँ सचमुच में मजबूत बनी है” और “क्या उसका लंबे समय का संघर्ष खत्म हो चुका है”। राष्ट्र के विकास में महिलाओं की सच्ची महत्ता और अधिकार के बारे में समाज में जागरुकता लाने के लिये मातृ दिवस, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस आदि जैसे कई सारे कार्यक्रम सरकार द्वारा चलाये जा रहे और लागू किये गये है। महिलाओं को कई क्षेत्र में विकास की जरुरत है। ‘सशक्तिकरण’ से तात्पर्य किसी व्यक्ति की उस क्षमता से है जिससे उसमें ये योग्यता आ जाती है जिसमें वो अपने जीवन से जुड़े सभी निर्णय स्वयं ले सके। महिला सशक्तिकरण में भी हम उसी क्षमता की बात कर रहे है जहाँ महिलाएँ परिवार और समाज के सभी बंधनों से मुक्त होकर अपने निर्णयों की निर्माता खुद हो।

अपनी निजी स्वतंत्रता और स्वयं के फैसले लेने के लिये महिलाओं को अधिकार देना ही महिला सशक्तिकरण है। वें देश और परिवार की आर्थिक स्थिति का प्रबंधन करने में पूरी तरह से सक्षम है। अत: महिलाओं के सशक्त होने से पूरा समाज अपने आप सशक्त हो जायेगा। भारत में, महिलाओं को सशक्त बनाने के लिये सबसे पहले समाज में उनके अधिकारों और मूल्यों को मारने वाले उन सभी राक्षसी सोच को मारना जरुरी है जैसे दहेज प्रथा, अशिक्षा, यौन हिंसा, असमानता, भ्रूण हत्या, महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा, वैश्यावृति और मानव तस्करी ।

  • पुरुष और महिला को बराबरी पर लाने के लिये महिला सशक्तिकरण में तेजी लाने की जरुरत है। सभी क्षेत्रों में महिलाओं का उत्थान राष्ट्र की प्राथमिकता में शामिल होना चाहिये। महिला और पुरुष के बीच की असमानता कई समस्याओं को जन्म देती है जो राष्ट्र के विकास में बड़ी बाधा के रुप में सामने आ सकती है।
  • ये महिलाओं का जन्मसिद्ध अधिकार है कि उन्हें समाज में पुरुषों के बराबर महत्व मिले। वास्तव में सशक्तिकरण को लाने के लिये महिलाओं को अपने अधिकारों से अवगत होना चाहिये। न केवल घरेलू और पारिवारिक जिम्मेदारियों बल्कि महिलाओं को हर क्षेत्रों में सक्रिय और सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिये। उन्हें अपने आस-पास और देश में होने वाली घटनाओं को भी जानना चाहिये।
  • महिला सशक्तिकरण में ये ताकत है कि वो समाज और देश में बहुत कुछ बदल सकें। वो समाज में किसी समस्या को पुरुषों से बेहतर ढ़ंग से निपट सकती है। वो देश और परिवार के लिये अधिक जनसंख्या के नुकसान को अच्छी तरह से समझ सकती है।
  • अच्छे पारिवारिक योजना से वो देश और परिवार की आर्थिक स्थिति का प्रबंधन करने में पूरी तरह से सक्षम है। पुरुषों की अपेक्षा महिलाएँ किसी भी प्रभावकारी हिंसा को संभालने में सक्षम है चाहे वो पारिवारिक हो या सामाजिक।
  • महिला सशक्तिकरण के द्वारा ये संभव है कि एक मजबूत अर्थव्यवस्था के महिला-पुरुष समानता वाले वाले देश को पुरुषवादी प्रभाव वाले देश से बदला जा सकता है। महिला सशक्तिकरण की मदद से बिना अधिक प्रयास किये परिवार के हर सदस्य का विकास आसानी से हो सकता है।
  • एक महिला परिवार में सभी चीजों के लिये बेहद जिम्मेदार मानी जाती है अत: वो सभी समस्याओं का समाधान अच्छी तरह से कर सकती है। महिलाओं के सशक्त होने से पूरा समाज अपने आप सशक्त हो जायेगा।
  • महिलाओं के लिये प्राचीन काल से समाज में चले आ रहे गलत और पुराने चलन को नये रिती-रिवाजों और परंपरा में ढ़ाल दिया गया था। भारतीय समाज में महिलाओं को सम्मान देने के लिये माँ, बहन, पुत्री, पत्नी के रुप में महिला देवियो को पूजने की परंपरा है लेकिन इसका ये कतई मतलब नहीं कि केवल महिलाओं को पूजने भर से देश के विकास की जरुरत पूरी हो जायेगी।
  • आज जरुरत है कि देश की आधी आबादी यानि महिलाओं का हर क्षेत्र में सशक्तिकरण किया जाए जो देश के विकास का आधार बनेंगी।
  • भारत एक प्रसिद्ध देश है जिसने ‘विविधता में एकता’ के मुहावरे को साबित किया है, जहाँ भारतीय समाज में विभिन्न धर्मों को मानने वाले लोग रहते है। महिलाओं को हर धर्म में एक अलग स्थान दिया गया है जो लोगों की आँखों को ढ़के हुए बड़े पर्दे के रुप में और कई वर्षों से आदर्श के रुप में महिलाओं के खिलाफ कई सारे गलत कार्यों (शारीरिक और मानसिक) को जारी रखने में मदद कर रहा है।
  • प्राचीन भारतीय समाज दूसरी भेदभावपूर्ण दस्तूरों के साथ सती प्रथा, नगर वधु व्यवस्था, दहेज प्रथा, यौन हिंसा, घरेलू हिंसा, गर्भ में बच्चियों की हत्या, पर्दा प्रथा, कार्य स्थल पर यौन शोषण, बाल मजदूरी, बाल विवाह तथा देवदासी प्रथा आदि परंपरा थी। इस तरह की कुप्रथा का कारण पितृसत्तामक समाज और पुरुष श्रेष्ठता मनोग्रन्थि है।
  • पुरुष पारिवारिक सदस्यों द्वारा सामाजिक राजनीतिक अधिकार (काम करने की आजादी, शिक्षा का अधिकार आदि) को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया। महिलाओं के खिलाफ कुछ बुरे चलन को खुले विचारों के लोगों और महान भारतीय लोगों द्वारा हटाया गया जिन्होंने महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण कार्यों के लिये अपनी आवाज उठायी।
  • राजा राम मोहन रॉय की लगातार कोशिशों की वजह से ही सती प्रथा को खत्म करने के लिये अंग्रेज मजबूर हुए। बाद में दूसरे भारतीय समाज सुधारकों (ईश्वर चंद्र विद्यासागर, आचार्य विनोभा भावे, स्वामी विवेकानंद आदि) ने भी महिला उत्थान के लिये अपनी आवाज उठायी और कड़ा संघर्ष किया। भारत में विधवाओं की स्थिति को सुधारने के लिये ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने अपने लगातार प्रयास से विधवा पुर्न विवाह अधिनियम 1856 की शुरुआत करवाई।
  • पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं के खिलाफ होने वाले लैंगिक असमानता और बुरी प्रथाओं को हटाने के लिये सरकार द्वारा कई सारे संवैधानिक और कानूनी अधिकार बनाए और लागू किये गये है।

Conclusion : 

हालाँकि ऐसे बड़े विषय को सुलझाने के लिये महिलाओं सहित सभी का लगातार सहयोग की जरुरत है। आधुनिक समाज महिलाओं के अधिकार को लेकर ज्यादा जागरुक है जिसका परिणाम हुआ कि कई सारे स्वयं-सेवी समूह और एनजीओ आदि इस दिशा में कार्य कर रहे है। महिलाएँ ज्यादा खुले दिमाग की होती है और सभी आयामों में अपने अधिकारों को पाने के लिये सामाजिक बंधनों को तोड़ रही है। हालाँकि अपराध इसके साथ-साथ चल रहा है। भारतीय समाज में सच में महिला सशक्तिकरण लाने के लिये महिलाओं के खिलाफ बुरी प्रथाओं के मुख्य कारणों को समझना और उन्हें हटाना होगा। जरुरत है कि हम महिलाओं के खिलाफ पुरानी सोच को बदले और संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों में भी बदलाव लाये।

बेटी बचाओबेटी पढ़ाओ पर निबंध

Introduction :

बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ योजना की शुरुआत भारतीय सरकार द्वारा 2015 के जनवरी महीने में हुई। इस योजना का मकसद भारतीय समाज में लड़कियों और महिलाओं के लिये कल्याणकारी कार्यों की कुशलता को बढ़ाने के साथ-साथ लोगों के बीच जागरुकता उत्पन्न करने के लिये भी है। 22 जनवरी 2015 को भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा सफलतापूर्वक इस योजना का आरंभ हुआ। इस योजना को सभी राज्य और केन्द्र शासित प्रदेशों में लागू करने के लिये एक राष्ट्रीय अभियान के द्वारा देश के 100 चुनिंदा शहरों में इस योजना को लागू किया गया । इस कार्यक्रम की शुरुआत करते समय प्रधनमंत्री ने कहा कि, भारतीय लोगों की ये सामान्य धारणा है कि लड़कियाँ अपने माता-पिता के बजाय पराया धन होती है।

अभिवावक सोचते है कि लड़के तो उनके अपने होते है जो बुढ़ापे में उनकी देखभाल करेंगे जबकि लड़कियाँ तो दूसरे घर जाकर अपने ससुराल वालों की सेवा करती हैं। लड़कियों या महिलाओं को कम महत्ता देने से धरती पर मानव समाज खतरे में पड़ सकता है क्योंकि अगर महिलाएँ नहीं तो जन्म नहीं। इसमें कुछ सकारात्मक पहलू ये है कि ये योजना लड़कियों के खिलाफ होने वाले अपराध और गलत प्रथाओं को हटाने के लिये एक बड़े कदम के रुप में साबित होगी।

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान के उद्देश्य –

  • इस अभियान के मुख्य उद्देश्य बालिकाओं की सुरक्षा करना और कन्या भ्रूण हत्या को रोकना है। इसके अलावा बालिकाओं की शिक्षा को बढ़ावा देना और उनके भविष्य को संवारना भी इसका उद्देश्य है। सरकार ने लिंग अनुपात में समानता लाने के लिए ये योजना शुरू की।
  • ताकि बालिकाएं दुनिया में सर उठकर जी पाएं और उनका जीवन स्तर भी ऊंचा उठे। इसका उद्देश्य बेटियों के अस्तित्व को बचाना एवं उनकी सुरक्षा को सुनिश्चित करना भी है। शिक्षा के साथ-साथ बालिकाओं को अन्य क्षेत्रों में भी आगे बढ़ाना एवं उनकी इसमें भागीदारी को सुनिश्चित करना भी इसका मुख्य लक्ष्य है|
  • इस अभियान के द्वारा समाज में महिलाओं के साथ हो रहे अन्याय और अत्याचार के विरूद्ध एक पहल हुई है। इससे बालक और बालिकाओं के बीच समानता का व्यवहार होगा। बेटियों को उनकी शिक्षा के लिए और साथ ही उनके विवाह के लिए भी सहायता उपलब्ध करवाई जाएगी, जिससे उनके विवाह में किसी प्रकार की दिक्कत नहीं होगी।
  • इस योजना से बालिकाओं को उनके अधिकार प्राप्त होंगे जिनकी वे हकदार हैं साथ ही महिला सशक्तिकरण के लिए भी यह अभियान एक मजबूत कड़ी है।

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान के कार्य –

  • हर थोड़े दिनों बाद हमें कन्या भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा, महिलाओं पर शारीरिक और मानसिक अत्याचार जैसे अपराधों की खबर देखने और सुनने को मिलती है। जिसके लिए भारत देश की सरकार इन बालिकाओं को बचाने और उनके अच्छे भविष्य के लिए हर संभव कोशिश कर रही है और अलग अलग योजनाएं चला रही है|
  • बालिकाओं की देखभाल और परवरिश अच्छी हो इसके लिए कई तरह के नए नियम कानून भी लागू किये जा रहे हैं। इसके साथ ही पुराने नियम कानूनों को बदला भी जा रहा है|
  • इस योजना के तहत मुख्य रूप से लड़के एवं लड़कियों के लिंग अनुपात में ध्यान केन्द्रित किया गया है, ताकि महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव और सेक्स डेटरमिनेशन टेस्ट को रोका जा सके।
  • इस अभियान का संचालन तीन स्तर पर हो रहा है, राष्ट्रीय स्तर पर, राजकीय स्तर पर और जिला स्तर पर। इस योजना में माता पिता एक निश्चित धनराशि अपनी बेटी के बैंक खाते में जमा करवाते हैं और सरकार उस राशि पर लाभ प्रदान करती है ताकि वह धनराशि बालिका की उच्च शिक्षा में और विवाह में काम आए।
  • जिससे बेटियों को बोझ ना समझा जाए। सरकार इस अभियान के द्वारा बालिकाओं की सुरक्षा और उनके उज्जवल भविष्य की कामना करती है।
  • इस अभियान के शुरुआती दौर में सभी ने इसका स्वागत और समर्थन किया लेकिन फिर भी ये इतना सफल नहीं हो पाया जितना सोचा गया था। बालिकाओं की स्थिति में सुधार लाने के लिए लोगों को जागरूक होना होगा और सभी को एकजुट होकर इस समस्या का समाधान करना होगा।
  • एक बच्ची दुनिया में आकर सबसे पहले बेटी बनती है। वे अपने माता पिता के लिए विपत्ति के समय में ढाल बनकर खड़ी रहती है। बालिका बन कर भाई की मदद करती है। बाद में धर्मपत्नी बनकर अपने पति और ससुराल वालों का हर अच्छी बुरी परिस्थिति में साथ निभाती है।
  • वह त्यागमूर्ति मां के रूप में अपने बच्चों पर सब कुछ कुर्बान कर जाती है और अपने बच्चों में अच्छे संस्कारों के बीज बोती है, जिससे वे आगे चलकर अच्छे इंसान बनें। सभी को बेटी और बेटों के साथ एक समान व्यवहार करना चाहिए।

Conclusion : 

उन्हें समान रूप से शिक्षा और जीवन स्तर देना चाहिए, समान अधिकार और प्यार – दुलार देना चाहिए, क्योंकि किसी भी देश के विकास के लिए बेटियां समान रूप से जिम्मेदार है। हम ये आशा करते हैं कि आने वाले दिनों में सामाजिक-आर्थिक कारणों की वजह से किसी भी लड़की को गर्भ में नहीं मारा जायेगा, अशिक्षित नहीं रहेंगी, असुरक्षित नहीं रहेंगी, अत: पूरे देश में लैंगिक भेदभाव को मिटाने के द्वारा बेटी-बचाओ बेटी-पढ़ाओ योजना का लक्ष्य लड़कियों को आर्थिक और सामाजिक दोनों तरह से स्वतंत्र बनाने का है। लडकियों को लडकों के समान समझा जाना चाहिए और उन्हें सभी कार्यक्षेत्रों में समान अवसर प्रदान करने चाहिए।

शिक्षा का अधिकार पर निबंध

Introduction :

प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में शिक्षा का बड़ा महत्व हैं,शिक्षा को जीवन का आधार माना गया हैं। किसी भी देश के आधुनिक या विकसित होने का प्रमाण उस देश के नागरिकों के शिक्षा स्तर पर निर्भर करता हैं। आधुनिक समय में शिक्षा को ही किसी राष्ट्र या समाज की प्रगति का सूचक समझा जाता हैं। शिक्षा का अधिकार अधिनियम संसद का एक अधिनियम है जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 ए के तहत भारत में 6 से 14 वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए नि: शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के महत्व का वर्णन करता है। यह अधिनियम 1 अप्रैल 2010 से लागू हुआ। इस अधिनियम की खास बात यह है कि गरीब परिवार के वे बच्चे, जो प्राथमिक शिक्षा से वंचित हैं, के लिए निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान रखा गया है ।

शिक्षा के अधिकार के साथ बच्चों एवं युवाओं का विकास होता है तथा राष्ट्र शक्तिशाली एवं समृद्ध बनता है । यह उत्तरदायी एवं सक्रिय नागरिक बनाने में भी सहायक है । इसमें देश के सभी लोगों, अभिभावकों एवं शिक्षकों का भी सहयोग आवश्यक है । इस कानून के लागू करने पर आने वाले खर्च केंद्र (55 प्रतिशत) और राज्य सरकार (45 प्रतिशत) मिलकर उठाएंगे।

  • आज विश्व के सभी राष्ट्रों द्वारा भारतीय युवाओं की प्रतिमा का मुक्त कण्ठ से गुणगान किया जाना इसका प्रमाण है । बावजूद इसके सम्पूर्ण राष्ट्र की शिक्षा को आधार मानकर विश्लेषण किया जाए तो अभी भी भारत शिक्षा के क्षेत्र में विकसित राष्ट्रों की तुलना में काफी पीछे है ।
  • वर्तमान में भारतीय शिक्षा दर अनुमानतः 74% है, जो वैश्विक स्तर पर बहुत कम है । तब इस अनुपात में और वृद्धि करने के लिए बुद्धिजीवियों ने अपने-अपने सुझाव दिए ।
  • उन सभी के सुझावों पर गौर अते हुए भारत सरकर ने शिक्षा को अनिवार्य रूप से लागू करने हेतु शिक्षा का अधिकार कानून (RTE Act) बनाकर पूरे देश में समान रूप से प्रस्तुत कर दिया ।
  • ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009’, 1 अप्रैल, 2010 से सम्पूर्ण भारत में लागू कर दिया गया । इसका प्रमुख उद्देश्य है- वर्ष आयु तक के सभी बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य, गुणवतायुक्त शिक्षा को सुनिश्चित करना । इस अधिनियम को सर्व शिक्षा अभियान तथा वर्ष 2005 के विधेयक का ही संशोधित रूप कहा जाए, तो समीचीन ही होगा ।
  • क्षेत्रीय सरकारों, अधिकारियों तथा अभिभावकों का यह दायित्व है कि वे बच्चे को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा दिलाने का प्रबन्ध करें । इस कार्य हेतु वित्तीय प्रबन्धन का पूर्ण दायित्व केन्द्र व राज्य सरकार द्वारा मिश्रित रूप से उठाया जाएगा । कोई भी बच्चा किसी समय विद्यालय में प्रवेश पाने को स्वतन्त्र है ।
  • आयु प्रमाण-पत्र न होने के बावजूद, बच्चा विद्यालय में प्रवेश ले सकता है । बच्चों की आवश्यकता का ध्यान रखते हुए पुस्तकालय, खेल के मैदान, स्वच्छ व मजबूत विद्यालय कक्ष, इमारत आदि का प्रबन्ध राज्य सरकार द्वारा किया जाएगा ।
  • शिक्षण की गुणवत्ता में सुधार हेतु 35 छात्रों पर एक शिक्षक का प्रावधान किया गया है तथा साथ ही यह सुनिश्चित किया गया है कि ग्रामीण ब शहरी किसी भी क्षेत्र में यह अनुपात प्रभावित न हो। 
  • इसके साथ ही अध्यापन की गुणवत्ता हेतु केवल प्रशिक्षित अध्यापकों को ही नियुक्त करने का प्रावधान किया गया है जो अप्रशिक्षित अध्यापक, प्राचीन समय से अध्यापनरत हैं, उन्हें सीमित अवधि में अध्यापक-प्रशिक्षण पूर्ण करने का आदेश पारित किया गया है, अन्यथा उन्हें पद-मुक्त किया जा सकता हे।

इसके अतिरिक्त निम्न कार्यों का पूर्ण रूप से निषेध है –

  • छात्रों को शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना देना ।
  • प्रवेश के दौरान छात्रों से कोई लिखित परीक्षा लेना ।
  • छात्रों या उनके अभिभावकों से किसी प्रकार का शुल्क लेना।
  • छात्रों को ट्‌यूशन पढ़ने के लिए बाध्य करना ।
  • बिना मान्यता प्राप्ति के विद्यालय का संचालन करना ।
  • इसी प्रकार निजी विद्यालयों में भी कक्षा 1 से प्रवेश के समय आर्थिक रूप से कमजोर समुदायों के छात्रों हेतु 25% आरक्षण का प्रावधान सुनिश्चित किया गया है ।
  • इस अधिनियम को प्रभावी बनाने का उत्तरदायित्व केन्द्र ब राज्य सरकार दोनों का है, जिसका वित्तीय बहन भी दोनों संयुक्त रूप से करेंगे ।
  • इस अधिनियम के अनुसार, वित्तीय बहन का दायित्व सर्वप्रथम राज्य सरकार को सौंपा गया था, परन्तु राज्य सरकार ने अपनी विवशता का हवाला देते हुए इसे अस्वीकार कर दिया तथा केन्द्र सरकार से मदद का अनुरोध किया, तदुपरान्त केन्द्र तथा राज्य सरकार द्वारा 65:36 अनुपात के तहत वित्तीय प्रबन्धन का विभाजन किया गया । उत्तर-पूर्वी राज्यों में यह अनुपात 90:10 है।

केन्द्र सरकार के दायित्व –

(i) बच्चों का चहुँमुखी विकास ।

(ii) संवैधानिक मूल्यों का विकास ।

(iii) जहाँ तक हो सके, मातृभाषा में शिक्षण दिया जाए ।

(iv) बच्चों के मानसिक बिकास के अनुरूप, उनका नियमित विश्लेषण । (धारा-29 के अन्तर्गत)

(v) बच्चों को भयमुक्त माहौल प्रदान कराना तथा अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का विकास करना ।

राज्य सरकार के दायित्व –

(i) वह प्रत्येक बच्चे को नि:शुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराएगी ।

(ii) अपने क्षेत्र के 14 वर्ष आयु तक के बच्चों का पूर्ण रिकॉर्ड रखेगी ।

(iii) शैक्षणिक कलेण्डर का निर्धारण करेगी (धारा-9 के अन्तर्गत)।

सर्व शिक्षा अभियान द्वारा पारित लक्ष्य वर्ष 2010 तक पूर्ण न हो पाया था, इसके अतिरिक्त यह अधिनियम भी लागू कर दिया गया । अतः यह कहना समीचीन ही होगा कि इस अधिनियम में सर्व शिक्षा अभियान के सभी नियम समाहित है ।

Conclusion : 

अधिनियम शिक्षा को 6 से 14 वर्ष की आयु के बीच हर बच्चे का मौलिक अधिकार बनाता है। अब भारत में 74% आबादी साक्षर है जिसमें पुरुषों में 80% और महिला 65% शामिल हैं। यह शिक्षा का मौलिक अधिकार 6 से 14 वर्षो के बालक-बालिकाओं के लिए निशुल्क और गुणवतापूर्ण शिक्षा की सहायता से उन्हें समान रूप से शिक्षा और रोजगार के समान अवसरों की उपलब्धता सुनिश्चित करवाएगा, इससे हमारा भारत शिक्षित और विकसित बनेगा।

निजता का अधिकार पर निबंध

Introduction :

मनुष्य की ज़रूरतें सबसे प्राथमिक ज़रूरतों जैसे कि भोजन, कपड़े और आश्रय से लेकर माध्यमिक ज़रूरतों जैसे शिक्षा, काम और मनोरंजन और आगे की ज़रूरतों जैसे मनोरंजन, भोजन, अवकाश, यात्रा, आदि से शुरू होती हैं। यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि इन सभी जरूरतों और इच्छाओ (wants) में गोपनीयता कहाँ है ? किसी भी सभ्य समाज में गोपनीयता की एक बुनियादी डिग्री एक प्राथमिक आवश्यकता है। जैसे-जैसे गोपनीयता की डिग्री बढ़ती है, यह एक माध्यमिक जरूरत और आगे एक इच्छा में विकसित हो जाती है।

निजता का अधिकार नागरिकों की निजता के अधिकार को लेकरकर यह सुनिश्चित करता है की सभी समान रूप से संरक्षित हो और अमीर और गरीब के लिए समान न्याय और अधिकार हो। आधार के लिए भारत के निवासियों के व्यक्तिगत डेटा के संग्रह की आवश्यकता होती है, और इसके परिणामस्वरूप चूक होने की संभावना को लेकर विवाद पैदा हो सकता है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि इसमें बायोमेट्रिक विवरण जैसे कि आईरिस स्कैनिंग और फिंगर प्रिंट के संग्रह की आवश्यकता होती है जो अनिवार्य रूप से महत्वपूर्ण विवरण हैं और इसका दुरुपयोग किया जा सकता है। साइबर स्पेस एक संवेदनशील स्थान है और यहाँ खतरे की संभावना अधिक है हालांकि, आधार अपने आप में एक सुविचारित कार्यक्रम है ताकि वित्तीय समावेशन सुनिश्चित किया जा सके।

निजता का महत्त्व

  • निजता वह अधिकार है जो किसी व्यक्ति की स्वायतता और गरिमा की रक्षा के लिये ज़रूरी है। वास्तव में यह कई अन्य महत्त्वपूर्ण अधिकारों की आधारशिला है।
  • दरअसल निजता का अधिकार हमारे लिये एक आवरण की तरह है, जो हमारे जीवन में होने वाले अनावश्यक और अनुचित हस्तक्षेप से हमें बचाता है।
  • यह हमें अवगत कराता है कि हमारी सामाजिक आर्थिक और राजनैतिक हैसियत क्या है और हम स्वयं को दुनिया से किस हद तक बाँटना चाहते हैं।
  • वह निजता ही है जो हमें यह निर्णित करने का अधिकार देती है कि हमारे शरीर पर किसका अधिकार है?
  • आधुनिक समाज में निजता का महत्त्व और भी बढ़ जाता है। फ्रांस की क्रांति के बाद समूची दुनिया से निरंकुश राजतंत्र की विदाई शुरू हो गई और समानता, मानवता और आधुनिकता के सार्वभौमिक सिद्धांतों पर आधारित लोकतंत्र ने पैर पसारना शुरू कर दिया।
  • अब राज्य लोगों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ चलाने लगे तो यह प्रश्न प्रासंगिक हो उठा कि जिस गरिमा के भाव के साथ जीने का आनंद लोकतंत्र के माध्यम से मिला उसे निजता के हनन द्वारा छिना क्यों जा रहा है?
  • तकनीक और अधिकारों के बीच हमेशा से टकराव होते आया है और 21वीं शताब्दी में तो तकनीकी विकास अपने उच्चतम स्तर पर पहुँच चुका है। ऐसे में निजता को राज्य की नीतियों और तकनीकी उन्नयन की दोहरी मार झेलनी पड़ी।
  • आज हम सभी स्मार्टफोंस का प्रयोग करते हैं। चाहे एपल का आईओएस हो या गूगल का एंड्राइड या फिर कोई अन्य ऑपरेटिंग सिस्टम, जब हम कोई भी एप डाउनलोड करते हैं, तो यह हमारे फ़ोन के कॉन्टेक्ट, गैलरी और स्टोरेज़ आदि के प्रयोग की इज़ाज़त मांगता है और इसके बाद ही वह एप डाउनलोड किया जा सकता है।
  • ऐसे में यह खतरा है कि यदि किसी गैर-अधिकृत व्यक्ति ने उस एप के डाटाबेस में सेंध लगा दी तो उपयोगकर्ताओं की निजता खतरे में पड़ सकती है।
  • तकनीक के माध्यम से निजता में दखल, राज्य की दखलंदाज़ी से कम गंभीर है। हम ऐसा इसलिये कह रहे हैं क्योंकि तकनीक का उपयोग करना हमारी इच्छा पर निर्भर है, किन्तु राज्य प्रायः निजता के उल्लंघन में लोगों की इच्छा की परवाह नहीं करता।
  • आधार का मामला इसका जीता जागता उदाहरण है। जब पहली बार आधार का क्रियान्वयन आरंभ किया गया तो कहा यह गया कि यह सभी भारतीयों को एक विशेष पहचान संख्या देने के उद्देश्य से लाई गई है। जल्द ही मनरेगा सहित कई बड़ी योजनाओं में बेनिफिट ट्रान्सफर के लिये आधार अनिवार्य कर दिया गया।
  • यहाँ तक कि आधार पर किसी भी प्रकार के विचार-विमर्श से किनारा करते हुए इसे मनी बिल यानी धन विधेयक के तौर पर संसद में पारित कर दिया गया। इन सभी बातों से पता चलता है कि निजता जो कि लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखने के लिये आवश्यक है, गंभीर खतरे में है।

गोपनीयता का उल्लंघन

  • सोशल मीडिया चैनलों और साइटों पर गोपनीयता भंग होने के अधिक मामले देखे जा सकते हैं, जिसमें साइबर अपराधियों द्वारा व्यक्ति के जीवन को नष्ट करने वाले जघन्य अपराध करने के लिए लोगों की व्यक्तिगत जानकारी और डेटा को हैक किया जाता है।
  • कई हैकर्स हमारे सोशल मीडिया और बैंकिंग खातों में घुस जाते हैं और लीक हुई जानकारी के जरिए पैसा कमाने के लिए संवेदनशील डेटा चुरा लेते हैं।
  • इतना ही नहीं, बल्कि कई अन्य क्षेत्र भी हैं जो गोपनीयता के उल्लंघन से पीड़ित हैं। इसलिए, यह एक प्रमुख चिंता का विषय है और सरकार को इससे निपटना चाहिए।

इंटरनेट के उपयोग के साथ, इस युग में, फेसबुक और ट्यूटर जैसे सामाजिक नेटवर्क सामाजिक संपर्क के नए रूपों को चला रहे हैं और उपलब्धता ने गोपनीयता संबंधी चिंताओं को बढ़ा दिया है। इसके लिए सरकार को साइबर सुरक्षा प्रणाली को मजबूत करना चाहिए और कानून के माध्यम से आश्वासन देना चाहिए कि निजता के अधिकार का उल्लंघन  न हो और निजी जानकारी को निजी रखा जाये।

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Essays

मानसिक स्वास्थ्य पर निबंध (Mental Health essay in Hindi)

मानसिक स्वास्थ्य पर निबंध (essay on Mental Health in Hindi)

Introduction :

गांधी जी ने एक बार कहा था, ” स्वास्थ्य ही वास्तविक धन है सोना और चांदी नहीं”। यह कथन हमारे जीवन में स्वास्थ्य के महत्व को इंगित करता है। लोग आमतौर पर अपने शारीरिक स्वस्थ पर अधिक ध्यान देते हैं और मानसिक फिटनेस को अनदेखा करते हैं। लेकिन यह भी सत्य है कि मानसिक स्वास्थ्य उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि शारीरिक स्वास्थ्य। हम अपने विकसित मस्तिष्क के कारण अपने जीवन को नियंत्रित कर पाते हैं। इसलिए, बेहतर प्रदर्शन और परिणाम के लिए हमारे शरीर और दिमाग को फिट और स्वस्थ रखना हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है आक्रामकता, नकारात्मक सोच, निराशा और भय ऐसे कारक हैं जो हमारे फिटनेस स्तर पर बहुत प्रभाव डालते हैं। मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति हमेशा अच्छे मूड में होता है और आसानी से संकट और ख़राब स्थितियों को आसानी से व्यवस्थित कर सकता है। 

मानसिक फिटनेस महसूस करने और सोच की सकारात्मकता को दर्शाता है जो जीवन का आनंद लेने की हमारी क्षमता में सुधार करता है। आजकल फिटनेस शब्द का इस्तेमाल मनोवैज्ञानिकों, स्कूलों, संगठनों और सामान्य लोगो द्वारा तार्किक सोच और तर्क क्षमता को दर्शाने के लिए किया जा रहा है। उसी तरह मानसिक इलनेस स्वास्थ्य की अस्थिरता है, जिसमें सोच और व्यवहार में अप्रत्याशित परिवर्तन आता हैं। तनाव या अन्य घटनाओं के कारण मानसिक बीमारी हो सकती है। यह आनुवंशिक कारकों, सामाजिक तनाव और खराब शारीरिक स्वास्थ्य से भी उत्पन्न हो सकती  है।

  • शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य का निकट संबंध है और यह निस्संदेह रूप से सिद्ध हो चुका है कि अवसाद के कारण हृदय और रक्तवाहिकीय रोग होते हैं।
  • मानसिक विकार व्यक्ति के स्वास्थ्य-संबंधी बर्तावों जैसे, समझदारी से भोजन करने, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद, सुरक्षित यौन व्यवहार, मद्य और धूम्रपान, चिकित्सकीय उपचारों का पालन करने आदि को प्रभावित करते हैं और इस तरह शारीरिक रोग के जोख़िम को बढ़ाते हैं।
  • मानसिक अस्वस्थता के कारण सामाजिक समस्याएं भी उत्पन्न होती हैं जैसे, बेरोजगार, बिखरे हुए परिवार, गरीबी, नशीले पदार्थों का दुर्व्यसन और संबंधित अपराध।
  • मानसिक अस्वस्थता रोगनिरोधक क्रियाशीलता के ह्रास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  • अवसाद से ग्रस्त चिकित्सकीय रोगियों का हश्र बिना अवसाद से ग्रस्त रोगियों से अधिक बुरा होता है।
  • लंबे चलने वाले रोग जैसे, मधुमेह, कैंसर,हृदय रोग अवसाद के जोखिम को बढ़ाते हैं।
  • कोई व्यक्ति जो शारीरिक रूप से अयोग्य है वह अपने परिवार की देखभाल नहीं कर सकता है। इसी तरह कोई व्यक्ति मानसिक तनाव का सामना कर रहा है और अपनी भावनाओं को संभालने में अक्षम है तो वह परिवार के साथ अच्छे रिश्तों का निर्माण और उनको बढ़ावा नहीं दे सकता है।
  • यह कहना बिल्कुल सही है कि एक शारीरिक रूप से अयोग्य व्यक्ति ठीक से काम नहीं कर सकता। कुशलतापूर्वक काम करने के लिए अच्छा मानसिक स्वास्थ्य बहुत आवश्यक है। काम पर पकड़ बनाने के लिए अच्छे सामाजिक और संज्ञानात्मक स्वास्थ्य का आनंद लेना चाहिए।
  • ख़राब शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य भी अध्ययन में एक बाधा है। अच्छी तरह से अध्ययन करने के लिए शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के अलावा अच्छा संज्ञानात्मक स्वास्थ्य बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है।
  • हमारा मानसिक स्वास्थ्य मूल रूप से, जिस तरह से हम महसूस करते हैं, अलग-अलग परिस्थितियों में सोचते हैं और स्थिति को नियंत्रित करते हैं, आदि को प्रभावित करता है। मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए शारीरिक स्वास्थ्य को बरकरार रखना महत्वपूर्ण है।
  • सामाजिक स्वास्थ्य समाज में अपने दोस्तों, पड़ोसियों, रिश्तेदारों और अन्य लोगों के साथ पारस्परिक संबंधों को संवारने और बनाए रखने की क्षमता रखता है। यह उचित रूप से कार्य करने और विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों के अनुकूल होने के लिए किसी व्यक्ति की क्षमता को दर्शाता है।
  • जब एक व्यक्ति का मस्तिष्क सभी मानसिक प्रक्रियाओं को कुशलता से निष्पादित करता है तो उसे अच्छे संज्ञानात्मक स्वास्थ्य का आनंद लेना कहा जाता है। प्रक्रियाओं और क्रियाकलापों में नई बातें, अच्छे निर्णय, अपनी बात और मजबूत संवाद करने के लिए भाषा का कुशल उपयोग करना शामिल है।
  • आध्यात्मिक स्वास्थ्य को बरकरार रखने से एक व्यक्ति अधिक सकारात्मक, जुझारू और सुलझा हुआ बनता है।
  • स्वास्थ्य का मतलब केवल आपकी शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य नहीं है बल्कि इसके बारे में ऊपर बताए गए विभिन्न तत्व भी इसमें शामिल हैं। जहाँ अच्छा शारीरिक स्वास्थ्य एक स्वस्थ जीवन के लिए आधार है वहीँ आपको एक स्वस्थ्य जीवन का आनंद लेने के लिए अन्य सभी स्वास्थ्य घटकों को बनाए रखना आवश्यक है।

Conclusion :

जीवन में हर कदम पर प्रतिस्पर्धा होती है। प्रत्येक व्यक्ति दूसरे की बराबरी करना चाहता है चाहे वह स्कूल या कॉलेज स्तर पर हो या जीवन में स्वास्थ्य शैली को बनाए रखनी की हो। लोगों को इस तथ्य को पहचानना चाहिए कि स्वास्थ्य पहले है। हम यह सब तभी कर सकते हैं जब हम स्वस्थ होते हैं और जीवन के अन्य पहलुओं पर बेहतर काम करते हैं। सरकार को देश की भलाई के लिए अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएँ भी प्रदान करनी चाहिए।

मानसिक बीमारी का इलाज़ संभव है। हम सकारात्मक सोच और अपनी जीवनशैली में बदलाव लाकर इस बीमारी को दूर कर सकते हैं। नियमित व्यायाम जैसे कि सुबह की सैर, योग और ध्यान मानसिक स्वास्थ्य को ठीक करने के लिए बेहतरीन औषधि साबित हुए हैं। अच्छा भोजन और पर्याप्त नींद लेना भी बहुत जरूरी है। तनावमुक्त और निरोगी जीवन के लिए अच्छा मानसिक स्वास्थ्य बहुत जरूरी है, क्योंकि हम सभी को अपने -अपने जीवन में बड़ी सफलताएं हासिल करनी है जिसके लिए अच्छे मानसिक स्वास्थ्य की बहुत जरूरत होती है।

योग का महत्व 

Introduction :

योग दुनिया में सबसे लोकप्रिय अभ्यास है, जिसकी शुरुआत भारत में योगियों द्वारा की गई । यह एक व्यायाम है जिसे हम अपने शरीर को संतुलित करके करते हैं। यह जीवन भर स्वस्थ रहने का सबसे अच्छा और सुरक्षित तरीका भी माना जाता है। यह हमारे शरीर के साथ-साथ मन पर भी नियंत्रण रखने में हमारी मदद करता है। यह हमें तनाव और चिंता से मुक्त करने का एक असरदार तरीका है। यह एक दवा की तरह है, जो हमारे शरीर के अंगों के कार्यों करने के ढंग को नियमित करके हमें विभिन्न बीमारियों से बचाने का कार्य करता है तथा हमारे शरीर को मजबूत बनाता है और हमें स्वस्थ रहने में मदत करता है। 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाया जाता है जब लोगों को योग के लाभों के बारे में जागरूक किया जाता है।

यह केवल एक शारीरिक क्रिया ही नहीं है, क्योंकि यह हमें मानसिक, भावनात्मक और आत्मिक विचारों पर नियंत्रण करने के योग्य भी बनाता है। यह हमारे मस्तिष्क को तेज करता है, बौद्धिक स्तर को सुधारता है और उच्च स्तर की एकाग्रता में मदद करता है। यदि हम नियमित रूप से अभ्यास करते हैं तो हम योग से आत्म-अनुशासन और आत्म-जागरूकता विकसित कर सकते हैं।

  • योग एक कला है जो हमारे शरीर, मन और आत्मा को एक साथ जोड़ता है और हमें मजबूत और शांतिपूर्ण बनाता है। योग आवश्यक है क्योंकि यह हमें फिट रखता है, तनाव को कम करने में मदद करता है और समग्र स्वास्थ्य को बनाए रखता है और एक स्वस्थ मन ही अच्छी तरह से ध्यान केंद्रित करने में सहायता कर सकता है।
  • योग आंतरिक शांति प्राप्त करने और तनाव तथा अन्य समस्याओं के खिलाफ लड़ाई में मदद करता है। योग एक व्यक्ति में शांति के स्तर को बढ़ाता है और उसके आत्मविश्वास को और अधिक बढ़ाने तथा उसे खुश रहने में मदद करता है।
  • एक स्वस्थ व्यक्ति एक अस्वस्थ व्यक्ति की तुलना में अधिक काम कर सकता है। आजकल जीवन बहुत तनावपूर्ण है और हमारे आसपास बहुत प्रदूषण है। यह कई स्वास्थ्य समस्याओं का कारण है। सिर्फ 10-20 मिनट का योग हर दिन आपके स्वास्थ्य को अच्छा रहने में मदद कर सकता है। बेहतर स्वास्थ्य का मतलब बेहतर जीवन है।
  • आजकल लोग आलसी, थके हुए या नींद की कमी महसूस करते हैं जिसके कारण वे अपने जीवन में अधिकतर मौज-मस्ती से चूक जाते हैं और अपने काम को सही ढंग से पूरा करने में सक्षम नहीं हैं।
  • सक्रियता होने के नाते आप अपने आसपास होने वाली चीजों के बारे में अधिक जागरूक रहते हैं और अपने काम को अधिक कुशलतापूर्वक और जल्दी से पूरा कर पाते हैं यह सब करने का एक तरीका नियमित रूप से योग का अभ्यास करना है।
  • लोग आजकल कई प्रकार के दर्द से ग्रस्त हैं। वे पैर की उंगलियों को छूने या नीचे की ओर झुकने के दौरान कठिनाइयों का सामना करते हैं। योग का नियमित अभ्यास इन सभी प्रकार के दर्द से राहत में मदद करता है। योग करने से इन सभी चीजों का प्रभाव कुछ दिनों में कम होता देखा जा सकता है।
  • योग आपके दिल को स्वस्थ बनाने में मदद करता है और यह आपके शरीर और नसों में रक्त के प्रवाह को बढ़ाकर अधिक कुशलता से काम करता है। यह आपके शरीर को ऑक्सीजन युक्त रखने में मदद करता है।
  • योग आपके शरीर को शांत करने और आराम करने में मदद करता है जिसका मतलब तनाव का कम होना है और आप अपने काम पर ध्यान केंद्रित कर सकते है।
  • यही कारण है कि बच्चों और किशोरों को योग करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है क्योंकि यह उनकी पढ़ाई में बेहतर तरीके से ध्यान केंद्रित करने में मदद करता है।
  • योग को आसान तक सीमित होने की वजह से आंशिक रूप से ही समझा जाता है, लेकिन लोगों को शरीर, मन और सांस को एकजुट करने में योग के लाभों का एहसास नहीं है। किसी भी आयु वर्ग और किसी भी शरीर के आकार के व्यक्ति द्वारा योग का चयन और इसका अभ्यास किया जा सकता है।
  • यह किसी के लिए भी शुरू करना संभव है। आकार और फिटनेस स्तर से कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि योग में विभिन्न लोगों के अनुसार प्रत्येक आसन के लिए संशोधन मौजूद हैं।

योग के फायदे –

  • मांसपेशियों के लचीलेपन में सुधार
  • शरीर के आसन और एलाइनमेंट को ठीक करता है
  • बेहतर पाचन तंत्र प्रदान करता है
  • आंतरिक अंग मजबूत करता है
  • अस्थमा का इलाज करता है
  • मधुमेह का इलाज करता है
  • दिल संबंधी समस्याओं का इलाज करने में मदद करता है
  • त्वचा के चमकने में मदद करता है
  • शक्ति और सहनशक्ति को बढ़ावा देता है
  • एकाग्रता में सुधार
  • मन और विचार नियंत्रण में मदद करता है
  • चिंता, तनाव और अवसाद पर काबू पाने के लिए मन शांत रखता है
  • तनाव कम करने में मदद करता है
  • रक्त परिसंचरण और मांसपेशियों के विश्राम में मदद करता है

कोई भी व्यक्ति योग का अभ्यास कर सकता है चाहे वह किसी भी उम्र का हो या जिस भी धर्म का पालन करता हो। जब हम योग को अपने जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा  बनाते हैं और हर दिन इसका अभ्यास करते हैं तो यह हम सभी के लिए बहुत फायदेमंद साबित होता है। स्वस्थ और खुशहाल जीवन जीने के लिए सभी को इसका अभ्यास जरूर करना चाहिए।

मोबाइल एडिक्शन

Introduction :

मोबाइल की लत आजकल हमारे समाज में एक चिंता का विषय बन चूका है। मोबाइल फोन की लत पड़ना जितना आसान है, इससे छुटकारा पाना उतना ही मुश्किल। दुनिया भर में लाखो लोग मोबाइल फोन के आदी हो चुके हैं। मोबाइल फ़ोन हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चूका है, इसके आभाव में हमारे अनेकों काम रुक जाते हैं। जब कोई व्यक्ति खुद को अपने मोबाइल से दूर नहीं रख पाता, इस स्थिति को मोबाइल की लत कहते हैं। मोबाइल फोन का आविष्कार हमें सशक्त बनाने के लिए किया गया था, लेकिन अब यह हम पर हावी होने लगा है। इसके माध्यम से हम दुनिया भर में किसी से भी बात कर सकते है। यह हमें उन सभी प्रकार की जानकारी प्राप्त करने में सक्षम बनाता है जिनकी हमें आवश्यकता है और मनोरंजन का एक बड़ा स्रोत भी है। स्मार्ट फोन हमें गेम खेलने, पढाई करने और ऑनलाइन शॉपिंग करने में सक्षम बनाता हैं।

यह हमें फिल्में देखने, फ़ोटो खींचने, संगीत सुनने, इंटरनेट पर सर्फ करने और विभिन्न अन्य गतिविधियों का आनंद लेने में सक्षम बनाता है। अत्यधिक उपयोगिता के कारण हमें इसकी लत लगती जा रही है जो हमारे लिए हानिकारक हो सकता है। मोबाइल की लत कई गंभीर समस्याओं का मुख्य कारण बन सकती है, जैसे व्यक्ति में चिड़चीड़ापन का होना, हमेशा सिर दर्द की समस्या, नेत्र संबंधित समस्या, अनिंद्रा व मोबाइल के हानिकार रेडिएशन से कई अन्य तरह के रोग भी हो सकते हैं। मोबाइल की लत का एक और संकेत समय की हानि है। वह व्यक्ति जो मोबाइल फोन का आदी है, उसको समय का पता ही नहीं रहता। वह अपना कोई भी कार्य समय पर समाप्त नहीं कर पता। मोबाइल फोन की आदत से छुटकारा पाना मुश्किल हो सकता है लेकिन असंभव नहीं।

  • अपनो से जोड़ना’ कहां मोबाइल की परिभाषा के रूप में पढ़ा जाता था। आज अपनों से दूरी का मुख्य कारण मोबाइल है। व्यक्ति एक रूम में एक साथ होने के बाद भी पास बैठे लोगों में अपनी कोई रुचि नहीं दिखाता और अपने-अपने मोबाइल के स्क्रीन स्क्रोल करता रहता है। इससे आपसी संबंध कमज़ोर होते हैं।
  • मोबाइल के लगातार इस्तेमाल से उससे निकलने वाली हानिकारक रेडिएशन से हमें हृदय संबंधी रोग हो सकते है। इसके अलावां आँखों के रौशनी पर भी गहरा असर पड़ता है। साथ ही सिर दर्द, नींद न आना, चिड़चीड़ापन, याददाश्त का कमज़ोर होना अन्य स्वास्थ्य संबंधित समस्याएं हो सकते हैं।
  • बेशक टेकनॉलजी के माध्यम से हम विकास की ओर बढ़ पाते है, जिसमें मोबाइल फ़ोन मुख्य भूमिका निभाता है। क्योंकि सबके पास पढ़ाई के लिए लैपटॉप या कम्पूटर नहीं हो सकता पर मोबाइल होता है। जिसकी मदद से वह अपने संदेह दूर कर सकते हैं पर मोबाइल की लत में आज लोग घंटों अपना किमती समय मोबाइल को दे देते हैं। जिससे उनका ध्यान पढ़ाई पर नहीं लगता है। अपने व्यवसाय में वह अपना पूर्ण योगदान नहीं दे पाते हैं।
  • खुद में ही खोए रहते हैं और खुद से दूर होते चले जाते हैं। हम पढ़ाने वाले समय पर भी खुद से झुठ बोलकर मोबाइल पर पढ़ाई करने के बहाने ढुंढ़ते हैं।
  • मोबाइल के न मिलने पर या खो जाने पर हम सभी परेशान हो जाते है पर बहुत अधिक चिंता का होनानोमोफोबीया कहलाता हैं। इसमें मोबाइल के न होने पर व्यक्ति असहज महसूस करता है तथा उसे बहुत अधिक घबराहट होने लगता है। विश्व भर में किए गए शोध से पता चला है, नोमोफोबिया की शिकायत तेजी से बढ़ती जा रही है। मोबाइल फ़ोन को बहुत अधिक चलाने से यह बीमारी हो सकती है।
  • नोमोफोबिया में संबंधित व्यक्ति को मोबाइल चोरी होने या गिर जाने के सपनें आते हैं, इससे वह घबराहट में नींद से उठ जाता हैं। ऐसा दिन भर मोबाइल की चिंता करने के वजह से होता है।
  • हम सभी अपने किमती सामानों के न मिलने पर घबरा जाते हैं, पर नोमोफोबीया में व्यक्ति का मोबाइल खो जाने पर वह इतना घबरा जाता है की उसे पैंनिक अटैक आ सकते हैं।
  • नोमोफोबिया का अर्थ नो मोबाइल फोबिया है, इसमें व्यक्ति किसी भी स्थिति में मोबाइल को स्वयं से दूर नहीं कर सकता। वह जहां कहीं भी जाता है मोबाइल लेकर हीं जाना पसंद करता है। सोने पर भी वह अपने समीप ही मोबाइल को रख कर सोता है।
  • नोमोफोबिया में बार-बार व्यक्ति को कॉल आने का आभास होता है, उसे लगता है मोबाइल की रिंग जैसे बज रही हो।
  • यह कुछ लक्षण है, जिससे मालुम चलता है व्यक्ति नोमोफोबिया का शिकार हो चुँका है, अतः सही समय पर इससे छुटकारा पाने के लिए उचित कदम उठाना चाहिए।
  • मोबाइल की लत ने व्यक्ति को अपने अधीन कर लिया है। गैजेट हमारे उपयोग के लिए है पर यहां गैजेट्स हमारा उपयोग कर रहे हैं। व्यक्ति को मोबाइल की ऐसी लत है की वह पास बैठे लोगों से बात करने के स्थान पर सोशल मीडिया पर मित्रों से लगा रहता है।
  • इससे उसके अपनों से आपसी संबंध कमज़ोर होते चले जाते है। साथ ही व्यकि के जीवन की विभिन्न पहलुओं को भी यह लत प्रभावित करता है जैसे स्वास्थ्य, आजीविका (career), अध्ययन आदि।
  • मोबाइल में अनेक ऐसे एप्लिकेशन हैं जिससे व्यक्ति पूरा-पूरा दिन दोस्तों से बाते करते रह सकते हैं, जैसे- वॉट्सएप, फेशबुक, इन्टाग्राम आदि। इसके वजह से बच्चे पढ़ाई में समय नहीं देते, बड़े अपने काम पर ध्यान नहीं देते हैं।
  • मोबाइल फ़ोन के हद से ज्यादा उपयोग से हम अनेक तरह के रोगों के चपेट में आ सकते हैं जैसे- आँखों का कमज़ोर होना, सिर दर्द, कम सुनाई देना, तनाव, अनिंद्रा आदि।
  • मोबाइल में सब कुछ आसानी से मिल जाने के वजह से हमारी याद करने की क्षमता कम होती जा रही है।

Conclusion :

मोबाइल की लत में पड़ा व्यक्ति सुबह उठने के बाद सबसे पहले मोबाइल चैक करता है, जब तक नींद न आ जाए मोबाइल उपयोग करता है तथा सोने के बाद भी अपने सिरहानें उसे रख कर सोता है। बेशक इस उपकरण से ज्यादा महत्वपूर्ण लोग आपके जीवन में हैं, उन्हें महत्व देना चाहिए।मोबाइल की लत से समय का दुरोपयोग होता है, समय से न सोना, समय से न उठना हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव डालता है। मोबाइल में आज अनेक तरह के गेम्स बच्चों को मिल जाते हैं, इसके फलस्वरूप बच्चें बाहर खेले जाने वाले खेल से कटते जा रहे हैं।

हम सोशल मीडिया, टेक्सटिंग, गेमिंग या वीडियो देखने जैसी मोबाइल गतिविधियों के लिए एक समय निर्धारित कर सकते हैं ताकि अपने अन्य कार्य समय पर कर पाए। हम पेंटिंग, नृत्य, इनडोर या आउटडोर गेम खेलने जैसी अन्य मनोरंजक गतिविधियों में भी संलग्न हो सकते हैं। अगर हम उचित प्रयास करे तो धीरे- धीरे इस समस्या से छुटकारा पा सकते हैं। अगर हम इसका सहीं प्रकार से उपयोग करते है तो यह हमारा काम आसान कर देता है और अगर हमे इसकी लत लग जाये तो यह हमारा ही उपयोग करने लगाता है।

वर्क फ्रॉम होम 

Introduction :

‘वर्क फ्रॉम होम’ कार्य करने का एक आधुनिक तरीका है, जहां कंपनी या फर्म के कर्मचारी अपने घर से ही अपना काम कर सकते हैं। घर से काम करने से कर्मचारियों के साथ-साथ कंपनियों के प्रबन्धको को भी आसानी रहती है क्योंकि पूरा काम समय पर बड़ी आसानी से समाप्त किया जा सकता है। कोरोना महामारी के खतरे को देखते हुए दुनिया भर की कंपनियों ने वर्क फ्रॉम होम की नीति अपनाई। भारत के लिए यह भले ही नई बात हो, लेकिन दुनिया के अन्य देशों में यह चलन पहले से ही मौजूद था। ‘वर्क फ्रॉम होम’ ने कई व्यावसायो और कंपनियों के लिए काम करने की नई संभावनाओं की राहे खोल दी है। कई कम्पनियाँ इसके माध्यम से अपने व्यापार मॉडल में सुधार कर रही है और साथ ही इसका फायदा उनके कर्मचारियों को भी मिल रहा है।

यदि कोई कर्मचारी स्वास्थ संबंधित समस्याओं का सामना कर रहा हैं, तो ‘वर्क फ्रॉम होम उनके लिए एक अच्छा उपाय साबित हो सकता है। यही कारण है कि आजकल, अधिकांश आईटी और अन्य संबंधित कंपनियां अपने कर्मचारियों को यह विकल्प दे रही हैं। लेकिन वर्क फ्रॉम होम हर किसी की क्षमता और व्यक्तित्व के लिए उपयुक्त नहीं है। कुछ कर्मचारी कार्यालय के वातावरण में काम करना पसंद करते हैं।

  • कोरोना वाय़रस संक्रमण के खतरे को देखते हुए दुनिया भर की कंपनियों ने वर्क फ्रॉम होम की नीति अपनाई है. भारत के कॉरपोरेट कल्चर के लिए यह भले ही नई बात है और आपदा के दौर में अपनाई गई व्यवस्था है, लेकिन दुनिया के अन्य देशों में यह चलन पहले से ही है.
  • कई कंपनियों ने कर्मचारियों को घर से काम करने (वर्क फ्रॉम होम) की सुविधा दी है. यह कदम इसलिए उठाया गया है ताकि ‘कम्युनिटी ट्रांसमिशन’ को रोका जा सके.
  • हालांकि घर से काम करने वाले अधिकतर लोग अब नई मुश्किलों से जूझ रहे हैं. कई लोग मानसिक तनाव और दबाव झेल रहे हैं. इसकी कई वजहें हैं.
  • कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए किये गए लॉकडाउन की वजह से ज्यादातर कंपनियों ने कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम का विकल्प दे दिया है. घर से काम करने के कारण कुछ लोग आलस्य महसूस करने लगे हैं. कुछ लोगों का मानना है कि घर पर काम करने के कारण अक्सर उनके गर्दन और कंधों में दर्द रहने लगा है.
  • नेशनल करियर सर्विस ने कहा है कि वर्क फ्रॉम होम को सफल बनाने के लिए जरूरी है आप हर दिन के काम की पूरी लिस्ट बनाएं और उसे शाम में चेक करें कि आपने सारे काम पूरे कर लिए हैं या नहीं. दूसरी बात यह है कि घर पर आप ऑफिस जैसा माहौल बनायें.
  • वर्क फ्रॉम होम के दौरान आप अपने काम के समय को लेकर स्पष्ट रहें. जैसे आप ऑफिस जाने के बाद एक निर्धारित समय तक काम करते हैं, वैसे ही आप घर से भी निर्धारित समय में ही काम करें. आप उस काम के बीच में ना डिस्टर्ब हों, ना कोई और काम करें. इसके साथ ही नेशनल करियर सर्विस ने कहा है कि ऑफिस के समय में केवल ऑफिस का काम करें.
  • अपने घर से काम करते समय भी आपको अपने सहकर्मियों के साथ संपर्क में रहना चाहिए. दूसरी बात यह है कि ऑफिस के कामकाज से संबंधित बातचीत करने के लिए आप डिजिटल संचार माध्यम का उपयोग करें. आप ईमेल कर सकते हैं, आप फोन कर सकते हैं, आप चैट कर सकते हैं या वीडियो कॉल कर सकते हैं. 
  • घर से ग्रॉसरी का सामान खरीदने के लिए बाहर निकलें तो साथ में सैनिटाइजर जरूर रखें. वजह यह है कि ग्रॉसरी शॉप या सुपरमार्केट में कई चीजों को छूना पड़ सकता है. कार्ट, काउंटर, शेल्‍फ वगैरह को छूने पर हाथों पर सैनिटाइजर जरूर लगाएं
  • जरूरी नहीं है कि आप सर्जिकल मास्‍क ही पहनें. हेल्‍थकेयर प्रोफेशनल्‍स को इनकी ज्‍यादा जरूरत होती है. घर पर कपड़े से बने मास्‍क भी आपकी सुरक्षा करने में मददगार होते हैं. आवश्‍यक वस्‍तुएं खरीदने के लिए बाहर निकलें तो मास्‍क जरूर पहन लें.
  • हफ्तेभर की ग्रॉसरी खरीदना पर्याप्‍त है. सरकार ने भरोसा दिया है कि वह आवश्‍यक वस्‍तुओं की आपूर्ति में बाधा नहीं आने देगी. इस दौरान प्रोटीनयुक्‍त खाना खाने की सलाह दी जाती है क्‍योंकि यह इम्‍यूनिटी को बढ़ाता है और सेहतमंद होता है.

Conclusion :

ज्‍यादातर दुकानों के सामने अब दुकानदारों ने गोले खींच दिए हैं. ऐसा सोशल डिस्‍टेंसिंग यानी सामाजिक दूरी को बनाए रखने के लिए किया गया है. ग्रॉसरी खरीदते वक्‍त एक-दूसरे से छह फीट की दूरी बनाकर रखना सही है. जितना संभव हो डिजिटल पेमेंट का इस्‍तेमाल करें. यह न केवल संक्रमण के खतरे को कम करता है, बल्कि कैश बचाने में भी मदद करता है. इसके चलते लॉकडाउन में छोटी-छोटी अवधियों में आपको एटीएम नहीं भागना पड़ता है. ग्रॉसरी खरीदकर घर वापस लौटने पर 20 सेकेंड तक अपने हाथों को साबुन से धुलना नहीं भूलें इसकी वजह यह है कि ज्यादातर मोबाइल ‘हाई-टच सरफेस’ माने जाते हैं. यहां हम ऐसी बातें बता रहे हैं जिनका ध्यान आपको स्मार्टफोन और लैपटॉप सहित गैजेट्स को साफ करते वक्त रखना है.

वर्क फ्रॉम होम करते हुए शुरुआती समय में कई बार काफी थकान महसूस होती है और काम नीरस लगने लगता है। वर्क फ्रॉम होम करने वाले कर्मचारीयो के कार्य की निगरानी करने में भी कठिनाई होती है। कंपनियां कर्मचारियों को घर से काम करने के लिए प्रोत्साहित कर सकती हैं लेकिन बेहतर परिणाम के लिए कुछ नियम भी होने चाहिए ताकि घर से काम प्रभावी ढंग से और समय सीमा के भीतर हो सके। वर्क फ्रॉम होम रोमांचक और लाभदायक है, लेकिन काम में स्वतंत्रता से जिम्मेदारियां भी बढ़ जाती हैं।

कोरोना वायरस का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

Introduction :

कोरोनावायरस (COVID-19) एक संक्रामक रोग है जो कोरोनावायरस के कारण होता है। इसकी शुरुआत पहली बार दिसंबर 2019 में चीन के वुहान शहर से हुई। डब्ल्यूएचओ ने 30 जनवरी को कोरोनवायरस को अंतरराष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किया है। कोरोनावायरस न केवल लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है बल्कि दुनिया के सभी देशों की अर्थव्यवस्थाओं को भी प्रभावित कर रहा है। विश्व व्यापार संगठन के अनुसार, व्यापार के मामले में, चीन दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक और दूसरा सबसे बड़ा आयातक है। विश्व के निर्यात का 13% और आयात का 11% केवल चीन से होता है। दुनिया के कई उद्योग अपने कच्चे माल के लिए चीन पर निर्भर हैं। 

पुरे विश्व में खरीदी जाने वाली लगभग एक तिहाई मशीनरी चीन से आती है, इसलिए कोरोनवायरस ने वैश्विक आपूर्ति पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है।चीन में कई कारखाने अब बंद हो गए हैं, निर्भर कंपनियों के लिए उत्पादन भी बंद हो गया है। उत्पादन में मंदी के कारण खपत में भी गिरावट आई है और इस तरह से दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं पर असर पड़ रहा है। कोरोनोवायरस फैलने के कारण लोगों की आवाजाही पर प्रतिबंध के कारण पर्यटन उद्योग को भी भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

कोरोना वायरस का आयात पर प्रभाव –

  • इस वायरस से हवाई यात्रा, शेयर बाज़ार, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं सहित लगभग सभी क्षेत्र प्रभावित हो रहे हैं।
  • यह वायरस अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है, जबकि इसके कारण चीनी अर्थव्यवस्था पहले से ही मुश्किल स्थिति में है।
  • इन दो अर्थव्यवस्थाओं, जिन्हें वैश्विक आर्थिक इंजन के रूप में जाना जाता है, संपूर्ण वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुस्ती तथा आगे जाकर मंदी का कारण बन सकता है।
  • निवेशकों के बाज़ारों से बाहर निकलने के कारण शेयर बाज़ार सूचकांक में लगातार गिरावट आई है। लोग बड़ी राशि को अपेक्षाकृत सुरक्षित क्षेत्र यथा- ‘सरकारी बाॅण्ड’ में लगा रहे हैं जिससे कीमतों में तेज़ी तथा उत्पादकता में कमी देखी गई है।
  • अमेरिकी बाज़ार में वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद सबसे खराब अनुभव हाल ही में कोरोना वायरस के कारण महसूस किया गया, ध्यातव्य है कि अमेरिकी बाज़ार में 12% से अधिक की गिरावट आई है।
  • यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि जो निवेशक ऐसे संकट के समय सामान्यत: स्वर्ण में निवेश करते हैं, इस संकट के समय उन्होंने इसका भी बहिष्कार कर दिया जिससे सोने की कीमतों में गिरावट देखी गई, तथा लोगों ने सरकारी गारंटी युक्त ‘ट्रेज़री बिल’ (Treasury Bills) में अधिक निवेश करना उचित समझा।
  • Apple, Nvidia, Adidas जैसी कंपनियाँ इससे अधिक प्रभावित हो सकती हैं क्योंकि ये चीन के आपूर्तिकर्त्ताओं पर निर्भर हैं, इन्हें भविष्य में बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है।

भारत की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव –

  • भारत जब अर्थव्यवस्था को पुन: पटरी पर लाने की कोशिश कर रहा है, ऐसे समय में इस वायरस का केवल सतही प्रभाव नहीं पड़ेगा तथा ऐसे कठिन समय में समस्या का समाधान मात्र ‘एयर लिफ्टिंग’ से संभव नहीं है।
  • यह समस्या न केवल आपूर्ति शृंखला को प्रभावित करेगी, अपितु यह भारत के फार्मास्यूटिकल, इलेक्ट्रॉनिक, ऑटोमोबाइल जैसे उद्योगों को गंभीर रूप से प्रभावित करेगी।
  • निर्यात, जिसे अर्थव्यवस्था के विकास का इंजन माना जाता है, इसमें वैश्विक मंदी की स्थिति में और गिरावट देखी जा सकती है, साथ ही निवेश में भी गिरावट आ सकती है।
  • भारतीय कंपनियाँ चीन आधारित ‘वैश्विक आपूर्ति शृंखला’ में शामिल प्रमुख भागीदार नहीं हैं, अत: भारतीय कंपनियाँ इससे अधिक प्रभावित नहीं होंगी।
  • दूसरा, कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आ रही है, जो कि वृहद् अर्थव्यवस्था और उच्च मुद्रास्फीति के चलते अच्छी खबर है।
  • भारत सरकार को लगातार विकास की गति का अवलोकन करने की आवश्यकता है, साथ ही चीन पर निर्भर भारतीय उद्योगों को आवश्यक समर्थन एवं सहायता प्रदान करनी चाहिये।
  • कोरोना वायरस जैसी बीमारी की पहचान, प्रभाव, प्रसार एवं रोकथाम पर चर्चा अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों द्वारा की जानी चाहिये ताकि इस बीमारी पर नियंत्रण पाया जा सके।

Conclusion :

वायरस जनित यह संकट किसी अन्य वित्तीय संकट से बिलकुल अलग है। अन्य वित्तीय संकटों का समाधान समय-परीक्षणित उपायों जैसे- दर में कटौती, बेल-आउट पैकेज (विशेष वित्तीय प्रोत्साहन) आदि से किया जा सकता है, परंतु वायरस जनित संकट का समाधान इन वित्तीय उपायों द्वारा किया जाना संभव नहीं है। ऑटोमोबाइल उद्योग पहले ही आर्थिक मंदी के कारण संकट में है और अब माल और सेवाओं की आपूर्ति बाधित होने के कारण उत्पादन में कमी आ रही है। चीन से आपूर्ति में रुकावट के कारण वैश्विक वित्तीय बाजार में उतार-चढ़ाव हो रहा है। यद्यपि दुनिया की अर्थव्यवस्था पर कोरोनोवायरस के सटीक प्रभाव को निर्धारित करना मुश्किल है, फिर भी यह स्पष्ट है कि यह प्रभाव लंबे समय तक रहेगा।

भारत में बेरोजगारी की समस्या

Introduction :

बेरोजगारी भारत में एक अहम मुद्दा बनता जा रहा है  जब कोई व्यक्ति काम करने योग्य हो और काम करने की इच्छा भी रखे किन्तु उसे काम का अवसर प्राप्त न हो तो वह बेरोजगार कहलाता हैं। आज हमारे देश मे लाखो लोग बेरोजगार है। ऐसा इसलिए है क्योंकि नौकरियाँ सीमित हैं और नौकरी पाने वालो की संख्या असीमित। भारत में बेरोजगारी की स्थिति एक गंभीर सामाजिक समस्या है। शिक्षा का अभाव और रोजगार के अवसरों की कमी ऐसे कारक हैं जो बेरोज़गारी का प्रमुख कारण हैं। बेरोज़गारी न केवल देश के आर्थिक विकास में बाधा डालती है बल्कि व्यक्तिगत और पूरे समाज पर भी एक साथ कई तरह के नकारात्मक प्रभाव डालती है।

2011 की जनगणना के अनुसार युवा आबादी का 20 प्रतिशत जिसमें 4.7 करोड़ पुरूष और 2.6 करोड़ महिलाएं पूर्ण रूप से बेरोजागार हैं। यह युवा 25 से 29 वर्ष की आयु समूह से हैं। यही कारण है कि जब कोई सरकारी नौकरी निकलती है तो आवेदको की संख्या लाखों मे होती हैं। तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या भारत मे बेरोजगारी का प्रमुख कारण हैं। वर्तमान शिक्षा प्रणाली भी दोषपूर्ण है। बेरोजगारी को दूर करने में जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण आवश्यक है। जिस अनुपात में रोजगार से साधन बढ़ते है, उससे कई गुना जनसंख्या में वृद्धि हो  जाती है।

  • सबसे खराब स्थिति तो वह है जब पढ़े-लिखे युवकों को भी रोजगार नहीं मिलता शिक्षित युवकों की यह बेरोजगारी देश के लिए सर्वाधिक चिन्तनीय है, क्योंकि ऐसे युवक जिस तनाव और अवसाद से गुजरते हैं, उससे उनकी आशाएं टूट जाती हैं और वे गुमराह होकर उग्रवादी, आतंकवादी तक बन जाते हैं।
  • पंजाब, कश्मीर और असम के आतंकवादी संगठनों में कार्यरत उग्रवादियों में अधिकांश इसी प्रकार के शिक्षित बेरोजगार युवक हैं। बेरोजगारी देश की आर्थिक स्थिति को डाँवाडोल कर देती है। इससे राष्ट्रीय आय में कमी आती है, उत्पादन घट जाता है और देश में राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न हो जाती है।
  • बेरोजगारी से क्रय शक्ति घट जाती है, जीवन स्तर गिर जाता है जिसका दुष्प्रभाव परिवार एवं बच्चों पर पड़ता है। बेरोजगारी मानसिक तनाव को जन्म देती है जिससे समाज एवं सरकार के प्रति कटुता के भाव जाग्रत होते हैं परिणामतः व्यक्ति का सोच नकारात्मक हो जाता है और वह समाज विरोधी एवं देश विरोधी कार्य करने में भी संकोच नहीं करता।

बेरोजगारी के कारण

  • भारत में बढ़ती हुई इस बेरोजगारी के प्रमुख कारणों में से एक है— तेजी से बढ़ती जनसंख्या। पिछले पाँच दशकों में देश की जनसंख्या लगभग चार गुनी हो गई है। सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की आबादी 125 करोड को पार कर गई है।
  • यद्यपि सरकार ने विभिन्न योजनाओं के द्वारा रोजगार को अनेक नए अवसर सुलभ कराए हैं, तथापि जिस अनुपात में जनसंख्या वृद्धि हुई है उस अनुपात में रोजगार के अवसर सुलभ करा पाना सम्भव नहीं हो सका, परिणामतः बेरोजगारों की फौज बढ़ती गई।
  • प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में बेरोजगारों की वृद्धि हो रही है। बढ़ती हुई बेरोजगारी से प्रत्येक बुद्धि-सम्पन्न व्यक्ति चिन्तित है। हमारी शिक्षा पद्धति भी दोषपूर्ण है जो रोजगारपरक नहीं है।
  • कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से लाखों स्नातक प्रतिवर्ष निकलते हैं। किन्तु उनमें से कुछ ही रोजगार पाने का सौभाग्य प्राप्त कर पाते हैं। उनकी डिग्री रोजी-रोटी को जुटा पाने में उनकी सहायता नहीं कर पाती।
  • वैज्ञानिक एवं तकनीकी प्रगति ने उद्योगों का मशीनीकरण कर दिया है परिणामतः आदमी के स्थान पर मशीन से काम लिया जाने लगा। मशीन आदमी की तुलना में अधिक कुशलता से एवं अधिक गुणवत्ता से कम कीमत पर कार्य सम्पन्न कर देती है, अतः स्वाभाविक रूप से आदमी को हटाकर मशीन से काम लिया जाने लगा।
  • फिर एक मशीन सैकड़ों श्रमिकों का काम अकेले ही कर देती है। परिणामतः औद्योगिक क्षेत्रों में बेकारी पनप गई। लघु उद्योग एवं कुटीर उद्योगों की खस्ता हालत ने भी बेरोजगारी में वृद्धि की है।

बेरोजगारी दूर करने के उपाय

भारत एक विकासशील राष्ट्र है, किन्तु आर्थिक संकट से घिरा हुआ है। उसके पास इतनी क्षमता भी नहीं है कि वह अपने संसाधनों से प्रत्येक व्यक्ति को रोजगार सुलभ करा सके। ऐसी स्थिति में न तो यह कल्पना की जा सकती है है कि वह प्रत्येक व्यक्ति को बेरोजगारी भत्ता दे सकता है और न ही यह सम्भव है, किन्तु सरकार का यह कर्तव्य अवश्य है कि वह बेरोजगारी को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाए। यद्यपि बेरोजगारी की समस्या भारत में सुरसा के मुख की तरह बढ़ती जा रही है फिर भी हर समस्या का निदान तो होता ही है।

  • भारत में वर्तमान में जनसंख्या वृद्धि 2.1% वार्षिक है जिसे रोकना अत्यावश्यक है। अब ‘हम दो हमारे दो’ का युग भी बीत चुका, अब तो ‘एक दम्पति एक सन्तान’ का नारा ही महत्वपूर्ण होगा, इसके लिए यदि सरकार को कड़ाई भी करनी पड़े तो वोट बैंक की चिन्ता किए बिना उसे इस ओर सख्ती करनी होगी। यह कठोरता भले ही किसी भी प्रकार की हो।
  • देश में आधारभूत उद्योगों के पर्याप्त विनियोग के पश्चात् उपभोग वस्तुओं से सम्बन्धित उद्योगों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। इन उद्योगों में उत्पादन के साथ ही वितरण परिवहन, आदि में रोजगार उपलब्ध होंगे।
  • शिक्षा को रोजगारोन्मुख बनाना आवश्यक है। हमारी शिक्षा पद्धति भी दोषपूर्ण है जो रोजगारपरक नहीं है। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से लाखों स्नातक प्रतिवर्ष निकलते हैं। किन्तु उनमें से कुछ ही रोजगार पाने का सौभाग्य प्राप्त कर पाते हैं। उनकी डिग्री रोजी-रोटी को जुटा पाने में उनकी सहायता नहीं कर पाती।

Conclusion :

धन्धों का विकास गांवों में कृषि सहायक उद्योग-धन्धों का विकास किया जाना आवश्यक है। इससे क्रषक खाली समय में अनेक कार्य कर सकेंगे। बागवानी, दुग्ध उत्पादन, मत्स्य अथवा मुर्गी पालन, पशुपालन, दुग्ध व्यवसाय, आदि ऐसे ही धन्धे है। कुटीरोद्योग एवं लघु उद्योगों के विकास से ग्रामीण एवं शहरी दोनों ही क्षेत्रों में रोजगार के अवसर सुलभ कराए जा सकते हैं।आज स्थिति यह है कि  एक ओर विशिष्ट प्रकार के दक्ष श्रमिक नहीं मिल रहे हैं तो दूसरे प्रकार के दक्ष श्रमिकों को कार्य नहीं मिल रहा है।

बेरोजगारी की दूर करने के सरकार द्वारा अनेक प्रयास किए गए है जिनमे राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम, ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारंटी कार्यक्रम, जवाहर रोजगार योजना, प्रधानमंत्री रोजगार योजना आदि कार्यक्रम शामिल है। लेकिन अभी भी कुछ सख्त कदम उठाने बाकि है। बेरोजगारी को दूर करना देश का सबसे प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए। नागरिकों को अधिक नौकरियों के निर्माण के साथ ही रोजगार के लिए सही कौशल प्राप्त करने के लिए प्रयास करना चाहिए।

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Essays

Essay on Women In Indian Armed Forces

Essay on Women In Indian Armed Forces

Introduction :

Women have done incredible things within the history of the world. They have proven time to time that they are equal in just about every way with the men. In today’s times, women are walking shoulder to shoulder with men in all sphere of life. The Supreme Court of India allowed women to serve as permanently commissioned officers in 10 combat support arms and services of the Indian Army. If we take global perspective, women are serving in the defense forces of many other countries such as the USA, Israel, Canada, Britain Germany etc. But women are normally not included in on-field combat roles.

  • They either serve in technical and administrative posts or sometimes on voluntary basis on the battlefield. The argument behind it is that women might be weaker physically. Thus, they would not possess the physical attributes suitable to become combat soldiers.
  • As per the report of an NGO, female soldiers are, on average, shorter and smaller than men, with 45-50% less upper body strength and 25-30% less aerobic capacity, which is essential for endurance. 
  • In addition, a concern is that romantic relationships between men and women belonging to the same unit could disrupt a unit’s fighting capacity.
  • Another argument against the inclusion of women in combat units is that placing women in combat would create a risk of them being captured, tortured and sexually harassed. 
  • Marriage and the subsequent birth of their children are major turning points in the careers of service women.  Now if we talk about some pros, allowing a mixed gender force keeps the military strong. 
  • Women are more effective in some circumstances than men. Allowing women to serve doubles the talent pool for delicate and sensitive jobs that require interpersonal skills. 
  • Currently, only Indian Air Force inducts women in a combat role as fighter pilots. The Air Force has around 13% of women officers, the highest among all three forces. The Army has approx 4% of women officers, while the Navy has 6% of women officers. 

Conclusion :

We can also say that India has limited experience as regards the induction of women in the armed forces. Hence, our knowledge of the complexities and long-term effects of the issues involved are very limited. On the other hand, women have been serving in the militaries of developed countries for a long time. These countries have acquired a deep understanding of all the issues. It is the responsibility of the Government to create both administrative and social infrastructure for the easy induction of women into the Armed Forces so that they can serve their country too.

Long essay on Women In Indian Armed Forces

Introduction : 

The Indian armed forces comprises of Army, Navy, Air Force and Coast Guard. The Coast Guard was set up as an Armed Force more recently in 1978. Due to their unique roles as protectors of the nation’s land, sea and airspace respectively, the nature of work in each service is different. Apart from their main roles of defending the country, they may also be required to perform tasks to ease civil administration during times of crisis. The Indian president is the supreme commander of the armed forces. In carrying out the primary role of defending the nation, the armed forces personnel are bound by certain rules that govern their conduct. 

  • Bright, young and energetic men and women make up the bulk of manpower in the armed forces. Recruitment is voluntary, which implies that every citizen of India is eligible to be a part of it, provided he/she fulfils the specified criteria for selection. 
  • Caste, region or religion, do not come in the way of the selection process, thereby making it a heterogeneous work place. Personnel retire earlier than many other government sectors, to keep the armed forces team, young and dynamic.
  •  Manpower in each of the services is broadly divided into ‘Commissioned officers’, ‘JCO’s (Junior Commissioned Officers)’ and ‘Other Ranks’ based on their qualifications and seniority.
  • The role of women in the armed forces for a long time, was limited to the medical profession i.e. doctors and nurses. In 1992, the doors were thrown open for women entry as regular officers in aviation, logistics, law, engineering and executive cadres. 
  • Thousands of spirited young women applied against advertisements and it was a turning point in the history of time. These women chose a new field where they had to painstakingly pave a path for the others to follow.
  • The initial adjustment problems weren’t as much for the women as it was for the men. Wrapped in their tradition of chivalry and respect to women, most gentlemen officers could not treat their female counterparts at par with themselves.
  • Their subordinates too, were men who came from conservative families where they saw women playing only traditional roles. The emergence of these women into totally male dominated bastions did initially create embarrassing moments for both. 
  • Men hushed their talks and behaved courteously, while women had to do with makeshift arrangements to suit their needs within units. Over the years and having come a long way now, men have realized that these women in uniform are their efficient and able co-workers. 
  • Currently, women in the non-medical cadre, serve as Short Service Commissioned (SSC) officers. Under this type of commission, they can serve in the armed forces for a period ranging from 5-14 years. On release they can pursue a career in the civil sector. 
  • SSC officers are released with gratuity and can avail some benefits as ex-serviceperson, but they do not get pension.  Women in the medical branch i.e. doctors and nurses can serve as Permanent Commissioned (PC) officers and are eligible for pension after retirement. They also have the option to serve as Short Service Commissioned officers.

 In the modern day of electronic warfare, it’s more about overcoming stress in warfare than physical combat. It has been proven scientifically that women handle stress better and are also mentally tougher. This is not to undermine a woman’s physical capability. Women have done extremely well in physical training as well. In the first few batches at the armed forces training academies women displayed more endurance and some even outran their male counterparts in cross-country runs and long distance marches. They carry on this tradition and keep setting new records. As most lady officers are married to gentlemen officers in the armed forces, as per government policies, they are transferred together. Women officers can also avail of maternity leave; furlough and annual leave in succession, to cater to pre and post-natal care. On retirement too, they enjoy medical facilities and coveted club memberships. 

Women Empowerment – Necessity of present Time

Introduction : 

Women Empowerment refers to the creation of an environment for women where they can make decisions of their own for their personal benefits as well as for the society. A lot is being heard these days on the need for the empowerment of women. With regards to current scenario the question arises that “Are women become really strong?” Many programs have been implemented and run by the government such as international Women’s Day, Mother’s Day etc. in order to bring awareness in the society about the true rights and value of the women in the development of the nation. There is a high level of gender inequality in India where women are ill-treated by their family members and outsiders.

  • The percentage of literate population in India is around 74% in which 65% is covered by women. The real meaning of the women empowerment is to make them well educated and leave them free so that they can be capable of taking their own decisions in any field. 
  • In modern India, women have held high offices including that of the President, Prime Minister, Speaker of the Lok Sabha, Leader of the Opposition, Union Ministers, Chief Ministers and Governors.
  • Women in India now participate fully in areas such as education, sports, politics, media, art and culture, service sectors, science and technology, etc.
  • Women’s empowerment is the most crucial point for the overall development of a country. Suppose, in a family, there is one earning person, while in another family, both men and women are earning, then who will have a better lifestyle.
  • The answer is simple, the family where both men and women are earning money. Thus, the country where men and women work together develops at a faster rate.
  • Crime against women such as rape, acid throwing, dowry killings, honor killings, and the forced prostitution of young girls has been reported in India.
  • India needs to take some advance steps to improve the women’s position in the society through the proper health, higher education, and economic participation. 
  • Women can be empowered in various ways. It can be done through government schemes as well as on an individual basis.

Conclusion : 

At the individual level, we should start respecting women and start giving them opportunities equal to men. We should promote and encourage them for jobs, higher education, business activities, etc.The Government has come up with various schemes such as Beti Bachao Beti Padhao Yojana, Mahila-E-Haat, Mahila Shakti Kendra, Working Women Hostel, Sukanya Samriddhi Yojana, etc.; to empower women. Apart from these schemes, we as individuals can also empower women by abolishing social evils like the dowry system, child marriage. These small steps will change the situation of women in society and make them feel empowered.   

Beti Bachao Beti Padhao – Girls the future of the Society

Introduction : 

Beti Bachao, Beti Padhao (Save girl child, educate a girl child) is a social campaign of the Government of India that aims to generate awareness and improve the position for girls. This program was launched to make some positive changes in the Indian society in status of girl child. The scheme was launched with an initial funding of ₹100 crore. BBBP scheme was launched on 22 January 2015 by the Prime Minister Narendra Modi.

  • There are many restrictions for the girl child in the Indian society which hinders the proper growth and development of the girl child. It aims to address the issue of the declining child sex ratio.
  • This scheme hinders the practice of female foeticide, girl child insecurity, sex discrimination etc. against girl child. Girls should be given equal status in families, at schools and in other places. Women must enjoy a fair share in the economy as well. They are as important as boys.
  • Families in villages and urban areas alike should be well-aware of the scheme. They should be well-educated about the importance of daughters in society. Society cannot progress without daughters.
  • Parents think that only boys are their property as they have to look after them in the old age however girls have to go another place to care her in-laws. 
  • Such thinking of the people about girl is really embarrassing and need to be eradicated from the people’s mind for giving the full rights of girl child from birth.
  • In the Population Census it was revealed that the population ratio of India in 2011 is 943 females per 1000 of males.  Olympics 2016 bronze medalist Sakshi Malik was made brand ambassador for BBBP to bring awareness in the country about the actual position of the girl child.
  • As responsible citizens of our country, we must organize awareness drives to nearby villages and educate them. Also, inform and make localities aware about the importance of girl child and education.
  • The conservative mind still stands as a monstrous hurdle in educating and saving daughters. Street plays in schools, villages, urban and rural-urban areas must be staged that render a message of equality of boys and girls. 

Conclusion :

Teach for India is another initiative that is aimed at teaching poor and socially backward kids irrespective of caste, colour and gender. It is important to raise awareness about the right treatment of girls and the importance of educating them among the students of schools, colleges and universities. Students must take part in speeches and express their opinions about the same. The people of our country should realize the responsibilities towards the girl child and they should be given equal opportunities in our society.

Safety of Women – A step to protect our future

Introduction : 

Women safety in India is a big concern which has been a most important topic regarding women safety. India is a most famous country all over the world for its great tradition and culture where women are given most respected place. Women are given the place of Goddess Lakshmi in the Indian society. Indian women are found working in all fields like aeronautics, space, politics, banks, schools, sports, businesses, army, police, and many more however we also cannot ignore the negative aspect of women position in India. Every day and every minute some women are getting harassed, molested, assaulted, and violated at various places all over the country.  

  • There is a big list of crimes against women in India such as acid attack, domestic violence, child abuse, dowry deaths, honor killings, rape, sexual harassment, forced prostitution, and many more.
  • In order to improve the condition regarding women safety in India self-defense techniques are the first and foremost thing to which each and every woman must be aware of for their safety.
  • They must have all the emergency numbers with them so that they can immediately contact to their family members and police.
  • There is a list of safety laws for women from all type of crimes against women but the number and frequency of crimes against women are increasing day by day. 
  • We should not blame the government because women safety is not only the responsibility of government only, it is the responsibility of every citizen. 
  • Although the list of crimes is very long, we can take measures to ensure women’s safety in our country. Firstly, the government must make stringent laws that ensure the punishment of criminals immediately.
  • Fast track courts must be set so the victim gets justice instantly. This will serve as a great example for other men to not commit crimes against women.

Conclusion :

Most importantly, men must be taught to respect women from an early age. They must consider women as equals so they don’t even think of harming them. When you consider someone inferior, you tend to oppress them. If this thinking goes away, half of the crimes will automatically end. In short, crimes against women are stopping the growth of our country. We must ask the men to change their thinking and work to make the world a safer place for women. There is an urgent need to understand and solve this problem of women safety so that they can also grow equally like men in their own country.

Women Entrepreneurs in India

Introduction :

Women constitute around half of the total world population. So is in India also. They are regarded as the better half of the society. In traditional societies, they were confined to the four walls of houses performing household activities. In modem societies, they have come out of the four walls to participate in all sorts of activities.

  • Women have been performing exceedingly well in different spheres of activities like academics, politics, administration, social work and so on. 
  • The person who has an idea, and who executes this idea and makes sure that it functions smoothly is called an entrepreneur. Entrepreneurs can also helm a business and make sure it runs smoothly.
  • Some of the most famous women entrepreneurs in India are Chanda Kocchar, (MD and CEO, ICICI Bank), Simone Tata (Chairperson, Trent Limited), Neelam Dhawan (MD, HP-India), and Kiran Mazumdar (Chairman and MD, Biocon).
  • The rapid strides that these women have taken over the past few decades have shown us the calibre that all women inherently possess. Indian women are coming out from the daily routine of their lives inside the doors of their houses.

Conclusion :

Multitasking women all over the country balance their work, home and family perfectly. Family members too are helping out and supporting women to achieve successful careers. If all women decide to explore themselves and not limit their lives to certain jobs, then each one of them can become a successful entrepreneur, working by their own rules and contently living their own life. Indian women can achieve this dream and in the coming decades women will do brilliantly in all domains of human lives.

Essay on Crime Against Women In India & Its Challenges

Introduction :

“You can tell the condition of a nation by looking at the status of its women.” This quote is given by Pt. Jawaharlal Nehru which shows that the status of women depicts the social, economic and mental condition of a nation. Crime against women in India is refers to physical, emotional or sexual crime committed against women. It can be in form of domestic violence, sexual assault, acid throwing, child marriage and murder. The main reason behind it is gender inequality present in our patriarchal society. 

  • According to National Crime Records Bureau (NCRB) report 2020, there were 4 lakh cases recorded against women and even more have unreported that really makes our country India one of the most dangerous country for women.
  • In these more than 30% cases were of domestic violence. In the lockdown phase due to covid-19, there was an upsurge in cases of domestic violence that’s why the National Commission for Women (NCW) had to launch WhatsApp number to report these cases.
  • Women are continuously facing and suffering from many threats ranging from molestation, sexual abuse, harassment at workplace, domestic violence, gang rape, eve teasing, cyber bulling, acid attack, marital rape, dowry system to honour killings.
  • These are visible offences against women and covid-19 makes the condition even worse. India also degraded at 140th rank in Global Gender Gap Report 2021 produced by world economic forum.
  • Metropolitans are infamous for heinous rapes like Nirbhaya case of Delhi. For checking such crimes, pilot projects for ‘Safe City Program’ is launched by the government.
  • There is one death every hour due to domestic violence for dowry. To check this, government came up with Dowry prohibition Act 1961 and domestic violence prevention Act 2005.
  • In the aftermath of ‘Kathua Rape Case’ government came up with ‘Protection of Children Against Sexual Offences (POCSO) Act 2012 which aims to provide protection to children against sexual abuse.
  • There should be more strict laws for protecting women, fast track courts also be there for crime against women, training centres should be opened for self defence.

Capital punishment should be mandatory for heinous crimes like rape, acid attack, sexual assault etc. The cases like Kathua kand and Nirbhaya gang rape put a question mark on women’s rights to live with dignity. Social revolution is the need of the hour to root out this menace from our society and we should give respect and recognition to women. This can be done by educating boys & girls and promoting gender equality in our country.

Short Essay on Women’s Safety in India

Introduction :

Women safety in India is a big concern which has been a most important topic regarding women safety. India is a most famous country all over the world for its great tradition and culture where women are given most respected place. Women are given the place of Goddess Lakshmi in the Indian society. Indian women are found working in all fields like aeronautics, space, politics, banks, schools, sports, businesses, army, police, and many more however we also cannot ignore the negative aspect of women position in India.

  • Every day and every minute some women are getting harassed, molested, assaulted, and violated at various places all over the country. 
  • There is a big list of crimes against women in India such as acid attack, domestic violence, child abuse, dowry deaths, honor killings, rape, sexual harassment, forced prostitution, and many more.
  • In order to improve the condition regarding women safety in India self-defense techniques are the first and foremost thing to which each and every woman must be aware of for their safety.
  • They must have all the emergency numbers with them so that they can immediately contact to their family members and police.
  • There is a list of safety laws for women from all type of crimes against women but the number and frequency of crimes against women are increasing day by day. 

Conclusion :

We should not blame the government because women safety is not only the responsibility of government only, it is the responsibility of every citizen. There is an urgent need to understand and solve this problem of women safety so that they can also grow equally like men in their own country.

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Essays

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 पर निबंध (Essay on New Education Policy 2020 in Hindi)

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 पर निबंध (Essay on New Education Policy 2020)

Introduction : 

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को देश की शिक्षा प्रणाली में समयनुसार उचित बदलाव करने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा 29 जुलाई, 2020 को मंजूरी दी गई। यह नीति देश में स्कूल और उच्च शिक्षा प्रणालियों में परिवर्तनकारी सुधार लेन में बहुत मददगार साबित होगी। यह 21 वीं सदी की पहली शिक्षा नीति है। नई नीति का उद्देश्य 2030 तक स्कूली शिक्षा में 100% सकल नामांकन अनुपात (GER) के साथ पूर्व-माध्यमिक से माध्यमिक स्तर तक शिक्षा का सार्वभौमिकरण करना है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति द्वारा कुछ नए बदलाव लाये गए है, जिसमें भारतीय उच्च शिक्षा को विदेशी विश्वविद्यालयों में बढ़ावा देना, चार-वर्षीय बहु-विषयक स्नातक कार्यक्रम के लिए कई निकास विकल्पों के साथ प्रस्तुत करना शामिल है। 

इस  नई नीति का उद्देश्य भारत को वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनाना है। स्कूली शिक्षा में, इस नीति में पाठ्यक्रम को ओवरहाल करने, पाठ्यक्रम में कमी लाने और अनुभवात्मक शिक्षा पर जोर देने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। स्कूल में वर्तमान 10 + 2 प्रणाली को एक नयी  5 + 3 + 3 + 4 पाठ्यक्रम प्रणाली से बदल दिया जाएगा। नई नीति के अनुसार, तीन साल की आंगनवाड़ी / प्री-स्कूलिंग के साथ 12 साल की स्कूली शिक्षा होगी। स्कूल और उच्च शिक्षा में, छात्रों के लिए एक विकल्प के रूप में संस्कृत को भी सभी स्तरों पर शामिल किया जाएगा। यह नीति औपचारिक स्कूली शिक्षा के दायरे में प्री-स्कूलिंग को शामिल करेगी ।

National Education Policy 2021 के विशेषताएं –

  • मानव संसाधन प्रबंधन मंत्रालय अब शिक्षा मंत्रालय के नाम से जाना जाएगा।
  • National Education Policy के अंतर्गत शिक्षा का सार्वभौमीकरण किया जाएगा जिसमें मेडिकल और लॉ की पढ़ाई शामिल नहीं की गई है।
  • पहले 10+2 का पैटर्न फॉलो किया जाता था परंतु अब नई नेशनल एजुकेशन पॉलिसी के अंतर्गत 5+3+3+4 का पैटर्न फॉलो किया जाएगा। जिसमें 12 साल की स्कूली शिक्षा होगी और 3 साल की प्री स्कूली शिक्षा होगी।
  • छठी कक्षा से व्यवसायिक परीक्षण इंटर्नशिप आरंभ कर दी जाएगी।
  • पांचवी कक्षा तक शिक्षा मातृभाषा या फिर क्षेत्रीय भाषा में प्रदान की जाएगी।
  • पहले साइंस, कॉमर्स तथा अर्ट स्ट्रीम होती थी। अब ऐसी कोई भी स्ट्रीम नहीं होगी। छात्र अपनी इच्छा अनुसार विषय चुन सकते हैं। छात्र फिजिक्स के साथ अकाउंट या फिर आर्ट्स का कोई सब्जेक्ट भी पढ़ सकते हैं।
  • छात्रों को छठी कक्षा से कोडिंग सिखाई जाएगी।
  • सभी स्कूल डिजिटल इक्विप्ड किए जाएंगे।
  • सभी प्रकार की इकॉन्टेंट को क्षेत्रीय भाषा में ट्रांसलेट किया जाएगा।
  • वर्चुअल लैब डिवेलप की जाएंगी।

नई शिक्षा नीति 2020 के सिद्धांत –

  • प्रत्येक बच्चे की क्षमता की पहचान एवं क्षमता का विकास करना
  • साक्षरता एवं संख्यामकता के ज्ञान को बच्चों के अंतर्गत विकसित करना
  • शिक्षा को लचीला बनाना
  • एक सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली में निवेश करना
  • गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को विकसित करना
  • बच्चों को भारतीय संस्कृति से जोड़ना
  • उत्कृष्ट स्तर पर शोध करना
  • बच्चों को सुशासन सिखाना एवं सशक्तिकरण करना
  • शिक्षा नीति को पारदर्शी बनाना
  • तकनीकी यथासंभव उपयोग पर जोर
  • मूल्यांकन पर जोर देना
  • विभिन्न प्रकार की भाषाएं सिखाना
  • बच्चों की सोच को रचनात्मक एवं तार्किक करना

नई शिक्षा नीति 2020 के फायदे –

  • नई शिक्षा नीति शिक्षार्थियों के एकीकृत विकास पर केंद्रित है।
  • यह 10+2 सिस्टम को 5+3+3+4 संरचना के साथ बदल देता है, जिसमें 12 साल की स्कूली शिक्षा और 3 साल की प्री-स्कूलिंग होती है, इस प्रकार बच्चों को पहले चरण में स्कूली शिक्षा का अनुभव होता है।
  • परीक्षाएं केवल 3, 5 और 8वीं कक्षा में आयोजित की जाएंगी, अन्य कक्षाओं का परिणाम नियमित मूल्यांकन के तौर पर लिए जाएंगे। बोर्ड परीक्षा को भी आसान बनाया जाएगा और एक वर्ष में दो बार आयोजित किया जाएगा ताकि प्रत्येक बच्चे को दो मौका मिलें।
  • नीति में पाठ्यक्रम से बाहर निकलने के अधिक लचीलेपन के साथ स्नातक कार्यक्रमों के लिए एक बहु-अनुशासनात्मक और एकीकृत दृष्टिकोण की परिकल्पना की गई है।
  • राज्य और केंद्र सरकार दोनों शिक्षा के लिए जनता द्वारा अधिक से अधिक सार्वजनिक निवेश की दिशा में एक साथ काम करेंगे, और जल्द से जल्द जीडीपी को 6% तक बढ़ाएंगे।
  • नई शिक्षा नीति सीखने के लिए पुस्तकों का भोझ बढ़ाने के बजाय व्यावहारिक शिक्षा को बढ़ाने पर ज्यादा केंद्रित है।
  • एनईपी यानी नई शिक्षा निति सामान्य बातचीत, समूह चर्चा और तर्क द्वारा बच्चों के विकास और उनके सीखने की अनुमति देता है।
  • एनटीए राष्ट्रीय स्तर पर विश्वविद्यालयों के लिए एक आम प्रवेश परीक्षा आयोजित करेगा।
  • छात्रों को पाठ्यक्रम के विषयों के साथ-साथ सीखने की इच्छा रखने वाले पाठ्यक्रम का चयन करने की भी स्वतंत्रता होगी, इस तरह से कौशल विकास को भी बढ़ावा मिलेगा।
  • सरकार एनआरएफ (नेशनल रिसर्च फाउंडेशन) की स्थापना करके विश्वविद्यालय और कॉलेज स्तर पर अनुसंधान और नवाचारों के नए तरीके स्थापित करेगी।

नई शिक्षा नीति 2020 के नुकसान –

  • भाषा का कार्यान्वयन यानि क्षेत्रीय भाषाओं में जारी रखने के लिए 5वीं कक्षा तक पढ़ाना एक बड़ी समस्या हो सकती है। बच्चे को क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाया जाएगा और इसलिए अंग्रेजी भाषा के प्रति कम दृष्टिकोण होगा, जो 5वीं कक्षा पूरा करने के बाद आवश्यक है।
  • बच्चों को संरचनात्मक तरीके से सीखने के अधीन किया गया है, जिससे उनके छोटे दिमाग पर बोझ बढ़ सकता है।

Conclusion :

नेशनल एजुकेशन पालिसी का मुख्य उद्देश्य भारत मैं प्रदान की जाने वाली शिक्षा को वैश्विक स्तर पर लाना है। जिससे कि भारत एक वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बन सके। नेशनल एजुकेशन पॉलिसी के माध्यम से शिक्षा का सार्वभौमीकरण किया जाएगा। नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2021 में सरकार के माध्यम से पुरानी एजुकेशन पॉलिसी में काफी सारे संशोधन किए हैं। जिससे कि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार आएगा और बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त कर पाएंगे। मिड दे मील कार्यक्रम को प्री-स्कूल बच्चों तक बढ़ाया जाएगा। यह नीति यह भी प्रस्तावित करती है कि सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को 2040 तक बहु-विषयक बनने का लक्ष्य रखना होगा। यह नीति देश में रोजगार के अवसरो को बढ़ावा देगी और हमारी शैक्षिक प्रणाली को मौलिक रूप से बदल देगी।

शिक्षा का अधिकार पर निबंध

Introduction : 

प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में शिक्षा का बड़ा महत्व हैं,शिक्षा को जीवन का आधार माना गया हैं। किसी भी देश के आधुनिक या विकसित होने का प्रमाण उस देश के नागरिकों के शिक्षा स्तर पर निर्भर करता हैं। आधुनिक समय में शिक्षा को ही किसी राष्ट्र या समाज की प्रगति का सूचक समझा जाता हैं। शिक्षा का अधिकार अधिनियम संसद का एक अधिनियम है जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 ए के तहत भारत में 6 से 14 वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए नि: शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के महत्व का वर्णन करता है। यह अधिनियम 1 अप्रैल 2010 से लागू हुआ। इस अधिनियम की खास बात यह है कि गरीब परिवार के वे बच्चे, जो प्राथमिक शिक्षा से वंचित हैं, के लिए निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान रखा गया है ।

शिक्षा के अधिकार के साथ बच्चों एवं युवाओं का विकास होता है तथा राष्ट्र शक्तिशाली एवं समृद्ध बनता है । यह उत्तरदायी एवं सक्रिय नागरिक बनाने में भी सहायक है । इसमें देश के सभी लोगों, अभिभावकों एवं शिक्षकों का भी सहयोग आवश्यक है । इस कानून के लागू करने पर आने वाले खर्च केंद्र (55 प्रतिशत) और राज्य सरकार (45 प्रतिशत) मिलकर उठाएंगे।

  • आज विश्व के सभी राष्ट्रों द्वारा भारतीय युवाओं की प्रतिमा का मुक्त कण्ठ से गुणगान किया जाना इसका प्रमाण है । बावजूद इसके सम्पूर्ण राष्ट्र की शिक्षा को आधार मानकर विश्लेषण किया जाए तो अभी भी भारत शिक्षा के क्षेत्र में विकसित राष्ट्रों की तुलना में काफी पीछे है ।
  • वर्तमान में भारतीय शिक्षा दर अनुमानतः 74% है, जो वैश्विक स्तर पर बहुत कम है । तब इस अनुपात में और वृद्धि करने के लिए बुद्धिजीवियों ने अपने-अपने सुझाव दिए ।
  • उन सभी के सुझावों पर गौर अते हुए भारत सरकर ने शिक्षा को अनिवार्य रूप से लागू करने हेतु शिक्षा का अधिकार कानून (RTE Act) बनाकर पूरे देश में समान रूप से प्रस्तुत कर दिया ।
  • ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009’, 1 अप्रैल, 2010 से सम्पूर्ण भारत में लागू कर दिया गया । इसका प्रमुख उद्देश्य है- वर्ष आयु तक के सभी बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य, गुणवतायुक्त शिक्षा को सुनिश्चित करना । इस अधिनियम को सर्व शिक्षा अभियान तथा वर्ष 2005 के विधेयक का ही संशोधित रूप कहा जाए, तो समीचीन ही होगा ।
  • क्षेत्रीय सरकारों, अधिकारियों तथा अभिभावकों का यह दायित्व है कि वे बच्चे को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा दिलाने का प्रबन्ध करें । इस कार्य हेतु वित्तीय प्रबन्धन का पूर्ण दायित्व केन्द्र व राज्य सरकार द्वारा मिश्रित रूप से उठाया जाएगा । कोई भी बच्चा किसी समय विद्यालय में प्रवेश पाने को स्वतन्त्र है ।
  • आयु प्रमाण-पत्र न होने के बावजूद, बच्चा विद्यालय में प्रवेश ले सकता है । बच्चों की आवश्यकता का ध्यान रखते हुए पुस्तकालय, खेल के मैदान, स्वच्छ व मजबूत विद्यालय कक्ष, इमारत आदि का प्रबन्ध राज्य सरकार द्वारा किया जाएगा ।
  • शिक्षण की गुणवत्ता में सुधार हेतु 35 छात्रों पर एक शिक्षक का प्रावधान किया गया है तथा साथ ही यह सुनिश्चित किया गया है कि ग्रामीण ब शहरी किसी भी क्षेत्र में यह अनुपात प्रभावित न हो। 
  • इसके साथ ही अध्यापन की गुणवत्ता हेतु केवल प्रशिक्षित अध्यापकों को ही नियुक्त करने का प्रावधान किया गया है जो अप्रशिक्षित अध्यापक, प्राचीन समय से अध्यापनरत हैं, उन्हें सीमित अवधि में अध्यापक-प्रशिक्षण पूर्ण करने का आदेश पारित किया गया है, अन्यथा उन्हें पद-मुक्त किया जा सकता हे।

इसके अतिरिक्त निम्न कार्यों का पूर्ण रूप से निषेध है –

  • छात्रों को शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना देना ।
  • प्रवेश के दौरान छात्रों से कोई लिखित परीक्षा लेना ।
  • छात्रों या उनके अभिभावकों से किसी प्रकार का शुल्क लेना।
  • छात्रों को ट्‌यूशन पढ़ने के लिए बाध्य करना ।
  • बिना मान्यता प्राप्ति के विद्यालय का संचालन करना ।
  • इसी प्रकार निजी विद्यालयों में भी कक्षा 1 से प्रवेश के समय आर्थिक रूप से कमजोर समुदायों के छात्रों हेतु 25% आरक्षण का प्रावधान सुनिश्चित किया गया है ।
  • इस अधिनियम को प्रभावी बनाने का उत्तरदायित्व केन्द्र ब राज्य सरकार दोनों का है, जिसका वित्तीय बहन भी दोनों संयुक्त रूप से करेंगे ।
  • इस अधिनियम के अनुसार, वित्तीय बहन का दायित्व सर्वप्रथम राज्य सरकार को सौंपा गया था, परन्तु राज्य सरकार ने अपनी विवशता का हवाला देते हुए इसे अस्वीकार कर दिया तथा केन्द्र सरकार से मदद का अनुरोध किया, तदुपरान्त केन्द्र तथा राज्य सरकार द्वारा

65:36 अनुपात के तहत वित्तीय प्रबन्धन का विभाजन किया गया । उत्तर-पूर्वी राज्यों में यह अनुपात 90:10 है।

केन्द्र सरकार के दायित्व –

(i) बच्चों का चहुँमुखी विकास ।

(ii) संवैधानिक मूल्यों का विकास ।

(iii) जहाँ तक हो सके, मातृभाषा में शिक्षण दिया जाए ।

(iv) बच्चों के मानसिक बिकास के अनुरूप, उनका नियमित विश्लेषण । (धारा-29 के अन्तर्गत)

(v) बच्चों को भयमुक्त माहौल प्रदान कराना तथा अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का विकास करना ।

राज्य सरकार के दायित्व –

(i) वह प्रत्येक बच्चे को नि:शुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराएगी ।

(ii) अपने क्षेत्र के 14 वर्ष आयु तक के बच्चों का पूर्ण रिकॉर्ड रखेगी ।

(iii) शैक्षणिक कलेण्डर का निर्धारण करेगी (धारा-9 के अन्तर्गत)।

Conclusion :

सर्व शिक्षा अभियान द्वारा पारित लक्ष्य वर्ष 2010 तक पूर्ण न हो पाया था, इसके अतिरिक्त यह अधिनियम भी लागू कर दिया गया । अतः यह कहना समीचीन ही होगा कि इस अधिनियम में सर्व शिक्षा अभियान के सभी नियम समाहित है । अधिनियम शिक्षा को 6 से 14 वर्ष की आयु के बीच हर बच्चे का मौलिक अधिकार बनाता है। अब भारत में 74% आबादी साक्षर है जिसमें पुरुषों में 80% और महिला 65% शामिल हैं। यह शिक्षा का मौलिक अधिकार 6 से 14 वर्षो के बालक-बालिकाओं के लिए निशुल्क और गुणवतापूर्ण शिक्षा की सहायता से उन्हें समान रूप से शिक्षा और रोजगार के समान अवसरों की उपलब्धता सुनिश्चित करवाएगा, इससे हमारा भारत शिक्षित और विकसित बनेगा।

बेटी बचाओबेटी पढ़ाओ पर निबंध

Introduction :

बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ योजना की शुरुआत भारतीय सरकार द्वारा 2015 के जनवरी महीने में हुई। इस योजना का मकसद भारतीय समाज में लड़कियों और महिलाओं के लिये कल्याणकारी कार्यों की कुशलता को बढ़ाने के साथ-साथ लोगों के बीच जागरुकता उत्पन्न करने के लिये भी है। 22 जनवरी 2015 को भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा सफलतापूर्वक इस योजना का आरंभ हुआ। इस योजना को सभी राज्य और केन्द्र शासित प्रदेशों में लागू करने के लिये एक राष्ट्रीय अभियान के द्वारा देश के 100 चुनिंदा शहरों में इस योजना को लागू किया गया । इस कार्यक्रम की शुरुआत करते समय प्रधनमंत्री ने कहा कि, भारतीय लोगों की ये सामान्य धारणा है कि लड़कियाँ अपने माता-पिता के बजाय पराया धन होती है।

अभिवावक सोचते है कि लड़के तो उनके अपने होते है जो बुढ़ापे में उनकी देखभाल करेंगे जबकि लड़कियाँ तो दूसरे घर जाकर अपने ससुराल वालों की सेवा करती हैं। लड़कियों या महिलाओं को कम महत्ता देने से धरती पर मानव समाज खतरे में पड़ सकता है क्योंकि अगर महिलाएँ नहीं तो जन्म नहीं। इसमें कुछ सकारात्मक पहलू ये है कि ये योजना लड़कियों के खिलाफ होने वाले अपराध और गलत प्रथाओं को हटाने के लिये एक बड़े कदम के रुप में साबित होगी।

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान के उद्देश्य –

  • इस अभियान के मुख्य उद्देश्य बालिकाओं की सुरक्षा करना और कन्या भ्रूण हत्या को रोकना है। इसके अलावा बालिकाओं की शिक्षा को बढ़ावा देना और उनके भविष्य को संवारना भी इसका उद्देश्य है। सरकार ने लिंग अनुपात में समानता लाने के लिए ये योजना शुरू की।
  • ताकि बालिकाएं दुनिया में सर उठकर जी पाएं और उनका जीवन स्तर भी ऊंचा उठे। इसका उद्देश्य बेटियों के अस्तित्व को बचाना एवं उनकी सुरक्षा को सुनिश्चित करना भी है। शिक्षा के साथ-साथ बालिकाओं को अन्य क्षेत्रों में भी आगे बढ़ाना एवं उनकी इसमें भागीदारी को सुनिश्चित करना भी इसका मुख्य लक्ष्य है|
  • इस अभियान के द्वारा समाज में महिलाओं के साथ हो रहे अन्याय और अत्याचार के विरूद्ध एक पहल हुई है। इससे बालक और बालिकाओं के बीच समानता का व्यवहार होगा। बेटियों को उनकी शिक्षा के लिए और साथ ही उनके विवाह के लिए भी सहायता उपलब्ध करवाई जाएगी, जिससे उनके विवाह में किसी प्रकार की दिक्कत नहीं होगी।
  • इस योजना से बालिकाओं को उनके अधिकार प्राप्त होंगे जिनकी वे हकदार हैं साथ ही महिला सशक्तिकरण के लिए भी यह अभियान एक मजबूत कड़ी है।

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान के कार्य –

  • हर थोड़े दिनों बाद हमें कन्या भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा, महिलाओं पर शारीरिक और मानसिक अत्याचार जैसे अपराधों की खबर देखने और सुनने को मिलती है। जिसके लिए भारत देश की सरकार इन बालिकाओं को बचाने और उनके अच्छे भविष्य के लिए हर संभव कोशिश कर रही है और अलग अलग योजनाएं चला रही है|
  • बालिकाओं की देखभाल और परवरिश अच्छी हो इसके लिए कई तरह के नए नियम कानून भी लागू किये जा रहे हैं। इसके साथ ही पुराने नियम कानूनों को बदला भी जा रहा है|
  • इस योजना के तहत मुख्य रूप से लड़के एवं लड़कियों के लिंग अनुपात में ध्यान केन्द्रित किया गया है, ताकि महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव और सेक्स डेटरमिनेशन टेस्ट को रोका जा सके।
  • इस अभियान का संचालन तीन स्तर पर हो रहा है, राष्ट्रीय स्तर पर, राजकीय स्तर पर और जिला स्तर पर। इस योजना में माता पिता एक निश्चित धनराशि अपनी बेटी के बैंक खाते में जमा करवाते हैं और सरकार उस राशि पर लाभ प्रदान करती है ताकि वह धनराशि बालिका की उच्च शिक्षा में और विवाह में काम आए।
  • जिससे बेटियों को बोझ ना समझा जाए। सरकार इस अभियान के द्वारा बालिकाओं की सुरक्षा और उनके उज्जवल भविष्य की कामना करती है।
  • इस अभियान के शुरुआती दौर में सभी ने इसका स्वागत और समर्थन किया लेकिन फिर भी ये इतना सफल नहीं हो पाया जितना सोचा गया था। बालिकाओं की स्थिति में सुधार लाने के लिए लोगों को जागरूक होना होगा और सभी को एकजुट होकर इस समस्या का समाधान करना होगा।
  • एक बच्ची दुनिया में आकर सबसे पहले बेटी बनती है। वे अपने माता पिता के लिए विपत्ति के समय में ढाल बनकर खड़ी रहती है। बालिका बन कर भाई की मदद करती है। बाद में धर्मपत्नी बनकर अपने पति और ससुराल वालों का हर अच्छी बुरी परिस्थिति में साथ निभाती है।
  • वह त्यागमूर्ति मां के रूप में अपने बच्चों पर सब कुछ कुर्बान कर जाती है और अपने बच्चों में अच्छे संस्कारों के बीज बोती है, जिससे वे आगे चलकर अच्छे इंसान बनें। सभी को बेटी और बेटों के साथ एक समान व्यवहार करना चाहिए।
  • उन्हें समान रूप से शिक्षा और जीवन स्तर देना चाहिए, समान अधिकार और प्यार – दुलार देना चाहिए, क्योंकि किसी भी देश के विकास के लिए बेटियां समान रूप से जिम्मेदार है।

Conclusion :

हम ये आशा करते हैं कि आने वाले दिनों में सामाजिक-आर्थिक कारणों की वजह से किसी भी लड़की को गर्भ में नहीं मारा जायेगा, अशिक्षित नहीं रहेंगी, असुरक्षित नहीं रहेंगी, अत: पूरे देश में लैंगिक भेदभाव को मिटाने के द्वारा बेटी-बचाओ बेटी-पढ़ाओ योजना का लक्ष्य लड़कियों को आर्थिक और सामाजिक दोनों तरह से स्वतंत्र बनाने का है। लडकियों को लडकों के समान समझा जाना चाहिए और उन्हें सभी कार्यक्षेत्रों में समान अवसर प्रदान करने चाहिए।

शिक्षा में यात्रा का महत्व

Introduction :

“दुनिया एक किताब है, और जो लोग यात्रा नहीं करते वे केवल इसका एक पन्नाही पढ़ते हैं।” यह एक प्रसिद्ध कहावत है। यात्रा हमें किसी भी विश्वविद्यालय या कॉलेज से अधिक सिखा सकती है। जब हम यात्रा करते हैं तो हम जिस देश की यात्रा करते हैं उसकी संस्कृति के बारे में सीखते हैं। यात्रा हमें एक सुखद अनुभव प्रदान करती हैं। ज्यादातर लोग, यात्रा के बाद, एक नए दृष्टिकोण, नए उत्साह और एक बेहतर दृढ़ संकल्प के साथ घर लौटते हैं। यात्रा के माध्यम से हमें  बहुत सी नई चीजों का ज्ञान प्राप्त होता है। हमें यात्रा से किसी विशेष समुदाय के लोगो के रहने के तरीके, सामाजिक जीवन, कृषि, पूजा, मान्यताओं, कला रूपों आदि के बारे में पता चलता है। 

छात्रों के लिए भी यात्रा का एक विशेष महत्व है। जब हम विभिन्न स्थानों पर जाते हैं, तो पाठ्यपुस्तकों में सीखी जाने वाली कई चीजें व्यावहारिक रूप से समझी जा सकती हैं। यात्रा एक व्यक्ति को उनके सभी साधारण सुखों और आराम से दूर, उनके आराम क्षेत्र से बाहर ले जाती है। यह हमें साहसी बनने, जीवन को पूर्ण रूप से जीने और समय का उपयोग करने के लिए नई चीजों की खोज करने और नए लोगों से मिलने के लिए मजबूर करता है। इसमें हमारे स्वास्थ्य को बेहतर बनाने की क्षमता है।

  • शिक्षा किसी भी बड़ी पारिवारिक, सामाजिक और यहाँ तक कि राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को भी हर करने की क्षमता प्रदान करती है। हम से कोई भी जीवन के हरेक पहलू में शिक्षा के महत्व को अनदेखा नहीं कर सकता। यह मस्तिष्क को सकारात्मक ओर मोड़ती है और सभी मानसिक और नकारात्मक विचारधाराओं को हटाती है।
  • यह लोगों की सोच को सकारात्मक विचार लाकर बदलती है और नकारात्मक विचारों को हटाती है। बचपन में ही हमारे माता-पिता हमारे मस्तिष्क को शिक्षा की ओर ले जाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे प्रसिद्ध शैक्षणिक संस्था में हमारा दाखिला कराकर हमें अच्छी शिक्षा प्रदान करने का हरसंभव प्रयास करते हैं।
  • यह हमें तकनीकी और उच्च कौशल वाले ज्ञान के साथ ही पूरे संसार में हमारे विचारों को विकसित करने की क्षमता प्रदान करती है। अपने कौशल और ज्ञान को बढ़ाने का सबसे अच्छे तरीके अखबारों को पढ़ना, टीवी पर ज्ञानवर्धक कार्यक्रमों को देखना, अच्छे लेखकों की किताबें पढ़ना आदि हैं। शिक्षा हमें अधिक सभ्य और बेहतर शिक्षित बनाती है। यह समाज में बेहतर पद और नौकरी में कल्पना की गए पद को प्राप्त करने में हमारी मदद करती है।
  • आधुनिक तकनीकी संसार में शिक्षा मुख्य भूमिका को निभाती है। आजकल, शिक्षा के स्तर को बढ़ाने के लिए बहुत तरीके हैं। शिक्षा का पूरा तंत्र अब बदल दिया गया है। हम अब 12वीं कक्षा के बाद दूरस्थ शिक्षा कार्यक्रम (डिस्टेंस एजूकेशन) के माध्यम से भी नौकरी के साथ ही पढ़ाई भी कर सकते हैं।
  • शिक्षा बहुत महंगी नहीं है, कोई भी कम धन होने के बाद भी अपनी पढ़ाई जारी रख सकता है। दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से हम आसानी से किसी भी बड़े और प्रसिद्ध विश्वविद्यालय में बहुत कम शुल्क पर प्रवेश ले सकते हैं। अन्य छोटे संस्थान भी किसी विशेष क्षेत्र में कौशल को बढ़ावा देने के लिए शिक्षा प्रदान कर रहे हैं।
  • पहले, शिक्षा प्रणाली बहुत ही महंगी और कठिन थी, गरीब लोग 12वीं कक्षा के बाद उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सक्षम नहीं थे। समाज में लोगों के बीच बहुत अन्तर और असमानता थी। उच्च जाति के लोग, अच्छे से शिक्षा प्राप्त करते थे और निम्न जाति के लोगों को स्कूल या कालेज में शिक्षा प्राप्त करने की अनुमति नहीं थी।
  • यद्यपि, अब शिक्षा की पूरी प्रक्रिया और विषय में बड़े स्तर पर परिवर्तन किए गए हैं। इस विषय में भारत सरकार के द्वारा सभी के लिए शिक्षा प्रणाली को सुगम और कम महंगी करने के लिए बहुत से नियम और कानून लागू किये गये हैं।
  • सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण, दूरस्थ शिक्षा प्रणाली ने उच्च शिक्षा को सस्ता और सुगम बनाया है, ताकि पिछड़े क्षेत्रों, गरीबों और मध्यम वर्ग के लोगों के लिए भविष्य में समान शिक्षा और सफलता प्राप्त करने के अवसर मिलें।
  • भलीभाँति शिक्षित व्यक्ति एक देश के मजबूत आधार स्तम्भ होते हैं और भविष्य में इसको आगे ले जाने में सहयोग करते हैं। इस तरह, शिक्षा वो उपकरण है, जो जीवन, समाज और राष्ट्र में सभी असंभव स्थितियों को संभव बनाती है।
  • शिक्षा हम सभी के उज्ज्वल भविष्य के लिए आवश्यक उपकरण है। हम जीवन में शिक्षा के इस उपकरण का प्रयोग करके कुछ भी अच्छा प्राप्त कर सकते हैं। शिक्षा का उच्च स्तर लोगों को सामाजिक और पारिवारिक आदर और एक अलग पहचान बनाने में मदद करता है।
  • शिक्षा का समय सभी के लिए सामाजिक और व्यक्तिगत रुप से बहुत महत्वपूर्ण समय होता है। यह एक व्यक्ति को जीवन में एक अलग स्तर और अच्छाई की भावना को विकसित करती है। शिक्षा किसी भी बड़ी पारिवारिक, सामाजिक और यहाँ तक कि राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को भी हर करने की क्षमता प्रदान करती है।
  • हम से कोई भी जीवन के हरेक पहलू में शिक्षा के महत्व को अनदेखा नहीं कर सकता। यह मस्तिष्क को सकारात्मक ओर मोड़ती है और सभी मानसिक और नकारात्मक विचारधाराओं को हटाती है।

Conclusion :

शिक्षा लोगों के मस्तिष्क को बड़े स्तर पर विकसित करने का कार्य करती है तथा इसके साथ ही यह समाज में लोगों के बीच के सभी भेदभावों को हटाने में भी सहायता करती है। यह हमें अच्छा अध्ययन कर्ता बनने में मदद करती है और जीवन के हर पहलू को समझने के लिए सूझ-बूझ को विकसित करती है। यह सभी मानव अधिकारों, सामाजिक अधिकारों, देश के प्रति कर्तव्यों और दायित्वों को समझने में हमारी सहायता करती है। नैनीताल, दार्जिलिंग, पंचमढ़ी, ऊटी आदि स्थानों की यात्रा से हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत प्रभाव पड़ता है। यह हमारे मानसिक ज्ञान को बढ़ा देता है और हमारे स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है, यात्रा हमारी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और पर्यटन उद्योग के विकास को भी बढ़ावा देती है। यात्रा किसी भी उम्र के व्यक्ति के लिए सही मनोरंजन है।

शहरी बेरोजगारी पर निबंध

Introduction :

बेरोजगारी एक गंभीर समस्या है जिसका सामना दुनिया के हर देश को करना पड़ रहा है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें एक कुशल और प्रतिभाशाली व्यक्ति नौकरी करना तो चाहता था लेकिन उसे नौकरी नहीं मिल पाती है। भारत उन विकासशील देशों में से एक है जो बेरोजगारी की समस्या से बुरी तरह से पीड़ित है। लेकिन भारत में बेरोजगारी की समस्या मांग की कमी का परिणाम नहीं है, बल्कि अधिक जनसंख्या वृद्धि के कारण है। चूंकि COVID-19 महामारी ने भारतीय अर्थव्यवस्था को चरमरा कर रख दिया है और बड़े पैमाने पर लोगो की नौकरियाँ छीन चुकी है, कोरोनोवायरस संक्रमण के बाद बेरोजगारी शहरी भारतीयों के लिए दूसरी सबसे बड़ी चिंता बन चुकी है। 

भारत भर में किए गए एक सर्वेक्षण में, शहरी क्षेत्रों में लगभग 87 प्रतिशत स्व-नियोजित उत्तरदाताओं ने कोरोनोवायरस (COVID-19) महामारी के कारण अपना रोजगार खो दिया है। इसका प्रभाव देश के ग्रामीण क्षेत्रों से आये श्रमिकों पर भी अधिक पड़ा था। सामान्य तौर पर, शहरी क्षेत्रों में रोजगार की हानि सर्वेक्षण के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक थी। सरकार ने 20 लाख करोड़ रुपये के विशेष आर्थिक पैकेज की घोषणा की है जो 2019-20 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 10% है, जो गरीब, मजदूरों, प्रवासियों को रोजगार प्रदान करने के लिए है, जिनकी कोरोनावाइरस महामारी की वजह से अपनी नौकरी खो दी है।

अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी के रूप –

1) खुली बेरोजगारी –

इस प्रकार की बेरोजगारी में श्रमिकों को कार्य करने के लिए अवसर प्राप्त नहीं होते जिनसे उन्हे नियमित आय प्राप्त हो सके । इस बेरोजगारी का मुख्य कार पूरक साधनों और पूंजी का अभाव है। यहाँ जनसंख्या वृद्धि की तुलना में पूंजी निर्माण की गति भी बहुत धीमी होती है । इसलिए, पूंजी-निर्माण की तुलना में श्रम-शक्ति अधिक तीव्रता से बद है। इसे ‘संरचनात्मक बेरोजगारी’ भी कहते हैं ।

2) अल्प रोजगारी-

अल्पविकसित अर्थव्यवस्था मे अल्प-रोजगारी को दो प्रकार से परिभाषा कर सकते हैं: प्रथम अवस्था वह है जिसमें एक व्यक्ति को उसकी योग्यतानुसार रोजगार मिल पाता । द्वितीय अवस्था वह है जिसमें एक श्रमिक को सम्पूर्ण दिन या कार्य से सम्पूर्ण स के अनुसार पर्याप्त कार्य नहीं मिलता । अत: श्रमिकों को पूर्णकालिक रोजगार नहीं मिल पा अर्थात् वर्ष में कुछ दिनों या किसी विशेष मौसम में ही कार्य मिल पाता है । इसी कारण इसे ‘मीर बेरोजगारी’ भी कहते हैं ।

3) ग्रामीण बेरोजगारी –

ग्रामीण क्षेत्रों में जनसंख्या बढ़ने से भूमि पर जनसंख्या का भा जाता है । भूमि पर जनसंख्या की मात्रा बढ़ने से कृषकों की संख्या भी बद जाती है । जिसके प्रच्छन्न बेरोजगारी की मात्रा बढ जाती है । अधिकांश श्रम-शक्ति प्राथमिक व्यवसायों में पं रहती है तथा व्यावसायिक ढाँचे के बेलोच होने के कारण गैर-व्यस्त मौसम में मी यह श्रमिक बाहर नहीं जाते ।

इसी कारण मौसमी बेरोजगारी पैदा होती है । मौसमी बेरोजगारी की मानव शक्ति के अल्प-प्रयोग से सम्बंधित है । यदि किसी विशेष मौसम में बेरोजगार श्रमित सहायक व्यवसायों में कार्य मिल भी जाता है, तो भी वह बेरोजगार बने ही रहते हैं ।

4) शहरी बेरोजगारी –

शहरी बेरोजगारी ग्रामीण बेरोजगारी की ही प्रशाखा है । कृषि में पुंजीवादी प्रणाली के विकास के कारण तथा भूमि पर जनसंख्या के भार में वृद्धि के कारण कृषक की आर्थिक दशा प्रतिदिन बिगड़ती जाती है, जिसके कारण भारी संख्या में श्रमिक ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर स्थानान्तरित होने लगते हैं ।

गाँवों से शहरी की ओर जनसंख्या की यह गतिशीलता शहरी आकर्षण के परिणामस्वरूप नहीं अपितु गाँवो मे पर्याप्त रोजगार के अवसर उपलब्ध न के कारण होती है ।

भारत में बेरोजगारी के कारण –

  • जनसंख्या वृद्धि की ऊँची दर बेरोजगारी की समस्या को जन्म देती है । इस दृष्टि से भारत की भूमि पर जनसंख्या का भार पहले से ही बहुत अधिक है । ऐसी स्थिति में नये रो के अवसर उपलब्ध कराने का दायित्व सहायक एवं सेवा क्षेत्र पर होता है।
  • यदि उद्योग क्षेत्र एवं सेवा क्षेत्र अपने दायित्व को पूर्ण करने में असमर्थ होते हैं तो जनसंख्या वृद्धि की तुलना में तो बेरी में वृद्धि होती है अथवा ग्रामीण क्षेत्रों में प्रच्छन्न बेरोजगारी उत्पन्न होती है ।
  • दूसरी बेरोजगारी की समस्या है कि भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि क्षेत्र का विकास उप धीमा एवं निस्तेज रहा है । यह क्षेत्र विकासशील अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं को पूए में असमर्थ रहा है । इसका कारण कृषि क्षेत्र की उत्पादकता का स्तर कम होना है ।
  • भारत में दोषपूर्ण आर्थिक नियोजन भी रोजगार के अवसरों में कमी का एक प्रमु बना ध्या है । भारत मे अभी तक आर्थिक विकास हेतु आधारभूत ढाँचे का विकास नहीं है । विभिन्न योजनाओं में ग्रामीण क्षेत्रों का समुचित ढंग से विकास नहीं हो सकता है, ग्रामीण जनसंख्या के स्थानान्तरण को नहीं रोका जा सका है । गावों में सेवा क्षेत्रो नहीं हो सका है ।
  • योजनाकाल में कृषि एवं उद्योगों मे तकनीकी विकास नहीं हो सका है जिससे कि उत्पादन में श्रम-शक्ति का अधिक उपयोग किया जा सके । योजनाओ में बेकार पडी हुई भूमि में उपयोग, सिचाई के साधनो का समुचित विकास, भूमि संरक्षण तथा कृषि में सहायब जैसे डेयरी, मछली पालन, मुर्गी पालन आदि का पर्याप्त विकास नहीं हो सका है जिसके कारण, शिक्षित, अशिक्षित एवं प्रशिक्षित व्यक्तियों हेतु नये रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं हो सके हैं ।
  • शहरों में बेरोजगारी को दूर करने के लिये सर्वप्रथम हमें शिक्षा प्रणाली में सुधार करना होगा इसके लिये आवश्यक यह है कि विद्यालय एवं विश्वविद्यालय स्तर पर व्यावसायिक शिक्षा को अपनार जाए ताकि शिक्षा प्राप्त कर यह व्यवसाय उम्मुख हो तथा स्नातकोत्तर स्तर पर या शोध पर केवर मेधावी विद्यार्थियों को ही प्रवेश दिया जाए ।
  • ऐसे उद्योगों में निवेश को प्रोत्साहित करना चाहिये जिनमें शीघ्र ही पूंजी का प्रतिफल प्राप्त होने त् सम्भावना हो । बढे शहरों में बेरोजगारी के केन्द्रीयकरण को रोकने हेतु औद्योगिक क्रियाओं विचलन एवं विकेन्द्रीकरण किया जाना चाहिए ।
  • राष्ट्रीयकृत बैंकों को छोटे उद्योगों एवं स्व-रोजग युक्त इंजीनियरों द्वारा आरम्भ किये गए उद्योगों को विकसित करने के लिये पर्याप्त मात्रा में सा सुविधाएँ उपलब्ध करानी चाहिए।

Conclusion :

सरकार द्वारा रोजगार के अवसरों में वृद्धि करने के लिए इस दृष्टि अनेक योजनाएं जैसे नेहरू रोजगार योजना रोजगार गारन्टी कार्यक्रम आदि क्रियान्वित गये हैं । भारत में बेरोजगारी की समस्या चरम पर है, लेकिन अब सरकार और स्थानीय अधिकारियों ने इस समस्या को गंभीरता से लिया है और इसे कम करने के लिए काम कर रहे हैं। नीति निर्माताओं और नागरिकों को अधिक नौकरियों के निर्माण के साथ ही रोजगार के लिए सही कौशल प्राप्त करने के लिए उचित प्रयास भी करते रहना चाहिए।

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Essays

pm kisan mandhan yojana essay in hindi

प्रधानमंत्री किसान मानधन योजना पर निबंध (pm kisan mandhan yojana essay in hindi)

Introduction : 

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रधान मंत्री किसान मानधन योजना का शुभारंभ 12 सितंबर 2019 को झारखंड के रांची में किया गया। इस योजना के तहत, छोटे और सीमांत किसानों को 60 वर्ष की आयु पूर्ण करने पर 3,000 रुपये की न्यूनतम निश्चित पेंशन प्रदान की जाएगी। पीएम किसान मानधन योजना 18 से 40 वर्ष की आयु के किसानों के लिए है। भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) द्वारा प्रबंधित पेंशन फंड के तहत पंजीकरण करके लाभार्थी PM-KMY योजना के सदस्य बन सकते है। इस प्रकार सदस्यों को केंद्र सरकार द्वारा समान योगदान के प्रावधान के साथ उनकी आयु के आधार पर पेंशन फंड में 55 से 200 रुपये के बीच मासिक योगदान करने की आवश्यकता होती है। 

यह योजना सभी छोटे और सीमांत किसानों के लिए लागू है। इस योजना के तहत उनके और केंद्र सरकार द्वारा किए जाने वाले योगदान का अनुपात 1: 1 है। पीएम किसान मानधन योजना के तहत सरकारी योगदान किसान द्वारा किए गए मासिक योगदान के बराबर है। छोटे और सीमांत किसान जो पहले से ही अन्य योजनाओं जैसे राष्ट्रीय पेंशन योजना (एनपीएस), कर्मचारी राज्य बीमा निगम योजना, कर्मचारी कोष संगठन योजना आदि के तहत पंजीकृत हैं, पीएम किसान मानधन योजना के लिए पात्र नहीं होंगे।

  • बेशक, कृषि के आधुनिकीकरण से किसानों के जीवन स्तर में बदलाव आया है, लेकिन लघु और सीमांत किसानों की बदहाली जस की तस कायम है।
  • साल दर साल होने वाली उनकी आत्महत्या की खबरें भी किसी से छिपी हुई नहीं हैं क्योंकि अधिक लागत और कम आय भारतीय कृषि से सम्बद्ध किसानों के लिए अभिशाप साबित हो रही है। जिसके कारण खेती-किसानी से लोगों की अभिरुचि घट रही है।
  • आलम यह है कि किसान व उनके बच्चे रोजगार की तलाश में शहरों की ओर भाग रहे हैं, जिससे न केवल हरित क्रांति, श्वेत क्रांति और नीली क्रांति आदि के संजोए सपने तार तार हो रहे हैं.
  • यही वजह है कि कृषि को बढ़ावा देने के लिए और किसानों की आय दुगुना करने के लिए नरेंद्र मोदी सरकार ने अपनी दूसरी पारी की पहली कैबिनेट की बैठक में ही किसानों के लिए एक नई और आकर्षक पेंशन योजना की शुरुआत कर दी और उससे आम लोगों व गरीबों को भी जोड़ दिया है।

प्रधानमंत्री किसान मानधन योजना विशेषताएं –

  • केंद्र सरकार किसानों के हित में कई योजनाएं चला रही हैं. इसी में एक पीएम किसान मानधन योजना है, जिसके तहत 60 साल की उम्र के बाद पेंशन का प्रावधान है.
  • इस योजना में 18 साल से 40 साल तक की उम्र का कोई भी किसान भाग ले सकता है, जिसे उम्र के हिसाब से मंथली आंशदान करने पर 60 की उम्र के बाद 3000 रुपये मंथली या 36000 रुपये सालाना पेंशन मिलेगी. इसके लिए अंशदान 55 रुपये से 200 रुपये तक मंथली है. 
  • पीएम किसान मानधन में जितना योगदान किसान का होगा, उसी के बराबर योगदान सरकार भी पीएम किसान अकाउंट में करेगी. यानी अगर आपका योगदान 55 रुपये है तो सरकार भी 55 रुपये का योगदान करेगी. इस पेंशन कोष का प्रबंधन भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) कर रहा है.
  • इस योजना के तहत कम से कम 20 साल और अधिकतम 40 साल तक 55 रुपये से 200 रुपये तक मासिक अंशदान करना होगा, जो उनकी उम्र पर निर्भर है.
  • अगर 18 साल की उम्र में जुड़ते हैं तो मासिक अंशदान 55 रुपये या सालाना 660 रुपये होगा. वहीं अगर 40 की उम्र में जुड़ते हैं तो 200 रुपये महीना या 2400 रुपये सालाना योगदान करना होगा.
  • अगर कोई किसान बीच में स्कीम छोड़ना चाहता है तो उसका पैसा नहीं डूबेगा. उसके स्कीम छोड़ने तक जो पैसे जमा किए होंगे उस पर बैंकों के सेविंग अकाउंट के बराबर का ब्याज मिलेगा. अगर पॉलिसी होल्डर किसान की मौत हो गई, तो उसकी पत्नी को 50 फीसदी रकम मिलती रहेगी.
  • नेशनल पेंशन स्कीम, कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC) स्कीम, कर्मचारी भविष्य निधि स्कीम (EPFO) जैसी किसी अन्य सामाजिक सुरक्षा स्कीम के दायरे में शामिल लघु और सीमांत किसानो को इस योजना का लाभ नहीं प्राप्त होगा.
  • अथवा वे किसान जिन्होंने श्रम एवं रोजगार मंत्रालय दवारा संचालित प्रधानमंत्री श्रम योगी मान धन योजना के लिए विकल्प चुना है. वे किसान जिन्होंने श्रम और रोजगार मंत्रालय दवारा संचालित प्रधानमंत्री लघु व्यापारी मान-धन योजना के लिए विकल्प चुना है वे भी इस योजना से वंचित रहेंगे.

Conclusion :

लाभार्थी के साथ, स्पाउस भी इस योजना के लिए पात्र हैं और निधि में अलग-अलग योगदान देकर रु 3000 की अलग से पेंशन प्राप्त कर सकते हैं। यदि स्पाउस नहीं है, तो ब्याज के साथ कुल योगदान नामांकित व्यक्ति को भुगतान किया जाएगा। यदि किसान की सेवानिवृत्ति की तारीख के मृत्यु हो जाती है, तो स्पाउस को परिवार पेंशन के रूप में पेंशन का 50% भाग प्राप्त होगा। यह उम्मीद की जाती है कि कम से कम 10 करोड़ किसान अगले पांच वर्षों के भीतर इस योजना का लाभ प्राप्त करेंगे, जो इसे दुनिया की सबसे बड़ी पेंशन योजनाओं में से एक बना देगा।

गरीब कल्याण रोजगार अभियान पर निबंध

Introduction : 

हमारे प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने गरीब कल्याण रोज़गार अभियान की शुरुआत की, जो प्रवासी मजदूरों के लिए एक रोजगार योजना है, जिससे लॉकडाउन के दौरान शहरों से गांवों में लौटे मजदूरों की मदत होगी। इस अभियान को पांच राज्यों मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, झारखंड और ओडिशा के मुख्यमंत्रियों की मौजूदगी में बिहार के तेलिहार गाँव से 20 जून, 2020 को वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से शुरू किया गया। इस योजना के तहत, देश के ग्रामीण हिस्सों में ग्रामीण नागरिकों, विशेषकर प्रवासी श्रमिकों के लिए आजीविका सहायता प्रदान करके देश के ग्रामीण हिस्सों में होने वाले आर्थिक प्रभाव को कम करना ही इस अभियान का मुख्य उद्देश्य है। 

केंद्र सरकार ने गरीब कल्याण रोज़गार अभियान के तहत लगभग 25 योजनाओं को एक साथ देश भर के 116 जिलों में लागू किया है तथा इस योजना के लिए 125 दिनों का लक्ष्य रखा गया है। पैकेजिंग और स्थानीय उत्पाद बनाने के लिए गांवों, कस्बों और छोटे शहरों के पास उद्योग समूह बनाए जाएंगे। फसलों को स्थानीय स्तर पर स्टोर करने के लिए 1 लाख करोड़ की लागत से कोल्ड स्टोरेज सुविधाएं विकसित की जाएंगी।

  • इस अभियान की शुरुआत प्रधानमंत्री द्वारा वीडियो-कॉन्फ्रेंस के माध्यम से बिहार के खगड़िया ज़िले के ग्राम तेलिहार से की।
  • ‘गरीब कल्याण रोज़गार अभियान’ के अंतर्गत सरकार द्वारा लगभग 50 हज़ार करोड़ रुपए का निवेश किया किया गया है।
  • यह 125 दिनों का अभियान होगा, जिसे मिशन मोड रूप में संचालित किया किया गया।
  • इस अभियान में छ: राज्यों बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड तथा ओडिशा को शामिल किया गया है।
  • छ: ज़िलों के 25,000 से अधिक प्रवासी श्रमिकों के साथ कुल 116 ज़िलों को इस अभियान के लिये चुना गया है, जिसमें 27 आकांक्षी ज़िले (aspirational districts) भी शामिल हैं।
  • इस कार्यक्रम में शामिल छ: राज्यों के 116 ज़िलों के गाँव कॉमन सर्विस सेंटर (Common Service Centres) तथा ‘कृषि विज्ञान केंद्रों’ (Krishi Vigyan Kendras) के माध्यम से शामिल होंगे, जो कोरोना के कारण लागू शारीरिक दूरी के मानदंडों को भी ध्यान में रखा गया।
  • इस अभियान में 12 विभिन्न मंत्रालयों को समनवित किया जाएगा, जिसमें पंचायती राज, ग्रामीण विकास, सड़क परिवहन और राजमार्ग, खान, पेयजल और स्वच्छता, पर्यावरण, रेलवे, नवीकरणीय ऊर्जा, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस, सीमा सड़कें, दूरसंचार तथा कृषि मंत्रालय शामिल हैं।
  • इस अभियान को ऐसे समय में शुरू किया जा रहा है जब COVID-19 के प्रकोप के कारण लाखों प्रवासी मज़दूर गाँवों की तरफ लौट रहे हैं जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार की समस्या उत्पन्न हो रही है।
  • मनरेगा के तहत काम करने वाले परिवारों की संख्या भी मई 2020 में एक स्तर पर पहुँच गई है।
  • यह अभियान ग्रामीण क्षेत्रों में ही प्रवासी श्रमिकों को रोज़गार प्रदान करने के साथ-साथ गाँवों के टिकाऊ बुनियादी ढाँचे का निर्माण करने में सहायक है।
  • यह अभियान प्रवासी श्रमिकों तथा ग्रामीण नागरिकों के सशक्तीकरण तथा उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करेगा अर्थात् गाँवों में ही आजीविका के अवसरों को इस अभियान के माध्यम से विकसित किया है।
  • PMGKRA में 50000 करोड़ की लागत लगी है जिसकी उद्घोषणा भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सहाय पैकेज के दौरान की थी। इस अभियान के लिए बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड और ओडिशा के 25,000 से अधिक अपने गाँव पलायन कर गए प्रवासी श्रमिकों के साथ कुल 116 जिलों को चुना गया है।

Conclusion :

इस अभियान के द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में आधुनिक सुविधाएं भी प्रदान की जाएंगी है। फाइबर केबल बिछाने और इंटरनेट के प्रावधान को भी अभियान का हिस्सा बनाया गया है। यह अभियान ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे का निर्माण करते हुए प्रवासी श्रमिकों के परिवारों को तत्काल राहत प्रदान करेगा। प्रवासी श्रमिकों की वर्तमान स्थिति के अनुसार गरीब कल्याण योजना जैसी योजना की बहुत आवश्यकता है। हालांकि, कार्यक्रम की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि क्या इसका लाभ प्रवासी श्रमिकों तक समय पर पहुंच पायेगा या नहीं। सरकार को सभी प्रवासी मजदूरों का एक डेटाबेस भी बनाना चाहिए जो भविष्य में उनके लिए एक सामाजिक सुरक्षा प्रणाली बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सके।

पीएम स्वनिधि योजना पर निबंध

Introduction : 

हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के द्वारा 1 जून 2020 को प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना को शुरू करने का फैसला लिया गया | इस योजना के अंतर्गत  देश के रेहड़ी और सड़क विक्रेताओं को अपना खुद का काम नए सिरे से शुरू करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा 10000 रूपये तक का लोन मुहैया कराया जायेगा | इस स्वनिधि योजना को प्रधानमंत्री स्ट्रीट वेंडर्स आत्म निर्भर निधि के नाम से भी जाना जाता है | इस लोन को समय पर चुकाने वाले स्ट्रीट वेंडर्स को 7 फीसद का वार्षिक ब्याज सब्सिडी के तौर पर उनके अकाउंट में सरकार की ओर से ट्रांसफर किया जाएगा। देश के जो इच्छुक लाभार्थी इस योजना का लाभ उठाना चाहते है तो उन्हें इस योजना के तहत आवेदन करना होगा |  

स्ट्रीट वेंडर आत्मनिर्भर निधि के अंतर्गत विभिन्न क्षेत्रों में वेंडर, हॉकर, ठेले वाले, रेहड़ी वाले, ठेली फलवाले आदि सहित 50 लाख से अधिक लोगों को योजना से लाभ प्रदान किया जायेगा | स्ट्रीट वेंडर आत्मनिर्भर निधि के अंतर्गत रेहड़ी पटरी वालो को अपना काम दोबारा से शुरू करने के लिए सरकार द्वारा लोन मुहैया कराया गया है |

  • इस योजना के तहत छोटे दुकानदार 10,000 रुपए तक के ऋण के लिये आवेदन कर सकेंगे।
  • ऋण प्राप्त करने के लिये आवेदकों को किसी प्रकार की ज़मानत या कोलैट्रल (Collateral) की आवश्यकता नहीं होगी।
  • इस योजना के तहत प्राप्त हुई पूंजी को चुकाने के लिये एक वर्ष का समय दिया जाएगा, विक्रेता इस अवधि के दौरान मासिक किश्तों के माध्यम से ऋण का भुगतान कर सकेंगे।
  • साथ ही इस योजना के तहत यदि लाभार्थी लिये गए ऋण पर भुगतान समय से या निर्धारित तिथि से पहले ही करते हैं तो उन्हें 7% (वार्षिक) की ब्याज सब्सिडी प्रदान की जाएगी, जो ‘प्रत्यक्ष लाभ अंतरण’ (Direct Benefit Transfer- DBT) के माध्यम से 6 माह के अंतराल पर सीधे लाभार्थी के बैंक खाते में जमा की जाएगी।
  • पीएम स्वनिधि के तहत निर्धारित तिथि से पहले ऋण के पूर्ण भुगतान पर कोई ज़ुर्माना नहीं लागू होगा।
  • इस योजना के तहत ऋण जारी करने की प्रक्रिया जुलाई माह से शुरू की जाएगी।
  • इस योजना के लिये सरकार द्वारा 5,000 करोड़ रुपए की राशि मंज़ूर की गई है, यह योजना मार्च 2022 तक लागू रहेगी।
  • यह पहली बार है जब सूक्ष्म-वित्त संस्थानों (Micro finance Institutions(MFI), गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (Non Banking Financial Company- (NBFC), स्वयं सहायता समूह (Self Help Group-SHG),  बैंकों को शहरी क्षेत्र की गरीब आबादी से जुड़ी किसी योजना में शामिल किया गया है।
  • इन संस्थानों को ज़मीनी स्तर पर उनकी उपस्थिति और छोटे व्यापारियों व शहरों की गरीब आबादी के साथ निकटता के कारण इस योजना में शामिल किया गया है।

तकनीकी का प्रयोग और पारदर्शिता –

  • इस योजना के प्रभावी वितरण और इसके क्रियान्वयन में पारदर्शिता लाने के लियेवेब पोर्टल और मोबाइल एप युक्त एक डिजिटल प्लेटफॉर्म का विकास किया जा रहा है।
  • यह प्लेटफॉर्म क्रेडिट प्रबंधन के लिये वेब पोर्टल और मोबाइल एप कोभारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (सिडबी) के ‘उद्यम मित्र’ पोर्टल से तथा ब्याज सब्सिडी के स्वचालित प्रबंधन हेतु MoHUA के ‘पैसा पोर्टल’ (PAiSA Portal) से जोड़ेगा।  
  • इस योजना के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रो और पृष्ठभूमि के 50 लाख से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रूप से लाभ प्राप्त होगा।
  • इस योजना को विशेष रूप से छोटे दुकानदारों (ठेले और रेहड़ी-पटरी वाले) के लिये तैयार किया गया है, इस योजना के माध्यम से छोटे व्यापारी COVID-19 के कारण प्रभावित हुए अपने व्यापार को पुनः शुरू कर सकेंगे।
  • इस योजना के माध्यम से सरकार द्वारा छोटे व्यापारियों के बीच डिजिटल बैंकिंग को बढ़ावा देने का प्रयास किया जाएगा।
  • इसके तहत ऋण चुकाने के लिये डिजिटल भुगतान करने वाले लाभार्थियों को हर माह कैश-बैक प्रदान कर उन्हें अधिक-से-अधिक डिजिटल बैंकिंग अपनाने के लिये प्रोत्साहित किया जाएगा।
  • इस योजना के ज़रिये रेहड़ी पटरी वालो को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाया जायगा तथा गरीब लोगो की स्थिति में सुधार होगा |
  • इस योजना के तहत MoHUA द्वारा जून माह में पूरे देश में राज्य सरकारों, दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन के राज्य कार्यालय, भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम, शहरी स्थानीय निकायों, सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों के लिए क्रेडिट गारंटी निधि ट्रस्ट और अन्य हितधारकों के सहयोग से क्षमता विकास और वित्तीय साक्षरता कार्यक्रम की शुरुआत की जाएगी।
  • COVID-19 महामारी के कारण देश की औद्योगिक इकाइयों और संगठित क्षेत्र के अन्य व्यवसायों के अतिरिक्त असंगठित क्षेत्र और छोटे व्यापारियों को भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ा है।
  • देश में बड़े पैमाने पर असंगठित क्षेत्र के प्रमाणिक आँकड़े उपलब्ध न होने से इससे जुड़े लोगों को सहायता पहुँचाना एक बड़ी चुनौती रही है। साथ ही इस क्षेत्र के लिये किसी विशेष आर्थिक तंत्र के अभाव में छोटे व्यापारियों को स्थानीय कर्ज़दारों से महँगी दरों पर ऋण लेना पड़ता है। 

Conclusion :

पीएम स्वनिधियोजना के माध्यम से छोटे व्यापारियों को आसान शर्तों पर ऋण उपलब्ध करा कर ऐसे लोगों को COVID-19 के कारण हुए नुकसान से उबरने में सहायता प्रदान की जा सकेगी। इस योजना के अंतर्गत 2 जुलाई 2020 को ऋण देने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद, राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 1.54 लाख से अधिक सड़क विक्रेताओं ने ऋण के लिए आवेदन किया है जिनमे से, 48,000 से अधिक को इस योजना के तहत ऋण स्वीकृत किया जा चूका है। यह प्रौद्योगिकी का उपयोग करते हुए लोगों की क्षमता को बढ़ाने और कोरोना संकट के समय कारोबार को नए सिरे से खड़ा कर आत्मनिर्भर भारत अभियान को गति देंगे।

प्रधान मंत्री जन धन योजना पर निबंध

Introduction : 

आजादी के बाद भी, भारत में बहुत से लोग बैंकिंग प्रणाली के भीतर नहीं लाए जा सके हैं, इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए सम्माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने प्रधान मंत्री जन-धन योजना को 28 अगस्त, 2014 को शुरू किया, ताकि समाज के बैंक से अपरिचित खंड को मुख्य धारा बैंकिंग में लाया जा सके । यह योजना देश में प्रत्येक परिवार को बैंक खाता और बैंकिंग सेवाएं प्रदान करने के लिए शुरू की गई ताकि व्यापक वित्तीय समावेशन किया जा सके । इस योजना के तहत 25 करोड़ से अधिक नए बैंक खाते खोल दिए गए । 

अधिकांश लोग, जिन्होंने अपने बैंक खाते खोले हैं वे पहले बैंकिंग प्रणाली की परिधि के बाहर थे। प्रधानमंत्री जन धन योजना के उद्घाटन के दिन ही एक करोड़ पचास लाख खाते खोले गये थे। इस योजना में 1 लाख रुपए का बीमा होगा जो विपत्ति के समय पर परिवार की बहुत मदद करेगा। इस योजना के तहत किसानों, आम जनता और अन्य ग्रामीण लोगों के लिए कृषि जैसे अन्य कारणों के लिए लोन लेना सरल हो जाएगा। भारत में नकद धन का कम प्रयोग होगा जिससे काले धन पर नियंत्रण लगेगा और सरकार का खर्च भी बच जाएगा इसके साथ-साथ आमदनी भी बढ़ेगी।

  • 28 अगस्त 2014 को भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के द्वारा शुरुआत की गयी लोगों की मुद्रा बचत योजना है जन धन योजना। इसे प्रधानमंत्री जन धन योजना भी कहा जाता है जोकि वास्तव में ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले आम भारतीय लोगों के लिये कुछ अवसर बनाने के लिये लोगों की एक संपत्ति योजना है।
  • प्रधानमंत्री के द्वारा शुरु की गयी ये योजना गरीब लोगों को पैसा बचाने में सक्षम बनाती है। लाल किले पर राष्ट्र को संबोधित करने के दौरान 15 अगस्त 2015 को उन्होंने इस योजना के बारे में घोषणा की। हालांकि इसकी शुरुआत दो हफ्ते बाद हुई।
  • यहाँ रहने वाले लोगों को स्वतंत्र बनाना ही सही मायने में एक स्वतंत्र भारत बनाना है। भारत एक ऐसा देश है जो भ्रामीण क्षेत्रों में रहने लोगों की पिछड़ेपन की स्थिति के कारण अभी भी एक विकासशील देशों में गिना जाता है।
  • अनुचित शिक्षा, असमानता, सामाजिक भेदभाव और बहुत सारी सामाजिक मुद्दों की वजह से भारत में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की दर उच्च है।
  • ये बहुत जरुरी है कि पैसा बचाने की आदत के बारे में लोगों के बीच जागरुकता बढ़े जिससे भविष्य में कुछ बेहतर करने के लिये वो स्वतंत्र हों और उनके भीतर कुछ विश्वास बढ़े।
  • बचत किये गये पैसों की मदद से वो बुरे दिनों में बिना किसी के सहारे अपनी मदद कर सकते हैं। जब हरेक भारतीय लोगों के पास अपना बैंक खाता होगा तब वो पैसों की बचत के महत्व को ज्यादा अच्छे से समझ सकेंगे।
  • इस योजना के अनुसार, इस योजना के शुरुआत होने के पहले दिन ही लगभग 1 करोड़ बैंक खाते खोले गये। भारत में अंतिम स्तर तक विकास लाने के लिये मुद्रा बचत योजना बहुत जरुरी है जिसको ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों में अपने बचत के बारे में अधिक सतर्क बनाने के द्वारा शुरुआत और प्राप्त किया जा सकता है।
  • खासतौर से, भारत के गरीब लोगों को खोले गये खातों के सभी लाभ को देने, बैंक खातों से उनको जोड़ने के लिये और पैसा बचत के लिये जन धन योजना स्कीम शुरु की गयी। भरतीय स्वतंत्रता दिवस से दो सप्ताह बाद 28 अगस्त को पीएम के द्वारा इस योजना की शुरुआत की गयी।
  • बैंक से उसके लाभ से सभी भारतीय नागरिकों को जोड़ने के लिये एक राष्ट्रीय चुनौती के रुप में इस खाता खोलने वाली और मुद्रा बचत योजना की शुरुआत की गयी थी।

Conclusion :

इस योजना को एक सफल योजना बनाने के लिये बहुत सारे कार्यक्रमों को लागू किया गया है। बैंक खातों के महत्व के बारे में जागरुक बनाने के साथ ही बैंक खाता खोलने के फायदे और प्रक्रिया के बारे में उनको समझाने और लोगों के दिमाग को इस ओर खींचने के लिये ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 60 हजार नामांकन कैंप लगाये गये। इस योजना के अंतर्गत ग्रामीण लोग भी वित्तीय सुविधाओं जैसे – इंश्योरेंस, वाहन लोन, गृह लोन, फसल बीमा आदि से जुड़ सकेंगे। प्रधान मंत्री जन धन योजना में सभी देशवासियो ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया, करोडो की तादात में अकाउंट खोले जा चुके है। अब हर व्यक्ति के पास अपना बैंक खाता होगा और वे पैसों की बचत के महत्व को और भी अच्छे से समझ सकेंगे।

प्रधान मंत्री आवास योजना

Introduction : 

सरकार ने 2022 तक ‘सभी के लिए आवास’ बनाने की दिशा में कुछ कदम उठाए हैं। प्रधान मंत्री आवास योजना ने हाल ही में मध्य आय वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर खंड और कम आय वाले समूह की आवास आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपने दायरे का विस्तार किया है । प्रधान मंत्री आवास योजना जून 2015 में लॉन्च की गई। सरकार ने पानी की सुविधा, स्वच्छता और बिजली की आपूर्ति के साथ सस्ती पक्का घरों के निर्माण की योजना बनाई है।

मूल रूप से यह योजना आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों और कम आय वाले समूह वर्गों में लोगों को कवर करने के लिए थी, लेकिन अब मध्य आय समूह को भी शामिल किया गया है। इसका उद्देश्य निजी डेवलपर्स के सहयोग से झोपड़पट्टी के निवासियों के लिए घरों का निर्माण करके झोपड़पट्टी के क्षेत्रों को बदलना है। यह नए निर्माण या मौजूदा घरों के नवीकरण के लिए उठाए गए ऋणों पर कमजोर और मध्यम आय वर्गों को क्रेडिट-लिंक्ड सब्सिडी देने की योजना है। ₹6 और ₹12 लाख के बीच के ऋण के लिए 3 प्रतिशत से 6.5 प्रतिशत की ब्याज सब्सिडी की घोषणा की गई है।

  • लॉन्च: वर्ष 2022 तक ‘सभी के लिये आवास’ के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिये 1 अप्रैल, 2016 को पूर्ववर्ती इंदिरा आवास योजना (Indira Awaas Yojana-IAY) का पुनर्गठन कर उसे  प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (PMAY-G) कर दिया गया था।
  • मंत्रालय:ग्रामीण विकास मंत्रालय।
  • उद्देश्य: मार्च 2022 तक सभी ग्रामीण परिवारों के आवासहीन और कच्चे तथा जीर्ण-शीर्ण घरों में रहने वाले लोगों को बुनियादी सुविधाओं के साथ पक्के घर उपलब्ध कराना।
  • पूर्ण अनुदान सहायता प्रदान करके आवास इकाइयों के निर्माण और मौजूदा गैर-लाभकारी कच्चे घरों के उन्नयन में गरीबी रेखा (बीपीएल) से नीचे रह रहे ग्रामीण लोगों की मदद करना।
  • लाभार्थी:इसके लाभार्थियों में एससी/एसटी, मुक्त बंधुआ मज़दूर और गैर-एससी/एसटी श्रेणियाँ, विधवाओं या कार्रवाई में मारे गए रक्षाकर्मियों के परिजन, पूर्व सैनिक एवं अर्द्धसैनिक बलों के सेवानिवृत्त सदस्य, विकलांग व्यक्ति तथा अल्पसंख्यक शामिल हैं।
  • लाभार्थियों का चयन:तीन चरणों के माध्यम से लाभार्थियों का सत्यापन किया जाएगा जिसमें 2011 की सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (SECC), ग्राम सभा एवं जियो टैगिंग शामिल है।
  • साझा लागत:इस योजना की कुल लागत का बँटवारा केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच 60:40 के अनुपात में किया जाता है, जबकि पूर्वोत्तर तथा हिमालयी राज्यों के लिये यह राशि 90:10 के अनुपात में साझा की जाती है।
  • घर के न्यूनतम आकार को 20 वर्ग मीटर से 25 वर्ग मीटर (एक स्वच्छ रसोई घर सहित) तक बढ़ाया गया है।
  • इकाई सहायता मैदानी क्षेत्रों में 70,000 रुपए से बढ़ाकर 1.20 लाख रुपए तथा पर्वतीय राज्यों में 75,000 रुपए से बढ़ाकर 1.30 लाख रुपए कर दी गई है।
  • शौचालय के निर्माण के लिये स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण (SBM-G), मनरेगाया वित्तपोषण के किसी अन्य स्रोत से तालमेल बिठाकर सहायता उपलब्ध कराई जाएगी।
  • पाइप के ज़रिये पेयजल आपूर्ति, बिजली कनेक्शन, एलपीजी गैस कनेक्शन इत्यादि के लिये विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों के माध्यम से भी प्रयास किया जाता है।
  • निर्माण लक्ष्य का केवल 55% पूरा हो चुका है।
  • ग्रामीण गरीबों के लिये बनाए जाने वाले 2.28 करोड़ घरों में से 1.27 करोड़ से कम घरों का कार्य जनवरी 2021 तक पूरा हो चुका था।
  • लगभग 85% लाभार्थियों के लिये धन स्वीकृत किया गया है।
  • इस योजना ने रोज़गार सृजन में मदद की है तथा कई राज्यों ने अपने प्रवासी मज़दूरों को लॉकडाउन के दौरान रोज़गार उपलब्ध कराया।

Conclusion :

आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों और कम आय वाले समूह श्रेणी में जो 6 लाख रुपये तक का ऋण लेना चाहते हैं, उनके लिए 15 वर्षों के कार्यकाल के लिए 6.5 प्रतिशत की ब्याज सब्सिडी है। सरकार आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए राज्यों/संघ शासित प्रदेशों के साथ साझेदारी में किए गए किफायती आवास परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करेगी। निचले और मध्यम आय वाले समूहों के लिए, प्रधान मंत्री आवास योजना ₹1 लाख से ₹2.3 लाख तक घर खरीदने की लागत को कम कर देगी।

प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना पर निबंध

Introduction : 

किसान भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, लेकिन उनका जीवन दिन ब दिन और अधिक कठिन होता जा रहा है। किसानो की बिगड़ती हालत को देखते हुए सरकार ने “प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना” की शुरूआत की। यह योजना 1 दिसंबर, 2018 से प्रभावी हो गई है। इस योजना के माध्यम से छोटे और सीमांत किसानों को एक सुनिश्चित आय सहायता प्रदान की जाएगी। इस योजना के तहत देश भर में सभी किसान परिवारों को हर चार महीने में रु 2000 की तीन समान किस्तों में रु 6,000 की आय सहायता प्रदान की जाती है।

फंड सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में स्थानांतरित किया जाता है। यह योजना नियमित रूप से किसानो को सुनिश्चित आय प्रदान करेगी। इस आय का उपयोग बीज, उर्वरक, उपकरण, श्रम और अन्य उभरती जरूरतों के लिए किया जा सकता है। लेकिन इस योजना की कुछ सीमाएँ भी हैं। इस योजना का का लक्ष्य छोटे और सीमांत किसानों को कवर करना है, भूमिहीन मजदूर और किरायेदार किसान इस योजना का लाभ नहीं उठा सकते। कुछ राज्यों को छोड़कर, अन्य राज्यों में अभी भी भूमि रिकॉर्ड के लिए डेटाबेस नहीं बन पाए हैं।

  • इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री ने पीएम-किसान मोबाइल एप भी लॉन्च किया है।
  • इस एप का उद्देश्य योजना की पहुँच को और अधिक व्यापक बनाना है। इस एप के माध्यम से किसान अपने भुगतान की स्थिति जान सकते हैं, साथ ही योजना से संबंधित अन्य मापदंडों के बारे में भी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

पीएम-किसान योजना की मौजूदा स्थिति –

  • मौजूदा वित्तीय वर्ष के केंद्रीय बजट में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) योजना के लिये 75,000 करोड़ रुपए की राशि प्रदान की गई है, जिसमें से 50,850 करोड़ रुपए से अधिक की राशि जारी की जा चुकी है।
  • आँकड़ों के अनुसार, अब तक 8.45 करोड़ से अधिक किसान परिवारों को इस योजना का लाभ पहुँचाया जा चुका है, जबकि इस योजना के तहत कवर किये जाने वाले लाभार्थियों की कुल संख्या 14 करोड़ है।
  • केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री ने घोषणा की है कि पीएम-किसान योजना के सभी लाभार्थियों को किसान क्रेडिट कार्ड (Kisan Credit Card-KCC) प्रदान किया जाएगा, ताकि वे आसानी से बैंक से ऋण प्राप्त कर सकें।

प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना –

  • प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) योजना एक केंद्रीय क्षेत्रक योजना है जिसकी शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 24 फरवरी, 2019 को लघु एवं सीमांत किसानों को आर्थिक सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से की गई थी।
  • इस योजना के तहत पात्र किसान परिवारों को प्रतिवर्ष 6,000 रुपए की दर से प्रत्यक्ष आय सहायता उपलब्ध कराई जाती है।
  • यह आय सहायता 2,000 रुपए की तीन समान किस्तों में लाभान्वित किसानों के बैंक खातों में प्रत्यक्ष रूप से हस्तांतरित की जाती है, ताकि संपूर्ण प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके।
  • आरंभ में यह योजना केवल लघु एवं सीमांत किसानों (2 हेक्टेयर से कम जोत वाले) के लिये ही शुरू की गई थी, किंतु 31 मई, 2019 को कैबिनेट द्वारा लिये गए निर्णय के उपरांत यह योजना देश भर के सभी किसानों हेतु लागू कर दी गई।
  • इस योजना का वित्तपोषण केंद्र सरकार द्वारा किया जा रहा है। इस योजना पर अनुमानतः 75 हज़ार करोड़ रुपए का वार्षिक व्यय आएगा।

योजना का उद्देश्य –

  • इस योजना का प्राथमिक उद्देश्य देश के लघु एवं सीमांत किसानों को प्रत्यक्ष आय संबंधी सहायता प्रदान करना है।
  • यह योजना लघु एवं सीमांत किसानों को उनकी निवेश एवं अन्य ज़रूरतों को पूरा करने के लिये आय का एक निश्चित माध्यम प्रदान करती है।
  • योजना के माध्यम से लघु एवं सीमांत किसानों को साहूकारों तथा अनौपचारिक ऋणदाता के चंगुल से बचाने का प्रयास किया जा रहा है।

Conclusion :

देश में किसानों की मौजूदा स्थिति को देखते हुए इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता की यह योजना किसानों को एक आर्थिक आधार प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है। हालाँकि कई विशेषज्ञों का मानना है कि योजना के तहत दी जा रही सहायता राशि अपेक्षाकृत काफी कम है, किंतु हमें यह समझना होगा कि इस योजना का उद्देश्य किसानों को उनकी निवेश संबंधी ज़रूरतों को पूरा करने के लिये एक आर्थिक आधार प्रदान करना है, ताकि वे फसल उत्पादन में नवीन तकनीक और गुणवत्तापूर्ण बीजों का प्रयोग कर उत्पादन में बढ़ोतरी कर सकें।

आवश्यक है कि योजना के मार्ग में स्थित विभिन्न बाधाओं को समाप्त कर इसे अधिक-से-अधिक किसानों के लिये लाभदायी बनाया जा सके। केंद्र सरकार को सार्वजनिक और निजी संस्थानों और बाजार एजेंसियों को उचित मूल्य पर कृषि क्षेत्र में सेवाएं प्रदान करने की अनुमति देनी चाहिए एवं उसका लक्ष्य गरीबी कम करना, स्थायी खाद्य सुरक्षा और समावेशी विकास और किसानों की भलाई सुनिश्चित करना होना चाहिए। यह योजना न केवल गरीब किसान परिवारों को सुनिश्चित आय प्रदान करेगी, बल्कि उनकी उभरती जरूरतों को भी पूरा करेगी।

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नेशनल रिक्रूटमेंट एजेंसी पर निबंध (essay on national recruitment agency in hindi)

नेशनल रिक्रूटमेंट एजेंसी पर निबंध (essay on national recruitment agency in hindi)

Introduction :

भारत सरकार ने राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी (एनआरए) नामक एक भर्ती एजेंसी के निर्माण को मंजूरी दी है। यह एक स्वतंत्र एजेंसी है जो विभिन्न सरकारी नौकरियों के लिए सामान्य प्रारंभिक परीक्षा आयोजित करायेगी । प्रारंभिक चरण में, यह एक सामान्य पात्रता परीक्षा (CET) आयोजित करेगा जिससे ग्रुप B और ग्रुप C पदों के लिए उम्मीदवारों का चयन किया जाएगा। ये परीक्षाएँ अभी एसएससी, आरआरबी और आईबीपीएस द्वारा आयोजित की जा रही हैं। धीरे-धीरे सभी केंद्र सरकार की भर्ती एजेंसियों को एनआरए के शामिल कर दिया जाएगा । वर्तमान में, सरकारी नौकरियों की तैयारी करने वाले उम्मीदवारों को विभिन्न पदों के लिए कई भर्ती एजेंसियों द्वारा आयोजित अलग-अलग परीक्षाओं के लिए उपस्थित होना पड़ता है।

लेकिन एनआरए के आगमन के बाद, यह पूरी प्रक्रिया छात्रों और एजेंसियों के लिए और आसान हो जाएगी। एनआरए शुरू में सीईटी परीक्षा आयोजित करेगा। सीईटी स्कोर के आधार पर उम्मीदवार संबंधित एजेंसी में रिक्त पदों के लिए आवेदन कर सकता है। सीईटी टेस्ट 3 स्तरों में आयोजित किया जाएगा और ये स्नातक, उच्च माध्यमिक और मैट्रिक स्तर के हैं। हालांकि, वर्तमान भर्ती एजेंसियां आईबीपीएस, आरआरबी और एसएससी यथावत रहेंगी। सीईटी स्तर पर किए गए परीक्षण के आधार पर, उम्मीदवारों का अंतिम चयन अलग-अलग विशेष परीक्षाओं द्वारा किया जाएगा जो टीयर 2 और टीयर 3 हैं जो संबंधित भर्ती एजेंसियों द्वारा आयोजित किए जाएंगे।

राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी की मुख्य विशेषताएं –

  • एक साल में कॉमन एलिजिबिलिटी टेस्ट (CET) दो बार आयोजित किया जाएगा.
  • विभिन्न स्तरों पर रिक्तियों पर भर्ती की सुविधा के लिए, स्नातक स्तर, 12 वीं पास और 10 वीं पास वाले उम्‍मीदवारों के लिए अलग से सीईटी का संचालन किया जाएगा.
  • NRA के तहत, एक बड़ा बदलाव यह होगा कि सीईटी 12 प्रमुख भारतीय भाषाओं में आयोजित किया जाएगा. जैसा कि हम जानते हैं कि केंद्र सरकार की नौकरियों में भर्ती केवल अंग्रेजी और हिंदी भाषाओं में होती है.
  • शुरुआत में CET तीन एजेंसियों के लिए कर्मचारी चयन आयोग, रेलवे भर्ती बोर्ड और इंस्टीट्यूट ऑफ बैंकिंग पर्सनेल सेलेक्शन भर्तियों को कवर करेंगे. इसका विस्तार चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा.
  • वर्तमान में प्रचलित शहरी पूर्वाग्रह को दूर करने के लिए, CET पूरे भारत में लगभग 1000 केंद्रों में आयोजित की जाएगी. परीक्षा केंद्र देश के हर जिले में होगा. आकांक्षी जिलों में परीक्षा संरचना बनाने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा जिससे आगे चलकर उम्मीदवारों को अपने निवास स्थान के निकट परीक्षा केन्द्रों तक पहुंचने में मदद मिलेगी.
  • – उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट करने के लिए, CET प्रथम स्तर की परीक्षा होगी और CET का स्कोर तीन वर्षों के लिए वैध होगा.
  • – NRA के तहत, CET ऊपरी आयु सीमा के अध्यधीन होगी उम्‍मीदवारों द्वारा सीईटी में भाग लेने के लिए अवसरों की संख्‍या पर कोई सीमा नहीं होगी. सरकार की मौजूदा नीति के अनुसार अजा/अजजा/अपिव तथा अन्‍य श्रेणियों के उम्‍मीदवारों को ऊपरी आयु-सीमा में छूट दी जाएगी.

राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी – छात्रों के लिए लाभ –

  • यह विभिन्न परीक्षाओं में उपस्थित होने की परेशानी को दूर करेगा.
  • यह वित्तीय बोझ को भी कम करेगा जो एकल परीक्षा शुल्क के माध्यम से कई परीक्षाओं में लगाया जाता है.
  • यह उम्मीदवारों के लिए यात्रा के समय, रहने की लागत इत्यादि को भी बचाएगा, क्योंकि परीक्षा हर जिले में आयोजित की जाएगी. यह अधिक महिला उम्मीदवारों को परीक्षा में उपस्थित होने या सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन करने के लिए भी प्रोत्साहित करेगा.
  • आवेदकों को एकल पंजीकरण पोर्टल पर पंजीकरण करना आवश्यक होगा.
  • – NRA के तहत परीक्षा की तारीखों में क्लैश होने के बारे में चिंता करने की कोई जरूरत नहीं होगी.

राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी से संस्थानों को लाभ –

  • यह उम्मीदवारों की प्रारंभिक या स्क्रीनिंग परीक्षा आयोजित करने की परेशानी को दूर करेगा.
  • यह भर्ती चक्र को भी काफी कम करेगा.
  • यह परीक्षा के पैटर्न में मानकीकरण (standardization) भी लाएगा.
  • यह विभिन्न भर्ती एजेंसियों की लागत को भी कम करेगा जिससे लगभग रु 600 करोड़ की बचत होने की उम्मीद है.

राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी की आवश्यकता –

  • वर्तमान में, सरकारी नौकरी के इच्छुक उम्मीदवारों को पात्रता के समान शर्तों वाले विभिन्न पदों के लिये अलग-अलग भर्ती एजेंसियों द्वारा संचालित भिन्न-भिन्न परीक्षाओं में सम्मिलित होना पड़ता है.
  • जिसके कारण उम्मीदवारों को अलग-अलग एजेंसियों के अलग-अलग शुल्क का भुगतान करना पड़ता है और साथ ही उम्मीदवारों को परीक्षा में हिस्सा लेने के लिये लंबी दूरी भी तय करनी पड़ती है, इससे उम्मीदवारों पर आर्थिक बोझ काफी हद तक बढ़ जाता है।
  • इसके अलावा अलग-अलग भर्ती परीक्षाएँ उम्मीदवारों के साथ-साथ परीक्षाओं का आयोजन करने वाली एजेंसियों पर भी कार्य के बोझ को बढ़ा देती हैं, जिसमें बार-बार होने वाला खर्च, सुरक्षा व्यवस्था और परीक्षा केंद्रों से संबंधित मुद्दे शामिल हैं।
  • आँकड़ों के अनुसार, भारत में प्रत्येक वर्ष लगभग 1.25 लाख सरकारी नौकरियों का विज्ञापन किया जाता है, जिनमें तकरीबन 2.5 करोड़ उम्मीदवार शामिल होते हैं।

Conclusion :

उम्मीदवारो का सीईटी परीक्षा का स्कोर, परिणाम की घोषणा की तारीख से तीन साल के लिए वैध होगा। सीईटी परीक्षा में बैठने के लिए उम्मीदवार द्वारा किए जाने वाले प्रयासों की संख्या पर कोई प्रतिबंध नहीं है। एनआरए समय की जरूरत है, क्योंकि उम्मीदवारों को अलग-अलग एजेंसियों द्वारा संचालित परीक्षाओं में सम्मिलित होना पड़ता है, जिसके कारण उनको इन एजेंसियों को कई बार शुल्क का भुगतान भी करना पड़ता है और साथ ही उम्मीदवारों को परीक्षा में हिस्सा लेने के लिये लंबी दूरी भी तय करनी पड़ती है, इससे उम्मीदवारों पर आर्थिक बोझ काफी अधिक बढ़ जाता है।

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 पर निबंध

Introduction :

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को देश की शिक्षा प्रणाली में समयनुसार उचित बदलाव करने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा 29 जुलाई, 2020 को मंजूरी दी गई। यह नीति देश में स्कूल और उच्च शिक्षा प्रणालियों में परिवर्तनकारी सुधार लेन में बहुत मददगार साबित होगी। यह 21 वीं सदी की पहली शिक्षा नीति है। नई नीति का उद्देश्य 2030 तक स्कूली शिक्षा में 100% सकल नामांकन अनुपात (GER) के साथ पूर्व-माध्यमिक से माध्यमिक स्तर तक शिक्षा का सार्वभौमिकरण करना है।

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति द्वारा कुछ नए बदलाव लाये गए है, जिसमें भारतीय उच्च शिक्षा को विदेशी विश्वविद्यालयों में बढ़ावा देना, चार-वर्षीय बहु-विषयक स्नातक कार्यक्रम के लिए कई निकास विकल्पों के साथ प्रस्तुत करना शामिल है। इस  नई नीति का उद्देश्य भारत को वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनाना है। स्कूली शिक्षा में, इस नीति में पाठ्यक्रम को ओवरहाल करने, पाठ्यक्रम में कमी लाने और अनुभवात्मक शिक्षा पर जोर देने पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

स्कूल में वर्तमान 10 + 2 प्रणाली को एक नयी  5 + 3 + 3 + 4 पाठ्यक्रम प्रणाली से बदल दिया जाएगा। नई नीति के अनुसार, तीन साल की आंगनवाड़ी / प्री-स्कूलिंग के साथ 12 साल की स्कूली शिक्षा होगी। स्कूल और उच्च शिक्षा में, छात्रों के लिए एक विकल्प के रूप में संस्कृत को भी सभी स्तरों पर शामिल किया जाएगा। यह नीति औपचारिक स्कूली शिक्षा के दायरे में प्री-स्कूलिंग को शामिल करेगी ।

National Education Policy 2021 के विशेषताएं –

  • मानव संसाधन प्रबंधन मंत्रालय अब शिक्षा मंत्रालय के नाम से जाना जाएगा।
  • National Education Policy के अंतर्गत शिक्षा का सार्वभौमीकरण किया जाएगा जिसमें मेडिकल और लॉ की पढ़ाई शामिल नहीं की गई है।
  • पहले 10+2 का पैटर्न फॉलो किया जाता था परंतु अब नई नेशनल एजुकेशन पॉलिसी के अंतर्गत 5+3+3+4 का पैटर्न फॉलो किया जाएगा। जिसमें 12 साल की स्कूली शिक्षा होगी और 3 साल की प्री स्कूली शिक्षा होगी।
  • छठी कक्षा से व्यवसायिक परीक्षण इंटर्नशिप आरंभ कर दी जाएगी।
  • पांचवी कक्षा तक शिक्षा मातृभाषा या फिर क्षेत्रीय भाषा में प्रदान की जाएगी।
  • पहले साइंस, कॉमर्स तथा अर्ट स्ट्रीम होती थी। अब ऐसी कोई भी स्ट्रीम नहीं होगी। छात्र अपनी इच्छा अनुसार विषय चुन सकते हैं। छात्र फिजिक्स के साथ अकाउंट या फिर आर्ट्स का कोई सब्जेक्ट भी पढ़ सकते हैं।
  • छात्रों को छठी कक्षा से कोडिंग सिखाई जाएगी।
  • सभी स्कूल डिजिटल इक्विप्ड किए जाएंगे।
  • सभी प्रकार की इकॉन्टेंट को क्षेत्रीय भाषा में ट्रांसलेट किया जाएगा।
  • वर्चुअल लैब डिवेलप की जाएंगी।

नई शिक्षा नीति 2020 के सिद्धांत –

  • प्रत्येक बच्चे की क्षमता की पहचान एवं क्षमता का विकास करना
  • साक्षरता एवं संख्यामकता के ज्ञान को बच्चों के अंतर्गत विकसित करना
  • शिक्षा को लचीला बनाना
  • एक सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली में निवेश करना
  • गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को विकसित करना
  • बच्चों को भारतीय संस्कृति से जोड़ना
  • उत्कृष्ट स्तर पर शोध करना
  • बच्चों को सुशासन सिखाना एवं सशक्तिकरण करना
  • शिक्षा नीति को पारदर्शी बनाना
  • तकनीकी यथासंभव उपयोग पर जोर
  • मूल्यांकन पर जोर देना
  • विभिन्न प्रकार की भाषाएं सिखाना
  • बच्चों की सोच को रचनात्मक एवं तार्किक करना

नई शिक्षा नीति 2020 के फायदे –

  • नई शिक्षा नीति शिक्षार्थियों के एकीकृत विकास पर केंद्रित है।
  • यह 10+2 सिस्टम को 5+3+3+4 संरचना के साथ बदल देता है, जिसमें 12 साल की स्कूली शिक्षा और 3 साल की प्री-स्कूलिंग होती है, इस प्रकार बच्चों को पहले चरण में स्कूली शिक्षा का अनुभव होता है।
  • परीक्षाएं केवल 3, 5 और 8वीं कक्षा में आयोजित की जाएंगी, अन्य कक्षाओं का परिणाम नियमित मूल्यांकन के तौर पर लिए जाएंगे। बोर्ड परीक्षा को भी आसान बनाया जाएगा और एक वर्ष में दो बार आयोजित किया जाएगा ताकि प्रत्येक बच्चे को दो मौका मिलें।
  • नीति में पाठ्यक्रम से बाहर निकलने के अधिक लचीलेपन के साथ स्नातक कार्यक्रमों के लिए एक बहु-अनुशासनात्मक और एकीकृत दृष्टिकोण की परिकल्पना की गई है।
  • राज्य और केंद्र सरकार दोनों शिक्षा के लिए जनता द्वारा अधिक से अधिक सार्वजनिक निवेश की दिशा में एक साथ काम करेंगे, और जल्द से जल्द जीडीपी को 6% तक बढ़ाएंगे।
  • नई शिक्षा नीति सीखने के लिए पुस्तकों का भोझ बढ़ाने के बजाय व्यावहारिक शिक्षा को बढ़ाने पर ज्यादा केंद्रित है।
  • एनईपी यानी नई शिक्षा निति सामान्य बातचीत, समूह चर्चा और तर्क द्वारा बच्चों के विकास और उनके सीखने की अनुमति देता है।
  • एनटीए राष्ट्रीय स्तर पर विश्वविद्यालयों के लिए एक आम प्रवेश परीक्षा आयोजित करेगा।
  • छात्रों को पाठ्यक्रम के विषयों के साथ-साथ सीखने की इच्छा रखने वाले पाठ्यक्रम का चयन करने की भी स्वतंत्रता होगी, इस तरह से कौशल विकास को भी बढ़ावा मिलेगा।
  • सरकार एनआरएफ (नेशनल रिसर्च फाउंडेशन) की स्थापना करके विश्वविद्यालय और कॉलेज स्तर पर अनुसंधान और नवाचारों के नए तरीके स्थापित करेगी।

नई शिक्षा नीति 2020 के नुकसान –

  • भाषा का कार्यान्वयन यानि क्षेत्रीय भाषाओं में जारी रखने के लिए 5वीं कक्षा तक पढ़ाना एक बड़ी समस्या हो सकती है। बच्चे को क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाया जाएगा और इसलिए अंग्रेजी भाषा के प्रति कम दृष्टिकोण होगा, जो 5वीं कक्षा पूरा करने के बाद आवश्यक है।
  • बच्चों को संरचनात्मक तरीके से सीखने के अधीन किया गया है, जिससे उनके छोटे दिमाग पर बोझ बढ़ सकता है।

Conclusion :

नेशनल एजुकेशन पालिसी का मुख्य उद्देश्य भारत मैं प्रदान की जाने वाली शिक्षा को वैश्विक स्तर पर लाना है। जिससे कि भारत एक वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बन सके। नेशनल एजुकेशन पॉलिसी के माध्यम से शिक्षा का सार्वभौमीकरण किया जाएगा। नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2021 में सरकार के माध्यम से पुरानी एजुकेशन पॉलिसी में काफी सारे संशोधन किए हैं। जिससे कि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार आएगा और बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त कर पाएंगे। मिड दे मील कार्यक्रम को प्री-स्कूल बच्चों तक बढ़ाया जाएगा। यह नीति यह भी प्रस्तावित करती है कि सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को 2040 तक बहु-विषयक बनने का लक्ष्य रखना होगा। यह नीति देश में रोजगार के अवसरो को बढ़ावा देगी और हमारी शैक्षिक प्रणाली को मौलिक रूप से बदल देगी।

शिक्षा में यात्रा का महत्व

Introduction :

“दुनिया एक किताब है, और जो लोग यात्रा नहीं करते वे केवल इसका एक पन्नाही पढ़ते हैं।” यह एक प्रसिद्ध कहावत है। यात्रा हमें किसी भी विश्वविद्यालय या कॉलेज से अधिक सिखा सकती है। जब हम यात्रा करते हैं तो हम जिस देश की यात्रा करते हैं उसकी संस्कृति के बारे में सीखते हैं। यात्रा हमें एक सुखद अनुभव प्रदान करती हैं। ज्यादातर लोग, यात्रा के बाद, एक नए दृष्टिकोण, नए उत्साह और एक बेहतर दृढ़ संकल्प के साथ घर लौटते हैं। यात्रा के माध्यम से हमें  बहुत सी नई चीजों का ज्ञान प्राप्त होता है। हमें यात्रा से किसी विशेष समुदाय के लोगो के रहने के तरीके, सामाजिक जीवन, कृषि, पूजा, मान्यताओं, कला रूपों आदि के बारे में पता चलता है। 

छात्रों के लिए भी यात्रा का एक विशेष महत्व है। जब हम विभिन्न स्थानों पर जाते हैं, तो पाठ्यपुस्तकों में सीखी जाने वाली कई चीजें व्यावहारिक रूप से समझी जा सकती हैं। यात्रा एक व्यक्ति को उनके सभी साधारण सुखों और आराम से दूर, उनके आराम क्षेत्र से बाहर ले जाती है। यह हमें साहसी बनने, जीवन को पूर्ण रूप से जीने और समय का उपयोग करने के लिए नई चीजों की खोज करने और नए लोगों से मिलने के लिए मजबूर करता है। इसमें हमारे स्वास्थ्य को बेहतर बनाने की क्षमता है।

  • शिक्षा किसी भी बड़ी पारिवारिक, सामाजिक और यहाँ तक कि राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को भी हर करने की क्षमता प्रदान करती है। हम से कोई भी जीवन के हरेक पहलू में शिक्षा के महत्व को अनदेखा नहीं कर सकता। यह मस्तिष्क को सकारात्मक ओर मोड़ती है और सभी मानसिक और नकारात्मक विचारधाराओं को हटाती है।
  • यह लोगों की सोच को सकारात्मक विचार लाकर बदलती है और नकारात्मक विचारों को हटाती है। बचपन में ही हमारे माता-पिता हमारे मस्तिष्क को शिक्षा की ओर ले जाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे प्रसिद्ध शैक्षणिक संस्था में हमारा दाखिला कराकर हमें अच्छी शिक्षा प्रदान करने का हरसंभव प्रयास करते हैं।
  • यह हमें तकनीकी और उच्च कौशल वाले ज्ञान के साथ ही पूरे संसार में हमारे विचारों को विकसित करने की क्षमता प्रदान करती है। अपने कौशल और ज्ञान को बढ़ाने का सबसे अच्छे तरीके अखबारों को पढ़ना, टीवी पर ज्ञानवर्धक कार्यक्रमों को देखना, अच्छे लेखकों की किताबें पढ़ना आदि हैं। शिक्षा हमें अधिक सभ्य और बेहतर शिक्षित बनाती है। यह समाज में बेहतर पद और नौकरी में कल्पना की गए पद को प्राप्त करने में हमारी मदद करती है।
  • आधुनिक तकनीकी संसार में शिक्षा मुख्य भूमिका को निभाती है। आजकल, शिक्षा के स्तर को बढ़ाने के लिए बहुत तरीके हैं। शिक्षा का पूरा तंत्र अब बदल दिया गया है। हम अब 12वीं कक्षा के बाद दूरस्थ शिक्षा कार्यक्रम (डिस्टेंस एजूकेशन) के माध्यम से भी नौकरी के साथ ही पढ़ाई भी कर सकते हैं।
  • शिक्षा बहुत महंगी नहीं है, कोई भी कम धन होने के बाद भी अपनी पढ़ाई जारी रख सकता है। दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से हम आसानी से किसी भी बड़े और प्रसिद्ध विश्वविद्यालय में बहुत कम शुल्क पर प्रवेश ले सकते हैं। अन्य छोटे संस्थान भी किसी विशेष क्षेत्र में कौशल को बढ़ावा देने के लिए शिक्षा प्रदान कर रहे हैं।
  • पहले, शिक्षा प्रणाली बहुत ही महंगी और कठिन थी, गरीब लोग 12वीं कक्षा के बाद उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सक्षम नहीं थे। समाज में लोगों के बीच बहुत अन्तर और असमानता थी। उच्च जाति के लोग, अच्छे से शिक्षा प्राप्त करते थे और निम्न जाति के लोगों को स्कूल या कालेज में शिक्षा प्राप्त करने की अनुमति नहीं थी।
  • यद्यपि, अब शिक्षा की पूरी प्रक्रिया और विषय में बड़े स्तर पर परिवर्तन किए गए हैं। इस विषय में भारत सरकार के द्वारा सभी के लिए शिक्षा प्रणाली को सुगम और कम महंगी करने के लिए बहुत से नियम और कानून लागू किये गये हैं।
  • सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण, दूरस्थ शिक्षा प्रणाली ने उच्च शिक्षा को सस्ता और सुगम बनाया है, ताकि पिछड़े क्षेत्रों, गरीबों और मध्यम वर्ग के लोगों के लिए भविष्य में समान शिक्षा और सफलता प्राप्त करने के अवसर मिलें।
  • भलीभाँति शिक्षित व्यक्ति एक देश के मजबूत आधार स्तम्भ होते हैं और भविष्य में इसको आगे ले जाने में सहयोग करते हैं। इस तरह, शिक्षा वो उपकरण है, जो जीवन, समाज और राष्ट्र में सभी असंभव स्थितियों को संभव बनाती है।
  • शिक्षा हम सभी के उज्ज्वल भविष्य के लिए आवश्यक उपकरण है। हम जीवन में शिक्षा के इस उपकरण का प्रयोग करके कुछ भी अच्छा प्राप्त कर सकते हैं। शिक्षा का उच्च स्तर लोगों को सामाजिक और पारिवारिक आदर और एक अलग पहचान बनाने में मदद करता है।
  • शिक्षा का समय सभी के लिए सामाजिक और व्यक्तिगत रुप से बहुत महत्वपूर्ण समय होता है। यह एक व्यक्ति को जीवन में एक अलग स्तर और अच्छाई की भावना को विकसित करती है। शिक्षा किसी भी बड़ी पारिवारिक, सामाजिक और यहाँ तक कि राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को भी हर करने की क्षमता प्रदान करती है।
  • हम से कोई भी जीवन के हरेक पहलू में शिक्षा के महत्व को अनदेखा नहीं कर सकता। यह मस्तिष्क को सकारात्मक ओर मोड़ती है और सभी मानसिक और नकारात्मक विचारधाराओं को हटाती है।

Conclusion :

शिक्षा लोगों के मस्तिष्क को बड़े स्तर पर विकसित करने का कार्य करती है तथा इसके साथ ही यह समाज में लोगों के बीच के सभी भेदभावों को हटाने में भी सहायता करती है। यह हमें अच्छा अध्ययन कर्ता बनने में मदद करती है और जीवन के हर पहलू को समझने के लिए सूझ-बूझ को विकसित करती है। यह सभी मानव अधिकारों, सामाजिक अधिकारों, देश के प्रति कर्तव्यों और दायित्वों को समझने में हमारी सहायता करती है। नैनीताल, दार्जिलिंग, पंचमढ़ी, ऊटी आदि स्थानों की यात्रा से हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत प्रभाव पड़ता है। यह हमारे मानसिक ज्ञान को बढ़ा देता है और हमारे स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है, यात्रा हमारी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और पर्यटन उद्योग के विकास को भी बढ़ावा देती है। यात्रा किसी भी उम्र के व्यक्ति के लिए सही मनोरंजन है।

भारत में विज्ञान और तकनीकी विकास

Introduction :

भारत दुनिया में एक महाशक्ति के रूप में उभर रहा है। एक तेजी से विकासशील राष्ट्र होने के नाते, देश विज्ञान और प्रौद्योगिकी के मामले में एक उज्ज्वल भविष्य हासिल करने के लिए बाधाओं के माध्यम से अपना रास्ता बना रहा है। भारतीय समाज प्रौद्योगिकी को अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में स्वीकार करने के लिए काफी उत्सुक है। आधुनिक युग विज्ञान, प्रौद्योगिकी, ज्ञान और सूचना का युग है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नए-नए आविष्कार किये जा रहे है, जिससे हमारा देश दुनिया भर में सुर्खियों में है। आधुनिक गैजेट जीवन के हर क्षेत्र में प्रयोग किए जा रहे हैं, जिससे जीवन आसान और कई समस्याएं हल हो जाती हैं।

आज प्रौद्योगिकी का विकास देश के लगभग सभी क्षेत्रों जैसे कि शिक्षा, बुनियादी ढाँचा, बिजली, विमानन, चिकित्सा, सूचना प्रौद्योगिकी और अन्य क्षेत्रों में बहुत तेजी से हो रहा है। वे अच्छी तरह से सुसज्जित हैं और राष्ट्र के लोगों को सुरक्षित करने के लिए कार्यरत हैं। लेकिन इस क्षेत्र में सन्तुस्टि के लिए कोई जगह नहीं है और हम अभी तक एक विकासशील देश बने हैं। कृषि के क्षेत्र में, हमारे वैज्ञानिक और तकनीकी शोधों ने हमें खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर होने में सक्षम बनाया है। रक्षा के क्षेत्र में भी हमारी उपलब्धियां काफी प्रशंसनीय रही हैं। पृथ्वी और नाग जैसी मिसाइलों का सफल उत्पादन हमारे वैज्ञानिकों की उच्च क्षमताओं और उपलब्धियों की गवाही देता है।

विज्ञान और तकनीकी का हमारे जीवन में प्रभाव –

  • जैसा कि हम सभी जानते हैं कि हम विज्ञान और तकनीकी के समय में रह रहे हैं. हम सभी का जीवन वैज्ञानिक अविष्कारों और आधुनिक समय की तकनीकियों पर बहुत अधिक निर्भर है. विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने लोगों के जीवन को बड़े स्तर पर प्रभावित किया है इसने जीवन को आसान, सरल और तेज बना दिया है.
  • नए युग में, विज्ञान का विकास बैलगाड़ी के युग को समाप्त करके मोटर चलित वाहनों की प्रवृत्ति लाने के लिए बहुत अधिक आवश्यक हो गया है. विज्ञान और प्रौद्योगिकी आधुनिकीकरण के हर पहलू को प्रत्येक राष्ट्र में लागू किया गया है.
  • जीवन के हर एक क्षेत्र को सही ढ़ंग से संचालित करने और लगभग सभी समस्याओं को सुलझाने के लिए आधुनिक उपकरणों की खोज की गई है.
  • इसे चिकित्सा, शिक्षा, बुनियादी ढांचा, उर्जा निर्माण, सूचना प्रौद्योगिकी और अन्य क्षेत्रों में लागू किए बिना सभी लाभों को प्राप्त करना संभव नहीं था.
  • हमने अपने दैनिक जीवन में जो कुछ भी सुधार देखे हैं, वो सब केवल विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास के कारण है. देश के उचित विकास और वृद्धि के लिए, विज्ञान और प्रौद्योगिकी का साथ-साथ चलना बहुत आवश्यक है.
  • गाँव अब कस्बों के रुप में और कस्बें शहरों के रुप में विकसित हो रहे हैं और इस प्रकार से अर्थव्यवस्था के क्षेत्रों में भी विकास हुआ है. हमारा देश भारत विज्ञान और प्रौद्योगिकी की दृष्टि से तेजी से विकास करता हुआ देश है.

विज्ञान और तकनीकी का जीवनशैली पर लागू होना –

  • विज्ञान और तकनीकी का लोगों के जीवन में लागू करना बहुत ही पुराना तरीका है, जो सिंधु घाटी सभ्यता के समय से प्रचलन में है. यह पाया गया है कि आग और पहिये की खोज करने के लिए लगभग पाँच अविष्कार किए गए थे. दोनों ही अविष्कारों को वर्तमान समय के सभी तकनीकी अविष्कारों का जनक कहा जाता है.
  • आग के अविष्कार के माध्यम से लोगों ने ऊर्जां की शक्ति के बारे में पहली बार जाना था. तभी से, लोगों में रुचि बढ़ी और उन्होंने जीवन-शैली को सरल और आसान बनाने के लिए बहुत से साधनों पर शोध के और अधिक कठिन प्रयास करने शुरु कर दिए
  • भारत प्राचीन समय से ही पूरे संसार में सबसे अधिक प्रसिद्ध देश है हालांकि, इसकी गुलामी के बाद, इसने अपनी पहचान और ताकत को खो दिया था. 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद, इसने भीड़ में अपनी खोई हुई ताकत और पहचान को दुबारा से प्राप्त करना शुरु कर दिया है.
  • वो विज्ञान और प्रौद्योगिकी ही थे, जिन्होंने पूरे विश्व में भारत को अपनी वास्तविक पहचान को प्रदान किया है. भारत अब विज्ञान और उन्नत तकनीकी के क्षेत्र में अपने नए अविष्कारों के माध्यम से तेजी से विकास करने वाला देश बन गया है. विज्ञान और तकनीकी आधुनिक लोगों की आवश्यकता और जरुरतों को पूरा करने के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है.
  • तकनीकी में उन्नति के कुछ उदाहरण, रेलवे प्रणाली की स्थापना, मैट्रो की स्थापना, रेलवे आरक्षण प्रणाली, इंटरनेट, सुपर कम्प्यूटर, मोबाइल, स्मार्ट फोन, लगभग सभी क्षेत्रों में लोगों की ऑलाइन पहुँच आदि है. भारत की सरकार बेहतर तकनीकी विकास के साथ ही देश में विकास के लिए अंतरिक्ष संगठन और कई शैक्षणिक संस्थाओं में अधिक अवसरों का निर्माण कर रही है.

Conclusion :

भारत के कुछ प्रसिद्ध वैज्ञानिक जिन्होंने भारत में विभिन्न क्षेत्रों में अपने उल्लेखनीय वैज्ञानिक शोध के माध्यम से तकनीकी उन्नति को संभव बना दिया उनमें से कुछ सर जे.सी. बोस, एस.एन. बोस, सी.वी. रमन, डॉ. होमी जे. भाभा, श्रीनिवास रामानुजन, परमाणु ऊर्जा के जनक डॉ. हर गोबिंद सिंह खुराना, विक्रम साराभाई आदि है. हम अपने स्वदेशी टैंकों के लिए आवश्यक नाइट-विज़न उपकरणों का निर्माण करने में सफल रहे हैं। प्रौद्योगिकी का उपयोग राष्ट्रीय विकास के लिए प्रभावी रूप से किया गया है और अभी तक इसके लाभ को जनता तक पहुंचाने के लिए बहुत कुछ हासिल किया जाना है।

शिक्षा का अधिकार पर निबंध

Introduction :

प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में शिक्षा का बड़ा महत्व हैं,शिक्षा को जीवन का आधार माना गया हैं। किसी भी देश के आधुनिक या विकसित होने का प्रमाण उस देश के नागरिकों के शिक्षा स्तर पर निर्भर करता हैं। आधुनिक समय में शिक्षा को ही किसी राष्ट्र या समाज की प्रगति का सूचक समझा जाता हैं। शिक्षा का अधिकार अधिनियम संसद का एक अधिनियम है जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 ए के तहत भारत में 6 से 14 वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए नि: शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के महत्व का वर्णन करता है। यह अधिनियम 1 अप्रैल 2010 से लागू हुआ। इस अधिनियम की खास बात यह है कि गरीब परिवार के वे बच्चे, जो प्राथमिक शिक्षा से वंचित हैं, के लिए निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान रखा गया है ।

शिक्षा के अधिकार के साथ बच्चों एवं युवाओं का विकास होता है तथा राष्ट्र शक्तिशाली एवं समृद्ध बनता है । यह उत्तरदायी एवं सक्रिय नागरिक बनाने में भी सहायक है । इसमें देश के सभी लोगों, अभिभावकों एवं शिक्षकों का भी सहयोग आवश्यक है । इस कानून के लागू करने पर आने वाले खर्च केंद्र (55 प्रतिशत) और राज्य सरकार (45 प्रतिशत) मिलकर उठाएंगे।

  • आज विश्व के सभी राष्ट्रों द्वारा भारतीय युवाओं की प्रतिमा का मुक्त कण्ठ से गुणगान किया जाना इसका प्रमाण है । बावजूद इसके सम्पूर्ण राष्ट्र की शिक्षा को आधार मानकर विश्लेषण किया जाए तो अभी भी भारत शिक्षा के क्षेत्र में विकसित राष्ट्रों की तुलना में काफी पीछे है ।
  • वर्तमान में भारतीय शिक्षा दर अनुमानतः 74% है, जो वैश्विक स्तर पर बहुत कम है । तब इस अनुपात में और वृद्धि करने के लिए बुद्धिजीवियों ने अपने-अपने सुझाव दिए ।
  • उन सभी के सुझावों पर गौर अते हुए भारत सरकर ने शिक्षा को अनिवार्य रूप से लागू करने हेतु शिक्षा का अधिकार कानून (RTE Act) बनाकर पूरे देश में समान रूप से प्रस्तुत कर दिया ।
  • ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009’, 1 अप्रैल, 2010 से सम्पूर्ण भारत में लागू कर दिया गया । इसका प्रमुख उद्देश्य है- वर्ष आयु तक के सभी बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य, गुणवतायुक्त शिक्षा को सुनिश्चित करना । इस अधिनियम को सर्व शिक्षा अभियान तथा वर्ष 2005 के विधेयक का ही संशोधित रूप कहा जाए, तो समीचीन ही होगा ।
  • क्षेत्रीय सरकारों, अधिकारियों तथा अभिभावकों का यह दायित्व है कि वे बच्चे को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा दिलाने का प्रबन्ध करें । इस कार्य हेतु वित्तीय प्रबन्धन का पूर्ण दायित्व केन्द्र व राज्य सरकार द्वारा मिश्रित रूप से उठाया जाएगा । कोई भी बच्चा किसी समय विद्यालय में प्रवेश पाने को स्वतन्त्र है ।
  • आयु प्रमाण-पत्र न होने के बावजूद, बच्चा विद्यालय में प्रवेश ले सकता है । बच्चों की आवश्यकता का ध्यान रखते हुए पुस्तकालय, खेल के मैदान, स्वच्छ व मजबूत विद्यालय कक्ष, इमारत आदि का प्रबन्ध राज्य सरकार द्वारा किया जाएगा ।
  • शिक्षण की गुणवत्ता में सुधार हेतु 35 छात्रों पर एक शिक्षक का प्रावधान किया गया है तथा साथ ही यह सुनिश्चित किया गया है कि ग्रामीण ब शहरी किसी भी क्षेत्र में यह अनुपात प्रभावित न हो। 
  • इसके साथ ही अध्यापन की गुणवत्ता हेतु केवल प्रशिक्षित अध्यापकों को ही नियुक्त करने का प्रावधान किया गया है जो अप्रशिक्षित अध्यापक, प्राचीन समय से अध्यापनरत हैं, उन्हें सीमित अवधि में अध्यापक-प्रशिक्षण पूर्ण करने का आदेश पारित किया गया है, अन्यथा उन्हें पद-मुक्त किया जा सकता हे।

इसके अतिरिक्त निम्न कार्यों का पूर्ण रूप से निषेध है –

  • छात्रों को शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना देना ।
  • प्रवेश के दौरान छात्रों से कोई लिखित परीक्षा लेना ।
  • छात्रों या उनके अभिभावकों से किसी प्रकार का शुल्क लेना।
  • छात्रों को ट्‌यूशन पढ़ने के लिए बाध्य करना ।
  • बिना मान्यता प्राप्ति के विद्यालय का संचालन करना ।
  • इसी प्रकार निजी विद्यालयों में भी कक्षा 1 से प्रवेश के समय आर्थिक रूप से कमजोर समुदायों के छात्रों हेतु 25% आरक्षण का प्रावधान सुनिश्चित किया गया है ।
  • इस अधिनियम को प्रभावी बनाने का उत्तरदायित्व केन्द्र ब राज्य सरकार दोनों का है, जिसका वित्तीय बहन भी दोनों संयुक्त रूप से करेंगे ।
  • इस अधिनियम के अनुसार, वित्तीय बहन का दायित्व सर्वप्रथम राज्य सरकार को सौंपा गया था, परन्तु राज्य सरकार ने अपनी विवशता का हवाला देते हुए इसे अस्वीकार कर दिया तथा केन्द्र सरकार से मदद का अनुरोध किया, तदुपरान्त केन्द्र तथा राज्य सरकार द्वारा

65:36 अनुपात के तहत वित्तीय प्रबन्धन का विभाजन किया गया । उत्तर-पूर्वी राज्यों में यह अनुपात 90:10 है।

केन्द्र सरकार के दायित्व –

(i) बच्चों का चहुँमुखी विकास ।

(ii) संवैधानिक मूल्यों का विकास ।

(iii) जहाँ तक हो सके, मातृभाषा में शिक्षण दिया जाए ।

(iv) बच्चों के मानसिक बिकास के अनुरूप, उनका नियमित विश्लेषण । (धारा-29 के अन्तर्गत)

(v) बच्चों को भयमुक्त माहौल प्रदान कराना तथा अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का विकास करना ।

राज्य सरकार के दायित्व:

(i) वह प्रत्येक बच्चे को नि:शुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराएगी ।

(ii) अपने क्षेत्र के 14 वर्ष आयु तक के बच्चों का पूर्ण रिकॉर्ड रखेगी ।

(iii) शैक्षणिक कलेण्डर का निर्धारण करेगी (धारा-9 के अन्तर्गत)।

Conclusion :

सर्व शिक्षा अभियान द्वारा पारित लक्ष्य वर्ष 2010 तक पूर्ण न हो पाया था, इसके अतिरिक्त यह अधिनियम भी लागू कर दिया गया । अतः यह कहना समीचीन ही होगा कि इस अधिनियम में सर्व शिक्षा अभियान के सभी नियम समाहित है । अधिनियम शिक्षा को 6 से 14 वर्ष की आयु के बीच हर बच्चे का मौलिक अधिकार बनाता है। अब भारत में 74% आबादी साक्षर है जिसमें पुरुषों में 80% और महिला 65% शामिल हैं। यह शिक्षा का मौलिक अधिकार 6 से 14 वर्षो के बालक-बालिकाओं के लिए निशुल्क और गुणवतापूर्ण शिक्षा की सहायता से उन्हें समान रूप से शिक्षा और रोजगार के समान अवसरों की उपलब्धता सुनिश्चित करवाएगा, इससे हमारा भारत शिक्षित और विकसित बनेगा।

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Essays

समाज में युवाओं की भूमिका निबंध

समाज के प्रति युवाओं की भूमिका पर निबंध (essay on Importance of youth in society in hindi)

Introduction :

युवाओं को प्रत्येक देश की सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति माना जाता है क्योंकि उनकी बुद्धिमता और कड़ी मेहनत देश को सफलता और समृद्धि की राह पर ले जाती है। जैसा कि प्रत्येक नागरिक का राष्ट्र के प्रति कुछ उत्तरदायित्व होता है, वैसे ही युवाओं का भी है। प्रत्येक राष्ट्र के निर्माण में इनका बहुत ही महत्त्वपूर्ण योगदान होता हैं। युवा एक ऐसे व्यक्ति को कहते है जिसकी उम्र 15 से 30 वर्ष के बीच में होती है। चूंकि युवा हर समाज की रीढ़ होते हैं और इसलिए वे समाज के भविष्य का निर्धारण करते हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि अन्य सभी आयु वर्ग जैसे कि बच्चे, किशोर, मध्यम आयु वर्ग और वरिष्ठ नागरिक युवाओं पर भरोसा करते हैं और उनसे बहुत उम्मीदें रखते हैं।

समाज में युवाओं पर अत्यधिक निर्भरता के कारण, हम सभी युवाओं की हमारे परिवारों, समुदायों और देश के भविष्य के प्रति बहुत ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ है। युवा अपने नेतृत्व, नवाचार और विकास कौशल द्वारा समाज की वर्तमान स्थिति को नवीनीकृत कर सकते हैं। युवाओं से देश की वर्तमान तकनीक, शिक्षा प्रणाली और राजनीति में बदलाव लाने की उम्मीद की जाती है। उनपर समाज में हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और नैतिक मूल्यों को बनाए रखने का भी उत्तरदायित्व है। यही कारण है कि देश के विकास के लिए युवाओं की सक्रिय भागीदारी की अत्यधिक आवश्यकता होती है।

  • हमारे राष्ट्र के लिए कई परिवर्तन, विकास, समृद्धि और सम्मान लाने में युवा सक्रिय रूप से शामिल हुए हैं। इस सबका मुख्य उद्देश्य उन्हें एक सकारात्मक दिशा में प्रशिक्षित करना है।
  • युवा पीढ़ी के उत्थान के लिए कई संगठन काम कर रहे हैं क्योंकि वे बड़े होकर राष्ट्र निर्माण में सहायक बनेंगे। गरीब और विकासशील देश अभी भी युवाओं के समुचित विकास और शिक्षण में पिछड़े हुए हैं।
  • एक बच्चे के रूप में प्रत्येक व्यक्ति, अपने जीवन में कुछ बनने का सपने देखता है, बच्चा अपनी शिक्षा पूरी करता है और कुछ हासिल करने के लिए कुछ कौशल प्राप्त करता है।
  • युवाओं में त्वरित शिक्षा, रचनात्मकता, कौशल होता है। वे हमारे समाज और राष्ट्र में परिवर्तन लाने की शक्ति रखते हैं।
  • युवा उस चिंगारी के साथ बड़ा होता है, जो कुछ भी कर सकता है।
  • समाज में कई नकारात्मक कुरीतियाँ और कार्य किए जाते हैं। युवाओं में समाज परिवर्तन और लिंग तथा सामाजिक समानता की अवधारणा को लाने की क्षमता है।
  • समाज में व्याप्त कई मुद्दों पर काम करके युवा दूसरों के लिए एक आदर्श बन सकते हैं।

युवा की भूमिका –

  • युवाओं को राष्ट्र की आवाज माना जाता है। युवा राष्ट्र के लिए कच्चे माल या संसाधन की तरह होते हैं। जिस तरह के आकार में वे हैं, उनके उसी तरीके से उभरने की संभावना होती है।
  • राष्ट्र द्वारा विभिन्न अवसरों और सशक्त युवा प्रक्रियाओं को अपनाया जाना चाहिए, जो युवाओं को विभिन्न धाराओं और क्षेत्रों में करियर बनाने में सक्षम बनाएगा।
  • युवा लक्ष्यहीन, भ्रमित और दिशाहीन होते हैं और इसलिए वे मार्गदर्शन और समर्थन के अधीन होते हैं, ताकि वे सफल होने के लिए अपना सही मार्ग प्रशस्त कर सकें।
  • युवा हमेशा अपने जीवन में कई असफलताओं का सामना करते हैं और हर बार ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि एक पूर्ण अंत है, लेकिन वो फिर से कुछ नए लक्ष्य के साथ खोज करने के लिए एक नए दृष्टिकोण के साथ उठता है।
  • एक युवा मन प्रतिभा और रचनात्मकता से भरा हुआ है। यदि वे किसी मुद्दे पर अपनी आवाज उठाते हैं, तो परिवर्तन लाने में सफल होते हैं।

भारत में युवाओं की प्रमुख समस्याएं –

  • कई युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान नहीं की जाती है; यहां तक ​​कि कई लोग गरीबी और बेरोजगारी तथा अनपढ़ अभिभावकों के वजह से स्कूलों नहीं जा पाते हैं। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि प्रत्येक बच्चे को स्कूल जाने और उच्च शिक्षा हासिल करने का मौका मिले।
  • बालिका शिक्षा पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि देश में कई ऐसे हिस्से हैं जहां लड़कियां स्कूल जाने और पढ़ाई से वंचित है। लेकिन युवा, लड़के और लड़कियों दोनों का गठन करते हैं। जब समाज का एक वर्ग उपेक्षित हो, तो समग्र विकास कैसे हो सकता है?
  • अधिकांश युवाओं को गलत दिशा में खींच लिया गया है; उन्हें अपने जीवन और करियर को नष्ट करने से रोका जाना चाहिए।
  • कई युवाओं में कौशल की कमी देखी गयी है, और इसलिए सरकार को युवाओं के लिए कुछ कौशल और प्रशिक्षण कार्यक्रमों को लागू करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए ताकि वे आगे एक या उससे अधिक अवसरों से लाभान्वित हो सकें।
  • भारत में अधिकांश लोग गांवों में रहते हैं, इसलिए शिक्षा और अवसरों की सभी सुविधाओं तक उनकी उचित पहुंच नहीं है।
  • कुछ युवाओं द्वारा वित्तीय संकट और सामाजिक असमानता की समस्या होती है।
  • ऐसे कई बच्चे हैं जो प्रतिभा के साथ पैदा हुए हैं, लेकिन अपर्याप्त संसाधनों के चलते, वे अपनी प्रतिभा के साथ आगे नहीं बढ़ सके।
  • उनमें से कई को पारिवारिक आवश्यकताओं के कारण पैसा कमाने के लिए अपनी प्रतिभा से हटकर अन्य काम करना पड़ता है, लेकिन उन्हें उस काम से प्यार नहीं है जो वे कर रहे हैं।
  • बेरोजगारी की समस्या युवाओं की सबसे बड़ी समस्या है।
  • जन्मजात प्रतिभा वाले कुछ बच्चे होते हैं, लेकिन संसाधन की कमी या उचित प्रशिक्षण नहीं होने के कारण, वे अपनी आशा और प्रतिभा भी खो देते हैं।
  • इस प्रकार, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि प्रत्येक बच्चे को उचित शिक्षा की सुविधा प्रदान की जाए। प्रशिक्षण और कौशल विकास कार्यक्रम शुरू किए जाने चाहिए। युवाओं को कई अवसर प्रदान किया जाना चाहिए। उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रियाओं और राजनीतिक मामलों में समान रूप से भाग लेना चाहिए।
  • कुशल समूहों को काम प्रदान करने के लिए कई रोजगार योजनाएं चलानी चाहिए।

Conclusion :

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम किस क्षेत्र में प्रगति करना चाहते हैं क्योंकि हर जगह युवाओं की आवश्यकता है। हमारे युवाओं को अपनी आंतरिक शक्तियों और समाज में उनकी भूमिका के बारे में पता होना चाहिए। हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हर किसी को खुद को योग्य साबित करने के लिए समान मौका मिल सके। युवाओं के पास एक अलग दृष्टिकोण है जो पुरानी पीढ़ियों के पास नहीं था जिसके द्वारा वे हमारे देश में विकाश और समृद्धि ला सकते है।

भारत में सांस्कृतिक विविधता पर निबंध

Introduction :

भारतीय संस्कृति विविध है और विभिन्न रीति-रिवाजों, विचारों और सामाजिक मान्यताओं से युक्त है। भारत में विभिन्न संस्कृतियां और समुदाय हैं जो अपने भोजन, कपड़ों, भाषाओं और परंपराओं में भिन्न हैं। भारतीय संस्कृति दुनिया की अन्य संस्कृतियों में सबसे पुरानी और प्रसिद्ध है। भारतीय साहित्य में भी विभिन्न समुदायों, परंपराओं, रीति-रिवाजों और धर्मों का मेल है। भारतीय संस्कृति की विविधता दुनिया भर में प्रसिद्ध है। भारत बहु-सांस्कृतिक और बहु-पारंपरिक त्योहारों का एक वैश्विक केंद्र है यहां पर हर धर्म के त्यौहार मनाये जाते है जैसे की दशहरा, होली, दिवाली, क्रिसमस, रमज़ान, गुरु नानक जयंती, गणेश चतुर्थी आदि । 

यहां पर हर एक त्योहार का अपना-अपना सांस्कृतिक और राष्ट्रीय महत्व है और प्रत्येक त्योहार अलग-अलग रीति-रिवाजों और परंपराओं के साथ मनाये जाते है। भारत में तीन राष्ट्रीय त्योहार – गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस और गांधी जयंती भी बड़े जोश और उत्साह के साथ मनाए जाते हैं ।भारत में, ईश्वर प्रत्येक व्यक्ति के दिल में बसते है। भारतीय विभिन्न प्रार्थनाओं, धार्मिक विश्वासों और नैतिक मूल्यों में विश्वास करते हैं। हिंदू परंपरा में, सभी लोग गायों, नीम, बरगद और पीपल के पेड़ की पूजा करते हैं और उनका सम्मान करते हैं। भारत में नदियों की भी पूजा की जाती है और उनका धार्मिक महत्व हैं। भारत में गंगा, यमुना गोदावरी, ब्रम्हपुत्र, नर्मदा और ताप्ती जैसी कई नदियो की पूजा की जाती हैं।

  • भारत में सदैव राजनैतिक एकता रही। राष्ट्र व सम्राट, महाराजाधिराज जैसी उपाधियां, दिग्विजय और अश्वमेध व राजसूय यज्ञ भारत की जाग्रत राजनैतिक एकता के द्योतक रहे हैं । महाकाव्यकाल, मौर्यकाल, गुप्तकाल और उसके बाद मुगलकाल में भी सम्पूर्ण भारत एक शक्तिशाली राजनैतिक इकाई रहा ।
  • यही कारण है कि देश के भीतर छोटे-मोटे विवाद, बड़े-बड़े युद्ध और व्यापक उथल-पुथल के बाद भी राजनैतिक एकता का सूत्र खण्डित नहीं हुआ । साम्प्रदायिकता, भाषावाद, क्षेत्रीयता और ऐसे ही अन्य तत्व उभरे और अन्तर्राष्ट्रीय शक्तियों ने उनकी सहायता से देश की राष्ट्रीय एकता को खण्डित करने का प्रयास किया, किन्तु वे कभी भी सफल नहीं हो पाये ।
  • जब देश के भीतर युद्ध, अराजकता और अस्थिरता की आंधी चल रही थी तब भी कोटि-कोटि जनता के मन और मस्तिष्क से राजनैतिक एकता की सूक्ष्म, किन्तु सुदृढ़ कल्पना एक क्षण के लिए भी ओझल नहीं हो पाई । इतिहास साक्षी है कि राजनैतिक एकता वाले देश पर विदेशी शक्तियां कभी भी निष्कंटक शासन नहीं चला पाई।
  • भारतीय संस्कृति का एक शक्तिशाली पक्ष इसकी धार्मिक एकता है । भारत के सभी धर्मों और सम्प्रदायों मे बाह्य विभिन्नता भले ही हो, किन्तु उन सबकी आत्माओं का स्रोत एक ही है । मोक्ष, निर्वाण अथवा कैवल्य एक ही गन्तव्य के पृथक-पृथक नाम हैं । भारतीय धर्मों में कर्मकाण्डों की विविधता भले ही हो किन्तु उनकी मूल भावना में पूर्ण सादृश्यता है ।
  • इसी धार्मिक एकता एवं धर्म की विशद कल्पना ने देश को व्यापक दृष्टिकोण दिया जिसमें लोगों के अभ्यन्तर को समेटने और जोड़ने की असीम शक्ति है । नानक, तुलसी, बुद्ध, महावीर सभी के लिए अभिनन्दनीय हैं । देश के मन्दिरों, मस्जिदों और गुरुद्वारों के समक्ष सब नतमस्तक होते है; तीर्थों और चारों धामों के प्रति जन-जन की आस्था इसी सांस्कृतिक एकता का मूल तत्व है ।
  • भारत की एकता का सबसे सुदृढ़ स्तम्भ इसकी संस्कृति है। रहन-सहन, खान-पान, वेश-भूषा और त्योहारों-उत्सवों की विविधता के पीछे सांस्कृतिक समरसता का तत्व दृष्टिगोचर होता है । संस्कारों (जन्म, विवाह, मृत्यु के समय अन्तिम संस्कार आदि) के एक ही प्रतिमान सर्वत्र विद्यमान हैं । सामाजिक नैतिकता और सदाचार के सूत्रों के प्रति समान आस्था के दर्शन होते हैं ।
  • मनुष्य जीवन पुरुष, स्त्रियों और लड़कों-लड़कियों के लिए आचरण, व्यवहार, शिष्टाचार, नैतिकता और जीवन-दर्शन की अविचल एकरूपता देश की सांस्कृतिक एकता का सुदृढ़ आधार है । भाषाओं के बीच पारस्परिक सम्बन्ध व आदान-प्रदान, साहित्य के मूल तत्वों, स्थायी मूल्यों और ललित कलाओं की मौलिक सृजनशील प्रेरणाएं सब हमारी सांस्कृतिक एकता की मौलिक एकता का प्रमाण है । सब ‘सत्यं’ ‘शिवं’ और ‘सुन्दरं’ की अभिव्यक्ति का माध्यम है ।
  • भारत की गहरी और आधारभूत एकता देखने की कम और अनुभव करने की वस्तु अधिक है । देश सबको प्यारा है । इसकी धरती, नदियों, पहाड़ों, हरे-भरे खेतों, लोक-गीतों, लोक-रीतियों और जीवन-दर्शन के प्रति लोगों में कितना अपनापन, कितना प्यार-अनुराग और कितना भावनात्मक लगाव है इसकी कल्पना नहीं की जा सकती । किसी भारतीय को इनके सम्बन्ध में कोई अपवाद सहय नहीं होगा क्योंकि ये सब उसके अपने है ।
  • भारत में इतनी विविधताओं के बावजूद एक अत्यन्त टिकाऊ और सुदृढ़ एकता की धारा प्रवाहित हो रही है इस सम्बन्ध में सभी भारतीयों के अनुभव एवं अहसास के बाद किसी बाह्य प्रमाण या प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं हैं । लेकिन फिर भी यहां बी॰ए॰ स्मिथ जैसे सुविख्यात इतिहासवेत्ता के कथन का हवाला देना अप्रासंगिक न होगा । उसने कहा कि भारत में ऐसी गहरी आधारभूत और दृढ़ एकता है, जो रंग, भाषा, वेष-भूषा, रहन-सहन की शैलियों और जातियों की अनेकताओं के बावजूद सर्वत्र विद्यमान है।
  • भारत को भौगोलिक दृष्टिकोण से कई क्षेत्रों में विभक्त किया जा सकता है, परन्तु सम्पूर्ण देश भारतवर्ष के नाम से विख्यात है । इस विशाल देश के अन्दर न तो ऐसी पर्वतमालाएँ है और न ही ऐसी सरिताएँ या सघन बन, जिन्हें पार न किया जा सके । इसके अतिरिक्त, उत्तर में हिमालय की विशाल पर्वतमाला तथा दक्षिण में समुद्र ने सारे भारत में एक विशेष प्रकार की ऋतु पद्धति बना दी है ।
  • ग्रीष्म ऋतु में जो भाप बादल बनकर उठती है, बह हिमालय की चोटियों पर बर्फ के रूप में जम जाती है और गर्मियों में पिघलकर नदियों की धाराएँ बनकर वापस समुद्र में चली जाती है । सनातन काल से समुद्र और हिमालय में एक-दूसरे पर पानी फेंकने का यह अद्‌भुत खेल चल रहा है । एक निश्चित क्रम के अनुसार ऋतुएँ परिवर्तित होती हैं एवं यह ऋतु चक्र सपने देश में एक जैसा है ।

Conclusion :

भारत में सदैव अनेक राज्य विद्यमान रहे है, परन्तु भारत के सभी महत्वाकांक्षी सम्राटों का ध्येय सम्पूर्ण भारत पर अपना एकछत्र साम्राज्य स्थापित करने का रहा है एवं इसी ध्येय से राजसूय वाजपेय, अश्वमेध आदि यश किए जाते थे तथा सम्राट स्वयं को राजाधिराज व चक्रवर्ती आदि उपाधियों से विभूषित कर इस अनुभूति को व्यक्त करते थे कि वास्तव में भारत का विस्तृत भूखण्ड राजनीतिक तौर पर एक है । भारत अमरनाथ मंदिर, बद्रीनाथ, हरिद्वार, वैष्णो देवी और वाराणसी जैसे कई पवित्र और धार्मिक स्थलों का घर है, जो देश के उत्तरी भाग में स्थित हैं। हालांकि, दक्षिणी क्षेत्र में, रामेश्वरम और सबरीमाला मंदिर का बहुत अधिक महत्व है। इस प्रकार, हम कह सकते हैं कि भारत परंपराओं और आधुनिक संस्कृति से भरा हुआ है। लोगों को अपनी इच्छानुसार किसी भी धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति दुनिया भर में प्रसिद्ध है।

विविधता मे एकता

Introduction :

भारत एक ऐसा देश है जिसने “विविधता मे एकता” की सच्चाई को सही साबित किया है। बिना किसी परेशानी के कई वर्षों से विभिन्न धर्म और जाति के लोगों ने एक साथ रह कर दिखाया है। भारत विश्व का एक प्रसिद्ध और बड़ा देश है जहाँ विभिन्न धर्म जैसे हिन्दू, मुस्लिम, बौद्ध, सिक्ख, जैन, ईसाई और पारसी आदि के एक साथ रहते हैं। यहाँ अलग-अलग जीवन-शैली के लोग एकसाथ रहते हैं। वो अलग आस्था, धर्म और विश्वास से संबंध रखते हैं। इन भिन्नताओं के बावजूद भी वो भाईचारे और मानवता के संबंध के साथ रहते हैं।

“विविधता में एकता” भारत की एक अलग विशेषता है जो इसे पूरे विश्व भर में प्रसिद्ध करती है। अपनी रीति-रिवाज़ और विश्वास का अनुसरण करने के द्वारा सभी धर्मों के लोग अलग तरीकों से पूजा-पाठ करते हैं। भारत अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिये प्रसिद्ध है जो कि विभिन्न धर्मों के ही लोगों के कारण है। अपने हित और विश्वास के आधार पर लोग विभिन्न जीवन-शैली को बढ़ावा देते हैं।

विविधता में एकता का महत्व –

  • “विविधता में एकता” लोगों की कार्यस्थल, संगठन और समुदाय में मनोबल को बढ़ाता है।
  • ये लोगों के बीच में दल भावना, रिश्ते, समूह कार्य को बढ़ाने में मदद करता है इसकी वजह से प्रदर्शन, कार्यकुशलता, उत्पादकता और जीवन शैली में सुधार आता है।
  • बुरी परिस्थिति में भी ये प्रभावशाली संवाद बनाता है।
  • सामाजिक परेशानियों से लोगों को दूर रखता है और मुश्किलों से लड़ने में आसानी से मदद करता है।
  • मानव रिश्तों में अच्छा सुधार लाता है तथा सभी के मानव अधिकारों की रक्षा करता है।
  • भारत में “विविधता में एकता” पर्यटन के स्रोत उपलब्ध कराता है। पूरी दुनिया से अधिक यात्रियों और पर्यटकों को विभिन्न संस्कृति, परंपरा, भोजन, धर्म और परिधान के लोग आकर्षित करते हैं।
  • कई तरीकों में असमान होने के बावजूद भी देश के लोगों के बीच राष्ट्रीय एकीकरण की आदत को ये बढ़ावा देता है।
  • भारत की सांस्कृतिक विरासत को मजबूत और समृद्ध बनाने के साथ ही ये देश के संपन्न विरासत को महत्व देता है।
  • विभिन्न फसलों के द्वारा कृषि के क्षेत्र में संपन्न बनाने में ये मदद करता है जिससे अर्थव्यवस्था में वृद्धि होती है।
  • देश के लिये विभिन्न क्षेत्रों में कौशल और उन्नत पेशेवरों के साधन है।
  • “विविधता में एकता” समाज के लगभग सभी पहलुओं में पूरे देश में मजबूती और संपन्नता का साधन बनता है। अपनी रीति-रिवाज़ और विश्वास का अनुसरण करने के द्वारा सभी धर्मों के लोग अलग तरीकों से पूजा-पाठ करते हैं बुनियादी एकरुपता के अस्तित्व को प्रदर्शित करता है।
  • “विविधता में एकता” विभिन्न असमानताओं की अपनी सोच से परे लोगों के बीच भाईचारे और समरसता की भावना को बढ़ावा देता है।
  • भारत अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिये प्रसिद्ध है जो कि विभिन्न धर्मों के लोगों के कारण है। अपने हित और विश्वास के आधार पर विभिन्न जीवन-शैली को अलग-अलग संस्कृति के लोग बढ़ावा देते हैं। ये दुबारा से विभिन्न पेशेवर क्षेत्रों में जैसे संगीत, कला, नाटक, नृत्य (शास्त्रिय, फोक आदि), नाट्यशाला, मूर्तिकला आदि में वृद्धि को बढ़ावा देते हैं। लोगों की आध्यात्मिक परंपरा उन्हें एक-दूसरे के लिये अधिक धर्मनिष्ठ बनाती है।
  • सभी भारतीय धार्मिक लेख लोगों की आध्यात्मिक समझ का महान साधन है। लगभग सभी धर्मों में ऋषि, महर्षि, योगी, पुजारी, फादर आदि होते हैं जो अपने धर्मग्रंथों के अनुसार अपनी आध्यात्मिक परंपरा का अनुसरण करते हैं।
  • भारत में हिन्दी मातृ-भाषा है हालाँकि अलग-अलग धर्म और क्षेत्र (जैसे इंग्लिश, ऊर्दू, संस्कृत, पंजाबी, बंगाली, उड़िया आदि) के लोगों के द्वारा कई दूसरी बोली और भाषाएँ बोली जाती है; हालाँकि सभी महान भारत के नागरिक होने पर गर्व महसूस करते हैं।
  • भारत की “विविधता में एकता” खास है जिसके लिये ये पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। ये भारत में बड़े स्तर पर पर्यटन को आकर्षित करता है।
  • एक भारतीय होने के नाते, हम सभी को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिये और किसी भी कीमत पर इसकी अनोखी विशेषता को कायम रखने की कोशिश करनी है। यहाँ “विविधता में एकता” वास्तविक खुशहाली होने के साथ ही वर्तमान तथा भविष्य की प्रगति के लिये रास्ता है।
  • भारत को एक स्वतंत्र देश बनाने के लिये भारत के सभी धर्मों के लोगों के द्वारा चलाये गये स्वतंत्रता आंदोलन को हम कभी नहीं भूल सकते है। भारत में “विविधता में एकता” का स्वतंत्रता के लिये संघर्ष बेहतरीन उदाहरण है।
  • भारत में “विविधता में एकता” सभी को एक कड़ा संदेश देता है कि बिना एकता के कुछ भी नहीं है। प्यार और समरसता के साथ रहना जीवन के वास्तविक सार को उपलब्ध कराता है। भारत में “विविधता में एकता” दिखाती है कि हम सभी एक भगवान के द्वारा पैदा, परवरिश और पोषित किये गये हैं।

Conclusion :

भारत एक ऐसा देश है जिसने “विविधता मे एकता” की सच्चाई को सही साबित किया है। बिना किसी परेशानी के कई वर्षों से विभिन्न धर्म और जाति के लोगों ने एक साथ रह कर दिखाया है। भारत ऊँचे पहाड़ों, घाटियों, महासागरों, प्रसिद्ध नदियों, धारा, जंगल, रेगिस्तान, प्राचीन संस्कृति और परंपराएँ और सबसे खास “विविधता में एकता” से सजा हुआ देश है। ये दुबारा से विभिन्न पेशेवर क्षेत्रों में जैसे संगीत, कला, नाटक, नृत्य, नाट्यशाला, मूर्तिकला आदि में वृद्धि को बढ़ावा देते हैं। लोगों की आध्यात्मिक परंपरा उन्हें एक-दूसरे के लिये अधिक धर्मनिष्ठ बनाती है। भारत की “विविधता में एकता” खास है जिसके लिये ये पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। ये भारत में बड़े स्तर पर पर्यटन को आकर्षित करता है। एक भारतीय होने के नाते, हम सभी को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिये और किसी भी कीमत पर इसकी अनोखी विशेषता को कायम रखने की कोशिश करनी चाहिये । यहाँ “विविधता में एकता” वास्तविक खुशहाली होने के साथ ही वर्तमान तथा भविष्य की प्रगति के लिये रास्ता है।

शिक्षा का अधिकार पर निबंध

Introduction :

प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में शिक्षा का बड़ा महत्व हैं,शिक्षा को जीवन का आधार माना गया हैं। किसी भी देश के आधुनिक या विकसित होने का प्रमाण उस देश के नागरिकों के शिक्षा स्तर पर निर्भर करता हैं। आधुनिक समय में शिक्षा को ही किसी राष्ट्र या समाज की प्रगति का सूचक समझा जाता हैं। शिक्षा का अधिकार अधिनियम संसद का एक अधिनियम है जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 ए के तहत भारत में 6 से 14 वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए नि: शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के महत्व का वर्णन करता है। यह अधिनियम 1 अप्रैल 2010 से लागू हुआ। इस अधिनियम की खास बात यह है कि गरीब परिवार के वे बच्चे, जो प्राथमिक शिक्षा से वंचित हैं, के लिए निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान रखा गया है ।

शिक्षा के अधिकार के साथ बच्चों एवं युवाओं का विकास होता है तथा राष्ट्र शक्तिशाली एवं समृद्ध बनता है । यह उत्तरदायी एवं सक्रिय नागरिक बनाने में भी सहायक है । इसमें देश के सभी लोगों, अभिभावकों एवं शिक्षकों का भी सहयोग आवश्यक है । इस कानून के लागू करने पर आने वाले खर्च केंद्र (55 प्रतिशत) और राज्य सरकार (45 प्रतिशत) मिलकर उठाएंगे।

  • आज विश्व के सभी राष्ट्रों द्वारा भारतीय युवाओं की प्रतिमा का मुक्त कण्ठ से गुणगान किया जाना इसका प्रमाण है । बावजूद इसके सम्पूर्ण राष्ट्र की शिक्षा को आधार मानकर विश्लेषण किया जाए तो अभी भी भारत शिक्षा के क्षेत्र में विकसित राष्ट्रों की तुलना में काफी पीछे है ।
  • वर्तमान में भारतीय शिक्षा दर अनुमानतः 74% है, जो वैश्विक स्तर पर बहुत कम है । तब इस अनुपात में और वृद्धि करने के लिए बुद्धिजीवियों ने अपने-अपने सुझाव दिए ।
  • उन सभी के सुझावों पर गौर अते हुए भारत सरकर ने शिक्षा को अनिवार्य रूप से लागू करने हेतु शिक्षा का अधिकार कानून (RTE Act) बनाकर पूरे देश में समान रूप से प्रस्तुत कर दिया ।
  • ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009’, 1 अप्रैल, 2010 से सम्पूर्ण भारत में लागू कर दिया गया । इसका प्रमुख उद्देश्य है- वर्ष आयु तक के सभी बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य, गुणवतायुक्त शिक्षा को सुनिश्चित करना । इस अधिनियम को सर्व शिक्षा अभियान तथा वर्ष 2005 के विधेयक का ही संशोधित रूप कहा जाए, तो समीचीन ही होगा ।
  • क्षेत्रीय सरकारों, अधिकारियों तथा अभिभावकों का यह दायित्व है कि वे बच्चे को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा दिलाने का प्रबन्ध करें । इस कार्य हेतु वित्तीय प्रबन्धन का पूर्ण दायित्व केन्द्र व राज्य सरकार द्वारा मिश्रित रूप से उठाया जाएगा । कोई भी बच्चा किसी समय विद्यालय में प्रवेश पाने को स्वतन्त्र है ।
  • आयु प्रमाण-पत्र न होने के बावजूद, बच्चा विद्यालय में प्रवेश ले सकता है । बच्चों की आवश्यकता का ध्यान रखते हुए पुस्तकालय, खेल के मैदान, स्वच्छ व मजबूत विद्यालय कक्ष, इमारत आदि का प्रबन्ध राज्य सरकार द्वारा किया जाएगा ।
  • शिक्षण की गुणवत्ता में सुधार हेतु 35 छात्रों पर एक शिक्षक का प्रावधान किया गया है तथा साथ ही यह सुनिश्चित किया गया है कि ग्रामीण ब शहरी किसी भी क्षेत्र में यह अनुपात प्रभावित न हो। 
  • इसके साथ ही अध्यापन की गुणवत्ता हेतु केवल प्रशिक्षित अध्यापकों को ही नियुक्त करने का प्रावधान किया गया है जो अप्रशिक्षित अध्यापक, प्राचीन समय से अध्यापनरत हैं, उन्हें सीमित अवधि में अध्यापक-प्रशिक्षण पूर्ण करने का आदेश पारित किया गया है, अन्यथा उन्हें पद-मुक्त किया जा सकता हे।

इसके अतिरिक्त निम्न कार्यों का पूर्ण रूप से निषेध है –

  • छात्रों को शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना देना ।
  • प्रवेश के दौरान छात्रों से कोई लिखित परीक्षा लेना ।
  • छात्रों या उनके अभिभावकों से किसी प्रकार का शुल्क लेना।
  • छात्रों को ट्‌यूशन पढ़ने के लिए बाध्य करना ।
  • बिना मान्यता प्राप्ति के विद्यालय का संचालन करना ।
  • इसी प्रकार निजी विद्यालयों में भी कक्षा 1 से प्रवेश के समय आर्थिक रूप से कमजोर समुदायों के छात्रों हेतु 25% आरक्षण का प्रावधान सुनिश्चित किया गया है ।
  • इस अधिनियम को प्रभावी बनाने का उत्तरदायित्व केन्द्र ब राज्य सरकार दोनों का है, जिसका वित्तीय बहन भी दोनों संयुक्त रूप से करेंगे ।
  • इस अधिनियम के अनुसार, वित्तीय बहन का दायित्व सर्वप्रथम राज्य सरकार को सौंपा गया था, परन्तु राज्य सरकार ने अपनी विवशता का हवाला देते हुए इसे अस्वीकार कर दिया तथा केन्द्र सरकार से मदद का अनुरोध किया, तदुपरान्त केन्द्र तथा राज्य सरकार द्वारा

65:36 अनुपात के तहत वित्तीय प्रबन्धन का विभाजन किया गया । उत्तर-पूर्वी राज्यों में यह अनुपात 90:10 है।

केन्द्र सरकार के दायित्व –

(i) बच्चों का चहुँमुखी विकास ।

(ii) संवैधानिक मूल्यों का विकास ।

(iii) जहाँ तक हो सके, मातृभाषा में शिक्षण दिया जाए ।

(iv) बच्चों के मानसिक बिकास के अनुरूप, उनका नियमित विश्लेषण । (धारा-29 के अन्तर्गत)

(v) बच्चों को भयमुक्त माहौल प्रदान कराना तथा अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का विकास करना ।

राज्य सरकार के दायित्व-

(i) वह प्रत्येक बच्चे को नि:शुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराएगी ।

(ii) अपने क्षेत्र के 14 वर्ष आयु तक के बच्चों का पूर्ण रिकॉर्ड रखेगी ।

(iii) शैक्षणिक कलेण्डर का निर्धारण करेगी (धारा-9 के अन्तर्गत)।

Conclusion :

सर्व शिक्षा अभियान द्वारा पारित लक्ष्य वर्ष 2010 तक पूर्ण न हो पाया था, इसके अतिरिक्त यह अधिनियम भी लागू कर दिया गया । अतः यह कहना समीचीन ही होगा कि इस अधिनियम में सर्व शिक्षा अभियान के सभी नियम समाहित है । अधिनियम शिक्षा को 6 से 14 वर्ष की आयु के बीच हर बच्चे का मौलिक अधिकार बनाता है। अब भारत में 74% आबादी साक्षर है जिसमें पुरुषों में 80% और महिला 65% शामिल हैं। यह शिक्षा का मौलिक अधिकार 6 से 14 वर्षो के बालक-बालिकाओं के लिए निशुल्क और गुणवतापूर्ण शिक्षा की सहायता से उन्हें समान रूप से शिक्षा और रोजगार के समान अवसरों की उपलब्धता सुनिश्चित करवाएगा, इससे हमारा भारत शिक्षित और विकसित बनेगा।

पीएम स्वनिधि योजना पर निबंध

Introduction :

हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के द्वारा 1 जून 2020 को प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना को शुरू करने का फैसला लिया गया | इस योजना के अंतर्गत  देश के रेहड़ी और सड़क विक्रेताओं को अपना खुद का काम नए सिरे से शुरू करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा 10000 रूपये तक का लोन मुहैया कराया जायेगा | इस स्वनिधि योजना को प्रधानमंत्री स्ट्रीट वेंडर्स आत्म निर्भर निधि के नाम से भी जाना जाता है |

इस लोन को समय पर चुकाने वाले स्ट्रीट वेंडर्स को 7 फीसद का वार्षिक ब्याज सब्सिडी के तौर पर उनके अकाउंट में सरकार की ओर से ट्रांसफर किया जाएगा। देश के जो इच्छुक लाभार्थी इस योजना का लाभ उठाना चाहते है तो उन्हें इस योजना के तहत आवेदन करना होगा |  स्ट्रीट वेंडर आत्मनिर्भर निधि के अंतर्गत विभिन्न क्षेत्रों में वेंडर, हॉकर, ठेले वाले, रेहड़ी वाले, ठेली फलवाले आदि सहित 50 लाख से अधिक लोगों को योजना से लाभ प्रदान किया जायेगा | स्ट्रीट वेंडर आत्मनिर्भर निधि के अंतर्गत रेहड़ी पटरी वालो को अपना काम दोबारा से शुरू करने के लिए सरकार द्वारा लोन मुहैया कराया गया है |

  • इस योजना के तहत छोटे दुकानदार 10,000 रुपए तक के ऋण के लिये आवेदन कर सकेंगे।
  • ऋण प्राप्त करने के लिये आवेदकों को किसी प्रकार की ज़मानत या कोलैट्रल (Collateral) की आवश्यकता नहीं होगी।
  • इस योजना के तहत प्राप्त हुई पूंजी को चुकाने के लिये एक वर्ष का समय दिया जाएगा, विक्रेता इस अवधि के दौरान मासिक किश्तों के माध्यम से ऋण का भुगतान कर सकेंगे।
  • साथ ही इस योजना के तहत यदि लाभार्थी लिये गए ऋण पर भुगतान समय से या निर्धारित तिथि से पहले ही करते हैं तो उन्हें 7% (वार्षिक) की ब्याज सब्सिडी प्रदान की जाएगी, जो ‘प्रत्यक्ष लाभ अंतरण’ (Direct Benefit Transfer- DBT) के माध्यम से 6 माह के अंतराल पर सीधे लाभार्थी के बैंक खाते में जमा की जाएगी।
  • पीएम स्वनिधि के तहत निर्धारित तिथि से पहले ऋण के पूर्ण भुगतान पर कोई ज़ुर्माना नहीं लागू होगा।
  • इस योजना के तहत ऋण जारी करने की प्रक्रिया जुलाई माह से शुरू की जाएगी।
  • इस योजना के लिये सरकार द्वारा 5,000 करोड़ रुपए की राशि मंज़ूर की गई है, यह योजना मार्च 2022 तक लागू रहेगी।
  • यह पहली बार है जब सूक्ष्म-वित्त संस्थानों (Micro finance Institutions(MFI), गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (Non Banking Financial Company- (NBFC), स्वयं सहायता समूह (Self Help Group-SHG),  बैंकों को शहरी क्षेत्र की गरीब आबादी से जुड़ी किसी योजना में शामिल किया गया है।
  • इन संस्थानों को ज़मीनी स्तर पर उनकी उपस्थिति और छोटे व्यापारियों व शहरों की गरीब आबादी के साथ निकटता के कारण इस योजना में शामिल किया गया है।

तकनीकी का प्रयोग और पारदर्शिता –

  • इस योजना के प्रभावी वितरण और इसके क्रियान्वयन में पारदर्शिता लाने के लियेवेब पोर्टल और मोबाइल एप युक्त एक डिजिटल प्लेटफॉर्म का विकास किया जा रहा है।
  • यह प्लेटफॉर्म क्रेडिट प्रबंधन के लिये वेब पोर्टल और मोबाइल एप कोभारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (सिडबी) के ‘उद्यम मित्र’ पोर्टल से तथा ब्याज सब्सिडी के स्वचालित प्रबंधन हेतु MoHUA के ‘पैसा पोर्टल’ (PAiSA Portal) से जोड़ेगा।  
  • इस योजना के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रो और पृष्ठभूमि के 50 लाख से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रूप से लाभ प्राप्त होगा।
  • इस योजना को विशेष रूप से छोटे दुकानदारों (ठेले और रेहड़ी-पटरी वाले) के लिये तैयार किया गया है, इस योजना के माध्यम से छोटे व्यापारी COVID-19 के कारण प्रभावित हुए अपने व्यापार को पुनः शुरू कर सकेंगे।
  • इस योजना के माध्यम से सरकार द्वारा छोटे व्यापारियों के बीच डिजिटल बैंकिंग को बढ़ावा देने का प्रयास किया जाएगा।
  • इसके तहत ऋण चुकाने के लिये डिजिटल भुगतान करने वाले लाभार्थियों को हर माह कैश-बैक प्रदान कर उन्हें अधिक-से-अधिक डिजिटल बैंकिंग अपनाने के लिये प्रोत्साहित किया जाएगा।
  • इस योजना के ज़रिये रेहड़ी पटरी वालो को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाया जायगा तथा गरीब लोगो की स्थिति में सुधार होगा |
  • इस योजना के तहत MoHUA द्वारा जून माह में पूरे देश में राज्य सरकारों, दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन के राज्य कार्यालय, भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम, शहरी स्थानीय निकायों, सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों के लिए क्रेडिट गारंटी निधि ट्रस्ट और अन्य हितधारकों के सहयोग से क्षमता विकास और वित्तीय साक्षरता कार्यक्रम की शुरुआत की जाएगी।
  • COVID-19 महामारी के कारण देश की औद्योगिक इकाइयों और संगठित क्षेत्र के अन्य व्यवसायों के अतिरिक्त असंगठित क्षेत्र और छोटे व्यापारियों को भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ा है।
  • देश में बड़े पैमाने पर असंगठित क्षेत्र के प्रमाणिक आँकड़े उपलब्ध न होने से इससे जुड़े लोगों को सहायता पहुँचाना एक बड़ी चुनौती रही है। साथ ही इस क्षेत्र के लिये किसी विशेष आर्थिक तंत्र के अभाव में छोटे व्यापारियों को स्थानीय कर्ज़दारों से महँगी दरों पर ऋण लेना पड़ता है। 

Conclusion :

पीएम स्वनिधियोजना के माध्यम से छोटे व्यापारियों को आसान शर्तों पर ऋण उपलब्ध करा कर ऐसे लोगों को COVID-19 के कारण हुए नुकसान से उबरने में सहायता प्रदान की जा सकेगी।  इस योजना के अंतर्गत 2 जुलाई 2020 को ऋण देने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद, राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 1.54 लाख से अधिक सड़क विक्रेताओं ने ऋण के लिए आवेदन किया है जिनमे से, 48,000 से अधिक को इस योजना के तहत ऋण स्वीकृत किया जा चूका है। यह प्रौद्योगिकी का उपयोग करते हुए लोगों की क्षमता को बढ़ाने और कोरोना संकट के समय कारोबार को नए सिरे से खड़ा कर आत्मनिर्भर भारत अभियान को गति देंगे।

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Essays

ऑनर किलिंग पर निबंध (Essay on Honour Killing in hindi)

ऑनर किलिंग पर निबंध (Essay on Honour Killing in hindi)

Introduction :

परिवार के किसी सदस्य, विशेष रूप से महिलाओ, की उसके सगे संबंधियों द्वारा की जाने वाली हत्या को ऑनर किलिंग कहा जाता है। ये हत्याएं परिवार और समाज की प्रतिष्ठा के नाम पे की जाती है। ऑनर किलिंग की घटनायें इन दिनों बढ़ती ही जा रही हैं। कुछ मामलों में, पुरुष और महिलाएं दोनों ऑनर किलिंग का शिकार हो जाते हैं। यह परिवार के भीतर प्रचलित एक प्रकार की हिंसा है। पुरुष प्रधान समाज में, महिलाओं की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखी जाती है। माना जाता है कि हत्या के शिकार लोग अधिकतर यौन अनैतिक मामलो में शामिल होते है जैसे की शादी से पहले यौन संबंध होना, तलाक मांगना आदि।

बाबा साहब आबेडकर ने एक बार कहा था, “मैं किसी समुदाय की प्रगति को महिलाओं द्वारा हासिल की गई प्रगति के पैमाने से मापता हूं।” वे मानते थे कि समाज के स्वास्थ्य का आकलन उसकी महिलाओं की स्थिति से किया जा सकता है। जबकि इज्जत के नाम पर हत्याएं समाज मे महिलाओं की ख़राब स्थिति को बताती है। हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के कुछ हिस्सों में हॉनर किलिंग की घटनाएं हुई है। जिनमे मुख्यता घर से भागे हुए युवा लड़की या लड़के या दोनों की एक या दोनों परिवार मिलकर हत्या कर देते है। ऐसे मामले ग्रामीणों के समर्थन के कारण पुलिस तक पहुंच ही नहीं पाते।

  • हाल ही में ऑनर किलिंग से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दो वयस्क अगर शादी करते हैं तो कोई तीसरा उसमें दखल नही दे सकता है।
  • साथ में न्यायालय ने यह भी बताया है कि हिन्दू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 5 में एक ही गोत्र में शादी न करने को उचित बताया गया है।
  • उल्लेखनीय है कि ऑनर किलिंग के केवल 3 प्रतिशत मामले ही गोत्र से संबंधित होते हैं, जबकि 97% मामले धर्म तथा अन्य कारणों से संबंधित होते हैं।
  • देश में जातिगत धारणाएँ लगातार बलवती होती जा रही हैं। अधिकांश ऑनर किलिंग के मामले तथाकथित उच्च और नीची जाति के लोगों के प्रेम संबंधों के मामले में देखने को मिले हैं। अंतर-धार्मिक संबंध भी ऑनर किलिंग का एक बड़ा कारण है।
  • ऑनर किलिंग का मूल कारण औपचारिक शासन का ग्रामीण क्षेत्रों तक नहीं पहुँच पाना है।पंचायत समिति जैसे औपचारिक संस्थानों की अनुपस्थिति में ग्रामीण क्षेत्रों में निर्णयन की शक्ति अवैध एवं गैर-संवैधानिक संस्थाएँ, जैसे- खाप पंचायतों के हाथ में चली जाती है।
  • शिक्षा के अभाव में समाज का बड़ा हिस्सा अपने संवैधानिक अधिकारों के संबंध में अनजान है। ऑनर किलिंग भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 15 (1), 1 9, 21 और 39 (एफ) को नकारात्मक ढंग से प्रभावित करता है।
  • अनुच्छेद 14, 15 (1), 19, और 21 मूल अधिकारों से संबंधित हैं, जबकि अनुच्छेद 39 राज्य के नीति निर्देशक तत्त्वों से संबंधित है। मूल अधिकार और निर्देशक तत्व संविधान की आत्मा और दर्शन के तौर पर जाने जाते हैं।
  • ऑनर किलिंग मानवाधिकारों के उल्लंघन के साथ-साथ अनुच्छेद 21 के अनुसार गरिमा के साथ जीने के अधिकार का उल्लंघन भी है।
  • यह देश में सहानुभूति, प्रेम, करुणा, सहनशीलता जैसे गुणों के अभाव को और बढ़ाने का कार्य करता है।

ऑनर किलिंग को रोकने में चुनौतियाँ –

  • इस तरह के अपराध प्रायः गोपनीय रूप से किये जाते हैं। अतः इसके संबंध में आँकड़ों की पर्याप्त कमी पाई जाती है।
  • स्थानीय पुलिस के सामने इस तरह के अपराध को वर्गीकृत करने मे समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। सामूहिक आधार पर इस तरह के अपराध को घरेलू हिंसा के रूप में वर्गीकृत कर दिया जाता है।
  • स्थानीय प्रशासन पर विश्वसनीयता की कमी के कारण महिला स्वयं के साथ हुए अपराध की सूचना नहीं दे पाती।
  • ‘सम्मान के लिये हत्या’ को रोकने के लिये लोगों में प्रायः शिक्षा का अभाव देखा जाता है साथ ही लोग रूढि़यों व सामाजिक बंधनों में जकड़े रहते हैं।
  • लैंगिक असमानता समाज में व्यावहारिक स्तर पर कट्टर वैचारिकता को जन्म देती है। इसी के फलस्वरूप ऐसी घटनाएँ प्रकाश में आती हैं।

भारत में कानूनी प्रावधान –

  • भारतीय संविधान में किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता एवं समान संरक्षण अनुच्छेद 14 के तहत दिया गया है।
  • अनुच्छेद 15 के तहत भारतीय संविधान में राज्य केवल धर्म, जाति, लिंग अथवा जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा।
  • अनुच्छेद 21 के तहत किसी भी व्यक्ति को जीवन जीने की स्वतन्त्रता अथवा व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा।
  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 के तहत अस्पृश्यता का उन्मूलन किया गया, ताकि सभी व्यक्ति को समाज में सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार मिले। उसे सामाजिक प्रतिष्ठा अथवा पिछड़ेपन या अन्य किसी कारण से होने वाले अपराध से संरक्षण दिया जा सके।
  • संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत भारत के नागरिकों को स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है, जिसके तहत वे अपना जीवन स्वतंत्रता से जी सकते हैं, जिसके तहत किसी को परंपरा, कानून अथवा अन्य किसी अनुचित आधार पर बाधित नहीं किया जा सकता।
  • “मानव अधिकार अधिनियम 2006” के तहत किसी मानव की गरिमा को हानि पहुँचाना भी अपराध की श्रेणी में आता है।
  • “घरेलू हिंसा अधिनियम 2005” के तहत किसी महिला को मानसिक रूप से अथवा शारीरिक रूप से प्रताडि़त किया जाता है तो महिला को इस अधिनियम के तहत संरक्षण प्राप्त है।

ऑनर किलिंग का प्रभाव –

  • परिवार द्वारा अथवा किसी भी सामाजिक व्यक्ति द्वारा सम्मान के नाम पर की गई हत्या समाज में अपराध को बढ़ावा देती है।
  • खाप पंचायत द्वारा दिये गए निर्णय जो कि ‘ऑनर किलिंग’ के नाम पर अत्याचार को प्रोत्साहित करते हैं इनके प्रभाव के बढ़ने से सामाजिक रूढि़वादिता को बढ़ावा मिलता है।
  • ‘ऑनर किलिंग’ के मामले महिलाओं की स्वयात्तता को प्रभावित करते हैं, जिससे घरेलू हिंसा, बलात्कार आदि विभिन्न तरह की समस्या उत्पन्न होती है।
  • ऑनर किलिंग के मामले जातिगत कट्टरता को बढ़ावा देंगे जिससे समाज के एक वर्ग का प्रभुत्व एवं अन्य का शोषण होगा जो लोगों में वैमनस्य एवं असंतुष्टि को भी बढ़ावा मिलता है।
  • इस तरह के अपराध देश में सामाजिक अराजकता को बढ़ावा देते हैं क्योंकि इससे एक-दूसरे की संस्कृति को सम्मान प्रदान करने की भावना समाप्त होगी।
  • समाज में नस्लीय एवं रंग भेद जैसे अपराध को बढ़ावा मिल सकता है।

Conclusion :

सरकार को ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त कानून बनाने चाहिए जो न केवल जघन्य अपराध करते हैं बल्कि इसे छिपाकर और सबूतों को मिटाकर इसे आत्महत्या का नाम दे देते हैं। इज्जत के नाम पर हत्याओं को रोकने के लिए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के अनुरूप एक कड़े कानून की भी जरूरत है, और इस पर नजर भी रखी जानी चाहिए क्योंकि लोग अभी भी सम्मान के नाम पर अपनी जान गंवा रहे हैं।

LGBT अधिकार पर निबंध

Introduction :

मानवाधिकार का मुख्य आधार सभी मनुष्यों में समान हैं तथा सभी मनुष्यों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए। जो कुछ भी इस विचार को कमजोर करता है वह समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है और भेदभाव का मार्ग प्रशस्त करता है। लेस्बियन, गे, बाइसेक्शुअल एवं ट्रांसजेंडर(एलजीबीटी) के मानवाधिकारों को दुनिया भर में तेजी से ध्यान में रखा जा रहा है, जिसमें नए कानूनी संरक्षण शामिल हैं। समानता का अधिकार और समान सुरक्षा की गारंटी संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 में दी गई है। भारत एक विशाल और विविध देश है और इस विषय के प्रति लोगो का दृष्टिकोण अलग-अलग हैं। 

भारत में एलजीबीटी लोगों को कानूनी और सामाजिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। पिछले एक दशक में, एलजीबीटी लोगों ने भारत मे, खासकर बड़े शहरों में, अधिक से अधिक सहिष्णुता प्राप्त की है। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 377 द्वारा उन यौन कार्यों को अपराध घोषित किया गया है जो ‘प्रकृति के आदेश के प्रतिकूल’ हैं। किन्तु भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने सितम्बर 2018 में इस धारा का प्रयोग उन कार्यों के लिए असंवैधानिक घोषित कर दिया जिनमें दो वयस्क परस्पर सहमति से समलैंगिक आचरण करते हैं।

  • धारा 377 जिसे “अप्राकृतिक अपराध” (unnatural offences) के नाम से भी जाना जाता है, को 1857 के विद्रोह के बाद औपनिवेशक शासन द्वारा अधिनियमित किया गया था।
  • दरअसल, उन्होंने अपने धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर हमारे लिये कानून बनाया। तब ईसाइयत में समलैंगिकता को अपराध माना जाता था जबकि इससे पहले समलैंगिक गतिविधियों में शामिल लोगों को भारत में दंडित नहीं किया जाता था।
  • अदालतों ने धारा 377 की कई बार व्याख्या की है और उन व्याख्याओं से निकलने वाला सामान्य सा निष्कर्ष यह है कि ‘धारा 377 में गैर-प्रजनन यौन कृत्यों और यौन विकृति के किसी भी कृत्य को दण्डित करने का प्रावधान है।
  • दरअसल, धारा 377 में गैर-प्रजनन यौन कृत्यों यानी अप्राकृतिक यौन संबंधों जैसे गुदा मैथुन (sadomy), ओरल सेक्स आदि को अपराध माना जाता है और दण्डित करने का भी प्रावधान है।
  • यह धारा विशेष रूप से एलजीबीटी समुदाय (lesbian, gay, bisexual, and transgender community) के लोगों की चिंताओं का कारण इसलिये है, क्योंकि उनके मध्य स्थापित होने वाले संबंधों को अप्राकृतिक ही माना जाता है।
  • ‘नाज़ फाउंडेशन’ ने वर्ष 2001 में दिल्ली उच्च न्यायालय से धारा 377 को गैर-संवैधानिक घोषित करने की मांग की थी। उच्च न्यायलय ने कहा कि:
  • → आपसी सहमति से स्थापित यौन संबंधों का अपराधीकरण न केवल लोगों के गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार को नकारना है, बल्कि यह भेदभावपूर्ण भी है।
    → समलैंगिकों को धारा 377 की वज़ह से ही समाज अपराधी के तौर पर देखता है, जो कि बेहद चिंताजनक है।
  • नाज़ फाउंडेशन मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय के इस निर्णय के बाद समलैंगिक समुदाय को राहत तो मिली, लेकिन ज़्यादा दिन तक यह स्थिति बनी नहीं रह सकी।
  • दिसंबर 2013 में ‘सुरेश कुमार कौशल बनाम नाज़ फाउंडेशन’ मामले में फैसला सुनाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को पलटते हुए दोबारा इस धारा को इसके मूल स्वरुप में ला दिया।
  • दरअसल समस्या इसलिये और गंभीर हो गई है, क्योंकि धारा 377 के प्रावधानों का सहारा लेते हुए समलैंगिकों को उनके अधिकारों से वंचित किया जा रहा है।
  • हाल ही में निजता को मूल अधिकार बनाए जाने के मामले की सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने कहा कि ‘सुरेश कौशल’ मामले में निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार मानते हुए सुनवाई नहीं की गई थी।
  • अतः यह माना जा रहा है कि ‘सुरेश कौशल’ मामले की संवैधानिकता को चुनौती देने वाले किसी मामले के बस नज़र में आने भर की देर है और सर्वोच्च न्यायालय इसे प्रभावहीन बना देगा।
  • विदित हो कि ‘सुरेश कौशल’ मामले में निर्णय आने का बाद से ही बड़ी संख्या में ऐसे मामले सामने आए हैं, जहाँ समलैंगिकों को उनके परिचितों और पुलिस द्वारा ब्लैकमेल किया जा रहा है। पिछले तीन वर्षों में इस तरह के मामलों की संख्या कुछ ज़्यादा ही बढ़ गई है।
  • दरअसल, समाज की मानसिकता ऐसी है कि समलैंगिकों को अपमान और भयानक तनाव से गुजरना पड़ा है। ब्रिटिशर्स जिन्होंने कि इस कानून लागू किया, उन्होंने 1960 के दशक में ही इससे छुटकारा पा लिया।

प्रतिवाद –

  • धारा 377 एक औपनिवेशिक विरासत होने के नाते गहन आलोचना का विषय रहा है। माना जाता है कि यह एक ऐसा कानून है जिसका पुलिस द्वारा दुरुपयोग किया जाता है और जो व्यक्ति की चयन करने की स्वतंत्रता के खिलाफ है। किसी कानून का केवल दुरुपयोग किया जाना ही उस कानून को खत्म करने का आधार नहीं बन सकता है।
  • नाज़ फाउंडेशन मामले में दिल्ली उच्च न्यायलय ने भले ही इस कानून को कुछ मूल अधिकारों का उल्लंघन करने वाला माना था, लेकिन साथ में यह भी कहा था कि असहमति के बावज़ूद अप्राकृतिक यौनाचार और नाबालिग के साथ सहमति या असहमति से स्थापित अप्राकृतिक यौन संबंधों को इस धारा के अंतर्गत अपराध माना जाएगा।
  • सभी धर्मों में समलैंगिकता को पाप माना गया है। इसे प्रकृति के आदेश के विरुद्ध आचरण माना गया है और ऐसा करने वाला व्यक्ति अपराधी माना जाता है। हालाँकि, 19वीं शताब्दी के अंत में एक मज़बूत राय सामने आई कि यह एक बीमारी है और किसी व्यक्ति को इसके लिये दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिये।
  • अभी कुछ दशकों पहले इस अवधारण को बल मिला है कि कुछ लोगों में समान लिंग के व्यक्तियों के प्रति आकर्षण एक जन्मजात लक्षण है| अतः यह न तो अनैतिक है और न ही कोई बीमारी है। हालाँकि अभी भी लोगों में इस बात को लेकर मतभेद है और कोई इसे धर्म-विरुद्ध आचरण मानता है तो कोई अनैतिक।

संवाद –

  • अपने घर के चहारदीवारी के अन्दर कोई व्यक्ति क्या करता है इसमें किसी का भी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिये। प्रत्येक व्यक्ति अपने पसंद का जीवन जीने के लिये स्वतंत्र है।
  • हालाँकि उसे यह अधिकार नहीं है कि वह अपने पसंदीदा आचरण का विज्ञापन करे, जिससे कि अन्य लोग प्रभावित हों। समलैंगिक होना एकदम ठीक बात है लेकिन समलैंगिकता का खुलेआम प्रदर्शन वर्जित होना चाहिये।
  • भारत में समलैंगिकता ही नहीं बल्कि यौन संबंधी आचरण को भी धर्म के नज़रिये से देखा जाता है। प्रायः सभी धर्मों में विवाह-पूर्व और समलैंगिक यौन संबंधों की मनाही है। लेकिन हम एक सभ्य और गणतांत्रिक देश में रह रहें हैं, जहाँ संविधान के कायदे कानून लागू होते हैं न की किसी धर्म के।

Conclusion :

संविधान ने हमें यह मौलिक अधिकार दिया है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी पसंद के हिसाब से जीवन जीने को स्वतंत्र है और किसी को भी यह अधिकार नहीं है कि वह औरों के व्यक्तिगत जीवन में ताक-झाँक करे। दरअसल, समलैंगिकता को धर्म के चश्मे से नहीं, बल्कि संविधान में निहित सिद्धांतों के आलोक में देखा जाना चाहिये और ये सिद्धांत एलजीबीटी समुदायों को भी एक आम भारतीय नागरिक को प्राप्त सभी अधिकार दिये जाने पर जोर देते हैं। भारत में अधिकांश एलजीबीटी लोग अपने परिवार से भेदभाव के डर से छिपकर रहते हैं, क्योंकि समलैंगिकता को हमारे समाज में शर्मनाक दृस्टि से देखा जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी भेदभाव मौजूद है, जहां एलजीबीटी लोग अक्सर अपने परिवारों से अस्वीकृति का सामना करते हैं और विपरीत लिंग विवाह के लिए मजबूर होते हैं।

तीन तलाक (ट्रिपल तलाकपर निबंध

Introduction :

तलाक एक अरबी शब्द है, लोकसभा ने मुस्लिम महिलाओं (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) विधेयक, पारित किया है। यह बिल तीन तालक से पीड़ित मुस्लिम महिलाओं के लिए मुख्य है। प्रस्तावित कानून के तहत, तत्काल ट्रिपल तालक देना गैरकानूनी होगा । ट्रिपल तालाक इस्लामिक तलाक का एक रूप है जो भारतीय मुसलमानों द्वारा, विशेष रूप से न्यायशास्त्र के हनफी स्कूलों के कुछ अनुयायियों द्वारा इस्तेमाल किया गया है। इसे मौखिक तालाक भी कहा जा सकता है। ट्रिपल तालाक शरिया कानून (इस्लामिक कानून) के तहत तलाक की प्रक्रिया है जहां एक पति अपनी पत्नी को तीन बार तालाक शब्द का उच्चारण करके तलाक दे सकता है। 

यह एक विडंबना है कि एक हिंदू महिला अपने पति की एकल पत्नी होने का पूर्ण अधिकार प्राप्त करती है, दूसरी ओर मुस्लिम महिलाओं को यह विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है। शाह बानो केस (1985) में एक गरीब मुस्लिम महिला ने तलाक के बाद रखरखाव का दावा किया तो लोगो में गुस्सा भड़क उठा। अल्पसंख्यक के गुस्से को दबाने के लिए, सरकार ने तुरंत कार्रवाई की और संसद ने मुस्लिम महिला अधिनियम, 1986 पारित किया जिसने शाह बानो के मामले में पारित SC के निर्णय को निरस्त कर दिया।

कुरान क्या कहता है?

  • तलाक के बारे में कुरान के भीतर संदेश स्पष्ट रूप से स्पष्ट है। यह अचानक से इसे भंग करने के बजाय विवाह की सुरक्षा की ओर अधिक झुकाव करता है। कुरान तलाक को अंजाम देने के लिए कुछ मानक तय करता है, यहां तक ​​कि शादी को पवित्र करने के भी मानक हैं।
  • “जो लोग अपनी पत्नियों को तलाक देने का इरादा रखते हैं, वे चार महीने तक इंतजार करेंगे।” इस्लामी शास्त्र संघ को जारी रखने की उम्मीद में तलाक को लागू करने में समय और धैर्य की मांग करता है, यह जानते हुए कि युगल में मतभेद हैं।

क्या है ट्रिपल तालक?

  • कुछ भारतीय मुसलमान विशेष रूप से सुन्नी मुसलमान ट्रिपल तालक की प्रणाली का पालन करते हैं जहाँ पति अपनी पत्नी को तीन शब्दों ‘तालाक, तालाक, तालाक’ का उच्चारण करके तलाक दे सकता है। यह 1400 साल पुरानी प्रथा है।
  • इस प्रथा में, पति को अपनी पत्नी को तलाक देने के कारणों का उल्लेख करने की आवश्यकता नहीं है। ट्रिपल तालक की प्रथा का उपयोग करके मुस्लिम पत्नी अपने पति को तलाक नहीं दे सकती।
  • इन वर्षों में, भारत में मुस्लिम महिलाएं अपने वैवाहिक घरों से कुछ समय में बाहर हो जाने के डर से जी रही हैं, क्योंकि एक मुस्लिम व्यक्ति, अगर वह फैसला करता है, तो “तालक” शब्द (तलाक) तीन बार कहकर शादी के वर्षों को समाप्त कर सकता है। ।

ट्रिपल तालाक कानून –

  • भारतीय संसद ने ट्रिपल तालक कानून को पारित किया, जिसे 30 जुलाई, 2019 को त्वरित ट्रिपल टैलक को आपराधिक अपराध बनाने के लिए विवाह विधेयक पर अधिकारों का संरक्षण भी कहा गया।
  • कानून ट्रिपल तालक को संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध भी बनाता है। रविशंकर प्रसाद, जो कानून और न्याय मंत्री थे, ने 21 फरवरी, 2019 को 21 फरवरी, 2019 को प्रख्यापित अध्यादेश को बदलने के लिए लोकसभा में विधेयक पेश किया।
  • कुछ राजनीतिक दलों द्वारा उच्च सदन के कामकाज की निरंतर गड़बड़ी के कारण यह विधेयक लंबे समय तक राज्यसभा में विचार के लिए लंबित था। ट्रिपल तालक तलाक प्रणाली का चलन जारी था, इसलिए कानून में सख्त प्रावधान करके इस तरह की प्रथा को रोकने के लिए तत्काल कार्रवाई करने की आवश्यकता थी।
  • सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिपल तालाक को असंवैधानिक माना क्योंकि यह लैंगिक कानून के खिलाफ है और समानता के सिद्धांत के खिलाफ संविधान के अनुसार एक मौलिक अधिकार है और यह भारत में इस्लाम के विश्वास के लिए मौलिक नहीं है।
  • 1985 में, शाह बानो नाम की एक महिला ने अपने पति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में केस लड़ा, जब उसने उसे बिना कोई गुजारा भत्ता दिए छोड़ दिया। शीर्ष अदालत ने उसके पक्ष में फैसला सुनाया।

ट्रिपल तालक अवैध –

  • विधेयक के क्लॉज 3 के अनुसार, “किसी भी व्यक्ति द्वारा अपनी पत्नी के शब्दों में, या तो बोले गए या लिखे गए या इलेक्ट्रॉनिक रूप में या अन्य तरीके से, जो भी शून्य और अवैध होगा,” एक व्यक्ति द्वारा तालाक का कोई भी उच्चारण।
  • खण्ड 3 में यह भी कहा गया है कि, “जो भी अपनी पत्नी पर ट्रिपल तालक का उच्चारण करेगा, उसे तीन साल के कारावास और जुर्माने से दंडित किया जाएगा”

Conclusion :

हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने इसे मनमाना और असंवैधानिक बताते हुए ट्रिपल तालक प्रथा को अमान्य कर दिया। SC ने इसे अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन बताया है । भारत संस्कृति, धर्म और रीति-रिवाजों की विविधता का देश है। भारत में, प्रत्येक धार्मिक समुदाय के पास अपने धार्मिक ग्रंथों के आधार पर कानूनों का एक सेट है, जो परिवार के मामलों को नियंत्रित करता है। हालांकि, किसी भी धर्म और सामाजिक न्याय का अभ्यास करने के अधिकार के बीच एक अच्छा संतुलन होना चाहिए। ट्रिपल तालाक बिल की संसद द्वारा स्वीकृति मुस्लिम महिलाओं को सामाजिक न्याय देने का सही कदम है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला राष्ट्रीय एकीकरण और धर्मनिरपेक्षता का मार्ग प्रशस्त करेगा। यह लैंगिक समानता, महिलाओं के कल्याण और न्याय को भी बढ़ावा देगा। यह व्यक्तिगत कानूनी मामलों को सरल करेगा।

महिला सशक्तिकरण पर निबंध

Introduction :

नारी सशक्तिकरण के नारे के साथ एक प्रश्न उठता है कि “क्या महिलाएँ सचमुच में मजबूत बनी है” और “क्या उसका लंबे समय का संघर्ष खत्म हो चुका है”। राष्ट्र के विकास में महिलाओं की सच्ची महत्ता और अधिकार के बारे में समाज में जागरुकता लाने के लिये मातृ दिवस, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस आदि जैसे कई सारे कार्यक्रम सरकार द्वारा चलाये जा रहे और लागू किये गये है। महिलाओं को कई क्षेत्र में विकास की जरुरत है। ‘सशक्तिकरण’ से तात्पर्य किसी व्यक्ति की उस क्षमता से है जिससे उसमें ये योग्यता आ जाती है जिसमें वो अपने जीवन से जुड़े सभी निर्णय स्वयं ले सके। महिला सशक्तिकरण में भी हम उसी क्षमता की बात कर रहे है जहाँ महिलाएँ परिवार और समाज के सभी बंधनों से मुक्त होकर अपने निर्णयों की निर्माता खुद हो।

अपनी निजी स्वतंत्रता और स्वयं के फैसले लेने के लिये महिलाओं को अधिकार देना ही महिला सशक्तिकरण है। वें देश और परिवार की आर्थिक स्थिति का प्रबंधन करने में पूरी तरह से सक्षम है। अत: महिलाओं के सशक्त होने से पूरा समाज अपने आप सशक्त हो जायेगा। भारत में, महिलाओं को सशक्त बनाने के लिये सबसे पहले समाज में उनके अधिकारों और मूल्यों को मारने वाले उन सभी राक्षसी सोच को मारना जरुरी है जैसे दहेज प्रथा, अशिक्षा, यौन हिंसा, असमानता, भ्रूण हत्या, महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा, वैश्यावृति और मानव तस्करी ।

  • पुरुष और महिला को बराबरी पर लाने के लिये महिला सशक्तिकरण में तेजी लाने की जरुरत है। सभी क्षेत्रों में महिलाओं का उत्थान राष्ट्र की प्राथमिकता में शामिल होना चाहिये। महिला और पुरुष के बीच की असमानता कई समस्याओं को जन्म देती है जो राष्ट्र के विकास में बड़ी बाधा के रुप में सामने आ सकती है।
  • ये महिलाओं का जन्मसिद्ध अधिकार है कि उन्हें समाज में पुरुषों के बराबर महत्व मिले। वास्तव में सशक्तिकरण को लाने के लिये महिलाओं को अपने अधिकारों से अवगत होना चाहिये। न केवल घरेलू और पारिवारिक जिम्मेदारियों बल्कि महिलाओं को हर क्षेत्रों में सक्रिय और सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिये। उन्हें अपने आस-पास और देश में होने वाली घटनाओं को भी जानना चाहिये।
  • महिला सशक्तिकरण में ये ताकत है कि वो समाज और देश में बहुत कुछ बदल सकें। वो समाज में किसी समस्या को पुरुषों से बेहतर ढ़ंग से निपट सकती है। वो देश और परिवार के लिये अधिक जनसंख्या के नुकसान को अच्छी तरह से समझ सकती है।
  • अच्छे पारिवारिक योजना से वो देश और परिवार की आर्थिक स्थिति का प्रबंधन करने में पूरी तरह से सक्षम है। पुरुषों की अपेक्षा महिलाएँ किसी भी प्रभावकारी हिंसा को संभालने में सक्षम है चाहे वो पारिवारिक हो या सामाजिक।
  • महिला सशक्तिकरण के द्वारा ये संभव है कि एक मजबूत अर्थव्यवस्था के महिला-पुरुष समानता वाले वाले देश को पुरुषवादी प्रभाव वाले देश से बदला जा सकता है। महिला सशक्तिकरण की मदद से बिना अधिक प्रयास किये परिवार के हर सदस्य का विकास आसानी से हो सकता है।
  • एक महिला परिवार में सभी चीजों के लिये बेहद जिम्मेदार मानी जाती है अत: वो सभी समस्याओं का समाधान अच्छी तरह से कर सकती है। महिलाओं के सशक्त होने से पूरा समाज अपने आप सशक्त हो जायेगा।
  • महिलाओं के लिये प्राचीन काल से समाज में चले आ रहे गलत और पुराने चलन को नये रिती-रिवाजों और परंपरा में ढ़ाल दिया गया था। भारतीय समाज में महिलाओं को सम्मान देने के लिये माँ, बहन, पुत्री, पत्नी के रुप में महिला देवियो को पूजने की परंपरा है लेकिन इसका ये कतई मतलब नहीं कि केवल महिलाओं को पूजने भर से देश के विकास की जरुरत पूरी हो जायेगी।
  • आज जरुरत है कि देश की आधी आबादी यानि महिलाओं का हर क्षेत्र में सशक्तिकरण किया जाए जो देश के विकास का आधार बनेंगी।
  • भारत एक प्रसिद्ध देश है जिसने ‘विविधता में एकता’ के मुहावरे को साबित किया है, जहाँ भारतीय समाज में विभिन्न धर्मों को मानने वाले लोग रहते है। महिलाओं को हर धर्म में एक अलग स्थान दिया गया है जो लोगों की आँखों को ढ़के हुए बड़े पर्दे के रुप में और कई वर्षों से आदर्श के रुप में महिलाओं के खिलाफ कई सारे गलत कार्यों (शारीरिक और मानसिक) को जारी रखने में मदद कर रहा है।
  • प्राचीन भारतीय समाज दूसरी भेदभावपूर्ण दस्तूरों के साथ सती प्रथा, नगर वधु व्यवस्था, दहेज प्रथा, यौन हिंसा, घरेलू हिंसा, गर्भ में बच्चियों की हत्या, पर्दा प्रथा, कार्य स्थल पर यौन शोषण, बाल मजदूरी, बाल विवाह तथा देवदासी प्रथा आदि परंपरा थी। इस तरह की कुप्रथा का कारण पितृसत्तामक समाज और पुरुष श्रेष्ठता मनोग्रन्थि है।
  • पुरुष पारिवारिक सदस्यों द्वारा सामाजिक राजनीतिक अधिकार (काम करने की आजादी, शिक्षा का अधिकार आदि) को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया। महिलाओं के खिलाफ कुछ बुरे चलन को खुले विचारों के लोगों और महान भारतीय लोगों द्वारा हटाया गया जिन्होंने महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण कार्यों के लिये अपनी आवाज उठायी।
  • राजा राम मोहन रॉय की लगातार कोशिशों की वजह से ही सती प्रथा को खत्म करने के लिये अंग्रेज मजबूर हुए। बाद में दूसरे भारतीय समाज सुधारकों (ईश्वर चंद्र विद्यासागर, आचार्य विनोभा भावे, स्वामी विवेकानंद आदि) ने भी महिला उत्थान के लिये अपनी आवाज उठायी और कड़ा संघर्ष किया। भारत में विधवाओं की स्थिति को सुधारने के लिये ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने अपने लगातार प्रयास से विधवा पुर्न विवाह अधिनियम 1856 की शुरुआत करवाई।

Conclusion :

पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं के खिलाफ होने वाले लैंगिक असमानता और बुरी प्रथाओं को हटाने के लिये सरकार द्वारा कई सारे संवैधानिक और कानूनी अधिकार बनाए और लागू किये गये है। हालाँकि ऐसे बड़े विषय को सुलझाने के लिये महिलाओं सहित सभी का लगातार सहयोग की जरुरत है। आधुनिक समाज महिलाओं के अधिकार को लेकर ज्यादा जागरुक है जिसका परिणाम हुआ कि कई सारे स्वयं-सेवी समूह और एनजीओ आदि इस दिशा में कार्य कर रहे है। महिलाएँ ज्यादा खुले दिमाग की होती है और सभी आयामों में अपने अधिकारों को पाने के लिये सामाजिक बंधनों को तोड़ रही है। हालाँकि अपराध इसके साथ-साथ चल रहा है। भारतीय समाज में सच में महिला सशक्तिकरण लाने के लिये महिलाओं के खिलाफ बुरी प्रथाओं के मुख्य कारणों को समझना और उन्हें हटाना होगा। जरुरत है कि हम महिलाओं के खिलाफ पुरानी सोच को बदले और संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों में भी बदलाव लाये।

निजता का अधिकार पर निबंध

Introduction :

मनुष्य की ज़रूरतें सबसे प्राथमिक ज़रूरतों जैसे कि भोजन, कपड़े और आश्रय से लेकर माध्यमिक ज़रूरतों जैसे शिक्षा, काम और मनोरंजन और आगे की ज़रूरतों जैसे मनोरंजन, भोजन, अवकाश, यात्रा, आदि से शुरू होती हैं। यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि इन सभी जरूरतों और इच्छाओ (wants) में गोपनीयता कहाँ है ? किसी भी सभ्य समाज में गोपनीयता की एक बुनियादी डिग्री एक प्राथमिक आवश्यकता है। जैसे-जैसे गोपनीयता की डिग्री बढ़ती है, यह एक माध्यमिक जरूरत और आगे एक इच्छा में विकसित हो जाती है। निजता का अधिकार नागरिकों की निजता के अधिकार को लेकरकर यह सुनिश्चित करता है की सभी समान रूप से संरक्षित हो और अमीर और गरीब के लिए समान न्याय और अधिकार हो।

 आधार के लिए भारत के निवासियों के व्यक्तिगत डेटा के संग्रह की आवश्यकता होती है, और इसके परिणामस्वरूप चूक होने की संभावना को लेकर विवाद पैदा हो सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इसमें बायोमेट्रिक विवरण जैसे कि आईरिस स्कैनिंग और फिंगर प्रिंट के संग्रह की आवश्यकता होती है जो अनिवार्य रूप से महत्वपूर्ण विवरण हैं और इसका दुरुपयोग किया जा सकता है। साइबर स्पेस एक संवेदनशील स्थान है और यहाँ खतरे की संभावना अधिक है हालांकि, आधार अपने आप में एक सुविचारित कार्यक्रम है ताकि वित्तीय समावेशन सुनिश्चित किया जा सके।

निजता का महत्त्व –

  • निजता वह अधिकार है जो किसी व्यक्ति की स्वायतता और गरिमा की रक्षा के लिये ज़रूरी है। वास्तव में यह कई अन्य महत्त्वपूर्ण अधिकारों की आधारशिला है।
  • दरअसल निजता का अधिकार हमारे लिये एक आवरण की तरह है, जो हमारे जीवन में होने वाले अनावश्यक और अनुचित हस्तक्षेप से हमें बचाता है।
  • यह हमें अवगत कराता है कि हमारी सामाजिक आर्थिक और राजनैतिक हैसियत क्या है और हम स्वयं को दुनिया से किस हद तक बाँटना चाहते हैं।
  • वह निजता ही है जो हमें यह निर्णित करने का अधिकार देती है कि हमारे शरीर पर किसका अधिकार है?
  • आधुनिक समाज में निजता का महत्त्व और भी बढ़ जाता है। फ्रांस की क्रांति के बाद समूची दुनिया से निरंकुश राजतंत्र की विदाई शुरू हो गई और समानता, मानवता और आधुनिकता के सार्वभौमिक सिद्धांतों पर आधारित लोकतंत्र ने पैर पसारना शुरू कर दिया।
  • अब राज्य लोगों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ चलाने लगे तो यह प्रश्न प्रासंगिक हो उठा कि जिस गरिमा के भाव के साथ जीने का आनंद लोकतंत्र के माध्यम से मिला उसे निजता के हनन द्वारा छिना क्यों जा रहा है?
  • तकनीक और अधिकारों के बीच हमेशा से टकराव होते आया है और 21वीं शताब्दी में तो तकनीकी विकास अपने उच्चतम स्तर पर पहुँच चुका है। ऐसे में निजता को राज्य की नीतियों और तकनीकी उन्नयन की दोहरी मार झेलनी पड़ी।
  • आज हम सभी स्मार्टफोंस का प्रयोग करते हैं। चाहे एपल का आईओएस हो या गूगल का एंड्राइड या फिर कोई अन्य ऑपरेटिंग सिस्टम, जब हम कोई भी एप डाउनलोड करते हैं, तो यह हमारे फ़ोन के कॉन्टेक्ट, गैलरी और स्टोरेज़ आदि के प्रयोग की इज़ाज़त मांगता है और इसके बाद ही वह एप डाउनलोड किया जा सकता है।
  • ऐसे में यह खतरा है कि यदि किसी गैर-अधिकृत व्यक्ति ने उस एप के डाटाबेस में सेंध लगा दी तो उपयोगकर्ताओं की निजता खतरे में पड़ सकती है।
  • तकनीक के माध्यम से निजता में दखल, राज्य की दखलंदाज़ी से कम गंभीर है। हम ऐसा इसलिये कह रहे हैं क्योंकि तकनीक का उपयोग करना हमारी इच्छा पर निर्भर है, किन्तु राज्य प्रायः निजता के उल्लंघन में लोगों की इच्छा की परवाह नहीं करता।
  • आधार का मामला इसका जीता जागता उदाहरण है। जब पहली बार आधार का क्रियान्वयन आरंभ किया गया तो कहा यह गया कि यह सभी भारतीयों को एक विशेष पहचान संख्या देने के उद्देश्य से लाई गई है। जल्द ही मनरेगा सहित कई बड़ी योजनाओं में बेनिफिट ट्रान्सफर के लिये आधार अनिवार्य कर दिया गया।
  • यहाँ तक कि आधार पर किसी भी प्रकार के विचार-विमर्श से किनारा करते हुए इसे मनी बिल यानी धन विधेयक के तौर पर संसद में पारित कर दिया गया। इन सभी बातों से पता चलता है कि निजता जो कि लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखने के लिये आवश्यक है, गंभीर खतरे में है।

गोपनीयता का उल्लंघन –

  • सोशल मीडिया चैनलों और साइटों पर गोपनीयता भंग होने के अधिक मामले देखे जा सकते हैं, जिसमें साइबर अपराधियों द्वारा व्यक्ति के जीवन को नष्ट करने वाले जघन्य अपराध करने के लिए लोगों की व्यक्तिगत जानकारी और डेटा को हैक किया जाता है।
  • कई हैकर्स हमारे सोशल मीडिया और बैंकिंग खातों में घुस जाते हैं और लीक हुई जानकारी के जरिए पैसा कमाने के लिए संवेदनशील डेटा चुरा लेते हैं।
  • इतना ही नहीं, बल्कि कई अन्य क्षेत्र भी हैं जो गोपनीयता के उल्लंघन से पीड़ित हैं। इसलिए, यह एक प्रमुख चिंता का विषय है और सरकार को इससे निपटना चाहिए।

इंटरनेट के उपयोग के साथ, इस युग में, फेसबुक और ट्यूटर जैसे सामाजिक नेटवर्क सामाजिक संपर्क के नए रूपों को चला रहे हैं और उपलब्धता ने गोपनीयता संबंधी चिंताओं को बढ़ा दिया है। इसके लिए सरकार को साइबर सुरक्षा प्रणाली को मजबूत करना चाहिए और कानून के माध्यम से आश्वासन देना चाहिए कि निजता के अधिकार का उल्लंघन  न हो और निजी जानकारी को निजी रखा जाये।

 

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