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समाज के प्रति युवाओं की भूमिका पर निबंध (essay on Importance of youth in society in hindi)

Introduction :

युवाओं को प्रत्येक देश की सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति माना जाता है क्योंकि उनकी बुद्धिमता और कड़ी मेहनत देश को सफलता और समृद्धि की राह पर ले जाती है। जैसा कि प्रत्येक नागरिक का राष्ट्र के प्रति कुछ उत्तरदायित्व होता है, वैसे ही युवाओं का भी है। प्रत्येक राष्ट्र के निर्माण में इनका बहुत ही महत्त्वपूर्ण योगदान होता हैं। युवा एक ऐसे व्यक्ति को कहते है जिसकी उम्र 15 से 30 वर्ष के बीच में होती है। चूंकि युवा हर समाज की रीढ़ होते हैं और इसलिए वे समाज के भविष्य का निर्धारण करते हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि अन्य सभी आयु वर्ग जैसे कि बच्चे, किशोर, मध्यम आयु वर्ग और वरिष्ठ नागरिक युवाओं पर भरोसा करते हैं और उनसे बहुत उम्मीदें रखते हैं।

समाज में युवाओं पर अत्यधिक निर्भरता के कारण, हम सभी युवाओं की हमारे परिवारों, समुदायों और देश के भविष्य के प्रति बहुत ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ है। युवा अपने नेतृत्व, नवाचार और विकास कौशल द्वारा समाज की वर्तमान स्थिति को नवीनीकृत कर सकते हैं। युवाओं से देश की वर्तमान तकनीक, शिक्षा प्रणाली और राजनीति में बदलाव लाने की उम्मीद की जाती है। उनपर समाज में हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और नैतिक मूल्यों को बनाए रखने का भी उत्तरदायित्व है। यही कारण है कि देश के विकास के लिए युवाओं की सक्रिय भागीदारी की अत्यधिक आवश्यकता होती है।

  • हमारे राष्ट्र के लिए कई परिवर्तन, विकास, समृद्धि और सम्मान लाने में युवा सक्रिय रूप से शामिल हुए हैं। इस सबका मुख्य उद्देश्य उन्हें एक सकारात्मक दिशा में प्रशिक्षित करना है।
  • युवा पीढ़ी के उत्थान के लिए कई संगठन काम कर रहे हैं क्योंकि वे बड़े होकर राष्ट्र निर्माण में सहायक बनेंगे। गरीब और विकासशील देश अभी भी युवाओं के समुचित विकास और शिक्षण में पिछड़े हुए हैं।
  • एक बच्चे के रूप में प्रत्येक व्यक्ति, अपने जीवन में कुछ बनने का सपने देखता है, बच्चा अपनी शिक्षा पूरी करता है और कुछ हासिल करने के लिए कुछ कौशल प्राप्त करता है।
  • युवाओं में त्वरित शिक्षा, रचनात्मकता, कौशल होता है। वे हमारे समाज और राष्ट्र में परिवर्तन लाने की शक्ति रखते हैं।
  • युवा उस चिंगारी के साथ बड़ा होता है, जो कुछ भी कर सकता है।
  • समाज में कई नकारात्मक कुरीतियाँ और कार्य किए जाते हैं। युवाओं में समाज परिवर्तन और लिंग तथा सामाजिक समानता की अवधारणा को लाने की क्षमता है।
  • समाज में व्याप्त कई मुद्दों पर काम करके युवा दूसरों के लिए एक आदर्श बन सकते हैं।

युवा की भूमिका –

  • युवाओं को राष्ट्र की आवाज माना जाता है। युवा राष्ट्र के लिए कच्चे माल या संसाधन की तरह होते हैं। जिस तरह के आकार में वे हैं, उनके उसी तरीके से उभरने की संभावना होती है।
  • राष्ट्र द्वारा विभिन्न अवसरों और सशक्त युवा प्रक्रियाओं को अपनाया जाना चाहिए, जो युवाओं को विभिन्न धाराओं और क्षेत्रों में करियर बनाने में सक्षम बनाएगा।
  • युवा लक्ष्यहीन, भ्रमित और दिशाहीन होते हैं और इसलिए वे मार्गदर्शन और समर्थन के अधीन होते हैं, ताकि वे सफल होने के लिए अपना सही मार्ग प्रशस्त कर सकें।
  • युवा हमेशा अपने जीवन में कई असफलताओं का सामना करते हैं और हर बार ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि एक पूर्ण अंत है, लेकिन वो फिर से कुछ नए लक्ष्य के साथ खोज करने के लिए एक नए दृष्टिकोण के साथ उठता है।
  • एक युवा मन प्रतिभा और रचनात्मकता से भरा हुआ है। यदि वे किसी मुद्दे पर अपनी आवाज उठाते हैं, तो परिवर्तन लाने में सफल होते हैं।

भारत में युवाओं की प्रमुख समस्याएं –

  • कई युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान नहीं की जाती है; यहां तक ​​कि कई लोग गरीबी और बेरोजगारी तथा अनपढ़ अभिभावकों के वजह से स्कूलों नहीं जा पाते हैं। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि प्रत्येक बच्चे को स्कूल जाने और उच्च शिक्षा हासिल करने का मौका मिले।
  • बालिका शिक्षा पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि देश में कई ऐसे हिस्से हैं जहां लड़कियां स्कूल जाने और पढ़ाई से वंचित है। लेकिन युवा, लड़के और लड़कियों दोनों का गठन करते हैं। जब समाज का एक वर्ग उपेक्षित हो, तो समग्र विकास कैसे हो सकता है?
  • अधिकांश युवाओं को गलत दिशा में खींच लिया गया है; उन्हें अपने जीवन और करियर को नष्ट करने से रोका जाना चाहिए।
  • कई युवाओं में कौशल की कमी देखी गयी है, और इसलिए सरकार को युवाओं के लिए कुछ कौशल और प्रशिक्षण कार्यक्रमों को लागू करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए ताकि वे आगे एक या उससे अधिक अवसरों से लाभान्वित हो सकें।
  • भारत में अधिकांश लोग गांवों में रहते हैं, इसलिए शिक्षा और अवसरों की सभी सुविधाओं तक उनकी उचित पहुंच नहीं है।
  • कुछ युवाओं द्वारा वित्तीय संकट और सामाजिक असमानता की समस्या होती है।
  • ऐसे कई बच्चे हैं जो प्रतिभा के साथ पैदा हुए हैं, लेकिन अपर्याप्त संसाधनों के चलते, वे अपनी प्रतिभा के साथ आगे नहीं बढ़ सके।
  • उनमें से कई को पारिवारिक आवश्यकताओं के कारण पैसा कमाने के लिए अपनी प्रतिभा से हटकर अन्य काम करना पड़ता है, लेकिन उन्हें उस काम से प्यार नहीं है जो वे कर रहे हैं।
  • बेरोजगारी की समस्या युवाओं की सबसे बड़ी समस्या है।
  • जन्मजात प्रतिभा वाले कुछ बच्चे होते हैं, लेकिन संसाधन की कमी या उचित प्रशिक्षण नहीं होने के कारण, वे अपनी आशा और प्रतिभा भी खो देते हैं।
  • इस प्रकार, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि प्रत्येक बच्चे को उचित शिक्षा की सुविधा प्रदान की जाए। प्रशिक्षण और कौशल विकास कार्यक्रम शुरू किए जाने चाहिए। युवाओं को कई अवसर प्रदान किया जाना चाहिए। उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रियाओं और राजनीतिक मामलों में समान रूप से भाग लेना चाहिए।
  • कुशल समूहों को काम प्रदान करने के लिए कई रोजगार योजनाएं चलानी चाहिए।

Conclusion :

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम किस क्षेत्र में प्रगति करना चाहते हैं क्योंकि हर जगह युवाओं की आवश्यकता है। हमारे युवाओं को अपनी आंतरिक शक्तियों और समाज में उनकी भूमिका के बारे में पता होना चाहिए। हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हर किसी को खुद को योग्य साबित करने के लिए समान मौका मिल सके। युवाओं के पास एक अलग दृष्टिकोण है जो पुरानी पीढ़ियों के पास नहीं था जिसके द्वारा वे हमारे देश में विकाश और समृद्धि ला सकते है।

भारत में सांस्कृतिक विविधता पर निबंध

Introduction :

भारतीय संस्कृति विविध है और विभिन्न रीति-रिवाजों, विचारों और सामाजिक मान्यताओं से युक्त है। भारत में विभिन्न संस्कृतियां और समुदाय हैं जो अपने भोजन, कपड़ों, भाषाओं और परंपराओं में भिन्न हैं। भारतीय संस्कृति दुनिया की अन्य संस्कृतियों में सबसे पुरानी और प्रसिद्ध है। भारतीय साहित्य में भी विभिन्न समुदायों, परंपराओं, रीति-रिवाजों और धर्मों का मेल है। भारतीय संस्कृति की विविधता दुनिया भर में प्रसिद्ध है। भारत बहु-सांस्कृतिक और बहु-पारंपरिक त्योहारों का एक वैश्विक केंद्र है यहां पर हर धर्म के त्यौहार मनाये जाते है जैसे की दशहरा, होली, दिवाली, क्रिसमस, रमज़ान, गुरु नानक जयंती, गणेश चतुर्थी आदि । 

यहां पर हर एक त्योहार का अपना-अपना सांस्कृतिक और राष्ट्रीय महत्व है और प्रत्येक त्योहार अलग-अलग रीति-रिवाजों और परंपराओं के साथ मनाये जाते है। भारत में तीन राष्ट्रीय त्योहार – गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस और गांधी जयंती भी बड़े जोश और उत्साह के साथ मनाए जाते हैं ।भारत में, ईश्वर प्रत्येक व्यक्ति के दिल में बसते है। भारतीय विभिन्न प्रार्थनाओं, धार्मिक विश्वासों और नैतिक मूल्यों में विश्वास करते हैं। हिंदू परंपरा में, सभी लोग गायों, नीम, बरगद और पीपल के पेड़ की पूजा करते हैं और उनका सम्मान करते हैं। भारत में नदियों की भी पूजा की जाती है और उनका धार्मिक महत्व हैं। भारत में गंगा, यमुना गोदावरी, ब्रम्हपुत्र, नर्मदा और ताप्ती जैसी कई नदियो की पूजा की जाती हैं।

  • भारत में सदैव राजनैतिक एकता रही। राष्ट्र व सम्राट, महाराजाधिराज जैसी उपाधियां, दिग्विजय और अश्वमेध व राजसूय यज्ञ भारत की जाग्रत राजनैतिक एकता के द्योतक रहे हैं । महाकाव्यकाल, मौर्यकाल, गुप्तकाल और उसके बाद मुगलकाल में भी सम्पूर्ण भारत एक शक्तिशाली राजनैतिक इकाई रहा ।
  • यही कारण है कि देश के भीतर छोटे-मोटे विवाद, बड़े-बड़े युद्ध और व्यापक उथल-पुथल के बाद भी राजनैतिक एकता का सूत्र खण्डित नहीं हुआ । साम्प्रदायिकता, भाषावाद, क्षेत्रीयता और ऐसे ही अन्य तत्व उभरे और अन्तर्राष्ट्रीय शक्तियों ने उनकी सहायता से देश की राष्ट्रीय एकता को खण्डित करने का प्रयास किया, किन्तु वे कभी भी सफल नहीं हो पाये ।
  • जब देश के भीतर युद्ध, अराजकता और अस्थिरता की आंधी चल रही थी तब भी कोटि-कोटि जनता के मन और मस्तिष्क से राजनैतिक एकता की सूक्ष्म, किन्तु सुदृढ़ कल्पना एक क्षण के लिए भी ओझल नहीं हो पाई । इतिहास साक्षी है कि राजनैतिक एकता वाले देश पर विदेशी शक्तियां कभी भी निष्कंटक शासन नहीं चला पाई।
  • भारतीय संस्कृति का एक शक्तिशाली पक्ष इसकी धार्मिक एकता है । भारत के सभी धर्मों और सम्प्रदायों मे बाह्य विभिन्नता भले ही हो, किन्तु उन सबकी आत्माओं का स्रोत एक ही है । मोक्ष, निर्वाण अथवा कैवल्य एक ही गन्तव्य के पृथक-पृथक नाम हैं । भारतीय धर्मों में कर्मकाण्डों की विविधता भले ही हो किन्तु उनकी मूल भावना में पूर्ण सादृश्यता है ।
  • इसी धार्मिक एकता एवं धर्म की विशद कल्पना ने देश को व्यापक दृष्टिकोण दिया जिसमें लोगों के अभ्यन्तर को समेटने और जोड़ने की असीम शक्ति है । नानक, तुलसी, बुद्ध, महावीर सभी के लिए अभिनन्दनीय हैं । देश के मन्दिरों, मस्जिदों और गुरुद्वारों के समक्ष सब नतमस्तक होते है; तीर्थों और चारों धामों के प्रति जन-जन की आस्था इसी सांस्कृतिक एकता का मूल तत्व है ।
  • भारत की एकता का सबसे सुदृढ़ स्तम्भ इसकी संस्कृति है। रहन-सहन, खान-पान, वेश-भूषा और त्योहारों-उत्सवों की विविधता के पीछे सांस्कृतिक समरसता का तत्व दृष्टिगोचर होता है । संस्कारों (जन्म, विवाह, मृत्यु के समय अन्तिम संस्कार आदि) के एक ही प्रतिमान सर्वत्र विद्यमान हैं । सामाजिक नैतिकता और सदाचार के सूत्रों के प्रति समान आस्था के दर्शन होते हैं ।
  • मनुष्य जीवन पुरुष, स्त्रियों और लड़कों-लड़कियों के लिए आचरण, व्यवहार, शिष्टाचार, नैतिकता और जीवन-दर्शन की अविचल एकरूपता देश की सांस्कृतिक एकता का सुदृढ़ आधार है । भाषाओं के बीच पारस्परिक सम्बन्ध व आदान-प्रदान, साहित्य के मूल तत्वों, स्थायी मूल्यों और ललित कलाओं की मौलिक सृजनशील प्रेरणाएं सब हमारी सांस्कृतिक एकता की मौलिक एकता का प्रमाण है । सब ‘सत्यं’ ‘शिवं’ और ‘सुन्दरं’ की अभिव्यक्ति का माध्यम है ।
  • भारत की गहरी और आधारभूत एकता देखने की कम और अनुभव करने की वस्तु अधिक है । देश सबको प्यारा है । इसकी धरती, नदियों, पहाड़ों, हरे-भरे खेतों, लोक-गीतों, लोक-रीतियों और जीवन-दर्शन के प्रति लोगों में कितना अपनापन, कितना प्यार-अनुराग और कितना भावनात्मक लगाव है इसकी कल्पना नहीं की जा सकती । किसी भारतीय को इनके सम्बन्ध में कोई अपवाद सहय नहीं होगा क्योंकि ये सब उसके अपने है ।
  • भारत में इतनी विविधताओं के बावजूद एक अत्यन्त टिकाऊ और सुदृढ़ एकता की धारा प्रवाहित हो रही है इस सम्बन्ध में सभी भारतीयों के अनुभव एवं अहसास के बाद किसी बाह्य प्रमाण या प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं हैं । लेकिन फिर भी यहां बी॰ए॰ स्मिथ जैसे सुविख्यात इतिहासवेत्ता के कथन का हवाला देना अप्रासंगिक न होगा । उसने कहा कि भारत में ऐसी गहरी आधारभूत और दृढ़ एकता है, जो रंग, भाषा, वेष-भूषा, रहन-सहन की शैलियों और जातियों की अनेकताओं के बावजूद सर्वत्र विद्यमान है।
  • भारत को भौगोलिक दृष्टिकोण से कई क्षेत्रों में विभक्त किया जा सकता है, परन्तु सम्पूर्ण देश भारतवर्ष के नाम से विख्यात है । इस विशाल देश के अन्दर न तो ऐसी पर्वतमालाएँ है और न ही ऐसी सरिताएँ या सघन बन, जिन्हें पार न किया जा सके । इसके अतिरिक्त, उत्तर में हिमालय की विशाल पर्वतमाला तथा दक्षिण में समुद्र ने सारे भारत में एक विशेष प्रकार की ऋतु पद्धति बना दी है ।
  • ग्रीष्म ऋतु में जो भाप बादल बनकर उठती है, बह हिमालय की चोटियों पर बर्फ के रूप में जम जाती है और गर्मियों में पिघलकर नदियों की धाराएँ बनकर वापस समुद्र में चली जाती है । सनातन काल से समुद्र और हिमालय में एक-दूसरे पर पानी फेंकने का यह अद्‌भुत खेल चल रहा है । एक निश्चित क्रम के अनुसार ऋतुएँ परिवर्तित होती हैं एवं यह ऋतु चक्र सपने देश में एक जैसा है ।

Conclusion :

भारत में सदैव अनेक राज्य विद्यमान रहे है, परन्तु भारत के सभी महत्वाकांक्षी सम्राटों का ध्येय सम्पूर्ण भारत पर अपना एकछत्र साम्राज्य स्थापित करने का रहा है एवं इसी ध्येय से राजसूय वाजपेय, अश्वमेध आदि यश किए जाते थे तथा सम्राट स्वयं को राजाधिराज व चक्रवर्ती आदि उपाधियों से विभूषित कर इस अनुभूति को व्यक्त करते थे कि वास्तव में भारत का विस्तृत भूखण्ड राजनीतिक तौर पर एक है । भारत अमरनाथ मंदिर, बद्रीनाथ, हरिद्वार, वैष्णो देवी और वाराणसी जैसे कई पवित्र और धार्मिक स्थलों का घर है, जो देश के उत्तरी भाग में स्थित हैं। हालांकि, दक्षिणी क्षेत्र में, रामेश्वरम और सबरीमाला मंदिर का बहुत अधिक महत्व है। इस प्रकार, हम कह सकते हैं कि भारत परंपराओं और आधुनिक संस्कृति से भरा हुआ है। लोगों को अपनी इच्छानुसार किसी भी धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति दुनिया भर में प्रसिद्ध है।

विविधता मे एकता

Introduction :

भारत एक ऐसा देश है जिसने “विविधता मे एकता” की सच्चाई को सही साबित किया है। बिना किसी परेशानी के कई वर्षों से विभिन्न धर्म और जाति के लोगों ने एक साथ रह कर दिखाया है। भारत विश्व का एक प्रसिद्ध और बड़ा देश है जहाँ विभिन्न धर्म जैसे हिन्दू, मुस्लिम, बौद्ध, सिक्ख, जैन, ईसाई और पारसी आदि के एक साथ रहते हैं। यहाँ अलग-अलग जीवन-शैली के लोग एकसाथ रहते हैं। वो अलग आस्था, धर्म और विश्वास से संबंध रखते हैं। इन भिन्नताओं के बावजूद भी वो भाईचारे और मानवता के संबंध के साथ रहते हैं।

“विविधता में एकता” भारत की एक अलग विशेषता है जो इसे पूरे विश्व भर में प्रसिद्ध करती है। अपनी रीति-रिवाज़ और विश्वास का अनुसरण करने के द्वारा सभी धर्मों के लोग अलग तरीकों से पूजा-पाठ करते हैं। भारत अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिये प्रसिद्ध है जो कि विभिन्न धर्मों के ही लोगों के कारण है। अपने हित और विश्वास के आधार पर लोग विभिन्न जीवन-शैली को बढ़ावा देते हैं।

विविधता में एकता का महत्व –

  • “विविधता में एकता” लोगों की कार्यस्थल, संगठन और समुदाय में मनोबल को बढ़ाता है।
  • ये लोगों के बीच में दल भावना, रिश्ते, समूह कार्य को बढ़ाने में मदद करता है इसकी वजह से प्रदर्शन, कार्यकुशलता, उत्पादकता और जीवन शैली में सुधार आता है।
  • बुरी परिस्थिति में भी ये प्रभावशाली संवाद बनाता है।
  • सामाजिक परेशानियों से लोगों को दूर रखता है और मुश्किलों से लड़ने में आसानी से मदद करता है।
  • मानव रिश्तों में अच्छा सुधार लाता है तथा सभी के मानव अधिकारों की रक्षा करता है।
  • भारत में “विविधता में एकता” पर्यटन के स्रोत उपलब्ध कराता है। पूरी दुनिया से अधिक यात्रियों और पर्यटकों को विभिन्न संस्कृति, परंपरा, भोजन, धर्म और परिधान के लोग आकर्षित करते हैं।
  • कई तरीकों में असमान होने के बावजूद भी देश के लोगों के बीच राष्ट्रीय एकीकरण की आदत को ये बढ़ावा देता है।
  • भारत की सांस्कृतिक विरासत को मजबूत और समृद्ध बनाने के साथ ही ये देश के संपन्न विरासत को महत्व देता है।
  • विभिन्न फसलों के द्वारा कृषि के क्षेत्र में संपन्न बनाने में ये मदद करता है जिससे अर्थव्यवस्था में वृद्धि होती है।
  • देश के लिये विभिन्न क्षेत्रों में कौशल और उन्नत पेशेवरों के साधन है।
  • “विविधता में एकता” समाज के लगभग सभी पहलुओं में पूरे देश में मजबूती और संपन्नता का साधन बनता है। अपनी रीति-रिवाज़ और विश्वास का अनुसरण करने के द्वारा सभी धर्मों के लोग अलग तरीकों से पूजा-पाठ करते हैं बुनियादी एकरुपता के अस्तित्व को प्रदर्शित करता है।
  • “विविधता में एकता” विभिन्न असमानताओं की अपनी सोच से परे लोगों के बीच भाईचारे और समरसता की भावना को बढ़ावा देता है।
  • भारत अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिये प्रसिद्ध है जो कि विभिन्न धर्मों के लोगों के कारण है। अपने हित और विश्वास के आधार पर विभिन्न जीवन-शैली को अलग-अलग संस्कृति के लोग बढ़ावा देते हैं। ये दुबारा से विभिन्न पेशेवर क्षेत्रों में जैसे संगीत, कला, नाटक, नृत्य (शास्त्रिय, फोक आदि), नाट्यशाला, मूर्तिकला आदि में वृद्धि को बढ़ावा देते हैं। लोगों की आध्यात्मिक परंपरा उन्हें एक-दूसरे के लिये अधिक धर्मनिष्ठ बनाती है।
  • सभी भारतीय धार्मिक लेख लोगों की आध्यात्मिक समझ का महान साधन है। लगभग सभी धर्मों में ऋषि, महर्षि, योगी, पुजारी, फादर आदि होते हैं जो अपने धर्मग्रंथों के अनुसार अपनी आध्यात्मिक परंपरा का अनुसरण करते हैं।
  • भारत में हिन्दी मातृ-भाषा है हालाँकि अलग-अलग धर्म और क्षेत्र (जैसे इंग्लिश, ऊर्दू, संस्कृत, पंजाबी, बंगाली, उड़िया आदि) के लोगों के द्वारा कई दूसरी बोली और भाषाएँ बोली जाती है; हालाँकि सभी महान भारत के नागरिक होने पर गर्व महसूस करते हैं।
  • भारत की “विविधता में एकता” खास है जिसके लिये ये पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। ये भारत में बड़े स्तर पर पर्यटन को आकर्षित करता है।
  • एक भारतीय होने के नाते, हम सभी को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिये और किसी भी कीमत पर इसकी अनोखी विशेषता को कायम रखने की कोशिश करनी है। यहाँ “विविधता में एकता” वास्तविक खुशहाली होने के साथ ही वर्तमान तथा भविष्य की प्रगति के लिये रास्ता है।
  • भारत को एक स्वतंत्र देश बनाने के लिये भारत के सभी धर्मों के लोगों के द्वारा चलाये गये स्वतंत्रता आंदोलन को हम कभी नहीं भूल सकते है। भारत में “विविधता में एकता” का स्वतंत्रता के लिये संघर्ष बेहतरीन उदाहरण है।
  • भारत में “विविधता में एकता” सभी को एक कड़ा संदेश देता है कि बिना एकता के कुछ भी नहीं है। प्यार और समरसता के साथ रहना जीवन के वास्तविक सार को उपलब्ध कराता है। भारत में “विविधता में एकता” दिखाती है कि हम सभी एक भगवान के द्वारा पैदा, परवरिश और पोषित किये गये हैं।

Conclusion :

भारत एक ऐसा देश है जिसने “विविधता मे एकता” की सच्चाई को सही साबित किया है। बिना किसी परेशानी के कई वर्षों से विभिन्न धर्म और जाति के लोगों ने एक साथ रह कर दिखाया है। भारत ऊँचे पहाड़ों, घाटियों, महासागरों, प्रसिद्ध नदियों, धारा, जंगल, रेगिस्तान, प्राचीन संस्कृति और परंपराएँ और सबसे खास “विविधता में एकता” से सजा हुआ देश है। ये दुबारा से विभिन्न पेशेवर क्षेत्रों में जैसे संगीत, कला, नाटक, नृत्य, नाट्यशाला, मूर्तिकला आदि में वृद्धि को बढ़ावा देते हैं। लोगों की आध्यात्मिक परंपरा उन्हें एक-दूसरे के लिये अधिक धर्मनिष्ठ बनाती है। भारत की “विविधता में एकता” खास है जिसके लिये ये पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। ये भारत में बड़े स्तर पर पर्यटन को आकर्षित करता है। एक भारतीय होने के नाते, हम सभी को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिये और किसी भी कीमत पर इसकी अनोखी विशेषता को कायम रखने की कोशिश करनी चाहिये । यहाँ “विविधता में एकता” वास्तविक खुशहाली होने के साथ ही वर्तमान तथा भविष्य की प्रगति के लिये रास्ता है।

शिक्षा का अधिकार पर निबंध

Introduction :

प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में शिक्षा का बड़ा महत्व हैं,शिक्षा को जीवन का आधार माना गया हैं। किसी भी देश के आधुनिक या विकसित होने का प्रमाण उस देश के नागरिकों के शिक्षा स्तर पर निर्भर करता हैं। आधुनिक समय में शिक्षा को ही किसी राष्ट्र या समाज की प्रगति का सूचक समझा जाता हैं। शिक्षा का अधिकार अधिनियम संसद का एक अधिनियम है जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 ए के तहत भारत में 6 से 14 वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए नि: शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के महत्व का वर्णन करता है। यह अधिनियम 1 अप्रैल 2010 से लागू हुआ। इस अधिनियम की खास बात यह है कि गरीब परिवार के वे बच्चे, जो प्राथमिक शिक्षा से वंचित हैं, के लिए निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान रखा गया है ।

शिक्षा के अधिकार के साथ बच्चों एवं युवाओं का विकास होता है तथा राष्ट्र शक्तिशाली एवं समृद्ध बनता है । यह उत्तरदायी एवं सक्रिय नागरिक बनाने में भी सहायक है । इसमें देश के सभी लोगों, अभिभावकों एवं शिक्षकों का भी सहयोग आवश्यक है । इस कानून के लागू करने पर आने वाले खर्च केंद्र (55 प्रतिशत) और राज्य सरकार (45 प्रतिशत) मिलकर उठाएंगे।

  • आज विश्व के सभी राष्ट्रों द्वारा भारतीय युवाओं की प्रतिमा का मुक्त कण्ठ से गुणगान किया जाना इसका प्रमाण है । बावजूद इसके सम्पूर्ण राष्ट्र की शिक्षा को आधार मानकर विश्लेषण किया जाए तो अभी भी भारत शिक्षा के क्षेत्र में विकसित राष्ट्रों की तुलना में काफी पीछे है ।
  • वर्तमान में भारतीय शिक्षा दर अनुमानतः 74% है, जो वैश्विक स्तर पर बहुत कम है । तब इस अनुपात में और वृद्धि करने के लिए बुद्धिजीवियों ने अपने-अपने सुझाव दिए ।
  • उन सभी के सुझावों पर गौर अते हुए भारत सरकर ने शिक्षा को अनिवार्य रूप से लागू करने हेतु शिक्षा का अधिकार कानून (RTE Act) बनाकर पूरे देश में समान रूप से प्रस्तुत कर दिया ।
  • ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009’, 1 अप्रैल, 2010 से सम्पूर्ण भारत में लागू कर दिया गया । इसका प्रमुख उद्देश्य है- वर्ष आयु तक के सभी बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य, गुणवतायुक्त शिक्षा को सुनिश्चित करना । इस अधिनियम को सर्व शिक्षा अभियान तथा वर्ष 2005 के विधेयक का ही संशोधित रूप कहा जाए, तो समीचीन ही होगा ।
  • क्षेत्रीय सरकारों, अधिकारियों तथा अभिभावकों का यह दायित्व है कि वे बच्चे को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा दिलाने का प्रबन्ध करें । इस कार्य हेतु वित्तीय प्रबन्धन का पूर्ण दायित्व केन्द्र व राज्य सरकार द्वारा मिश्रित रूप से उठाया जाएगा । कोई भी बच्चा किसी समय विद्यालय में प्रवेश पाने को स्वतन्त्र है ।
  • आयु प्रमाण-पत्र न होने के बावजूद, बच्चा विद्यालय में प्रवेश ले सकता है । बच्चों की आवश्यकता का ध्यान रखते हुए पुस्तकालय, खेल के मैदान, स्वच्छ व मजबूत विद्यालय कक्ष, इमारत आदि का प्रबन्ध राज्य सरकार द्वारा किया जाएगा ।
  • शिक्षण की गुणवत्ता में सुधार हेतु 35 छात्रों पर एक शिक्षक का प्रावधान किया गया है तथा साथ ही यह सुनिश्चित किया गया है कि ग्रामीण ब शहरी किसी भी क्षेत्र में यह अनुपात प्रभावित न हो। 
  • इसके साथ ही अध्यापन की गुणवत्ता हेतु केवल प्रशिक्षित अध्यापकों को ही नियुक्त करने का प्रावधान किया गया है जो अप्रशिक्षित अध्यापक, प्राचीन समय से अध्यापनरत हैं, उन्हें सीमित अवधि में अध्यापक-प्रशिक्षण पूर्ण करने का आदेश पारित किया गया है, अन्यथा उन्हें पद-मुक्त किया जा सकता हे।

इसके अतिरिक्त निम्न कार्यों का पूर्ण रूप से निषेध है –

  • छात्रों को शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना देना ।
  • प्रवेश के दौरान छात्रों से कोई लिखित परीक्षा लेना ।
  • छात्रों या उनके अभिभावकों से किसी प्रकार का शुल्क लेना।
  • छात्रों को ट्‌यूशन पढ़ने के लिए बाध्य करना ।
  • बिना मान्यता प्राप्ति के विद्यालय का संचालन करना ।
  • इसी प्रकार निजी विद्यालयों में भी कक्षा 1 से प्रवेश के समय आर्थिक रूप से कमजोर समुदायों के छात्रों हेतु 25% आरक्षण का प्रावधान सुनिश्चित किया गया है ।
  • इस अधिनियम को प्रभावी बनाने का उत्तरदायित्व केन्द्र ब राज्य सरकार दोनों का है, जिसका वित्तीय बहन भी दोनों संयुक्त रूप से करेंगे ।
  • इस अधिनियम के अनुसार, वित्तीय बहन का दायित्व सर्वप्रथम राज्य सरकार को सौंपा गया था, परन्तु राज्य सरकार ने अपनी विवशता का हवाला देते हुए इसे अस्वीकार कर दिया तथा केन्द्र सरकार से मदद का अनुरोध किया, तदुपरान्त केन्द्र तथा राज्य सरकार द्वारा

65:36 अनुपात के तहत वित्तीय प्रबन्धन का विभाजन किया गया । उत्तर-पूर्वी राज्यों में यह अनुपात 90:10 है।

केन्द्र सरकार के दायित्व –

(i) बच्चों का चहुँमुखी विकास ।

(ii) संवैधानिक मूल्यों का विकास ।

(iii) जहाँ तक हो सके, मातृभाषा में शिक्षण दिया जाए ।

(iv) बच्चों के मानसिक बिकास के अनुरूप, उनका नियमित विश्लेषण । (धारा-29 के अन्तर्गत)

(v) बच्चों को भयमुक्त माहौल प्रदान कराना तथा अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का विकास करना ।

राज्य सरकार के दायित्व-

(i) वह प्रत्येक बच्चे को नि:शुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराएगी ।

(ii) अपने क्षेत्र के 14 वर्ष आयु तक के बच्चों का पूर्ण रिकॉर्ड रखेगी ।

(iii) शैक्षणिक कलेण्डर का निर्धारण करेगी (धारा-9 के अन्तर्गत)।

Conclusion :

सर्व शिक्षा अभियान द्वारा पारित लक्ष्य वर्ष 2010 तक पूर्ण न हो पाया था, इसके अतिरिक्त यह अधिनियम भी लागू कर दिया गया । अतः यह कहना समीचीन ही होगा कि इस अधिनियम में सर्व शिक्षा अभियान के सभी नियम समाहित है । अधिनियम शिक्षा को 6 से 14 वर्ष की आयु के बीच हर बच्चे का मौलिक अधिकार बनाता है। अब भारत में 74% आबादी साक्षर है जिसमें पुरुषों में 80% और महिला 65% शामिल हैं। यह शिक्षा का मौलिक अधिकार 6 से 14 वर्षो के बालक-बालिकाओं के लिए निशुल्क और गुणवतापूर्ण शिक्षा की सहायता से उन्हें समान रूप से शिक्षा और रोजगार के समान अवसरों की उपलब्धता सुनिश्चित करवाएगा, इससे हमारा भारत शिक्षित और विकसित बनेगा।

पीएम स्वनिधि योजना पर निबंध

Introduction :

हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के द्वारा 1 जून 2020 को प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना को शुरू करने का फैसला लिया गया | इस योजना के अंतर्गत  देश के रेहड़ी और सड़क विक्रेताओं को अपना खुद का काम नए सिरे से शुरू करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा 10000 रूपये तक का लोन मुहैया कराया जायेगा | इस स्वनिधि योजना को प्रधानमंत्री स्ट्रीट वेंडर्स आत्म निर्भर निधि के नाम से भी जाना जाता है |

इस लोन को समय पर चुकाने वाले स्ट्रीट वेंडर्स को 7 फीसद का वार्षिक ब्याज सब्सिडी के तौर पर उनके अकाउंट में सरकार की ओर से ट्रांसफर किया जाएगा। देश के जो इच्छुक लाभार्थी इस योजना का लाभ उठाना चाहते है तो उन्हें इस योजना के तहत आवेदन करना होगा |  स्ट्रीट वेंडर आत्मनिर्भर निधि के अंतर्गत विभिन्न क्षेत्रों में वेंडर, हॉकर, ठेले वाले, रेहड़ी वाले, ठेली फलवाले आदि सहित 50 लाख से अधिक लोगों को योजना से लाभ प्रदान किया जायेगा | स्ट्रीट वेंडर आत्मनिर्भर निधि के अंतर्गत रेहड़ी पटरी वालो को अपना काम दोबारा से शुरू करने के लिए सरकार द्वारा लोन मुहैया कराया गया है |

  • इस योजना के तहत छोटे दुकानदार 10,000 रुपए तक के ऋण के लिये आवेदन कर सकेंगे।
  • ऋण प्राप्त करने के लिये आवेदकों को किसी प्रकार की ज़मानत या कोलैट्रल (Collateral) की आवश्यकता नहीं होगी।
  • इस योजना के तहत प्राप्त हुई पूंजी को चुकाने के लिये एक वर्ष का समय दिया जाएगा, विक्रेता इस अवधि के दौरान मासिक किश्तों के माध्यम से ऋण का भुगतान कर सकेंगे।
  • साथ ही इस योजना के तहत यदि लाभार्थी लिये गए ऋण पर भुगतान समय से या निर्धारित तिथि से पहले ही करते हैं तो उन्हें 7% (वार्षिक) की ब्याज सब्सिडी प्रदान की जाएगी, जो ‘प्रत्यक्ष लाभ अंतरण’ (Direct Benefit Transfer- DBT) के माध्यम से 6 माह के अंतराल पर सीधे लाभार्थी के बैंक खाते में जमा की जाएगी।
  • पीएम स्वनिधि के तहत निर्धारित तिथि से पहले ऋण के पूर्ण भुगतान पर कोई ज़ुर्माना नहीं लागू होगा।
  • इस योजना के तहत ऋण जारी करने की प्रक्रिया जुलाई माह से शुरू की जाएगी।
  • इस योजना के लिये सरकार द्वारा 5,000 करोड़ रुपए की राशि मंज़ूर की गई है, यह योजना मार्च 2022 तक लागू रहेगी।
  • यह पहली बार है जब सूक्ष्म-वित्त संस्थानों (Micro finance Institutions(MFI), गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (Non Banking Financial Company- (NBFC), स्वयं सहायता समूह (Self Help Group-SHG),  बैंकों को शहरी क्षेत्र की गरीब आबादी से जुड़ी किसी योजना में शामिल किया गया है।
  • इन संस्थानों को ज़मीनी स्तर पर उनकी उपस्थिति और छोटे व्यापारियों व शहरों की गरीब आबादी के साथ निकटता के कारण इस योजना में शामिल किया गया है।

तकनीकी का प्रयोग और पारदर्शिता –

  • इस योजना के प्रभावी वितरण और इसके क्रियान्वयन में पारदर्शिता लाने के लियेवेब पोर्टल और मोबाइल एप युक्त एक डिजिटल प्लेटफॉर्म का विकास किया जा रहा है।
  • यह प्लेटफॉर्म क्रेडिट प्रबंधन के लिये वेब पोर्टल और मोबाइल एप कोभारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (सिडबी) के ‘उद्यम मित्र’ पोर्टल से तथा ब्याज सब्सिडी के स्वचालित प्रबंधन हेतु MoHUA के ‘पैसा पोर्टल’ (PAiSA Portal) से जोड़ेगा।  
  • इस योजना के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रो और पृष्ठभूमि के 50 लाख से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रूप से लाभ प्राप्त होगा।
  • इस योजना को विशेष रूप से छोटे दुकानदारों (ठेले और रेहड़ी-पटरी वाले) के लिये तैयार किया गया है, इस योजना के माध्यम से छोटे व्यापारी COVID-19 के कारण प्रभावित हुए अपने व्यापार को पुनः शुरू कर सकेंगे।
  • इस योजना के माध्यम से सरकार द्वारा छोटे व्यापारियों के बीच डिजिटल बैंकिंग को बढ़ावा देने का प्रयास किया जाएगा।
  • इसके तहत ऋण चुकाने के लिये डिजिटल भुगतान करने वाले लाभार्थियों को हर माह कैश-बैक प्रदान कर उन्हें अधिक-से-अधिक डिजिटल बैंकिंग अपनाने के लिये प्रोत्साहित किया जाएगा।
  • इस योजना के ज़रिये रेहड़ी पटरी वालो को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाया जायगा तथा गरीब लोगो की स्थिति में सुधार होगा |
  • इस योजना के तहत MoHUA द्वारा जून माह में पूरे देश में राज्य सरकारों, दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन के राज्य कार्यालय, भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम, शहरी स्थानीय निकायों, सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों के लिए क्रेडिट गारंटी निधि ट्रस्ट और अन्य हितधारकों के सहयोग से क्षमता विकास और वित्तीय साक्षरता कार्यक्रम की शुरुआत की जाएगी।
  • COVID-19 महामारी के कारण देश की औद्योगिक इकाइयों और संगठित क्षेत्र के अन्य व्यवसायों के अतिरिक्त असंगठित क्षेत्र और छोटे व्यापारियों को भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ा है।
  • देश में बड़े पैमाने पर असंगठित क्षेत्र के प्रमाणिक आँकड़े उपलब्ध न होने से इससे जुड़े लोगों को सहायता पहुँचाना एक बड़ी चुनौती रही है। साथ ही इस क्षेत्र के लिये किसी विशेष आर्थिक तंत्र के अभाव में छोटे व्यापारियों को स्थानीय कर्ज़दारों से महँगी दरों पर ऋण लेना पड़ता है। 

Conclusion :

पीएम स्वनिधियोजना के माध्यम से छोटे व्यापारियों को आसान शर्तों पर ऋण उपलब्ध करा कर ऐसे लोगों को COVID-19 के कारण हुए नुकसान से उबरने में सहायता प्रदान की जा सकेगी।  इस योजना के अंतर्गत 2 जुलाई 2020 को ऋण देने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद, राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 1.54 लाख से अधिक सड़क विक्रेताओं ने ऋण के लिए आवेदन किया है जिनमे से, 48,000 से अधिक को इस योजना के तहत ऋण स्वीकृत किया जा चूका है। यह प्रौद्योगिकी का उपयोग करते हुए लोगों की क्षमता को बढ़ाने और कोरोना संकट के समय कारोबार को नए सिरे से खड़ा कर आत्मनिर्भर भारत अभियान को गति देंगे।

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Abhilash Kumar

The author Abhilash Kumar

Abhilash Kumar is the founder of “Studyguru Pathshala” brand & its products, i.e. YouTube, Books, PDF eBooks etc. He is one of the most successful bloggers in India. He is the author of India’s the best seller “Descriptive Book”. As a social activist, he has distributed his books to millions of deprived and needy students.

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