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ऑनर किलिंग पर निबंध (Essay on Honour Killing in hindi)

Introduction :

परिवार के किसी सदस्य, विशेष रूप से महिलाओ, की उसके सगे संबंधियों द्वारा की जाने वाली हत्या को ऑनर किलिंग कहा जाता है। ये हत्याएं परिवार और समाज की प्रतिष्ठा के नाम पे की जाती है। ऑनर किलिंग की घटनायें इन दिनों बढ़ती ही जा रही हैं। कुछ मामलों में, पुरुष और महिलाएं दोनों ऑनर किलिंग का शिकार हो जाते हैं। यह परिवार के भीतर प्रचलित एक प्रकार की हिंसा है। पुरुष प्रधान समाज में, महिलाओं की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखी जाती है। माना जाता है कि हत्या के शिकार लोग अधिकतर यौन अनैतिक मामलो में शामिल होते है जैसे की शादी से पहले यौन संबंध होना, तलाक मांगना आदि।

बाबा साहब आबेडकर ने एक बार कहा था, “मैं किसी समुदाय की प्रगति को महिलाओं द्वारा हासिल की गई प्रगति के पैमाने से मापता हूं।” वे मानते थे कि समाज के स्वास्थ्य का आकलन उसकी महिलाओं की स्थिति से किया जा सकता है। जबकि इज्जत के नाम पर हत्याएं समाज मे महिलाओं की ख़राब स्थिति को बताती है। हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के कुछ हिस्सों में हॉनर किलिंग की घटनाएं हुई है। जिनमे मुख्यता घर से भागे हुए युवा लड़की या लड़के या दोनों की एक या दोनों परिवार मिलकर हत्या कर देते है। ऐसे मामले ग्रामीणों के समर्थन के कारण पुलिस तक पहुंच ही नहीं पाते।

  • हाल ही में ऑनर किलिंग से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दो वयस्क अगर शादी करते हैं तो कोई तीसरा उसमें दखल नही दे सकता है।
  • साथ में न्यायालय ने यह भी बताया है कि हिन्दू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 5 में एक ही गोत्र में शादी न करने को उचित बताया गया है।
  • उल्लेखनीय है कि ऑनर किलिंग के केवल 3 प्रतिशत मामले ही गोत्र से संबंधित होते हैं, जबकि 97% मामले धर्म तथा अन्य कारणों से संबंधित होते हैं।
  • देश में जातिगत धारणाएँ लगातार बलवती होती जा रही हैं। अधिकांश ऑनर किलिंग के मामले तथाकथित उच्च और नीची जाति के लोगों के प्रेम संबंधों के मामले में देखने को मिले हैं। अंतर-धार्मिक संबंध भी ऑनर किलिंग का एक बड़ा कारण है।
  • ऑनर किलिंग का मूल कारण औपचारिक शासन का ग्रामीण क्षेत्रों तक नहीं पहुँच पाना है।पंचायत समिति जैसे औपचारिक संस्थानों की अनुपस्थिति में ग्रामीण क्षेत्रों में निर्णयन की शक्ति अवैध एवं गैर-संवैधानिक संस्थाएँ, जैसे- खाप पंचायतों के हाथ में चली जाती है।
  • शिक्षा के अभाव में समाज का बड़ा हिस्सा अपने संवैधानिक अधिकारों के संबंध में अनजान है। ऑनर किलिंग भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 15 (1), 1 9, 21 और 39 (एफ) को नकारात्मक ढंग से प्रभावित करता है।
  • अनुच्छेद 14, 15 (1), 19, और 21 मूल अधिकारों से संबंधित हैं, जबकि अनुच्छेद 39 राज्य के नीति निर्देशक तत्त्वों से संबंधित है। मूल अधिकार और निर्देशक तत्व संविधान की आत्मा और दर्शन के तौर पर जाने जाते हैं।
  • ऑनर किलिंग मानवाधिकारों के उल्लंघन के साथ-साथ अनुच्छेद 21 के अनुसार गरिमा के साथ जीने के अधिकार का उल्लंघन भी है।
  • यह देश में सहानुभूति, प्रेम, करुणा, सहनशीलता जैसे गुणों के अभाव को और बढ़ाने का कार्य करता है।

ऑनर किलिंग को रोकने में चुनौतियाँ –

  • इस तरह के अपराध प्रायः गोपनीय रूप से किये जाते हैं। अतः इसके संबंध में आँकड़ों की पर्याप्त कमी पाई जाती है।
  • स्थानीय पुलिस के सामने इस तरह के अपराध को वर्गीकृत करने मे समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। सामूहिक आधार पर इस तरह के अपराध को घरेलू हिंसा के रूप में वर्गीकृत कर दिया जाता है।
  • स्थानीय प्रशासन पर विश्वसनीयता की कमी के कारण महिला स्वयं के साथ हुए अपराध की सूचना नहीं दे पाती।
  • ‘सम्मान के लिये हत्या’ को रोकने के लिये लोगों में प्रायः शिक्षा का अभाव देखा जाता है साथ ही लोग रूढि़यों व सामाजिक बंधनों में जकड़े रहते हैं।
  • लैंगिक असमानता समाज में व्यावहारिक स्तर पर कट्टर वैचारिकता को जन्म देती है। इसी के फलस्वरूप ऐसी घटनाएँ प्रकाश में आती हैं।

भारत में कानूनी प्रावधान –

  • भारतीय संविधान में किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता एवं समान संरक्षण अनुच्छेद 14 के तहत दिया गया है।
  • अनुच्छेद 15 के तहत भारतीय संविधान में राज्य केवल धर्म, जाति, लिंग अथवा जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा।
  • अनुच्छेद 21 के तहत किसी भी व्यक्ति को जीवन जीने की स्वतन्त्रता अथवा व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा।
  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 के तहत अस्पृश्यता का उन्मूलन किया गया, ताकि सभी व्यक्ति को समाज में सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार मिले। उसे सामाजिक प्रतिष्ठा अथवा पिछड़ेपन या अन्य किसी कारण से होने वाले अपराध से संरक्षण दिया जा सके।
  • संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत भारत के नागरिकों को स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है, जिसके तहत वे अपना जीवन स्वतंत्रता से जी सकते हैं, जिसके तहत किसी को परंपरा, कानून अथवा अन्य किसी अनुचित आधार पर बाधित नहीं किया जा सकता।
  • “मानव अधिकार अधिनियम 2006” के तहत किसी मानव की गरिमा को हानि पहुँचाना भी अपराध की श्रेणी में आता है।
  • “घरेलू हिंसा अधिनियम 2005” के तहत किसी महिला को मानसिक रूप से अथवा शारीरिक रूप से प्रताडि़त किया जाता है तो महिला को इस अधिनियम के तहत संरक्षण प्राप्त है।

ऑनर किलिंग का प्रभाव –

  • परिवार द्वारा अथवा किसी भी सामाजिक व्यक्ति द्वारा सम्मान के नाम पर की गई हत्या समाज में अपराध को बढ़ावा देती है।
  • खाप पंचायत द्वारा दिये गए निर्णय जो कि ‘ऑनर किलिंग’ के नाम पर अत्याचार को प्रोत्साहित करते हैं इनके प्रभाव के बढ़ने से सामाजिक रूढि़वादिता को बढ़ावा मिलता है।
  • ‘ऑनर किलिंग’ के मामले महिलाओं की स्वयात्तता को प्रभावित करते हैं, जिससे घरेलू हिंसा, बलात्कार आदि विभिन्न तरह की समस्या उत्पन्न होती है।
  • ऑनर किलिंग के मामले जातिगत कट्टरता को बढ़ावा देंगे जिससे समाज के एक वर्ग का प्रभुत्व एवं अन्य का शोषण होगा जो लोगों में वैमनस्य एवं असंतुष्टि को भी बढ़ावा मिलता है।
  • इस तरह के अपराध देश में सामाजिक अराजकता को बढ़ावा देते हैं क्योंकि इससे एक-दूसरे की संस्कृति को सम्मान प्रदान करने की भावना समाप्त होगी।
  • समाज में नस्लीय एवं रंग भेद जैसे अपराध को बढ़ावा मिल सकता है।

Conclusion :

सरकार को ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त कानून बनाने चाहिए जो न केवल जघन्य अपराध करते हैं बल्कि इसे छिपाकर और सबूतों को मिटाकर इसे आत्महत्या का नाम दे देते हैं। इज्जत के नाम पर हत्याओं को रोकने के लिए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के अनुरूप एक कड़े कानून की भी जरूरत है, और इस पर नजर भी रखी जानी चाहिए क्योंकि लोग अभी भी सम्मान के नाम पर अपनी जान गंवा रहे हैं।

LGBT अधिकार पर निबंध

Introduction :

मानवाधिकार का मुख्य आधार सभी मनुष्यों में समान हैं तथा सभी मनुष्यों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए। जो कुछ भी इस विचार को कमजोर करता है वह समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है और भेदभाव का मार्ग प्रशस्त करता है। लेस्बियन, गे, बाइसेक्शुअल एवं ट्रांसजेंडर(एलजीबीटी) के मानवाधिकारों को दुनिया भर में तेजी से ध्यान में रखा जा रहा है, जिसमें नए कानूनी संरक्षण शामिल हैं। समानता का अधिकार और समान सुरक्षा की गारंटी संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 में दी गई है। भारत एक विशाल और विविध देश है और इस विषय के प्रति लोगो का दृष्टिकोण अलग-अलग हैं। 

भारत में एलजीबीटी लोगों को कानूनी और सामाजिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। पिछले एक दशक में, एलजीबीटी लोगों ने भारत मे, खासकर बड़े शहरों में, अधिक से अधिक सहिष्णुता प्राप्त की है। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 377 द्वारा उन यौन कार्यों को अपराध घोषित किया गया है जो ‘प्रकृति के आदेश के प्रतिकूल’ हैं। किन्तु भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने सितम्बर 2018 में इस धारा का प्रयोग उन कार्यों के लिए असंवैधानिक घोषित कर दिया जिनमें दो वयस्क परस्पर सहमति से समलैंगिक आचरण करते हैं।

  • धारा 377 जिसे “अप्राकृतिक अपराध” (unnatural offences) के नाम से भी जाना जाता है, को 1857 के विद्रोह के बाद औपनिवेशक शासन द्वारा अधिनियमित किया गया था।
  • दरअसल, उन्होंने अपने धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर हमारे लिये कानून बनाया। तब ईसाइयत में समलैंगिकता को अपराध माना जाता था जबकि इससे पहले समलैंगिक गतिविधियों में शामिल लोगों को भारत में दंडित नहीं किया जाता था।
  • अदालतों ने धारा 377 की कई बार व्याख्या की है और उन व्याख्याओं से निकलने वाला सामान्य सा निष्कर्ष यह है कि ‘धारा 377 में गैर-प्रजनन यौन कृत्यों और यौन विकृति के किसी भी कृत्य को दण्डित करने का प्रावधान है।
  • दरअसल, धारा 377 में गैर-प्रजनन यौन कृत्यों यानी अप्राकृतिक यौन संबंधों जैसे गुदा मैथुन (sadomy), ओरल सेक्स आदि को अपराध माना जाता है और दण्डित करने का भी प्रावधान है।
  • यह धारा विशेष रूप से एलजीबीटी समुदाय (lesbian, gay, bisexual, and transgender community) के लोगों की चिंताओं का कारण इसलिये है, क्योंकि उनके मध्य स्थापित होने वाले संबंधों को अप्राकृतिक ही माना जाता है।
  • ‘नाज़ फाउंडेशन’ ने वर्ष 2001 में दिल्ली उच्च न्यायालय से धारा 377 को गैर-संवैधानिक घोषित करने की मांग की थी। उच्च न्यायलय ने कहा कि:
  • → आपसी सहमति से स्थापित यौन संबंधों का अपराधीकरण न केवल लोगों के गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार को नकारना है, बल्कि यह भेदभावपूर्ण भी है।
    → समलैंगिकों को धारा 377 की वज़ह से ही समाज अपराधी के तौर पर देखता है, जो कि बेहद चिंताजनक है।
  • नाज़ फाउंडेशन मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय के इस निर्णय के बाद समलैंगिक समुदाय को राहत तो मिली, लेकिन ज़्यादा दिन तक यह स्थिति बनी नहीं रह सकी।
  • दिसंबर 2013 में ‘सुरेश कुमार कौशल बनाम नाज़ फाउंडेशन’ मामले में फैसला सुनाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को पलटते हुए दोबारा इस धारा को इसके मूल स्वरुप में ला दिया।
  • दरअसल समस्या इसलिये और गंभीर हो गई है, क्योंकि धारा 377 के प्रावधानों का सहारा लेते हुए समलैंगिकों को उनके अधिकारों से वंचित किया जा रहा है।
  • हाल ही में निजता को मूल अधिकार बनाए जाने के मामले की सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने कहा कि ‘सुरेश कौशल’ मामले में निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार मानते हुए सुनवाई नहीं की गई थी।
  • अतः यह माना जा रहा है कि ‘सुरेश कौशल’ मामले की संवैधानिकता को चुनौती देने वाले किसी मामले के बस नज़र में आने भर की देर है और सर्वोच्च न्यायालय इसे प्रभावहीन बना देगा।
  • विदित हो कि ‘सुरेश कौशल’ मामले में निर्णय आने का बाद से ही बड़ी संख्या में ऐसे मामले सामने आए हैं, जहाँ समलैंगिकों को उनके परिचितों और पुलिस द्वारा ब्लैकमेल किया जा रहा है। पिछले तीन वर्षों में इस तरह के मामलों की संख्या कुछ ज़्यादा ही बढ़ गई है।
  • दरअसल, समाज की मानसिकता ऐसी है कि समलैंगिकों को अपमान और भयानक तनाव से गुजरना पड़ा है। ब्रिटिशर्स जिन्होंने कि इस कानून लागू किया, उन्होंने 1960 के दशक में ही इससे छुटकारा पा लिया।

प्रतिवाद –

  • धारा 377 एक औपनिवेशिक विरासत होने के नाते गहन आलोचना का विषय रहा है। माना जाता है कि यह एक ऐसा कानून है जिसका पुलिस द्वारा दुरुपयोग किया जाता है और जो व्यक्ति की चयन करने की स्वतंत्रता के खिलाफ है। किसी कानून का केवल दुरुपयोग किया जाना ही उस कानून को खत्म करने का आधार नहीं बन सकता है।
  • नाज़ फाउंडेशन मामले में दिल्ली उच्च न्यायलय ने भले ही इस कानून को कुछ मूल अधिकारों का उल्लंघन करने वाला माना था, लेकिन साथ में यह भी कहा था कि असहमति के बावज़ूद अप्राकृतिक यौनाचार और नाबालिग के साथ सहमति या असहमति से स्थापित अप्राकृतिक यौन संबंधों को इस धारा के अंतर्गत अपराध माना जाएगा।
  • सभी धर्मों में समलैंगिकता को पाप माना गया है। इसे प्रकृति के आदेश के विरुद्ध आचरण माना गया है और ऐसा करने वाला व्यक्ति अपराधी माना जाता है। हालाँकि, 19वीं शताब्दी के अंत में एक मज़बूत राय सामने आई कि यह एक बीमारी है और किसी व्यक्ति को इसके लिये दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिये।
  • अभी कुछ दशकों पहले इस अवधारण को बल मिला है कि कुछ लोगों में समान लिंग के व्यक्तियों के प्रति आकर्षण एक जन्मजात लक्षण है| अतः यह न तो अनैतिक है और न ही कोई बीमारी है। हालाँकि अभी भी लोगों में इस बात को लेकर मतभेद है और कोई इसे धर्म-विरुद्ध आचरण मानता है तो कोई अनैतिक।

संवाद –

  • अपने घर के चहारदीवारी के अन्दर कोई व्यक्ति क्या करता है इसमें किसी का भी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिये। प्रत्येक व्यक्ति अपने पसंद का जीवन जीने के लिये स्वतंत्र है।
  • हालाँकि उसे यह अधिकार नहीं है कि वह अपने पसंदीदा आचरण का विज्ञापन करे, जिससे कि अन्य लोग प्रभावित हों। समलैंगिक होना एकदम ठीक बात है लेकिन समलैंगिकता का खुलेआम प्रदर्शन वर्जित होना चाहिये।
  • भारत में समलैंगिकता ही नहीं बल्कि यौन संबंधी आचरण को भी धर्म के नज़रिये से देखा जाता है। प्रायः सभी धर्मों में विवाह-पूर्व और समलैंगिक यौन संबंधों की मनाही है। लेकिन हम एक सभ्य और गणतांत्रिक देश में रह रहें हैं, जहाँ संविधान के कायदे कानून लागू होते हैं न की किसी धर्म के।

Conclusion :

संविधान ने हमें यह मौलिक अधिकार दिया है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी पसंद के हिसाब से जीवन जीने को स्वतंत्र है और किसी को भी यह अधिकार नहीं है कि वह औरों के व्यक्तिगत जीवन में ताक-झाँक करे। दरअसल, समलैंगिकता को धर्म के चश्मे से नहीं, बल्कि संविधान में निहित सिद्धांतों के आलोक में देखा जाना चाहिये और ये सिद्धांत एलजीबीटी समुदायों को भी एक आम भारतीय नागरिक को प्राप्त सभी अधिकार दिये जाने पर जोर देते हैं। भारत में अधिकांश एलजीबीटी लोग अपने परिवार से भेदभाव के डर से छिपकर रहते हैं, क्योंकि समलैंगिकता को हमारे समाज में शर्मनाक दृस्टि से देखा जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी भेदभाव मौजूद है, जहां एलजीबीटी लोग अक्सर अपने परिवारों से अस्वीकृति का सामना करते हैं और विपरीत लिंग विवाह के लिए मजबूर होते हैं।

तीन तलाक (ट्रिपल तलाकपर निबंध

Introduction :

तलाक एक अरबी शब्द है, लोकसभा ने मुस्लिम महिलाओं (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) विधेयक, पारित किया है। यह बिल तीन तालक से पीड़ित मुस्लिम महिलाओं के लिए मुख्य है। प्रस्तावित कानून के तहत, तत्काल ट्रिपल तालक देना गैरकानूनी होगा । ट्रिपल तालाक इस्लामिक तलाक का एक रूप है जो भारतीय मुसलमानों द्वारा, विशेष रूप से न्यायशास्त्र के हनफी स्कूलों के कुछ अनुयायियों द्वारा इस्तेमाल किया गया है। इसे मौखिक तालाक भी कहा जा सकता है। ट्रिपल तालाक शरिया कानून (इस्लामिक कानून) के तहत तलाक की प्रक्रिया है जहां एक पति अपनी पत्नी को तीन बार तालाक शब्द का उच्चारण करके तलाक दे सकता है। 

यह एक विडंबना है कि एक हिंदू महिला अपने पति की एकल पत्नी होने का पूर्ण अधिकार प्राप्त करती है, दूसरी ओर मुस्लिम महिलाओं को यह विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है। शाह बानो केस (1985) में एक गरीब मुस्लिम महिला ने तलाक के बाद रखरखाव का दावा किया तो लोगो में गुस्सा भड़क उठा। अल्पसंख्यक के गुस्से को दबाने के लिए, सरकार ने तुरंत कार्रवाई की और संसद ने मुस्लिम महिला अधिनियम, 1986 पारित किया जिसने शाह बानो के मामले में पारित SC के निर्णय को निरस्त कर दिया।

कुरान क्या कहता है?

  • तलाक के बारे में कुरान के भीतर संदेश स्पष्ट रूप से स्पष्ट है। यह अचानक से इसे भंग करने के बजाय विवाह की सुरक्षा की ओर अधिक झुकाव करता है। कुरान तलाक को अंजाम देने के लिए कुछ मानक तय करता है, यहां तक ​​कि शादी को पवित्र करने के भी मानक हैं।
  • “जो लोग अपनी पत्नियों को तलाक देने का इरादा रखते हैं, वे चार महीने तक इंतजार करेंगे।” इस्लामी शास्त्र संघ को जारी रखने की उम्मीद में तलाक को लागू करने में समय और धैर्य की मांग करता है, यह जानते हुए कि युगल में मतभेद हैं।

क्या है ट्रिपल तालक?

  • कुछ भारतीय मुसलमान विशेष रूप से सुन्नी मुसलमान ट्रिपल तालक की प्रणाली का पालन करते हैं जहाँ पति अपनी पत्नी को तीन शब्दों ‘तालाक, तालाक, तालाक’ का उच्चारण करके तलाक दे सकता है। यह 1400 साल पुरानी प्रथा है।
  • इस प्रथा में, पति को अपनी पत्नी को तलाक देने के कारणों का उल्लेख करने की आवश्यकता नहीं है। ट्रिपल तालक की प्रथा का उपयोग करके मुस्लिम पत्नी अपने पति को तलाक नहीं दे सकती।
  • इन वर्षों में, भारत में मुस्लिम महिलाएं अपने वैवाहिक घरों से कुछ समय में बाहर हो जाने के डर से जी रही हैं, क्योंकि एक मुस्लिम व्यक्ति, अगर वह फैसला करता है, तो “तालक” शब्द (तलाक) तीन बार कहकर शादी के वर्षों को समाप्त कर सकता है। ।

ट्रिपल तालाक कानून –

  • भारतीय संसद ने ट्रिपल तालक कानून को पारित किया, जिसे 30 जुलाई, 2019 को त्वरित ट्रिपल टैलक को आपराधिक अपराध बनाने के लिए विवाह विधेयक पर अधिकारों का संरक्षण भी कहा गया।
  • कानून ट्रिपल तालक को संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध भी बनाता है। रविशंकर प्रसाद, जो कानून और न्याय मंत्री थे, ने 21 फरवरी, 2019 को 21 फरवरी, 2019 को प्रख्यापित अध्यादेश को बदलने के लिए लोकसभा में विधेयक पेश किया।
  • कुछ राजनीतिक दलों द्वारा उच्च सदन के कामकाज की निरंतर गड़बड़ी के कारण यह विधेयक लंबे समय तक राज्यसभा में विचार के लिए लंबित था। ट्रिपल तालक तलाक प्रणाली का चलन जारी था, इसलिए कानून में सख्त प्रावधान करके इस तरह की प्रथा को रोकने के लिए तत्काल कार्रवाई करने की आवश्यकता थी।
  • सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिपल तालाक को असंवैधानिक माना क्योंकि यह लैंगिक कानून के खिलाफ है और समानता के सिद्धांत के खिलाफ संविधान के अनुसार एक मौलिक अधिकार है और यह भारत में इस्लाम के विश्वास के लिए मौलिक नहीं है।
  • 1985 में, शाह बानो नाम की एक महिला ने अपने पति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में केस लड़ा, जब उसने उसे बिना कोई गुजारा भत्ता दिए छोड़ दिया। शीर्ष अदालत ने उसके पक्ष में फैसला सुनाया।

ट्रिपल तालक अवैध –

  • विधेयक के क्लॉज 3 के अनुसार, “किसी भी व्यक्ति द्वारा अपनी पत्नी के शब्दों में, या तो बोले गए या लिखे गए या इलेक्ट्रॉनिक रूप में या अन्य तरीके से, जो भी शून्य और अवैध होगा,” एक व्यक्ति द्वारा तालाक का कोई भी उच्चारण।
  • खण्ड 3 में यह भी कहा गया है कि, “जो भी अपनी पत्नी पर ट्रिपल तालक का उच्चारण करेगा, उसे तीन साल के कारावास और जुर्माने से दंडित किया जाएगा”

Conclusion :

हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने इसे मनमाना और असंवैधानिक बताते हुए ट्रिपल तालक प्रथा को अमान्य कर दिया। SC ने इसे अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन बताया है । भारत संस्कृति, धर्म और रीति-रिवाजों की विविधता का देश है। भारत में, प्रत्येक धार्मिक समुदाय के पास अपने धार्मिक ग्रंथों के आधार पर कानूनों का एक सेट है, जो परिवार के मामलों को नियंत्रित करता है। हालांकि, किसी भी धर्म और सामाजिक न्याय का अभ्यास करने के अधिकार के बीच एक अच्छा संतुलन होना चाहिए। ट्रिपल तालाक बिल की संसद द्वारा स्वीकृति मुस्लिम महिलाओं को सामाजिक न्याय देने का सही कदम है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला राष्ट्रीय एकीकरण और धर्मनिरपेक्षता का मार्ग प्रशस्त करेगा। यह लैंगिक समानता, महिलाओं के कल्याण और न्याय को भी बढ़ावा देगा। यह व्यक्तिगत कानूनी मामलों को सरल करेगा।

महिला सशक्तिकरण पर निबंध

Introduction :

नारी सशक्तिकरण के नारे के साथ एक प्रश्न उठता है कि “क्या महिलाएँ सचमुच में मजबूत बनी है” और “क्या उसका लंबे समय का संघर्ष खत्म हो चुका है”। राष्ट्र के विकास में महिलाओं की सच्ची महत्ता और अधिकार के बारे में समाज में जागरुकता लाने के लिये मातृ दिवस, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस आदि जैसे कई सारे कार्यक्रम सरकार द्वारा चलाये जा रहे और लागू किये गये है। महिलाओं को कई क्षेत्र में विकास की जरुरत है। ‘सशक्तिकरण’ से तात्पर्य किसी व्यक्ति की उस क्षमता से है जिससे उसमें ये योग्यता आ जाती है जिसमें वो अपने जीवन से जुड़े सभी निर्णय स्वयं ले सके। महिला सशक्तिकरण में भी हम उसी क्षमता की बात कर रहे है जहाँ महिलाएँ परिवार और समाज के सभी बंधनों से मुक्त होकर अपने निर्णयों की निर्माता खुद हो।

अपनी निजी स्वतंत्रता और स्वयं के फैसले लेने के लिये महिलाओं को अधिकार देना ही महिला सशक्तिकरण है। वें देश और परिवार की आर्थिक स्थिति का प्रबंधन करने में पूरी तरह से सक्षम है। अत: महिलाओं के सशक्त होने से पूरा समाज अपने आप सशक्त हो जायेगा। भारत में, महिलाओं को सशक्त बनाने के लिये सबसे पहले समाज में उनके अधिकारों और मूल्यों को मारने वाले उन सभी राक्षसी सोच को मारना जरुरी है जैसे दहेज प्रथा, अशिक्षा, यौन हिंसा, असमानता, भ्रूण हत्या, महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा, वैश्यावृति और मानव तस्करी ।

  • पुरुष और महिला को बराबरी पर लाने के लिये महिला सशक्तिकरण में तेजी लाने की जरुरत है। सभी क्षेत्रों में महिलाओं का उत्थान राष्ट्र की प्राथमिकता में शामिल होना चाहिये। महिला और पुरुष के बीच की असमानता कई समस्याओं को जन्म देती है जो राष्ट्र के विकास में बड़ी बाधा के रुप में सामने आ सकती है।
  • ये महिलाओं का जन्मसिद्ध अधिकार है कि उन्हें समाज में पुरुषों के बराबर महत्व मिले। वास्तव में सशक्तिकरण को लाने के लिये महिलाओं को अपने अधिकारों से अवगत होना चाहिये। न केवल घरेलू और पारिवारिक जिम्मेदारियों बल्कि महिलाओं को हर क्षेत्रों में सक्रिय और सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिये। उन्हें अपने आस-पास और देश में होने वाली घटनाओं को भी जानना चाहिये।
  • महिला सशक्तिकरण में ये ताकत है कि वो समाज और देश में बहुत कुछ बदल सकें। वो समाज में किसी समस्या को पुरुषों से बेहतर ढ़ंग से निपट सकती है। वो देश और परिवार के लिये अधिक जनसंख्या के नुकसान को अच्छी तरह से समझ सकती है।
  • अच्छे पारिवारिक योजना से वो देश और परिवार की आर्थिक स्थिति का प्रबंधन करने में पूरी तरह से सक्षम है। पुरुषों की अपेक्षा महिलाएँ किसी भी प्रभावकारी हिंसा को संभालने में सक्षम है चाहे वो पारिवारिक हो या सामाजिक।
  • महिला सशक्तिकरण के द्वारा ये संभव है कि एक मजबूत अर्थव्यवस्था के महिला-पुरुष समानता वाले वाले देश को पुरुषवादी प्रभाव वाले देश से बदला जा सकता है। महिला सशक्तिकरण की मदद से बिना अधिक प्रयास किये परिवार के हर सदस्य का विकास आसानी से हो सकता है।
  • एक महिला परिवार में सभी चीजों के लिये बेहद जिम्मेदार मानी जाती है अत: वो सभी समस्याओं का समाधान अच्छी तरह से कर सकती है। महिलाओं के सशक्त होने से पूरा समाज अपने आप सशक्त हो जायेगा।
  • महिलाओं के लिये प्राचीन काल से समाज में चले आ रहे गलत और पुराने चलन को नये रिती-रिवाजों और परंपरा में ढ़ाल दिया गया था। भारतीय समाज में महिलाओं को सम्मान देने के लिये माँ, बहन, पुत्री, पत्नी के रुप में महिला देवियो को पूजने की परंपरा है लेकिन इसका ये कतई मतलब नहीं कि केवल महिलाओं को पूजने भर से देश के विकास की जरुरत पूरी हो जायेगी।
  • आज जरुरत है कि देश की आधी आबादी यानि महिलाओं का हर क्षेत्र में सशक्तिकरण किया जाए जो देश के विकास का आधार बनेंगी।
  • भारत एक प्रसिद्ध देश है जिसने ‘विविधता में एकता’ के मुहावरे को साबित किया है, जहाँ भारतीय समाज में विभिन्न धर्मों को मानने वाले लोग रहते है। महिलाओं को हर धर्म में एक अलग स्थान दिया गया है जो लोगों की आँखों को ढ़के हुए बड़े पर्दे के रुप में और कई वर्षों से आदर्श के रुप में महिलाओं के खिलाफ कई सारे गलत कार्यों (शारीरिक और मानसिक) को जारी रखने में मदद कर रहा है।
  • प्राचीन भारतीय समाज दूसरी भेदभावपूर्ण दस्तूरों के साथ सती प्रथा, नगर वधु व्यवस्था, दहेज प्रथा, यौन हिंसा, घरेलू हिंसा, गर्भ में बच्चियों की हत्या, पर्दा प्रथा, कार्य स्थल पर यौन शोषण, बाल मजदूरी, बाल विवाह तथा देवदासी प्रथा आदि परंपरा थी। इस तरह की कुप्रथा का कारण पितृसत्तामक समाज और पुरुष श्रेष्ठता मनोग्रन्थि है।
  • पुरुष पारिवारिक सदस्यों द्वारा सामाजिक राजनीतिक अधिकार (काम करने की आजादी, शिक्षा का अधिकार आदि) को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया। महिलाओं के खिलाफ कुछ बुरे चलन को खुले विचारों के लोगों और महान भारतीय लोगों द्वारा हटाया गया जिन्होंने महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण कार्यों के लिये अपनी आवाज उठायी।
  • राजा राम मोहन रॉय की लगातार कोशिशों की वजह से ही सती प्रथा को खत्म करने के लिये अंग्रेज मजबूर हुए। बाद में दूसरे भारतीय समाज सुधारकों (ईश्वर चंद्र विद्यासागर, आचार्य विनोभा भावे, स्वामी विवेकानंद आदि) ने भी महिला उत्थान के लिये अपनी आवाज उठायी और कड़ा संघर्ष किया। भारत में विधवाओं की स्थिति को सुधारने के लिये ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने अपने लगातार प्रयास से विधवा पुर्न विवाह अधिनियम 1856 की शुरुआत करवाई।

Conclusion :

पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं के खिलाफ होने वाले लैंगिक असमानता और बुरी प्रथाओं को हटाने के लिये सरकार द्वारा कई सारे संवैधानिक और कानूनी अधिकार बनाए और लागू किये गये है। हालाँकि ऐसे बड़े विषय को सुलझाने के लिये महिलाओं सहित सभी का लगातार सहयोग की जरुरत है। आधुनिक समाज महिलाओं के अधिकार को लेकर ज्यादा जागरुक है जिसका परिणाम हुआ कि कई सारे स्वयं-सेवी समूह और एनजीओ आदि इस दिशा में कार्य कर रहे है। महिलाएँ ज्यादा खुले दिमाग की होती है और सभी आयामों में अपने अधिकारों को पाने के लिये सामाजिक बंधनों को तोड़ रही है। हालाँकि अपराध इसके साथ-साथ चल रहा है। भारतीय समाज में सच में महिला सशक्तिकरण लाने के लिये महिलाओं के खिलाफ बुरी प्रथाओं के मुख्य कारणों को समझना और उन्हें हटाना होगा। जरुरत है कि हम महिलाओं के खिलाफ पुरानी सोच को बदले और संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों में भी बदलाव लाये।

निजता का अधिकार पर निबंध

Introduction :

मनुष्य की ज़रूरतें सबसे प्राथमिक ज़रूरतों जैसे कि भोजन, कपड़े और आश्रय से लेकर माध्यमिक ज़रूरतों जैसे शिक्षा, काम और मनोरंजन और आगे की ज़रूरतों जैसे मनोरंजन, भोजन, अवकाश, यात्रा, आदि से शुरू होती हैं। यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि इन सभी जरूरतों और इच्छाओ (wants) में गोपनीयता कहाँ है ? किसी भी सभ्य समाज में गोपनीयता की एक बुनियादी डिग्री एक प्राथमिक आवश्यकता है। जैसे-जैसे गोपनीयता की डिग्री बढ़ती है, यह एक माध्यमिक जरूरत और आगे एक इच्छा में विकसित हो जाती है। निजता का अधिकार नागरिकों की निजता के अधिकार को लेकरकर यह सुनिश्चित करता है की सभी समान रूप से संरक्षित हो और अमीर और गरीब के लिए समान न्याय और अधिकार हो।

 आधार के लिए भारत के निवासियों के व्यक्तिगत डेटा के संग्रह की आवश्यकता होती है, और इसके परिणामस्वरूप चूक होने की संभावना को लेकर विवाद पैदा हो सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इसमें बायोमेट्रिक विवरण जैसे कि आईरिस स्कैनिंग और फिंगर प्रिंट के संग्रह की आवश्यकता होती है जो अनिवार्य रूप से महत्वपूर्ण विवरण हैं और इसका दुरुपयोग किया जा सकता है। साइबर स्पेस एक संवेदनशील स्थान है और यहाँ खतरे की संभावना अधिक है हालांकि, आधार अपने आप में एक सुविचारित कार्यक्रम है ताकि वित्तीय समावेशन सुनिश्चित किया जा सके।

निजता का महत्त्व –

  • निजता वह अधिकार है जो किसी व्यक्ति की स्वायतता और गरिमा की रक्षा के लिये ज़रूरी है। वास्तव में यह कई अन्य महत्त्वपूर्ण अधिकारों की आधारशिला है।
  • दरअसल निजता का अधिकार हमारे लिये एक आवरण की तरह है, जो हमारे जीवन में होने वाले अनावश्यक और अनुचित हस्तक्षेप से हमें बचाता है।
  • यह हमें अवगत कराता है कि हमारी सामाजिक आर्थिक और राजनैतिक हैसियत क्या है और हम स्वयं को दुनिया से किस हद तक बाँटना चाहते हैं।
  • वह निजता ही है जो हमें यह निर्णित करने का अधिकार देती है कि हमारे शरीर पर किसका अधिकार है?
  • आधुनिक समाज में निजता का महत्त्व और भी बढ़ जाता है। फ्रांस की क्रांति के बाद समूची दुनिया से निरंकुश राजतंत्र की विदाई शुरू हो गई और समानता, मानवता और आधुनिकता के सार्वभौमिक सिद्धांतों पर आधारित लोकतंत्र ने पैर पसारना शुरू कर दिया।
  • अब राज्य लोगों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ चलाने लगे तो यह प्रश्न प्रासंगिक हो उठा कि जिस गरिमा के भाव के साथ जीने का आनंद लोकतंत्र के माध्यम से मिला उसे निजता के हनन द्वारा छिना क्यों जा रहा है?
  • तकनीक और अधिकारों के बीच हमेशा से टकराव होते आया है और 21वीं शताब्दी में तो तकनीकी विकास अपने उच्चतम स्तर पर पहुँच चुका है। ऐसे में निजता को राज्य की नीतियों और तकनीकी उन्नयन की दोहरी मार झेलनी पड़ी।
  • आज हम सभी स्मार्टफोंस का प्रयोग करते हैं। चाहे एपल का आईओएस हो या गूगल का एंड्राइड या फिर कोई अन्य ऑपरेटिंग सिस्टम, जब हम कोई भी एप डाउनलोड करते हैं, तो यह हमारे फ़ोन के कॉन्टेक्ट, गैलरी और स्टोरेज़ आदि के प्रयोग की इज़ाज़त मांगता है और इसके बाद ही वह एप डाउनलोड किया जा सकता है।
  • ऐसे में यह खतरा है कि यदि किसी गैर-अधिकृत व्यक्ति ने उस एप के डाटाबेस में सेंध लगा दी तो उपयोगकर्ताओं की निजता खतरे में पड़ सकती है।
  • तकनीक के माध्यम से निजता में दखल, राज्य की दखलंदाज़ी से कम गंभीर है। हम ऐसा इसलिये कह रहे हैं क्योंकि तकनीक का उपयोग करना हमारी इच्छा पर निर्भर है, किन्तु राज्य प्रायः निजता के उल्लंघन में लोगों की इच्छा की परवाह नहीं करता।
  • आधार का मामला इसका जीता जागता उदाहरण है। जब पहली बार आधार का क्रियान्वयन आरंभ किया गया तो कहा यह गया कि यह सभी भारतीयों को एक विशेष पहचान संख्या देने के उद्देश्य से लाई गई है। जल्द ही मनरेगा सहित कई बड़ी योजनाओं में बेनिफिट ट्रान्सफर के लिये आधार अनिवार्य कर दिया गया।
  • यहाँ तक कि आधार पर किसी भी प्रकार के विचार-विमर्श से किनारा करते हुए इसे मनी बिल यानी धन विधेयक के तौर पर संसद में पारित कर दिया गया। इन सभी बातों से पता चलता है कि निजता जो कि लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखने के लिये आवश्यक है, गंभीर खतरे में है।

गोपनीयता का उल्लंघन –

  • सोशल मीडिया चैनलों और साइटों पर गोपनीयता भंग होने के अधिक मामले देखे जा सकते हैं, जिसमें साइबर अपराधियों द्वारा व्यक्ति के जीवन को नष्ट करने वाले जघन्य अपराध करने के लिए लोगों की व्यक्तिगत जानकारी और डेटा को हैक किया जाता है।
  • कई हैकर्स हमारे सोशल मीडिया और बैंकिंग खातों में घुस जाते हैं और लीक हुई जानकारी के जरिए पैसा कमाने के लिए संवेदनशील डेटा चुरा लेते हैं।
  • इतना ही नहीं, बल्कि कई अन्य क्षेत्र भी हैं जो गोपनीयता के उल्लंघन से पीड़ित हैं। इसलिए, यह एक प्रमुख चिंता का विषय है और सरकार को इससे निपटना चाहिए।

इंटरनेट के उपयोग के साथ, इस युग में, फेसबुक और ट्यूटर जैसे सामाजिक नेटवर्क सामाजिक संपर्क के नए रूपों को चला रहे हैं और उपलब्धता ने गोपनीयता संबंधी चिंताओं को बढ़ा दिया है। इसके लिए सरकार को साइबर सुरक्षा प्रणाली को मजबूत करना चाहिए और कानून के माध्यम से आश्वासन देना चाहिए कि निजता के अधिकार का उल्लंघन  न हो और निजी जानकारी को निजी रखा जाये।

 

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Abhilash Kumar

The author Abhilash Kumar

Abhilash Kumar is the founder of “Studyguru Pathshala” brand & its products, i.e. YouTube, Books, PDF eBooks etc. He is one of the most successful bloggers in India. He is the author of India’s the best seller “Descriptive Book”. As a social activist, he has distributed his books to millions of deprived and needy students.

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